मुख्य सामग्री पर जाएँ

Allama Afaque Ahmad Mujaddidiबह्र उल-इरफ़ान: समात व जहाततसर्फ़ात बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा

अध्याय 42 में से 65पृष्ठ 290–305

तसर्फ़ात बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा

मास्टर कौसर इमाम आफ़ाक़ी गोपाल गंज*

अली गुड़ ह मुस्लिम यूनिवर सिटी और जामिआ मलय इस्लामीया से तालीम मुकम्मल करने के बाद में मुलाज़मत करने के दौरान वालिद साहिब से हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रज़ि अल्लाह अन्हु के बारे में पता लगा ।हालाँकि इस वक़्त एक आजाद जेहन दुनिया दार इंसान था लेकिन नाम से ही अलग कैफियत महसूस हुई ।जून 2005 में काफ़ी जिद व जहद के बाद हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रज़ि अल्लाह अन्हु से पहली मुलाक़ात क़न्नौज में हुई ।इसी मुलाक़ात में दिल की कैफियत बदल गई और में न चाहते हुए भी दुनिया से बेज़ार रहने लगा । अक्तूबर 2005 में बीअत का शरफ़ नसीब हुआ ।

नसीहत व करामत ।अप्रैल 2011 में बंदआ नाचीज़ पर हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान का ख़ास कर्म हुआ फ़रमाया मास्टर साहिब तहजद बुला नाग़ा पढ़ें और उसके बाद 500 मर्तबा अल्लाह अलसमद पढ़ कर थोडी देर सौ रहीं इंशा अल्लाह अच्छे ख्वाब आएं गे जून 2011 में हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान के कर्म से आक़ाए नामदार हुज़ूर अहमद मुज्तबा ﷺ का दीदार नसीब हुआ फिर कई बार हुआ जिसकी तरफ़ हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान क़ुद्दिस सिर्रहू ने पहले ही इशारे फ़रमा दीये थे ।

फ़ैज़ व करामत । दौरान सफर सरहिंद शरीफ़ एक हफ्ते सोहबत में रहने का शरफ़ नसीब हुआ वापसी के बाद मेरी कैफियत बदलने लगी क़ुर्ब ख़ुदा वंदी ,इश्क इलाही मुजद्दिद अल्फ़ सानी से मुहब्बत और दुनिया से बे रग़बती का सिलसिला शुरू हो गया ।

फ़ैज़ान मुर्शद ग्रामी क़ुद्दिस सिर्रहू ।35 साला क़ायम शुदा दारउलउलूम इस्लामीया गरीब नवाज़ सियासी तनाज़ा का शिकार हो कर ख़त्म सा हो गया था बका की कोई उम्मीद न थी हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रज़ि अल्लाह अन्हु के क़दम नाज़ की बरकत से 5 साल के मुख़्तसर अरसा में बाब मुजद्दिद अल्फ़ सानी गरीब नवाज़ मस्जिद उलआफ़ाक़ दार इलाकामा सय्यद अबू लख़ीरात लाइब्रेरी और बहुत से दीगर काम अंजाम पज़ीर हुए तालीमी मैदान में शोबा दर्स निज़ामी ,आदादय ता राबिया , हफ़त व क़िरात और असरी तालीम जदेज की बुनियाद पर इलाक़ा में एक अलग शिनाख्त रखता है बे सर्व सामानी के आलम में जो कुछ हुआ और हो रहा है हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रज़ि अल्लाह अन्हु की ज़िंदा करामत है ।

करामत व तसर्फ़ ।हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान सरापा करामत थे । मेरे तीन अज़ीज़ों की मुलाज़मत खतमहोने वाली थी बचने की कोई सूरत न थी एक साहिब को तो मुलाज़मत गंवाने के साथ साथ जेल और लाखों रूपए जुर्माना भी देना था लेकिन हुज़ूर मुर्शद ग्रामी ने फ़रमाया था मुलाज़मत उन शा अल्लाह बुर करार रहे गी फिर ऐसा ही हुआ ।

खुलासा कलाम यह कि इस मर्द क़लंदर के बारे में मुझ जैसा दुनिया वी इल्म रखने वाला किया लिख सकता है जिसको हुज़ूर ﷺ ने अपना बेटा कहा हो और कुतुब जहां के मन्सब पर फ़ाइज़ किया हो उनके दर्जात व मुरातिब अहले मार्फत व नज़र ही जा न सकते हैं ।

*मुहतमिम दार उलउलूम इस्लामीया गरीब नवाज़, मक़ाम सरियाँ इख्तियार गोपाल गंज

बह्र उल-इरफ़ान एक काबिल तक़लीद शख्सियत

मौलाना मुमताज़ आलम मिस्बाही*

कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं ,जो अपनी मिसाल आप होती हैं ,ऐसी शख्सियतें ज़माना के लिए मनारा नूर और आफताब रशद व हिदायत होती हैं ,जिन से बंदगान ख़ुदा रोशनी हासिल करते हैं और अपनी दुनिया और आख़िरत को संवारते हैं ।

बुला शुबह ऐसी ही बर्गुज़ीदा शख़्सियात में से एक शैख़ तरीक़त उस्ताज़ अलालमा ,जामा शरीअत व तरीक़त बह्र उल-इरफ़ान हज़रत अल्लामा अल्हाज उलशाह मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद साहिब क़िबला मुजद्दिदी क़ुद्दिस सिर्रहू उलअज़ीज़ ज़ात सतूदा सिफ़ात थी। आप को अल्लाह तआला ने बहुत से मुहासिन व कमालात का जामा बनाया था ।आप आलम शरीअत भी थे और वाकिफ़ इसरार व रमूज़ मार्फत व तरीक़त भी, फ़क़ीह व मुहद्दिस भी थे और मुनाज़िर व मुतकुल्लिम भी,मुहक़्क़ व मुसन्निफ़ भी थे और वाइज़ व ख़तीब भी मबलग़ व दाई इस्लाम भी थे और मस्लिह व मुरब्बी भी ।ज़हद व वरा और तक़्वा व परहेज़गारी आप का नुमाया वस्फ़ था,तसना और ख़ुद राई व ख़ुद नुमाई से हमेशा दौर रहते थे ।

ब एं हिम्मा मुहासिन व कमालात आप हद दर्जा ख़लीक़ व मिलनसार भी वाक़्य होते थे आप से जो भी मुलाक़ात का शरफ़ हासिल करता था मुताअस्सिर हुए बग़ैर नहीं रहता था ,मौला क्रीम ने आप को दिल दर्द मंद और सोज़ दरों से नवाज़ा था आप कौम व मिलित के लिए हमेशा परेशान और फ़िक्र मंद रहते थे और उन की तरक्की की मुम्किन तदाबीर पर गौर व फ़िक्र किया करते थे ।

आप 1984؁ में सरकार गरीब नवाज़ क़ुद्दिस सिर्रहू उलअज़ीज़ के दादा पीर हज़रत सय्यदना हाजी शरीफ़ ज़िंदनी क़ुद्दिस सिर्रहू की नगरी क़न्नौज में तशरीफ़ लाये और एक छोटी सी मस्जिद से अपनी ख़िदमात का आगाज़ किया और मुख़्तसर सी मुद्दत में दार उलउलूम अहमदिया के नाम से इल्म व इरफान का एक ऐसा पर बिहार गुलशन आबाद फ़रमाया ,जो देखने से ताल्लुक रखता है अज़ीं आप ने कौम मुस्लिम के बच्चों को दुनियावी से आरास्ता व पारास्ता करने के लिए वारसी इंटर कालेज भी क़ायम फ़रमाया मौला क्रीम बतफ़ेल रूफ रहीम व ﷺ उन की ख़िदमात को शरफ़ कबूल अता फ़रमाए उनके दर्जात को बुलंद फ़रमाए और उनके साहबज़ादगान ख़ुलफ़ा व मुरीदैन और तलामज़ा को उनके मिशन को फ़रोग़ देने की तौफ़ीक़ रफ़ीक मरहमत फ़रमाए आमीन बजाह हबीबा उलक्रीम अलैहि अकमल अलसलो व अफ़ज़ल इलतसलैम ।

  • शैख़ अलहदीस व सदर उलमदरसेन जामिआ रिज़वीह मुनाज़िर उलउलूम नयी जामा मस्जिद बाबू परोह कानपुर यू पी

बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम वालरिज़्वान और सफर हरमैन शरीफ़ैन

क़ारी मुहम्मद ज़िया अलक़मर नक़्शबंदी मुजद्दिदी आफ़ाक़ी *

मुर्शिदना सय्यदना इमाम हुदा मुजद्दिद तरीक़त बह्र उल-इरफ़ान मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी नक़्शबंदी क़ुद्दिस सिर्रहू ( मुतवफ़्फ़ी 9/ ज़ी कादा 1440 हिजरी मुताबिक13 /जुलाई 2019 बरोज़ सनेचर)ने हरमैन शरीफ़ैन के सात सफर मुबारक फ़रमाए।

उन में तीन हज मुबारक के लिए और चार उमरे के लियेफरमाए आपने अपनी मुकम्मल हयात तैबा ख़िदमत इस्लाम व संयत व फ़रोग़ तसव्वुफ़ वरूहानियत और जामिआ की तौसीअ व तामीर में सिर्फ़ की कभी अपनी ज़ाती ज़िन्दगी के लिए कुछ भी जमा न किया इस लिए आप पर हज फर्ज़ नहीं हुआ था मगरआपके चाहने वाले इतने ज़्यादा रहे कि हर साल आप से इस मुबारक सफर के लियेगुजारशें करते आप दीनी मस्रुफ़ियात की वजह से उज़्र फ़रमादेते वर्ना मज़ेद सफर मुबारक होते हालाँकि शब् व रोज़ मदीना की याद में तड़पते रहते और हर मजलिस में अक्सर अपने प्यारे नबी अलैहि अस्सलाम का ज़िक्र फ़रमाते और गुलामों को इश्क मदीना की तालीम देते इश्क मदीना आपकी रग रग में समायाहुआ था जोकि तहरीरात व तकरीरात से अयाँ है हर जुमेरात को महफ़िल दरूदख़वानी मुनाक़िद फ़रमाते इश्क रसूल ﷺ में इतना कसरत से रोते कि डाढ़ी मुबारक आंसूओं से तर होजाति आज भी ग़ुलामान बह्र उल-इरफ़ान इस महफ़िल में पाबंदी से शिरकत करते हैं और अपने इस मुहसिन आज़म की पैरवी करके अपने सीनों को मदीना के नूर से पुरनूर करते हैं।

फ़क़ीर आफ़ाक़ी को भी अलहम्द लिल्लाह अपने प्यारे मुर्शद व मुहसिन व मुरब्बी की बा बरकत मईयत में हरमैन शरीफ़ैन के दो सफर मुबारक की सआदत हासिल हुई उन असफार में आप के चश्म देदमामूलात यहाँ कलमबंद कर रहा हूँ।

आपकी मईयत में पहला सफर हज मुबारक12 /अक्तूबर 2012 मुताबिक 16 ज़ुलवादा 1433 ।ठुजर ई में किया आपके साथ हम दो लोग एक फ़क़ीर आफ़ाक़ी दूसरे इंजीनियर हाजी जाकिर हसीन आफ़ाक़ी क़न्नौज शरीक सफर रहे।

दूसरा सफर उमरा मुबारक 19/मई 2016 मुताबिक 12 शाबान 1437उमरा मुबारक का यह सफर आपका आखिरी सफर था इस सफर मुबारक में आपके साथ तक़रीबा 85 मर्द व ख़वातीन जिन में आपके अहले ख़ाना और मुरीदैन व मुहबीन और जामिआ के असातिज़ा शरीक सफर होकर आपकी बरकतें हासिल करते हुए उमरा के शरफ़ से मुशर्रफ़

हुएआज भी मुर्शद ग्रामी की यादें क़ुलूब को रंजीदा करती हैं और मुर्शद की शफकतें, आपकी बातें और क़दम क़दम पर दीनी रहनुमाई बहुत याद आती है आपका हरिहर लम्हा इश्क मुस्तफ़ा और इताअत मुस्तफ़ा से पर होता था।

मामूलात हरमैन शरीफ़ैन:

अब आप के हरमैन शरीफ़ें के मामूलात जिन का आप के साथ रह कर मुशाहिदा किया अब तक फ़क़ीर की याद दाश्त के निहां ख़ाने में महफूज़ हैं उन्हें कलमबंद करने की सआदत हासिल कर रहा हूँ शायद किसी के काम आएं और फ़क़ीर को भी मुर्शद के तुफ़ैल बरकतें हासिल होजाएं।

हमारे हुज़ूर अलैहि अर्रहमा जब सफर मदीना का क़सद फ़रमाते तो काफ़ी दिन पहले ही से कसरत से हरमैन शरीफ़ैन के फ़ज़ाइल व मिसाइल बयान फ़रमाते। और सफर से एक दिन क़ब्ल शब् में महफ़िल मीलाद शरीफ़ मुनाक़िद फ़रमाते और इस में नात व हमद कसरत से पढ़वा ते और हरमैन शरीफ़ैन बिलख़सूस दयार महबूब ﷺ की अज़्मतों पर इस अंदाज़ में रोशनी डालते कि आशिक़ान मुस्तफ़ा की आंखें अशकबार हो जातें ऐसी बाफ़ीज़ महफ़िल मीलाद अब फ़क़ीर की नज़र में नहीं आती जो कि नूर व फ़ैज़ान से भरपूर हो ती थी उसके बाद आप तमाम अहबाब व मुरीदैन से मुलाक़ात फ़रमाते और जाने के वक़्त तक आप के चाहने वालों का तांता बंधा रहता था ।इसी महफ़िल में आप अपने हुक़ूक़ और दूसरों के हुक़ूक़ के हवाले से गुफ़्तगू फ़रमाते हुक़ूक़ उलईबाद के मामले में बहुत एहतियात फ़रमाते हर एक से बुला झिझक माफी मांग लेते लोग सन कर शर्मिंदा होते कि हुज़ूर जैसा बुजुर्ग और हम से माफी ! जिन के बारे में हम गुलाम इतलाफ़ हक़ अलाबद का तसोर भी नहीं करते इस मौका पर लोगों की कसरत इस क़द्र हो जाती कि जामिआ और घर के बाहर हर तरफ़ इंसान ही इंसान नज़र आते इस के बावजूद आप के मामूलात यौमिया में सर मो फ़र्क़ नहीं आता हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अलरहम वालरिज़्वान की खासियत थी कि लोगों की कसरत और काम कितना ही अहम क्यों न हो लेकिन वक़्त नमाज़ मस्जिद जाकर जमात से नमाज़ अदा फ़रमाते और इस के बाद मुराक़बा व ज़िक्र फ़रमाते यह चीज़ पूरी हयात मुबारका में रही अज़ीमत पर अमल हमेशा रहा कभी भी कोई सुन्नत बल्कि मुस्तहब तक किसी की वजह से तर्क न फ़रमाया और अक्सर दूसरों को तलक़ीन फ़रमाते कि इत्तिबा सुन्नत लाज़िम रहे और किसी एक काम की वजह से दूसरे काम पर और मामूलात मशाइख़ पर फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए इस का हमेशा ख़याल रखो !

घर वालों और मुताल्लिक़ीन को ख़ास कर जामिआ के असातिज़ा व कारकुनान को ख़ास हिदायात फ़रमाते इस के बाद

आप घर से निकलते वक़्त दो रकात नमाज़ सफर अदा फ़रमाते और दा सफर परहते फिर मुलाक़ात व मुसाफ़ा करने के बाद गाड़ी में बैठते और दा सफर पढ़ते घर से एयरपोर्ट रवाना होते दौरान सफर गाड़ी में कसरत दुरूद शरीफ़ फ़रमाते या फिर अज़मत सरकार बयान फ़रमाते कोई ज़रूरी बात होती तो इरशाद फ़रमादेते वर्ना सुकूत इख्तियार फ़रमाते एयरपोर्ट पहुँच कर सब चाहने वाले लोग जो कि आप को वहाँ तक छोड़ ने जाते थे उन से यके बाद दीगरे मुसाफ़ा व मुअनिक़ा फ़रमाते और फिर एयरपोर्ट में दाखिल होते ज़रूरी दस्तावेजी कार्रवाई पूरी कराते और इस दौरान भी ज़िक्र व शगल जारी रखते अगर वक़्त नमाज़ होता तो सब से पहले नमाज़ बा जमात अदा फ़रमाते नमाज़ हमेशा जमात ही से अदा फ़रमाते क्योंकि हर सफर पर उमूमन आप के साथ कोई न कोई मुरीद या शागिर्द रहता था।

इस लिए सफर में भी जमात से नमाज़ अदा फ़रमाते, आप एयरपोर्ट ही पर एहराम बांधते और दो रकात नमाज़ अदा फ़रमाते और नियत उमरा करने के बाद तलबीह बावाज़ बुलंद पढ़ते इस के बाद हवाई जहाज़ में सवार होते और तलबीह पढ़ते और पुराहुआई सफर द्रोदशरीफ़ और अपने अज़कार या कुतुब बेनी में गुज़ारते और जद्दा पहुँच कर वहाँ की इमीग्रेशन की मशगूलयात से फ़ारिग़ होते उमूमन क़न्नौज वाले हज़रात लखनऊ एयरपोर्ट से जद्दा की फ्लाइट से जाते इस लिए शाम का वक़्त (अस्र विमग़रब) होता पहले नमाज़ अदा फ़रमाते और एक वक़्त की नमाज़ तो फ्लाइट ही में अदा करनी पड़ती जद्दा के एयरपोर्ट पर भी पहले नमाज़ अदा फ़रमाते फ़क़ीर नेबार हा देखा कि अगर कभी नमाज़ में ताख़ीर हुई तो चेहरा मुबारका का रंग मुतग़य्यर होने लगता पेशानी से पसीना नमूदार होने लगता और बारबार सिर्फ़ और सिर्फ़ नमाज़ की बात करते बिलआख़िर नमाज़ अदा फ़रमालीते ।

जद्दा एयरपोर्ट से मक्का शरीफ़ के लिए रवाना होते जद्दा से मक्का शरीफ़ रवानगी केवक़्त बहुत ज़्यादा इन्हिमाक बढ़ जाता और बहुत ज़्यादा काब अल्ला शरीफ़ की तरफ़ मुतवज्जा होते शहर मक्का में पहुँच कर दुआ पढ़ते और शकर अदा करते इस के फ़ौरन बाद सामान रोम में रखवा कर हाजित होती तो फ़ारिग़ होकर फोरा वुज़ू करते और हरम शरीफ़ की तरफ़ रवाना होजाते सफर की थकावट की बिलकुल प्रवाह नहीं करते तलबीह का विरुद फ़रमाते रहतेहरम शरीफ़ में दाखिल होकर पहले दुआ पढ़ते और काब अल्ला शरीफ़ पर नज़र पड़ते ही हदीस में मज़कूर दुआ पढ़ते अग्रणिमाज़ फर्ज़ का वक़्त होता तो नमाज़ अदा फ़रमाते वर्ना दौरकात नमाज़ नफ़ल अदा करते और ज़मज़म नोश फ़रमाते और ज़मज़म पीने के वक़्त की दुआ अललहम् अनी इसिलिक उलमा नाफ़आ वरज़्क़ा वासुआ वामला मुतक़बला विश्फ़ा मिन कल

दा पढ़ते फिर आप तवाफ़ काबा शुरू फ़रमाते तवाफ़ से पहले इज़्तिबा फ़रमालीते यानी चादर सीधे कंधे से निकाल कर सीधे हाथ के बगल के नीचे से निकाल कर इस के दोनों प्ले बाएं कंधे पर डाल लेते और हिज्र अस्वद के क़रीब या सामने लाइट के महाज़ी होकर तवाफ़ की नियत :अललहम् अरीद अलतवाफ़ बेतुक उलहराम फीसरह ली वितक़िबला मनी कहते हुए दोनों हाथों से हिज्र अस्वद का इस्तलाम फ़रमाते यानी चूम लेते और यह दुआ पढ़ते बिस्म अल्ला वाल्हम्दुलिल्ला वाल्लाह अकबर वालसला वस्सलाम अली रसूल अल्ला सिल्ली अल्ला अलैहि वसल्लम। पहले तीन चक्रों में रमल फ़रमाते यानी छोटे छोटे क़दम से बहादुरों की तरह चलते जैसा कि हदीस में आया है आप तवाफ़ के दौरान दुआ खास पढ़ना लाज़िम नहीं फ़रमाते और कोई मालूम करता तो तीसरा कलिमा और सुबहान अल्ला, वालहमद लिल्लाह, विला इला उला अल्ला, वाल्लाह अकबर और द्रोदशरीफ़ वगैरह के लिए फ़रमा देते कि यह काफ़ी हैं। रुकन यमानी पर :अललहम् अनी इसिलिक उलाफू वालाफ़ीत फि उद्दीन वालदनिया विलाख़िर ) और हिज्र अस्वद के पास जो कि मक़ाम मुस्तजाब है: रबिना आतना फ़ी अलदन्या हसन व फ़ी इलआख़िरत हसन वक़्ना अज़ाब अलनार और आप मक़ाम इब्राहिम पर खासकर दुरूद इब्राहीमी पढ़ते तवाफ़ के सात चक्र मुकम्मल फ़रमा कर मक़ाम इब्राहिम अलैहि अस्सलाम पर या जहां आपको जगह मिल जाती वहाँ दो रकात नमाज़ कंधे ढक कर अदा फ़रमाते और आप ज़म ज़म भी नोश फ़रमाते दौरान तवाफ़ बहुत एहतियात से चलते निगाहें नीची रखते या फिर बीत अल्लाह की तरफ़ नज़र फ़रमाते अक्सर तवाफ़ के दौरान मुख़तलिफ़ किस्म के लोग आप से मुसाफ़ा करते और बाज़ पर इसरार बंदों को फ़क़ीर आफ़ाक़ी ने भी देखा कि वह इशारात में आप से कुछ कलाम फ़रमा लेते और अआप भी मुस्कुरा देते बाज़ तो आप की पेशानी को बोसा तक ले लेते अल्लाह तआला ने आप को हसन सीरत के साथ साथ हसन सूरत में ला जवाब इन्फ़िरादियत अता फ़रमाई थी जो देखता एक बार जरूर मुड़ कर देखता था।

सफ़ा विमरोह की सई:

फिर तवाफ़ से फ़राग़त के बाद हिज्र अस्वद का इस्तलाम करते और सफ़ा व मरोह की सई शुरू फ़रमाते सफ़ा पहाड़ी पर चढ़ते वक़्त कुरआन मुक़द्दस की यह आयात तिलावत फ़रमाते ।अन् अलस्सफ़ा व उलۡमरۡवत मनۡ शोआइर अलल्लाआ ۚ फमनۡ हिज् उलۡबीۡत अव आۡतिमिर फला जिनाह अलीۡह उन्नۡ यदुत्पोवफ़ बहुमा ؕ व मनۡ ततूवा ख़ीۡरब्बा ۙ फ़ान्न अलल्लाआ शाकिरٌ अलीۡमٌ ﴿158﴾

फिर काब अल्लाह की तरफ़ मुँह करते और अल्लाह की हमद व सना ओर्कलिमा तौहीद पढ़ कर सई की दुआ फ़रमाते अललहम्

अनी अरीद अलसई बेन अलसफा वाल्मरो फीसरह ली व तक़िबला मनी सई के दौरान ज़िक्र व दुआ में मशगूल रहते जब ग्रीन लाइट आती तो दरमियानी चाल चलते और यह दुआ पढ़ते। रब अग़फ़िर व अरहम व तत्जावुज़ उम्मा ताल्लुम वाणित ताल्लुम मा लानाल्म अंक उन्नत अलाइज़ अलाकरम।

हरी लाइट से गुजरने के बाद चौथा कलिमा कसरत से पढ़ते यहाँ तक कि मरोह पहाड़ी आजाती इस पहाड़ी के निचले हिस्से पर खडे होकर इसी तरह करते जैसा कि सफ़ा पहाड़ी पर किया था फिर इस के बाद सफ़ा की जानिब वही सब करते जो पहले किया थाऔरपढ़ते हुए चलते इसी तरह सात फेरे मुकम्मल फ़रमाते और सई की तकमील के बाद मस्जिद में दो रकात नमाज़ अदा फ़रमाते उसके बाद अगर कोई नमाज़ का वक़्त होता तो पहले नमाज़ अदा करते और अपने औराद व अशग़ाल मुराक़बा और तिलावत कुरआन पाक करने के बाद मस्जिद से बाहर निकल कर सर मुंडाकर उमरा मुकम्मल फ़रमाते फिर एहराम उतार कर कपड़े ज़ेब तन फ़रमा लेते थे।

हरम मक्का के यौमिया मामूलात :

आप तहजद की नमाज़ कभी मस्जिद हराम शरीफ़ आकर अदा फ़रमाते और कभी रोम पर ही अदा फ़रमाते और फ़ज्र की नमाज़ की अदाएगी के लिए होटल से तैयार हो कर निकलते पहले इतर लगाते जितने लोग साथ में होते अपने दस्त मुबारक से सब को इतर लगाते और 100 बार सुबहान अल्लाह वबहमदा सुबहान अल्लाह उलअज़ीम की तस्बीह पढ़ते हुए हरम को रवाना होते फ़ज्र में जाते वक़्त कोई भी कलाम न फ़रमाते ज़िक्र व दुरूद में मशगूल रहते हरम पहुँच कर नमाज़ फ़ज्र अपनी जमात से अदा फ़रमाते और इस के बाद आदत के मुताबिक मुराक़बा और शिजरा ख़वानी और फ़ातिहा ख़वानी फ़रमाते उसके बाद अशराक़ विचाश्त की नमाज़ अदा करते बादा दलायल अलख़ैरात शरीफ़ पढ़ते और कुरआन क्रीम की तिलावत देर तक फ़रमाते तमाम औराद व अशग़ाल से फ़ारिग़ हो कर काब अल्लाह का तवाफ़ करते और फिर होटल तशरीफ़ लाते रास्ते में हसब ज़रूरत मुख़्तसर कलाम फ़रमाते अक्सर खामोश रहते और रोम पर पहुँच कर निहायत क़लील नाश्ता तनावल करते। और फिरकसी किताब के मुताला और ज़्यादा तर तो आप किताब ही तहरीर फ़रमाते रहते औकात फुर्सत में कुतुब तहरीर करनाआपका महबूब मशग़ला था वक़्त कासहीह इस्तेमाल और उसकी क़द्र वकीमत कोई आप से सीखे।पूरे हज और उमरा मुबारक के बक़ीया वक़्त में कमरे पर भी आप मशगूल रहते हज के तक़रीबा ً चालीस दिन फ़क़ीर आपकी मुबारक सोहबत वख़दमत में रहा आप को बहुत कम आराम करते हुए पाया थोडी देर के लिए लेटे में पीर दबाने लग जाता कुछ देर गुजरती कि आंख खिल जाती उठ कर बैठ जाते और फिर लिखने में

मश्शग़ोल हो जाते। और मुझे आराम के लिए फ़रमाते दोपहर का खाना खाकर थोडी देर कैलूला करते और फिर ज़ुहर की नमाज़ के लिए इसतरह निकलते कि वहाँ के मुताबिक अस्र की अज़ान जो कि सऊदीया में साया मसल के तहत तक़रीबन तीन बजे ही पढ़ लेते हैं और अहनाफ़ के यहाँ साया मसलेन है कि अस्र का वक़्त वहाँ केतक़रीबन पांच बजे शुरू होता है इस तरह उन की अस्र के वक़्त और अपनी ज़ुहर के वक़्त में मस्जिद हराम शरीफ़ पहुँच कर ज़ुहर की नमाज़ बाजमाअत अदा फ़रमाते । ज़ुहर के बाद ज़िक्र व मुराक़बा फ़रमाते और फिर तिलावत कुरआन में मशगूल हो जाते याफर तवाफ़ करते और कभी अहबाब के साथ मस्जिद आयशा से उमरा के लिए जाते और हसब साबिक़ उमरा करते। एक उमरा मस्जिद जाराना से भी अदा फ़रमाते थे।और वहाँ कब्रिस्तान में सहाबा कराम के मज़ारात की हाजिरी भी देते थे।

आप ने कभी भी किसी बदक़ीदा की इक़तिदा नहीं फ़रमाई वहाबियों की इक़तिदा उन की बदकीदगी और गुस्ताखियों की वजह से अहले सुन्नत विजमाअत के यहाँ जायज़ नहीं मगर अपनी हर नमाज़ अक्सर जमात से मस्जिद ही में अदा फ़रमाते और फिर जब अंदालाहनाफ़ अस्र का वक़्त आजाता तो अस्र की नमाज़ अदा फ़रमाते और बाद अस्र हसब मामूल अपने ज़िक्र व मुराक़बा में मशगूल हो जाते मग़रिब तक मुराक़बा फ़रमाते। और अस्र के बाद हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम रज़ि अल्लाह तआला अन्हु से मनक़ूल यह इस्तिग़फ़ार 25 मर्तबा इस्तिग़फ़िरुल्लाह अलज़ी ला इला उला हो अलरहमन अलरहीम उलही उलक़य्यूम अलज़ी ला यमवत व अतूब इलिया रब अग़फ़िरली पाबंदी से पढ़ा करते थे ।

बादा मग़रिब की नमाज़ अदा फ़रमाते और अवाबेन छ रकात अदा फ़रमाते और कभी पूरी बेस रकात भी अदा फ़रमाते जैसा कि हदीस में है उन बेस रकात के ताल्लुक से फ़क़ीर से हुज़ूर मुर्शदी उलक्रीम ने फ़रमाया कि एक हदीस में है कि आका अलैहि अस्सलाम ने बेस रकात अवाबेन पढ़ी लहज़ा इस पर अमल हो जाए और सुन्नत की अदाएगी भी हो जाए अगर चह हदीस ज़ईफ़ है फ़क़ीर को बखूबी याद है कि आप ने हज के फ़ौरन बाद मग़रिब अदा फ़रमाई और इस वक़्त आप भी बहुत ही थके हुए थे क्योंकि मिना व मुज़दल्फ़ा और अर्फ़ात के मैदान से वापसी तक मुकम्मल सफर पैदल किए हुए थे और इस थकान के बावजूद आप ने बेस रकात अदा फ़रमाई फ़क़ीर ने भी अपने मुर्शद बाकमाल की तबईत में मुकम्मल बेस रकात अदा कीं।ज़ईफी,विजस्मानी कमज़ोरी और शगुर के मरीज होने के बावजूद हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान इस कसरत से इबादत में मसरूफ़ रहते कि जवान भी रषिक करते और हैरत में पड़ जाते आप की इलो हिम्मत का अंदाजा इस से लगायाजासकता है कि हज के मौका पर

मनी की रवानगी के वक़्त जब हुज्जाज कराम ट्रेन और बसों से जाते हैं इस वक़्त आप ने हम दोनों यानी फ़क़ीर आफ़ाक़ी और इंजीनियर अल्हाज जाकिर ख़ान आफ़ाक़ी से फ़रमाया कि एक हदीस के मुताबिक जो आदमी मक्का मुकर्रमा से पैदल अर्फ़ात तक पैदल हज करेगा उसको हर क़दम पर 700 नेकियां मिलती हैं और हरम मुक़द्दस की हर नेकी के बदले एक लाख नेकियां मिलती हैं एक लाख को अगर सात सौ में ज़रब दिया जाए तो गोया हर क़दम पर हाजी को सात करोड़ नेकियां मिलेंगें।फ़रमाते कि इतना सुनहरा मौका और बड़ी नेमत नहीं गंवाना चाहिए लहज़ा पैदल ही सफर करेंगे इस तरह आपने हम गुनहगारों को भी इस शरफ़ से मुशर्रफ़ फ़रमाया ।इस वाक़ा से आपके इलो हिम्मत का पता लगता है अवरण्युकी के कितने हरीस थे उसका अंदाजा बखूबी होता है जिस्मानी राहत को बिलकुल तरजीह नहीं देते थे हमेशा कसरत इबादत पर उभारते थे- बहरहाल मग़रिब की नमाज़ के बाद जो वक़्त मिलता इस में दुरूद व तस्बीहात पढ़ते दुरूद शरीफ़ कम अज़ कम साढ़े तीन सौ मर्तबा जैसा कि आपने अपनी किताब ज़िक्र व फ़िक्र में नकल फ़रमाया है और बादा इशा की नमाज़ अदा फ़रमाते और हसब मामूल मुराक़बा के बाद तवाफ़ अदा फ़रमाते और फिर मस्जिद हराम सेकमरे पर तशरीफ़ लाते रास्ते में बुजुर्गों के वाक़ियात व इर्शादात व मामूलात या कौम व मिलित और दीन के हवाले से गुफ़्तगू फ़रमाते हुए आते और कमरे पर पहुँच कर खाना तनावल फ़रमाते फिर कुछ अहबाब ज़ियारत व मुलाक़ात के लिए आते तो उनको कुछ नसाइह फ़रमाते और आदाब हरमैन बयान फ़रमाते कुछ लोग अक्सर बाद तआम या शाम को मिसाइल पूछने आते तो उनकी दीनी मिसाइल में रहनुमाई फ़रमाते उलग़र्ज़ सुबह ता शाम ज़िक्र व इबादत में गुजरता मेरी मालूमात में एक मिनट भी मासवा अल्लाह में नहीं गुजरता उसके बाद कुछ देर फिर किताब तहरीर फ़रमाते और फिर आराम करने के लिए बिस्तर पर लेट जाते फ़क़ीर को पीर दबाने की ख़िदमत का शरफ़ मिल जाता और इस दौरान बड़ी कीमती नसीहतें या बुजुर्गों के अक़्वाल व इर्शादात और दीनी सरगर्मियों के हवाले से गुफ़्तगू फ़रमाते और थोडी देर बाद मुझ जिब्रा पीर दबाने से मना फ़रमादेते और आराम के लिए कहते थे फ़क़ीर आपके इसरार पर कदमों की जानिब अपनी चारपाई पर सौ जाता तहजद के वक़्त मुझको भी हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान जगा देते और तहजद अदा फ़रमाते और फिर हम लोग हरम शरीफ़ के लिए रवाना होजाते इसी तरह यह रोजाना का मामूल रहता था ।

ज़ियारात:

जन्नत उलमाल्ला शरीफ़ की ज़ियारत के लिए बड़े शौक से जाते और रास्ते में खानदान नुबुव्वत के अफराद

बाइलख़सूस उम उलमोमिनीन हज़रत ख़दीजा अलकबरी रज़ि अल्लाह अनहा के फ़ज़ाइल और आपकी इनायात जो कि आपके उपर थीं बयान फ़रमाते एक बार फ़रमाया कि अम्मां ख़दीजा अलकबरी रज़ि अल्लाह अनहा बड़ी मेहरबान व मुशफ़िक़ा हैं आपकी वसातत से बहुत जिल्द काम होजाता है इस लिए आप जन्नत उलमाल्ला में बाइलख़सूस आपके मजार के सामने रो रोकर दुआ मांगते थे हालाँकि अब वहाँ सऊदी हुकूमत ने मज़ारात के निशानात मिटादए हैं मगर पुराने लोगों को बालवासता निशानात कब्र आज भी मालूम हैं। इस कब्रिस्तान में हज़रत उम उलमोमिनीन ख़दीजा अलकुबरा रज़ि अल्लाह अनहाआऔर हज़रत अब्द उलमतलब और हज़रत असमा बन्त अबी बुकर हज़रत अब्द अलरहमन बिन अबू बुकर हज़रत अब्द अल्लाह बिन ज़ुबैर हज़रत फिजील बिन अब्बास और हज़रत अबदुल्लाह बिन उम्र रज़ि अल्लाह अन्हुम वानहन अजमईन और हुज़ूर सिल्ली अल्लाह अलैहि व आला व सल्लम के साहबज़ादगान हज़रत कासिम, हज़रत तैब, हज़रत ताहिर रज़ि अल्लाह अन्हुम अजमईन उनके अलावा बे शुमार ताबईन रहिमहुम अल्लाह और औलिया कराम मदफ़ून हैं हुज़ूर सिल्ली अल्लाह अलैहि व आला व सल्लम ने इसी कब्रिस्तान की बाबत फ़रमाया कि इस मुक़द्दस कब्रिस्तान के सत्र हजार अफराद बुला हिसाब जन्नत में जाएँ गे।

आप हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान जब जन्नत उलमाली ٰتشریف ले जाते तोवहां बारी बारी मुख़तलिफ़ सहाबा कराम रिज़ू उन अल्लाह अलैहिम अजमईन के मजार अत् पर फ़ातिहा ख़वानी फ़रमाते इस के बाद तशरीफ़ ले आते।

और मक्का शरीफ़ की दीगर ज़ियारात जो कि टूर वाले बस के ज़रिया कराते हैं आप वहाँ भी तशरीफ़ ले जाते मगर आप ज़्यादा तर ज़िक्र व अज़कार में मशगूल रहते हरा और सौरपहाड़ी वगैरह की ज़ियारत दौर से ही फ़रमाते उपर नहीं चढ़ते बल्कि वहीं ज़िक्र अलहि में मशगूल रहते इस के अलावा आप मक्का शरीफ़ से क़रीब हज़रत उम उलमोमिनीन हज़रत उम स्लिमा रज़ि अल्लाह अन्हा के मजार पाक की ज़ियारत के लियेतशरीफ़ ले जाते अब सऊदी हुकूमत ने वहाँ पाबंदी लगा दी है मेरी मालूमात में मक्का शरीफ़ की यही ज़ियारात थी जो कि मज़कूर हुईं आप के साथ फ़क़ीर को भी मयस्सर आएं।

महफ़िल मीलाद :

मक्का शरीफ़ में आप अपने रोम पर मीलाद शरीफ़ और नात ख़वानी का एहतिमाम फ़रमाया करते और बड़ी बारौनक महफ़िल हुआ करती हज के मौका पर अक्सर लोग आप के बारे में मालूमात कर के मिलने के लिए आजाते अरब और दीगर मुमालिक पाकिस्तान वगैरह के उल्मा व मशाइख़ भी मुलाकातें फ़रमाते हसब मौका उन से कौम व मिलित की मिसाइल पर गुफ़्तगू होती ख़ास कर सऊदीया में वहाबियत के मुज़िर असरात और वहाबियों की ज्यादतियों से

बड़े नालां रहते अक्सर मुक़ामात पर मतू और पोलिस जो कि हर सन्नी को परेशान कर ते हैं अपना दीन समझते हैं उसको देख देख कर बहुत रंजीदा होते और वह लिटरेचर जिस के ज़रिया वह लोग अपने फ़ासद अक़ाइद मुख़तलिफ़ ज़बानों में किताबों के ज़रिया नशर कर रहे हैं इस से बहुत खफा होते हज के मौका पर मुझ से फ़रमाया कि जितनी किताबें वहाबी स्टाल पर फ्री तकसीम करते हैं हासिल करू ताकि उन को पढ़ कर उन के बातिल नज़रियात का रद्द कर के अवाम एलिनास को उनके दाम फरेब से बचाया जा सके इस मौका पर आप ने एक किताब वहाबियों के बातिल अक़ाइद के रद्द में तहरीर भी फ़रमाई और एक किताब लताइफ़ मदीना का तर्जुमा बनाम रवाइह सकीना फ़रमाया आप फ़रमाते हैं इस किताब में हज़रत मासूम रज़ि अल्लाह अन्हु के वह मुक्षु फ़ात दर्ज हैं जो कि आप हरमैन शरीफ़ैन के मुख़तलिफ़ मुक़ामात मुक़द्दसा के हवालेसे बयान फरमाएं हैं और हर मक़ाम मुक़द्दस व सहाबा इकराम के मक़ाम व अनिवार की बरकात को अपने कश्फ़ के ज़रिया बयान फ़रमाया है वगैरह वगैरह मज़ेद फ़रमाते कि हुज़ूर मुजद्दिद अल्फ़ सानी अलैहि अर्रहमा वालरिज़्वान के इस शहजादे की शान व अज़मत इस दौर में ऐसी थी कि उल्मा मशाइख़ हरमैन शरीफ़ैन आप के दस्त हक़ परस्त पर बीअत हो कर इकतिसाब फ़ैज़ कर ते थे और मजालिस रूहानियत जहां लगती थी ज़िक्रो मुराक़बा का माहौल रहताथा आज जिस तसव्वुफ़ वरूहानियत का वहाबी इंकार कर ते हैं इसकेतमाम उमूर हरमैन शरीफ़ैन में होते थे इस ताल्लुक से आप ने अपनी एक और किताब"कश्फ़ व इलहाम की शरई हैसियत:में तफ़सीली बहस फ़रमाई है बहरहाल हरम शरीफ़ में अक्सर मशाइख़ इकराम के हवालेसे गुफ़्तगू फ़रमाते थे और तरबीयत के लियेआन के मामूलात व बरकात और रूहानी मामलात भी कभी कभी ज़िक्र फ़रमाया करते थे इस तरह मक्का शरीफ़ में जब तक रहते मुतज़किरा बाला तरीके पर मामूल रहता और फिर जब मदीना मुनव्वरा की रवानगी का वक़्त आता तो आखिरी तवाफ़ फरमातेऔर गुड़ गड़ा कर बारगाह एज़दी में दुआएं मांगते और फिर मदीना शरीफ़ के लिए रवाना हो जाते।

मदीना शरीफ़ के मामूलात

आदाब मदीना मुनव्वरा :

जब मदीना शरीफ़ के लिए रवाना हो ते तो आदाब की सख्त तलक़ीन फ़रमाते और दुरूद शरीफ़ की कसरत फ़रमाया करते कि क़ल्ब को हर ख़याल से खाली करू और तवज्जो सिर्फ़ बारगाह रसूल की तरफ़ रहे क्योंकि हम

महबूब ख़ुदा सुब्हानहू की बारगाह में हाजिरी देने जा रहे हैं सारी इबादतों की क़बूलीयत उन की नजरो इनायत पर मुनहसिर है आप की एक निगाह इलतिफ़ात दुनियाओ आख़िरत की मेराज है आप राजी हो जाएँ तो रब राजी हो जाए आप की ही सिफारिश से फरमान कुरआन के बमूजब गुनह गारों की दुआऔर तौबा की क़बूलीयत हो ती है लहज़ा हर वक़्त आप की तरफ़ मुतवज्जा रहो एक लम्हा के लिए भी गाफिल न हो अक्सर फ़रमाया करते कि हुज़ूर सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि वसल्लम की रहमत आम है मगर जो उम्मती आप से जैसी उम्मीदें ले कर आता है वैसा ही इस पर कर्म फ़रमा ते हैं जो आप के बारे में जैसा गुमान व अक़ीदा रखता है वैसा ही पाता है अगर आप की नियत है कि सरकार नवाजें गे तो जरूर नवाज़ दिए जाएँ गे इस दर से कोई खाली नहीं जाता फ़रमाते कि आप की तरफ़ से बे एतिनाई और ला प्रवाही बहुत मुज़िर है क्योंकि यह भी हदीस से साबित है कि सरकार ने फ़रमाया है कि में तुम में सब से ज़्यादा बे नयाज़ हो M और अल्लाह अग़ैरमनी यानी मुझ से भी ज़्यादा बे नयाज़ है लहज़ा इस की बारगाह से फ़ैज़ व नूर और नज़रेकरम के हुसूल के लिए आप की बारगाह के मुक़रबीन सहाबा कराम अलैहिम इलरिज़्वान और औलिया कामलियन नीज़ अपने सिलसिला के मशाइख़ अजाम के तवस्सुत से अर्ज़ करते रहीं उन शा इअल्ला तआला बहुत जिल्द फ़ाइज़ अल्मराम और फ़ैज़याब होंगे फ़रमाते कि मदीना मुनव्वरा के ज़र्रा ज़र्रा का अदब मलहूज़ रहे यहाँ किसी किस्म की सौ अदबी दुनिया व आख़िरत का बड़ा ख़सारा बिन सकती है हरमैन शरीफ़ैन में जब तक रहो बुलंद आवाज़ से गुफ़्तगू न करू और खासकर मुवाजिहा शरीफ़ और मस्जिद नबवी शरीफ़ में ।जैसाकि कुरआन में हुक्म दिया गया है कि नबी ﷺ की बारगाह में आवाज़ बुलंद न करू वर्ना तुम्हारे सारे आमाल बर्बाद हो जाएँ गे यह कुछ आदाब थेजो कि आप से फ़क़ीर ने सुने वह बयान कर दिए मौला तआला सब को ताजदारमदीना का इश्क और अदब की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

मदीना के पूरे रास्ते नाअतें पढ़ वाते और ख़ुद भी अशआर गुनगुनाते रहते और दुरूद शरीफ़ पढ़ते जों जों मदीना क़रीब आता आप की कैफियत बदलती जाती दिल व ज़बान पर अपने आका का ही ज़िक्र जारी रखतेजब शहर मदीना क़रीब आता तो गुंबद खिज़्रा की ज़ियारत के लिए बे करार हो जाते क्योंकि गुंबद खिज़्रा शहर के रोड से ही नज़र आने लगता है शहर में गाड़ी दाखिल हो ते ही गुंबद खिज़्रा की तरफ़ लो लगाते और उठ उठ कर गुंबद खिज़्रा की ज़ियारत फ़रमाते इसी हालत इश्क में सलाम पेश करते । यहाँ तक कि मंज़िल पर पहुँचते गाड़ी क्योंकि पहले होटल ही लेकर जाती है सामान वगैरह होटल में रखा जाता है और फिर हाजी हज़रात वहाँ से हरम रवाना होते हैं।

हाजिरी बारगाह रसूल ﷺ:

मुनव्वरा पहुँचते और कमरे ही से ग़ुस्ल फ़रमाकर नये कपड़े ज़ेब तन फ़रमाते ,इतर लगाते और मस्जिद नबवी शरीफ़ के लिए रवाना हो जाते अशकबार आंखों से और चहर पर मुस्कुराहट के साथ मस्जिद नबवी में दाखिल हो ते और नमाज़ अदा फरमाने के बाद सब से पहले बाब अस्सलाम से बार गाह नबवी अलैहि अस्सलाम में हाजिरी देते और बाब अस्सलाम से आहिस्ता आहिस्ता दुरूद शरीफ़ पढ़ हुए हुज्रा मुबारका के सामने पहुँच कर निहायत मुतवाज़आना अंदाज़ में सलाम पेश करते और निगाह नीचें रहतीं एक क़दम क़दम बड़ी एहतियात से उठाते तालीमा बांदहे रहते और फ़ातिहा ख़वानी करते और दुआ मांगते । बाब अस्सलाम केदाखिल होते वक़्त लोगों को इतर भी लगाया करते देर तक मुवाजिहा शरीफ़ में क़िबला की जानिब पुश्त कर के खडे खडे सलाम पेश फ़रमाते और आंखें बंद फ़रमा कर मुराक़ब रहते इस अंदाज़ में बारगाह नबवी में आप ऐसे रहते जैसा कि मुरीद अपने शैख़ और एक आशिक अपने माशूक़ की बारगाह में होता है फ़क़ीर ने अपने मुतअद्दिद असफार मदीना में अब तक ऐसी कोई शख्सियत इस कैफियत में नहीं देखी इस के बाद हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ि अल्लाह अन्हु और हज़रत उम्र रज़ि अल्लाह अन्हु की बारगाह में सलाम पेश करते हुए गेट की तरफ़ पीठ किए और चेहरा मुवाजिहा शरीफ़ की तरफ़ किए हुए धीरे धीरे वापस होते और बाहर निकल कर गुंबद खिज़्री की ज़ियारत फ़रमाते कभी बाहर सेहन में देर तक बैठते और ज़ियारत गुंबद खिज़्रा फ़रमाते और ज़िक्र दुरूद शरीफ़ सलाम पेश फ़रमा कर कुछ ज़रूरी बातें बयान फ़रमाते इस के बाद अगर वक़्त सुबह होता तो जन्नत अलबक़ीअ शरीफ़ की तरफ़ जाते और वहाँ अहले बीत अजाम के मज़ारात मुक़द्दसा से फ़ातिहा ख़वानी शुरू फ़रमाते और अज़्वाज मुतहरात के मज़ारात पर रुकते और सलाम पेश करते बादा हज़रत उसमान ग़नी रज़ि अल्लाह अन्हु के मजार मुक़द्दस पर हाजिर होते और वहाँ कुछ देर फ़ातिहा ख़वानी करते यहाँ ज़्यादा देर तक सऊदी पोलिस रुकने नहीं देती इस लिए आप उन से उलझने को ना पसंद फ़रमाते और वहाँ से वापस आजाते। इस कब्रिस्तान की अज़मत बयान फ़रमाते कि यह दुनिया कासिब से अफ़ज़ल कब्रिस्तान है इस में दस हजार से ज़ाइद सहाबा कराम और बड़े ताबईन वावलिया कराम हज़रत इमाम मालिक रज़ि अल्लाह अन्हुम अजमईन जैसे लोग आराम फ़रमा हैं इसी जन्नत अलबक़ीअ शरीफ़ में हमारे सिलसिले के अज़ीम बुजुर्ग हज़रत ख़्वाजा अहमद सईद क़िबला आलम क़ुद्दिस सिर्रहू भी मदफ़ून हैं इनकेबारे में अक्सर बयान फ़रमाते थे जन्नत अलबक़ीअ शरीफ़ की ज़ियारत के लिए दूसरे तीसरे दिन तशरीफ़ ले जाते थे और फ़रमाते कि बुजुर्गों के

मज़ारात से इस्तिफ़ादा रूहानी तरक़्क़ीयात के लिए बहुत मुफीद होताहै ख़ास कर सहाबा कराम और अहले बीत अजाम वाज़्वाज मुतहरात से बारगाह रिसालत में सिफारिश कराना चाहिए इस से बहुत जिल्द मकसूद पुराहोजाताहै बिलख़सूस उम अलममनीन हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ि अल्लाह अनहा बहुत जिल्द बारगाह रिसालत में काम करादेतें हैं क्यों कि महबूबा महबूब कायनात सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम हैं इसलिए आप उनके नाम से बिलख़सूस फ़ातिहा ख़वानी करके दुआ फ़रमाते ऐसा ही अमल हज़रत इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू से भी मनक़ूल है।

सरकार की बारगाह में सलाम पेश फ़रमाकर कमरे पर तशरीफ़ लाते और कुछ देर आराम फ़रमाते आप की आदत करीमा थी कि दोनों हरम यानी मक्का शरीफ़ मस्जिद हराम ओरमदीना शरीफ़ की क़दीम मस्जिद नबवी शरीफ़ तुर्की वाले हिस्सा में नमाज़ अदा फ़रमाते और मुराक़बा वगैरह इसी हिस्सा में करते बादा हसब साबिक़ नमाज़ों और ज़िक्र विमराक़िबात के तमाम औकात सुबह ता शाम हरम मक्का शरीफ़ की तरह मदीना मुनव्वरा में भी रखते तहजद के लिए जिल्द बेदार हो जातेआवर फ़ज्र ता अशराक़ व चाश्त मसरूफ़ मुराक़बा व ज़िक्र रहते उसके बाद तिलावत कलाम पाक करते और बारगाह रसूल में हाजिरी के लिए जाते और सलाम पेश फ़रमाते जब भी मस्जिद नबवी अलैहि अस्सलाम से जाते तो सलाम करके ही जाते दिन में कई बार हाजिरी होती उसके बाद वहाँ से कमरे पर तशरीफ़ लाते इसी तरह हसब साबिक़ ज़ुहर के वक़्त मस्जिद नबवी शरीफ़ आते और इशा के बाद तक मस्जिद नबवी में रहते इस दौरान भेड़ जब कम हो जाती तो रियाज़ अलजन में नमाज़ उदाफ़रमाते और कभी अस्हाब सफ़ा के चबूतरा पर अगर जगह मयस्सर आजाती वर्ना किसी भी जगह जहां सुकून रहता वहीं मसरूफ़ इबादत रहते और जब कभी रश की बिनापर तुर्की वाले हिस्सा में जगह नहीं मिलती तो नये वाले आगे के हिस्से में जहां से गुंबद खिज़्रा नज़र आताहै पहले वाली छतरी के क़रीब निशिश्त फ़रमाते और अपने मामूलात में लग जाते।इसी तरह आप का यौमिया मामूल रहता आप ज़्यादा तर मस्जिद नबवी शरीफ़ में रह कर इबादत करना पसंद फ़रमाते थे क्योंकि जो फ़ैज़ सरकार के क़ुर्ब में मिलता है वह कहीं नहीं और जो भी जहां मिलता है वह यहीं से मिलता है इस लिए मांगने वाले के लिए अपने आका से लो लगाये रहना चाहिए इस लिए आप अपना वक़्त ज़्यादा तर हरम ही में गुज़ारते और मुरीदैन व मुहबीन को भी मस्जिद नबवी ही में नमाज़ और इबादत की ताकीद फ़रमाते और फ़रमाते जब तक मस्जिद में रहो बावुज़ू रहवावर सरकार की तरफ़ इस तरह मुतवज्जा रहो कि आप हमें हर वक़्त मुलाहिजा फ़रमारहे हैं यहाँ तक फ़रमाते कि अगर मस्जिद में दलबस्तगी न रहे और दिल मुतवज्जा न रहे खयालात मुंतशिर हूँ तो इस वक़्त वहाँ न

रहे बल्कि बाहर जाए और फिर ताजे होकर इतमीनान कलबी हासिल करे और फर्मशगूल इबादत होजाए।उन शा अल्लाह इस तर यके से फ़ैज़याब हो नगे।

मुक़ामात ज़ियारात मदीना मुनव्वरा:

आप मदीना शरीफ़ के मुख़तलिफ़ मुक़ामात मुक़द्दसा की ज़ियारात के लिए तशरीफ़ ले जाते उन में कुछ अहम मसाजिद मदीना मुनव्वरा वह हैं जो कि हुज़ूर अलैहि अस्सलाम के जमाने में थीं जैसाकि मस्जिद क़बा और मस्जिद क़िबलतीं ,मस्जिद जुमा मस्जिद ग़मामा व मस्जिद अजाबा और सबा मसाजिद वगैरह उन तमाम मुक़ामात की ज़ियारात के लिए तशरीफ़ ले जाते जहां जहां उमूमा ज़ाइरीन जाते हैं उन तमाम मुक़ामात की फ़ज़ीलतीं मारूफ़ हैं इस लिए यहाँ बयान नहीं की हैं हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा फ़रमाते कि उन मुक़ामात के फ़्यूज़ात व बरकात बहुत ज़्यादा हैं मदीना मुनव्वरा की हर हर गली कूचा नूर से मनोर है इस के अलावा आप आखिरी उमरे पर बदर शरीफ़ भी शुहदाए बदर की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ ले गए और इस से एक दिन क़ब्ल मजलिस मुनाक़िद फ़रमाई जिस में जिंग बदर का पस मंज़रतफ़सीली बयान फ़रमाया इस दौरान बयान आप ने आक़ाआलीय अस्सलाम पर किए गए कुफ़्फ़ार मक्का के मज़ालिम बयान फ़रमाए तो आपकी आंखें अशकबार होगईं मजलिस में अक्सर लोग रोने लगे और आप ने आका अलैहि अस्सलाम की इस वक़्त की रक्त अंगेज़ दुआ बयान फ़रमाई जिस वक़्त कि आप ने खेमा उरीश में बारगाह मौला में गर्ये ज़ारी करते हुए दुआ फ़रमाई थी कि मौला कुफ़्फ़ार मक्का मुक़ाबिल यह मुट्ठी भर मुसलमान इस जमीन पर तेरे नाम लेवा हैं अगर आज यह जमात ही शिक्षित पा गई तो इस जमीन पर तेराकोई नाम लेवा न होगा ए अल्लाह मदद फ़रमा इस वक़्त हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ि अल्लाह अन्हु ने आप के मुबारक मुँह पर अपना हाथ रख दिया था और अर्ज़ करने लगे या रसूल अल्लाह ﷺबस कीजिए।इस बयान पर हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान बहुत रोए और अपने आका के उम्मत पर एहसानात को गिनाए और ताइफ़ की अज़ीयतें ज़िक्र फ़रमाकर फिर रोने लगे इस के बाद आप ने रक्त आमेज़ दुआ फ़रमाई हरेक गुलाम की आंखें अशकबार हो गईं आज भी इस मजलिस के असरात क़ल्ब में महसूस होते हैं इस तरह की कैफियत अक्सर औकात में हो जाती थी आप बहुत ज़्यादा गर्ये व ज़ारी करते और कौम व मिलित की फ़लाह व बहबूद के लिए अपने मुहबीन विमरीदैन और मुआविनीन जामिआ के लिए दुआएं मांगते थे आप हर मौका पर इत्तिबा सुन्नत और खातमा बालख़ैर की द आ जरूर फ़रमाते थे। मदीना शरीफ़ में भी आप महफ़िल मीलाद मुनाक़िद फ़रमाते बड़े एहतिमाम के साथ महफ़िल में शरीक होते अज़मत मदीना बयान करते और नात ख़वानी होती शेरेनी का

इंतजाम फ़रमाते और लोगों में तकसीम की जाती । रास्ते चलते हरमैन शरीफ़ैन में ग़ुरबा की इमदाद भी करते कभी कुछ खरीद कर तकसीम फ़रमाते और हरमैन शरीफ़ैन आप रोजा भी रखते थे।

और भी बहुत सी आदात करीमा थीं नीज़ बहुत सी दुआएं और अशआर आप पढ़ते रहते थेजो फ़क़ीर को याद नहीं और न ही अदबन मालूम करने की हिम्मत कर सिक्का आप के मामूलात के हवाले सेजो फ़ी उलवक़्त जेहन में था वह सुपुर्द क़िरतास करदिया मामूलात में जो भी लिखा गया है वह फ़क़ीर का चश्म दीद है या जो आप से सुना वह ज़िक्र कर दिया है जो रह गया है और किसी किस्म की कोई गलती हुई हो तो इस के लिए माज़ूर हूँ जुमला अहले इस्लाम और बिलख़सूस मुहबीन व मुख़लिसीन और मुरीदैन बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा से गुजारिश है कि फ़क़ीर आफ़ाक़ी को भी दुआओं में याद रखें ।

*इलजामा अल-अहमदिया अस्सुन्निया क़न्नौज यूपी इंडिया