अध्याय 34 में से 65पृष्ठ 235–242
आह! मुजद्दिदी क़लंदर रहमताल्लाह अलैहि
मौलाना शम्स अलहदा मिस्बाही साहिब क़िबला*
यह जानकाह खबर बिजली बिन कर गिरी कि हमारे मुख़लिस कर्म फ़रमा हमदर्द अहले सुन्नत मर्द क़लंदर हज़रत अल्लामा मुफ्ती मुहम्मद आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी रहमत अल्लाह अलैहि अब इस दारफानी से दार जावदानी की जानिब कोच कर गए कुछ देर तक सकता का आलम था कि खबर बहरहाल मुहतमिल सिदक़ विकिज़्ब होती ही है शायद यह खबर खिलाफ़ वाक़ा हो लेकिन जब क़न्नौज से हज़रत के बाज़ अक़्रबा ने इत्तिला दी तो यकीन हुआ और बे साख़ता ज़बान से निकला ‘‘आह मुजद्दिदी क़लंदर’’ खैर
मर्जी मूली अज़ हिम्मा औली, और सब्रोतो असल सदमा औली की घड़ी होता है। एक अरसा दराज़ से मेरा उन के साथ दीनी, मसलकी, इल्मी राबिता रहा है। उन्हें हज़रात मुजदुद्दीन इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी और मुजद्दिद आज़म इमाम अहमद रज़ा क़ुद्दिस सरहुमा से वालहाना अकीदत थी और उन के तरीका दावत को अमली लिबास पहनाने की तग विद्व में शब् विरोज़ अनथक जद्दोजहद फ़रमाते और इस राह में उन के जज्बा इख़लास की बरकतें; बहुत से ऐसे इलाक़ा जात में नुमायाँ नज़र आती हैं जहां हमारे अकाबिर की जलवा गिरी न होस्की या कम हुई और ख़ल्क़ ख़ुदा की एक बड़ी तादाद बद मज़हबों और बे दीनों के चंगुल फँस चुकी थी। उन्हें इस मोहलिक दलदल से निकाल कर वादी रज़ा की बिहारों से रोशनास करदिया। अल्लाह सुब्हानहू वित्ताली उन के औलाद रूहानी विजस्मानी सब को उन के नुक़ूश क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ रफ़ीक बख़्शे और उन के छोटे हुए मिशन को आगे ले जाने का हौसला इनायत फ़रमाए। आप ने मसलकी हवाला से सरहिंद शरीफ़, हरियाणा, मेवात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार वगैरह में एक बड़ी तादाद को राह हक़ पर गामज़न फ़रमाया तसफ़ीया क़ुलूब की खातिर मख़सूस औराद व वज़ाइफ़ का दर्स देते थे और बहुतों की अमली तरबीयत भी फ़रमाते थे। आप की तावीजात में ख़ुदा इज़ विजल ने बड़ा असर रखा था कभी कभार लोगों का बड़ा हुजूम होता, हिंदू हो या मुस्लिम हर कोई आप के तहरीर फर्मौदा नुक़ूश से मुस्तफ़ीद होता हम ने दिहली में देखा कई बड़े आई, एस अफसरान भी आप से गहरी अकीदत रखते हैं उन्हें अक़ीदा हुक्का पर मजबूती से क़ायम रहने की तदाबीर भी फ़रमाते। मजहबी, सियासी, समाजी हर मैदान के बाहर अफराद आप की खासी क़द्र करते थे। बड़े बड़े सियासत दाँ आप की दुआ लेने के लिए क़न्नौज हाजिरी देते थे आप की सादगी भी लोगों को बहुत भाती थी उन के जामिआ अहमदिया में इम्तहान लेने के लिए नीज़ तक़रीब ख़त्म बुखारी शरीफ़ में जाना हुआ रुखसत के वक़्त फ़रमाया, तक़रीब ख़त्म सही अलबख़ारी, में जो रूहानियत, नूरानियत और नुज़ूल रहमात का समा था वह बहुत कम देखने को मिला। और बड़े मुशफ़िक़ाना और मुख़लिसाना अंदाज़ में साल आइंदा की दावत देते हुए उलविदा फ़रमाया। आप को आलम इस्लाम और आलम अरब से राबिता की खासी फ़िक्र रहती थी। इस सिलसिला में फोन पर बारहा राबिता फ़रमाते तबादला ख़याल फ़रमाते। आधा, आधा घंटा गुफ़्तगू फ़रमाते अपने दर्द, दुख का इज़हार फ़रमाते कि बद मज़हबों ने हम अहले सुन्नत का तआरुफ़ दुनियाय इस्लाम में अपने ताल्लुकात की बना पर एक जदीद फ़िर्क़ा की हैसियत से बग़ैर किसी ठोस सही सबूत के कर रखा है और बरसग़ीर में अहले सुन्नत का सही तर्जुमान अपनी जमात कोही उन के क़ुलूब व अज़हान में बैठा दिया है जब कि मामला और हक़ीक़त बिलकुल ब्रअक्स है हमारे पास
मज़बूत कवी दलायल व शवाहिद मौजूद हैं लहज़ा हम अगर मुनज़्ज़म तौर पर इस्लाम दुनिया से राबिता उस्तिवार करें तो बरसग़ीर के सुनियों को बे हद कुव्वत मिल सकती है और हम अपने खोये हुए वक़ार को न सिर्फ़ बहाल बल्कि इस के अंदर काफ़ी इस्तिहकाम पैदा करसकते हैं चुनांचे उन्हों ने अमली ज़िन्दगी मैदान में पूरे अज़म व हौसला के साथ क़दम रखा और कई कान्फ्रेंसें कीं और कई अरबों को मदऊ फ़रमाया हमारी जमात की रिवायत कि महज़ बात के बादशाह और शैख़ चली की मन्सूबा बंदी ही में मगन रहना को तोड़ा। फ़क़ीर बैरून हिंद अपनी गोनागों और इल्मी, दीनी मस्रुफ़ियात के बाइस हर कान्फ्रेंस में तो न हाजिर होपाता मगर बाज़ में शिरकत हुई। मुसर्रत हुई ख़ुदा तआला हमारी जमात को उन जैसा मुख़लिस बे लौस, दर्ददल रखने वाला बदल अता फ़रमाए और उन के मिशन को फ़रोग़ बख़्शे। आमीन बजाह उन्नबी उलक्रीम अलैहि अफ़ज़ल अलसलो वाक्रम इलतसलैम।
*उस्ताज़ अल-जामिआ अलाशर्फिया मुबारक पुर यूपी
मसऊल दारालाफ़ता कंज़ अलायमान यू।के
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रहमत अल्लाह अलैहि और्जज़बा इत्तिहाद
मुफ्ती अवैस रज़ा खेरी मुजद्दिदी*
नहमदा विंसली अली रसोलह उलक्रीम
हजारों साल नरगिस अपनी बे नूरी पा रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा वर पैदा
इस दुनियायरंग व बो में कुछ शख्सियतें ऐसी हुई हैं जिन के वजूद मसाऊद से ज़माना बरकतें हासिल करता रहा है और वह पर अनिवार हस्तियां अपनी तजल्लियात से जमाने का मर्जा और रहनुमा होती हैं जो उम्मत मुस्लिमा को इत्तिहाद का मक़सद अता करती हैं और रहनुमाई भी फरमाती हैं उन्हें मुक़द्दस हस्तियों में एक अदीम उलमिसाल हस्ती खानदान मुजद्दिदय नक़्शबंदिया के रुकन रुकीन फ़र्द फरीद और अज़ीम सपूत मसलक आला हज़रत के बे नज़ीर तर्जुमान फ़िक्र मुजद्दिद व रज़ा के मोतबर और मोक़र शारह शाह सेवान के इल्मी व रूहानी वारिस हम शबिया सरकार कुतुब ज़माँ सय्यद अबू अलख़ैरात फलक शैख़ अलमशाइख़ के माहताब मनीररिज़ूर शैख़ अलालम के रूहानी फ़रज़न्द वाकिफ़ रमूज़ शरीअत व इसरार तरीक़त नमूना इस्लाफ़ बह्र उल-इरफ़ान उलशाह मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी नक़्शबंदी रहमत अल्लाह अलैहि हैं जो कि 9 ज़ीक़ादा 1440ह बरोज़ हफ्ते अली उलसबाह शाह सरहिंद के मैख़ाना वहदत का जाम लोगों को पिलाते हुए दाग मुफ़ारिक़त दे
गए। (अना लिल्लाह व अना इलिया राजावन )
ज़माना बड़े शौक से सन रहा था
हमें सौ गए दास्तां कहते कहते
लेकिन यह बात भी यकीन के उजाले में अयाँ हो गइ है कि ज़िंदा और मुत्तहिद कौम अपने बुजुर्गों की याद मरने नहीं देती।
इल्मी दुनिया का मक़ूला है कि नाला दर्द से दर्द मंद ही मुतास्सिर होता है अहले आलम इस बात से बाख़बर हैं कि माज़ी क़रीब में मुल्क के तूल वारज़ में फैली संयत का अज़ीम ख़सारा हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान उलशाह मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी के सानिहा इर्तिहाल से वक़ूअ पज़ीर हुआ हमारे गर्ये ग़म पर सब्र की तलक़ीन भी नाकाबिल बर्दाश्त है इस लिए कि हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रहमत अल्लाह अलैहि का अचानक इस दुनिये फ़ानी से कोच करना मिलित इस्लामीया के लिए अज़ीम सानिहा है इस जानकाह सदमा का एहसास सिर्फ़ अवाम अहलसन्नत ही को नहीं बल्कि ख़वास उल्मा विमशाइख़ और दानिश्वरान कौम व मिलित वातराफ़ व अकनाफ़ वतन के अफराद भी इस रूह फ़र्सा सानिहा से दर्द व कर्ब से दो चार नज़र आते हैं।
दिल का यह हाल हुआ उन से जुदा होते ही
जैसे शीशा कोई पत्थर पा ग्रा देता है
मगर किया करें यह कारखाना कुदरत है( कल नफ़्स ज़ायक्त उलमौत) नस क़तई
(उलमौत जसर यूसल अलहबीब अली अलहबीब) मौत एक पल है जो हबीब को हबीब से मिला देता है हर आने वाला जाने वाला है लेकिन मुबारक है वह मर्द मोमिन जिस के जाने पर ख़ल्क़ ख़ुदा अशकबार हो यकीना आप का वजूद मसाऊद अहले ज़माना के लिए ख़ुदा की एक अज़ीम नेमत था और इत्तिहाद व इत्तफाक़ का हसीन संगम था लेकिन वह अज़ीम उलशान नेमत आज हम से रूठ चुकी है गो कि ज़बान हाल से कह रही हो।
मत सहल हमें जानू फिरता है फलक बरसों
तब खाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा की ज़ात बैक वक़्त मुतअद्दिद सिफ़ात व कमालात का जामा थी तक़्वा ,तहारत , अमल, ज़हद व वरा का मंबा होने के साथ साथ एक बे मिसाल मदर्स खानगाह खैरिय के लाजवाब सोफी खुशख़साल सूरत व सीरत का मनबग़ कुरआन व सुन्नत के एक अदीम उलमिसाल दाई और अपने वक़्त के नमूना इस्लाफ़ और मुफ्ती आज़म थे आप एक ऐसी अंजुमन थे जिस में तहरीक की तहरीक थी आप निहायत बुलंद अज़ाइम के
मालिक खुश अख़लाक़, मिलनसार,शख्सियत शनास विशख़सियत साज़ एक संजीदा पुरवक़ार आजिज़ी व इन्किसारी का पीकर थे।
इस माद्दियत और इख़तिलाफ़ व इंतिशार के दौर में तिश्नगान उलूम ज़ाहिरा व बातिना की सराबी और मिलित बैजा की हिफाज़त वस्यान्त के लिए जहां आप ने अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया जैसा संयत का एक अज़ीम किला तामीर फ़रमाया इस की मुतअद्दिद शाखें मुतअद्दिद असरी जमिआत खानक़ाहें क़ायम फरमाएं वहीं इसलाह आमाल और तसफ़ीया क़ल्ब और मक़सद तख़लीक़ से भूली बसरी ज़िन्दगी गुजारने वाले फ़र्द बशर को मंशाए तख़लीक़ से आगाह करने और उन के दलों में सरकार मदीना अलैहि इलतहीत वाल्सना की मुहब्बतों का चिराग रोशन करने उन के दलों में मार्फत हक़ का दीप जलाने के लिए मुतअद्दिद खानक़ाहों की दाग बेल भी डाली।
और जज्बा इत्तिहाद इस क़द्र था कि मुख़ालिफ़ीन से भी अपनी अज़मत का लोहा मनवाया आप के नुमायाँ ज़िंदा व ताबिंदा अज़ीम कारनामे आली औसाफ़ इमतियाज़ियात व ख़ुसुसीआत नीज़ इल्मी, दीनी समाजी , मिली ,कौमी ख़िदमात रहती दुनिया तक हमेशा याद रहीं गी।
हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान रहमताल्लाह अलैहि काजज्बा इत्तिहाद:
हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान रहमताल्लाह अलैहि जिन के नाम और शख्सियत के साथ तीन बातें वाकिफ़ कार के जेहन में बुला इरादा आती हैं एक दीन इस्लाम की बे पनाह ख़िदमत और सिलसिला नक़्शबंदिया मुजद्दिदय के लिए नये दौर का आगाज़ और इत्तिहाद व इत्तफाक़ के लेकिये बेपनाह का विशें।
खानगाह खैरिय मुजद्दिदय के रूहानी चश्म व चिराग हज़रत मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी रहमत अल्लाह अलैहि की शहरत आरिफ बिल्लाह बह्र उल-इरफ़ान के खिताब से हुई अपने मुर्शद बरहक़ सरताज विलायत वासल बारगाह सुबहान शैख़ अलालम उलशाह अहमद रज़ा ख़ान नक़्शबंदी दाम ज़ला उलनूरानी के दामन कर्म से वाबस्तगी के बाद आप ने पूरी ज़िन्दगी ख़िदमत दीन ख़ुसूसन फ़रोग़ तसव्वुफ़ और इत्तिहादामत केलिये वक्फ करदी।
इतना ही नहीं कि आप ने फ़क़त तहरीक तसव्वुफ़ को फ़रोग़ दिया बल्कि मौजूदा दौर के जाहिल सूफ़ियों की नक़ाब कुशाई भी खूब की असल और नकल हक़ व बातिल के दरमियान ख़त इमतियाज़ खींचा जैसाकि आप की तसानीफ़ ज़िक्र वफ़कर , सिलसिला नक़्शबंदिया और इस का सुलूक तसव्वुफ़ और इस के फ़वाइद वगैरह से ज़ाहिर व अयाँ है
आज जहां में हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रहमत अल्लाह अलैहि को नम कन्म उलारूस की लोरियां सुना रही है वहीं से इस शाहकार का आफ़ाक़ी पैग़ाम जुमला अहले फ़िक्र को यह दर्स दे रहा है कि अपनी प्रसूज़ फ़ुग़ां आतिश नवा और नाला शब् गीर से हम
पहाड़ों के जिगर में सुराख कर सकते हैं लेकिन उलमाए इस्लाम और खानक़ाही हज़रात को इस बात पर मुतफ़िकर होना होगा कि हमें मक़सद इत्तिहाद में कामयाब व कामरान होने के लिए बाहमी मुहब्बत के साथ एक दूसरे के आंगन में इत्तिहाद का शजर लगाना होगा।
मुत्तहिद हो तो बदल दो गे जमाने का निजाम
मुंतशिर हो तो मरू शिवर मचाते क्यों हो
इत्तिहाद व इत्तफाक़ का यही वह हसीन मक़सद था जिस की दावत में आप तादम हयात कोशां र है और ख़ल्क़ ख़ुदा को इस हुक्म अलहि की दावत देते रहे जिस का ज़िक्र कुरआन हकीम में कुछ यों है ।(वातिसमो बहबल अल्लाह जमीन विलातफ़र्क़्वा)(सूरह आल इमरान, आयत नंबर 103)यानी और तुम सब लोग मिल कर अल्लाह की रसी यानी दीन इस्लाम को मजबूती से पकड़ लो और आपस में इख़तिलाफ़ व तफ़र्क़ा न करू।
दूसरी आयत सूरह इनफाल की है फरमान अलहि है (वातीउआ अल्लाह वर्सोलह विला तनाज़ावा फतहशलवा वितज़हब रेहकम वासबरवा उन अल्लाह मा अलसाबरीन)
यानी अल्लाह और इस के रसूल की इताअत करू और आपस में झगड़ा व इख़तिलाफ़ न करू वर्ना तुम्हारे अंदर कमज़ोरी पैदा हो जाए गी और तुम्हारी हुआ उखड़ जाए गी और सब्र करू यकीना अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।
पहली और दूसरी आयतों में अल्लाह रब अलाज़त ने मुसलमानों को इख़तिलाफ़ात और तफ़र्क़ा से वाज़िह तौर पर रोका है जो हर तरह के इख़तिलाफ़ात वितफ़र्क़ा को शामिल है मसला सियासी दीनी और इक़तिसादी इख़तिलाफ़ वगैरह और यह भी बतलाया है कि अगर इख़तिलाफ़ करोगे तो इस का नतीजा किया होगा और वह नतीजा उम्मत की कमज़ोरी और ताकत व कुव्वत का ख़त्म होना है जिन का मुशाहिदा हम अपनी आंखों से इस दौर में कर रहे हैं जितना आज मुसलमान ज़लील व रुस्वा है शायद कभी इतना ज़लील और रुस्वा रहा हो नीज़ जितना कमजोर आज का मुसलमान है शायद किसी दौर में इतना कमजोर रहा हूँ यही वजह है कि आज के जमाने में मुसलमानों की बेन अलअक़वामी तौर पर कोई अहमियत वक़ात नहीं रह गइ है। मुसलमानों प्रकीसी मुसीबत आन पड़ी है हर जगह उन को हिरासान किया जा रहा है उन की इज्जत वनामोस महफूज़ नहीं है उन को तह तेग किया जारहा है इस्लामी शाइर व इबादात से उन को दौर किया जारहा है उम्मत इस्लामीया दौर हाजिर में बहुत मुश्किलात में फंसी हुई है बारेश शख्स को दहशत गिर्द करार दिया जा रहा है और मुसलमानों की अक्सरीयत ग़ुरबत और जहालत जैसी मोहलिक बीमारियों से जूझ रही है आखिर ऐसा क्यों है इस के वजूहात व असबाब किया हैं जब कि मुसलमानों पर उन की मासियत व गुनाहों के बावजूद अल्लाह रब अलाज़त ने मुख़तलिफ़ किस्म के फजल विक्रम फ़रमाए हैं मुसलमानों को
ज़राअती मादिनी जिस्मानी रूहानी ग़रज़कि हर किस्म की स्रोत व दौलत से नवाजा है उन की तादाद एक अरब से ज़ाइद है और इस्लामी मुमालिक का रकबा भी बहुत ज़्यादा वसीअ व अरीज़ है उन तमाम सवालात के जवाबात मज़कूरा बाला दोनों आयतों में मौजूद है जोकि मुसलमानों का हर किस्म का बाहमी इख़तिलाफ़ व तफ़र्क़ा है।
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रहमत अल्लाह अलैहि का मुजद्दिदी मिशन और आप की ज़िन्दगी का ख़ास व अहम पहलू इत्तिहाद इत्तफाक़ की दावत थी फ़रमाते कि मुसलमान भाइयों की कामयाबी और कामरानी का ज़रिया आपसी इत्तिहाद इत्तफाक़ है और सिर्फ़ इसी के जरिये हम अपनी अज़मत रफ़्ता को बहाल कर सकते हैं
इस दौर पर फ़ित्न में हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा की तालीमात पर अमल कर के फ़िर्क़ा वारीयत से निजात हासिल की जा सकती है आप की आला फ़िक्री आब ज़र से लिखने के काबिल है यही वजह है की मिलित इस्लामीया के बिखरे विमुंतशिर शीराज़े को जोड़ने और यकजा करने में हमेशा फिक्रमंद रहा करते थे आप फ़रमाते कि एक मबलग़ के लिए भरपूर इल्म होना और इस की तरबीयत का ताम होना हसन फ़हम और हिक्मत का होना ख़ास तौर पर अपनी तबलीग़ में खालिस होना बहुत ज़रूरी है जभी हम अपनी तबलीग़ में कामयाब व कामरान हो सकते हैं और बग़ैर हसन तबलीग़ और शख्सियत साज़ी के इस्लाम वसनीयत का फ़रोग़ औरित्तिहाद क़ायम करनाहद दर्जा मुश्किल है।
आप के इख़लास और बे नफ़सी का आलम यह था कि आप के पैरोकार जोकुछ नज़राना आप की बारगाह में पेश करते वह दीन की राह में खर्च कर दिया करते थे बल्कि 25 साल तक मदरसे सेतनख्वाह ही न ली तबलीग़ दीन के लिए जो आप के असफार होते वह ख़ुद अपने ज़ाती पैसे से होते यह तमाम बातें और आप की मुबारक ज़ात नज़राना ख़ौर नाम निहाद उलमा व मशाइख़ के लिए नमूना अमल है और इस दौर पर फ़ित्न में बेमिसाल नसीहत है प्यारे इस्लामी भाइयो! यह सिर्फ़ एक सच्चे क़ाइद ही की पहचान होती है।
हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा उलमा व मशाइख़ का बहुत एहतिराम फ़रमाते बायं उलूम मर्तबत और फजल विकमाल उलमाए ज़ाहिर के लिए भी आप खडे होजाते और निहायत तवाज़ा और ख़ंदा पेशानी से मिलते।
आप अपनी पूरी ज़िन्दगी फ़रोग़ तसव्वुफ़ और इत्तिहाद का काम अंजाम देते रहे इस के लिए आप ने नेरी खानक़ाहों का रुख किया और उल्मा व मशाइख़ की ख़िदमत में इत्तिहाद का पैग़ाम पेश फ़रमाते सिर्फ़ हिंदोस्तान ही नहीं बल्कि बैरून हिंद भी इस पैग़ाम को जारी रखा आप अपने स्टेजों पर बरेली शरीफ़ मारहरा शरीफ़ कछौछह शरीफ़ मकिन पुर शरीफ़ वगैरह विदीगर अहले सुन्नत के अज़ीम अल्मरतिब्बत उलमा व मशाइख़ को इकट्ठा करते नीज़ उन से इत्तिहाद औरफ़रोग़
तसव्वुफ़ के मुताल्लिक़ मश्वरा भी करते और बहसन व खूबी उन की ख़िदमत में अपनी तजावेज़ भी पेश फ़रमाते।
आप की ज़िन्दगी का मक़सद मसलक आली हज़रत की नश्रवाशाअत सुन्नत रसूल पर फ़आल होना और इत्तिहाद के परचम को बुलंद करना था क्योंकि आप ख़ुद में एक तहरीक ही तहरीक थे आप के सारे जलसों ,महफिलों, तक़रीबात वगैरह में फ़क़त इत्तिहाद ही इत्तिहाद नज़र आता था क्योंकि इत्तिहाद उम्मत आप के हयात के गोशों में एक ख़ास पहलू था
और एक रोशन पहलू यह भी है कि जहां आप ने मुसलमानों के दलों के टूटते तारों को जोड़ने की सई बलेग़ फ़रमाई वहीं आदाए दें के सामने दीन व मजहब के दिफ़ा में आहनी दीवार बिन कर खडे रहे क्योंकि यही वह वस्फ़ ख़ास है जो इश्क को तमाम दीवानों में मुमताज़ करदेता है आप आयत करीमा ( वालज़ीन उमनवा अशदा अली अलकुफ़्फ़ार वरहमा बेन्हम ) की जीती जागती तस्वीर थे जहां आप मुसलमीन से आपसी मुनाफ़िरत को ख़त्म करने की बे इन्तहा कोशिश फ़रमाते वहीं यह फ़िक्र भी हमेशा दामन गीर रहती कि सरकार मदीना सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम की भूली भाली उम्मत को भेड़िये अपनी दरिंदगी का शिकार न बना लें अलहम्द लिल्लाह यह रंग आशिक़ाना आप की तसानीफ़ में जाबजा नज़र आता है।
आप के वाज़ व तकरीर से भी दीन की तड़प और मिलित बैज़ा के लिए बेहिसाब मुहब्बत नज़र आती है हादस्तन कभी किसी की दिल शकुनी के जुमले न निकलते फ़क़त मुहब्बत व इत्तफाक़ की बातें बयान फ़रमाते नीज़ आप फ़रमाते कि प्यारे इस्लामी भाइयो: अलहम्द लिल्लाह हम मुजद्दिदी हैं और मुजद्दिदी कभी इख़तिलाफ़ नहीं करते और जो इख़तिलाफ़ व तफ़र्क़ा से काम ले वह मुजद्दिदी हो ही नहीं सकता इस लिए कि इमाम रब्बानी पूरी ज़िन्दगी इत्तिहाद व इत्तफाक़ का दर्स देते रहे।
मुहतरम क़ारईन कराम: जज्बा इत्तिहाद का यह सेल रवाँ आप की ज़ात बा बरकात में इस क़द्र जारी व सारी था कि आप अहकाम शरएहि पर अमल पेरा होते तो इस हसन तदबीर से कि हती अलामकान जमा बेन उलमज़ाहिब तर्क न हो जैसा कि आप के मकातीब शरीफा से अयाँ है।
सरहिंद से मदीना बहुत ही क़रीब है
आफ़ाक़ इस डगर पा चले हैं चलाएं गे
अल्लाह रब अलाज़त आप के तुफ़ैल ज़ाक्रोशाकरावर दीन का दर्द रखने वाले बंदे पैदा फ़रमाए और आप का फ़ैज़ सारे आलम में कसरत से आम फ़रमाए।
*खानगाह खैरिय कमालपुर शरीफ़, ज़िला मिर्जापुर