अध्याय 52 में से 65पृष्ठ 345–360
मुख़तलिफ़ उलजहात शख्सियत
प्रोफेसर सय्यद सिराज उद्दीन अजमली*
मुफ्ती मुहम्मद आफ़ाक़ साहिब रहमत अल्लाह अलैहि की रहलत मिलित इस्लामीया हिंद का इतना अज़ीम ख़सारा है कि जिस की तलाफ़ी आसानी से मुमकिन नहीं है।
मुझे हज़रत की ख़िदमत में हाजिरी और हज़रत की दावत पर क़न्नौज के सफर और उन के उदारे में एक जलसे और क़ुल की मजलिस में शिरकत की सआदत हासिल हुई है।
इस जलसे और इस मजलिस की बरकतों की यादें आज भी मेरे हाफ़िज़े का हिस्सा हैं, जलसा तो हज़रत शैख़ अहमद सरहंदी मुजद्दिद अल्फ़ सानी रहमत अल्लाह अलैहि से मुताल्लिक़ था जिसे हज़रत मौलाना आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी साहिब रहमत अल्लाह अलैहि ने समीनार का अनवान दिया था और इस में बाकायदा मक़ाला ख़वानी भी हुई और तक़ारीर भी । मुझे सब से ज़्यादा मौलाना की जिस चीज़ ने मुतास्सिर किया वह उन का अख़लाक़ ,इख़लास, इन्किसार और और उन का वह सादा अंदाज़ था जिस से हर कोई उन का गर्वीदा हो जाता था। इस शैख़ अहमद मुजद्दिद अल्फ़ सानी सरहंदी रहमत अल्लाह अलैहि के सेमीनार में हिंदोस्तान भर से उल्मा और मुफ़िक्रीन तशरीफ़ लाये थे। इस के अलावा बहुत बड़ी तादाद में सिलसिला नक़्शबंदिया के मुतवस्सिलीन और मौलाना के मस्तर्षदीन भी आये थे ।
नमाज़ ज़ुहर से क़ब्ल तक सेमीनार का सिलसिला रहा जिस में मौलाना रौनक अ फ़िरोज़ भी रहे और अपने हसन इंतजाम का मुज़ाहरा भी करते रहे।सिलसिला नक़्शबंदिया की ख़िदमात, हज़रत शैख़ अहमद सरहंदी के फ़ज़ाइल व मनाक़िब और ख़ुद मौलाना के उदारे की ख़िदमात पर गुफ़्तगू होती रही।ज़ुहर के बाद मौलाना की मेहमान नवाजी और दस्तरख़्वान की
फ़य्याज़ी का मुज़ाहरा होता रहा और हम ही नहीं एक ख़ल्क़ ख़ुदा लज़्ज़त काम व दहन के हुसूल में मसरूफ़ रही। बाद नमाज़ अस्र समीनार का डाइस क़ुल की मजलिस में तब्दील होगया।
क़ुल की मजलिस का सब से इमतियाज़ी पहलू मौलाना की क़ियादत में हलक़ा ज़िक्र था। हमारे सिलसिला जुङ्यद्य कादरिया में और दायरा शाह अजमल में जितने सलासल तरीक़त की इजाजत है उन सब में जली अज़कार के मुकाबले ख़फ़ी अज़कार को रिवाज हासिल है। हमारे इस्लाफ़ और ख़ुसूसन हमारे पीर व मुर्शद हज़रत मौलाना हाफ़िज़ क़ारी शाह सय्यद अहमद अजमली अलैहि अलरहम सज्जादा नशीन दायरा शाह अजमल इलाह आबाद अपनी सादगी और ख़फ़ी अज़कार व आमाल की कसरत के सबब सूफ़ियाए माज़ी क़रीब में अपनी एक अलग शिनाख्त रखते हैं।
इस दर का गुदा होने की बाइस यह ख़ाकसार ज़िक्र जली के तरीके से क़तअन ना बलद था । ज़िन्दगी में पहली मर्तबा ज़िक्र जली की किसी मजलिस में शिरकत का मौका मिला था। में हज़रत मौलाना आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी रहमत अल्लाह अलैहि और उनके अहबाब और उन की मजलिस के शुरका के अंदाज़ ज़िक्र जली को देख कर मुबहूत होगया। में ने देखा कि मौलाना आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी और उनके रफ़क़ा की गर्दन की रगें इस तरह ज़िक्र जली में तआवुन कर रही हैं कि उन के हिसार जिसम से आजाद हो जाने का इमकान रोशन होता जा रहा है। हक़ हक़ की आवाज़ गले से नहीं रग गुलो से और शाने के आस पास की शर्यानों से निकलती महसूस होरही है अजीब समां था अजीब आलम कैफ़ व मस्ती था और मुझ जैसा दुनियादार जब यह मंज़र देख कर शश्दर था तो वह लोग कि जो इस ज़िक्र में हिम्मा तन मसरूफ़ थे उन की सरशारी का आलम किया होगा और फिर उन के क़ाइद हज़रत मौलाना आफ़ाक़ मुजद्दिदी की महवियत और मशगूलियत किस दर्जे की होगी।
ग़रज में ने वह समां आज तक नहीं भोला है न मौलाना का वह अंदाज़ अभी तक मेरे जेहन से महव हुआ है। जैसे ही में ने मौलाना की रहलत और वफ़ात हसरत आयात की खबर सन्नी इसी महवियत ज़िक्र के वास्ते से और ज़िक्र में उन के आज़ा और उन के अंद्रून के तआवुन के वास्ते से बारगाह अहदेत व समदेत में बतफ़ेल जनाब रसूल क्रीम अलैहि अफ़ज़ल अस्सलात वालतसलैम और बतफ़ेल हज़रात पैरान सिलसिला नक़्शबंदिया मौलाना मरहूम की मग़फ़िरत की दुआ की।
उधर मौलाना के नाअतिया कलाम को देखने का इत्तफाक़ हुआ उन के नाअतिया और तक़दीसी कलाम का एक मुख़्तसर सा मजमूआ अजीज़ ग्रामी क़द्र डाक्टर अब्द अस्सलाम जैलानी साहिब की वसातत से मुझ तक पहुँचा। इस मजमूआ शाहरी में जो
कलाम है इस की अदबी हैसियत किया है इस में फ़न्नी कमालात कहां कहां दिखाए गए हैं उन मौज़ूआत पर गुफ़्तगू तो उन शाइआलला होती रहे गी सर दस्त इतना अर्ज़ करता हूँ कि जो कैफ़ और जो सरशारी और जो वालहाना अंदाज़ और जो सरमस्ती में ने मौलाना की अमली ज़िन्दगी में इस मजलिस क़ुल में देखी थी इसी का तहरीरी इज़हार में ने बिशकल शाहरी और तक़दीसी शाहरी इस छोटे से मजमूआ नात विमनक़बत में देखा।
रब तबारक व ताली की बारगाह में दुआ गो हूँ कि मौलाना ने इश्क व मुहब्बत रसूल व आल रसूल और ताल्लुक खातिर अर्बाब शरीअत व तरीक़त की जो तुख़्म रेज़ी अपने चाहने वालों और मानने वालों के दलों में की है मौला ताली उन्हें उन सब का अज्र, बुलंदी दर्जात, मग़फ़िरत और क़ुर्ब पाए नाज़ सर्वर कायनात अलैहि अलसलो वालतसलैम वाला वस्हिबा की शक्ल में इस दुनिया में इनायत फ़रमाए। आमीन या रब अलालमीन बजाह ताहा व यास सिल्ली अल्लाह अलैहि वाला वसल्लम
*शोबा उर्दू, अली गढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
सौ जा शरीफ़ और बह्र उल-इरफ़ान
मौलाना अब्द अलरहीम नक़्शबंदी *
हज़रत अल्लामा अल्हाज बह्र उल-इरफ़ान मुफ्ती शाह मुहम्मद आफ़ाक़ अहमद साहिब मुजद्दिदी नक़्शबंदी बानी जामिआ अहमदिया क़न्नौज की ज़ात बा बरकात दुनिये अहले सुन्नत के लिए अज़ीम सरमाया इफ्तिख़ार थी, जा मआ सिद्दीक़ीय सूजा शरीफ़ (बाड़मेर, रा जस्थान ) से और इस के बानी हज़रत अल्लामा अल्हाज पीर सय्यद गुलाम हसीन शाह जैलानी मदज़ला से आप का तआरुफ़ विमुलाक़ात हज़रत अल्लामा मौलाना फ़ैज़ उलहक़ साहिब आज़मी के जरिये बमौक़ा उर्स जैलानी व जश्न दस्तार फ़ज़ीलत के हुई,सुबह चादर पोशी के वक़्त हुज़ूर बानी जामिआ सिद्दीक़ीय या उन के शागिर्द रशीद हज़रत अल्लामा मुफ्ती सय्यद अहमद शाह साहिब मिटारी धोरा जवी आम तौर से रक्त अंगेज़ दुआएं मांगते और कसीरवाम व ख़वास को बाफ़ीज़ किया करते हैं मगर इस साल हुज़ूर पीर साहिब क़िबला ने हज़रत बह्र उल-इरफ़ान से दुआ मंगवाई, इस इलाक़ा के लोगों ने पहली मर्तबा इस मौका से हज़रत बह्रुल-इरफ़ान को जाना, पहचाना।
हुज़ूरपीयर साहिब क़िबला के पीर ख़ाना मिला कात्यार शरीफ़ संध का पीर ख़ाना यानी हज़रत शाह अहमद सईद मुजद्दिदी का
घराना, हज़रत बह्रुल-इरफ़ान का भी बा लोस्ता पीर ख़ाना है इस ख़ुसूसी निस्बत ने दोनों बुजुर्गों को बिलकुल एक दूसरे केक़रीब करदिया, यही वजह है कि हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान क़िबला ने सूजा शरीफ़ हर साल आना अपने उपर लाज़िम कर लिया था। चनां चह इबतदाए साल यानी 3 ज़ी उलक़ादा क्वाफ़्तिताह बुखारी शरीफ़ व उर्स सिद्दीक़ी के जलसा में हर साल आनाजोपीर साहिब क़िबला ने आप पर लाज़िम व आइद करदियाथा उसे बह्रुल-इरफ़ान साहिब ने तादम हयात निभाया, इस साल भी 3 ज़ी उलक़ादा 1440ह को तशरीफ़ ला ऐथेवो, यूम यक्शंबा था, सातवें रोज़ 9 ज़ी उलक़ादा शंबा को सुबह 4 बजे इंतकाल फ़रमाया।
क़न्नौज व बदायूं का सफर :
जहां हर साल हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान 3 ज़ी उलक़ादा को ख़ुद सूजा शरीफ़ बुला नाग़ा तशरीफ़ ला ते रहे वहीं अपने जामिआ अहमदिया क़न्नौज के सालाना जलसा व आलमी कान्फ्रेंस में शिरकत केलिये बार बारहज़रत पीर साहिब क़िबला से ताज़िन्दगी इसरार करते रहे कि आप एक मर्तबा जरूर क़न्नौज तशरीफ़ लाएं मगर कसरत कार और ज़ोफ़ व नक़ाहत की बना पर लंबी मुसाफिरी पीर साहिब क़िबला के लिए मुश्किल थी लेकिन जामिआ सिद्दीक़ीय से क़न्नौज के लिए हर साल आप वफ़द भेजते रहे इस साल के जामिआ अहमदिया क़न्नौज के प्रोग्राम में तो हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान नेशिरकत के लिए बहुत ज़िया दह इस्रारकरलिया तो हुज़ूर पीर साहिब क़िबला ने दावत को कबूल फ़रमाया और बाई कार दो गाड़ियों से 10 नफरी वफ़द के साथ तशरीफ़ ले गए, पहले बदायूं शरीफ़ अपने जिद अमजद हज़रत सय्यद ताज महमूद सुर्ख पोष सुर्ख शहीदरहमत अल्लाह अलैहि के मजार पर ’’स्वथा मुहल्ला‘‘ हाजिर हुए वहाँ खानगाह कादरिया में हुज़ूर सालम मियां मदज़ला अलाली ने क़याम का इंतजाम किराया, जामिआ कादरिया के स्टाफ़ ने हक़ ज़िया फ़त अदा किया। हज़रत अल्लामा मौलाना मुफ्ती फहीम अहमद सकलेनी अज़हरी ककरालवी ने बदायूं की हाजिरी के इंतिज़ामात का बेड़ा उठाया था जिस को अहसन तौर परिसर अंजाम दिया, रात के दस बजे वह मा काफ़िला के बड़ी सरकार तक इस्तिकबाल को तशरीफ़ ला ए, ख़ा निक़ाह कादरिया ले गए, हुज़ूर सालम मियां मदज़ला अलाली काख़ास हुज्रा शरीफ़ जो मस्जिद से मुत्तसिल है जहां अहले सुन्नत की मुक़तदिर हस्तियां आली हज़रतरहमत अल्लाह अलैहि जैसी क़याम कर चुकी थीं, वहाँ हज़रत का क़याम था, दीगर हमराहियों के लिए मदर्रिसा के रोम तै थे, रात का खाना और आराम यहीं रहा, सुबह नाश्ता के बाद हुज़ूर सुर्ख शहीदरहमत अल्लाह अलैहि पा हा ज़री हुई, वहाँ जनाब मुहम्मद सलेम व गैरह ने खेमा लगाकर का लेनों से फर्श को सज्जादिया था, अहले मुहल्ला ने शानदार इस्तिकबाल किया, जनाब मौलाना मुन्ना ज़र हसीन बदायूनी भी
तशरीफ़ लाये उन की नात ख़वानी से मजमा महज़ूज़ हुआ, नसफ़ घंटा मुराक़ब रहे बादा दुआ फ़रमाई और शेरेनी तकसीम हुई फिर सलेम साहिब के घर चाय पानी के लिए तशरीफ़ ले गए, उन्हों ने अपने घर बहुत सारे लोगों को बुला रखा था, हज़रत को कुछ किताबें पेश कीं। डाक्टर गुलाम यहा अंजुम की किताब ,,मशाइख़ कादरिया,, की जिल्द दोम सलेम साहिब के वालिद मौलाना इफ्तिख़ार अहमद ने छपवाया था, जिस में यूपी के मशाइख़ का ज़िक्र है जो हज़रत सुर्ख शहीदरहमत अल्लाह अलैहि के ज़िक्र पर भी मुश्तमिल है। यह हिस्सा हज़रत के तमाम रफ़क़ा को सलेम साहिब ने तोहफा में दिया, फिर जनाब मुफ्ती फहीम अहमद साहिब अज़हरी हज़रत को ककराला अपने दौलत ख़ाना पा ले कर गए उन के घर अज़ीम लाइब्रेरी है, जहां वह मक़ाला जात और तसनीफ़ात व तालीफ़ात का काम किया करते हैं, बल्कि सकलेनी उलमा का यह मीटिंग हाल है जिस में उम्मत मुस्तफ़व्य की सलाह व फ़लाह की तर केबें बनाया करते हैं। यहाँ अज़हरी साहिब के रफ़क़ाए कार उलमाए अजाम और असातिज़ा मौजूद थे, सब ने प्रतपाक इस्तिकबाल किया। चाय पानी के बाद मुख़्तसर नसीहत और सूजा शरीफ़ की दावत पेश कर के रुखसत हुए, यह सकलेनी काफ़िला कुछ दौर तक साथ चला, एक गावम में दूसरा जिम ग़फ़ीर रोड पर इस्तिकबाल को खड़ा नज़र आया, वहाँ गाड़ियों को रोका गया, सब ने मुसाफ़ा किया, दुआएं लें औरहज़रत को क़न्नौज के लिए रुखसत किया, क़न्नौज से पांच किलोमीटर क़ब्ल एक छोटी मस्जिद में नमाज़ासरादाकी फरहज़रत बह्र उल-इरफ़ान साहिब के चहेते अकीदत मंद जनाब बबलू भा ई के घरपहुंचे, वहाँ हज़रत मौलाना आफताब आलम आफ़ाक़ी मुजद्दिदी ख़ादिम हज़रत बह्र उल-इरफ़ान मा कसीर हज़रात के इस्तिकबाल के लिए खडे थे नारहाए तकबीर व रिसालत से शानदार इस्तिकबाल हुआ, रात को यहाँ क़याम था रफ़क़ा पहले स्टेज पा गए रात के 2 बजे क़िबला पीर साहिब स्टेज पा तशरीफ़ लाये और दस्तार बंदी तक रौनक स्टेज रहे हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान क़िबला की देरीना तमन्ना पूरी हो ई, यूपी के अक्सर ख़ानवादों, मराकज़ और सज्जादा नशीनान व मुफ़्तियान कराम से स्टेज खिचा खुच भरा हुआ था, तल धरने की भी जगह न थी सामने सामईन का ठाठें मारता हुआ दरिया था, दौर दौर तक सर ही सर नज़र आरहे थे । अच्छे अच्छे नात ख़वाँ और आ लिमी शहरत रखने वाले ख़ुतबा अपनी सहरांगेज़्यों से नाज़रीन व सामईन को मस्हूर कर रहे थे, फ़ैज़ मुजद्दिदी झुमा झिम बरस रहा था । हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान के पीर व मुर्शद हज़रत अल्लामा मौलाना अहमद रज़ा साहिब मुजद्दिदी कमालपुरी, बनारसी और हुज़ूर पीर साहिब क़िबला दोनों के जलवा बार होने ने नूरा नियत को दोबाला करदिया था यह जलसा नमाज़ फ़ज्र के वक़्त हज़रत पीर तरीक़त शाह अब्द अलरशीद फ़ारूक़ी मासूमी मुजद्दिदी सज्जादा नशीन खानगाह मासूमी रामपुर की दुआ पर इख़तताम पज़ीर हुआ
जबकि अस्ना ए जलसा, जामिआ अहमदिया से शाय होने वाली ताजे तरिन तसनीफ़ात की रस्म इजरा हज़रत पीर साहिब क़िबला और हज़रत अल्लामा मुहम्मद अहमद मिस्बाही नाज़िम तालीमात जामिआ अशर्फिया के हाथों से करवा ई गई थी बाद इजरा बोजह मुसलसल सफर की थकावट के हज़रत पीर साहिब को क़याम गाह पा पहुँचा दिया गया ।
अली अलसुबह बाद नमाज़ अशराक़ हज़रत बह्र उल-इरफ़ान, हज़रत की क़याम गाह पा तशरीफ़ लाये अपने जलसा की तैयारियों वाली मुकम्मल जद्दू जहद, मेहनत व मशक्कत बयान फ़रमाई कि हम ने जा जा कर हर एक को दावत दी सब ने हा मि भरी फोन पा बराबर राबिता में रहे यकीन दहा नी भी बुर करार थी कि जरूर आएं गे मगर कुछ हज़रात नहीं पहुँचे कुछ अवारिज़ और मुआ ना रहे हूँ गे मगर काश सब आये होते तो अहले सुन्नत का मुस्तक़बिल अच्छा, उम्दा और बेहतर व मजबूत बना ने के लिए इस साल हमारे यहाँ मश्वरा होनाथा । फिर हज़रत पीर साहिब क़िबला का शुक्रिया अदा किया कि आप ने वादा को निभाया दौर से सफर की सऊबतें बर्दा शत फ़रमाकर तशरीफ़ लाये हमारी खुशियों को दोबाला किया हमारी हिम्मतों को तवा ना ई बख्शी जिस के हम शकर गुजार हैं, इस प्रासरार दावत ने शर्मिंदा ताबीर हो कर बहुत से लोगों को बाफ़ीज़ किया, यूपी के कितने ख़ा नवादों और मराकज़ के जिम्मा दारों से मुलाक़ात हुई।
ख़िदमात:
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की ज़ात मसाऊद से अहले सुन्नत को जो नफा पहुँचा इस की तफ़सील उन के मुरीदैन व मुतवस्सिलीन और क़रीब में गुजारने वालों से हासिल कर पाएं गे यह उम्मीद है कि जरूर वह ख़िदमात मंज़र आम पर आएं गी, इस मुख़्तसर बयान में वह ख़िदमात दर्ज कर नी हैं जो अहले राजस्थान ख़ुसूसन जामिआ सिद्दीक़ीय सूजा शरीफ़ बाड़मेर राजस्थान और जामिआ अकबरीय लोनी शरीफ़ कुछ, गुजरात के फ़ारग़ीन सिद्दीक़ी वाकबरी उलमाकी नज़र में आएं दोनों उदारे आज तक अहले सुन्नत की किस क़द्र ख़िदमात अंजाम दे पाए हैं इस का फैसला बासानी अहले राजस्थान व गुजरात कर सकते हैं बल्कि यूपी बिहार व दीगर रियासतों के अहले इल्म हज़रात से उन दो मराकज़ की ख़िदमात कम ही मख़फ़ी हूँ गी। हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मज़हर मदनी बिन हज़रत शाह अहमद सईद मुजद्दिदी नक़्शबंदी के फ़ैज़ याफताह बुजुर्ग हज़रत शाह सिद्दीक़ अल्लाह नक़्शबंदी मिला कात्यारीरहमत अल्लाह अलैहि के फ़ैज़ के यह दो दरिया हैं जो गुजरात व राजस्थान की दौर दौर तक की खुश्क ज़मीनों को संयत के पानी से आज तक खूब खूब सेराब कर चुके हैं और सिंचाई का सिलसिला मज़ेद तरक्की पर है सच यह है कि राजस्थान व गुजरात के मग़रिबी हिस्सों तक यूपी व बिहार के मशाइख़ व उलमा को लाने में उन दो उदारों और उन की शाखों का अहम रोल है बल्कि तहक़ीक़ यह है कि ढाई सौ
साल से मग़रिबी राजस्थान यानी थ्रियाथार की यह खानदान ख़िदमत अंजाम दे रहा है, ढाई सौ साल क़ब्ल जब यह इलाक़ा आबाद हो ना शुरू हुआ था, उन दो समंदरों यानी जामिआ सिद्दीक़ीय व जामिआ अकबरीय के बानी मुबानी ख़ानवादा लौंवीय जैलानिया उएन इस दौर में पकलाना पंजाब और बहावल पुर से आकर बाड़मेर के गावम नगर में आबाद हुआ और इस इलाक़ा की संयत बचा ने और आबयारी करने में जिद जहद शुरू करदी थी ।ग़ौस ज़माँ हज़रत अल्लामा पीर सय्यद हाजी अहमद शाह जैलानी कादरी (1299ह) का शहर बाड़मेर में आस्ताना शरीफ़ और उन की वहाँ रहलत इस का मुँह बोलता सबूत हैं, उन के बिरादर्जादा हज़रत कुतुब दौरां पीर सय्यद हाजी अली अकबर शाह जैलानी के इस इलाक़ा में तालीमी, तर्बीयती और तब्लीग़ी दौरे उन में अवाम व ख़वास को तरबीयत के लिए मुराक़बे, मुजाहिदे और ज़िक्र के हलक़े करवान इऑन हलकों में लोगों का बेसाख़ता चीख़ना पुकारना, गर्ये व ज़ारी, बेहोशी व रक्त के आलम में मनाज़िल सुलूक से आशना होना, सुलूक नक़्शबंदी की तकमील पर उन को ख़िला फ़त से नवाजना, किसी से पोशीदा नहीं है इस नेमत उज़्मा से जिस क़द्र यह मग़रिबी राजस्थान सदियों से मुस्तफ़ीज़ हो ता रहा शायद दूसरा अला क़्ह इतने तवील अर्से तक आशना हुआ होगा । फिर यह सिलसिला उन के दौर से आज के दिन तक बहमदा ताली जों का तों जारी व सारी है इस में कभी अनुक़्ता न पाया गया आज उन यादों को ताजे कर ने और अपने मा थे की आंखों से देखने के लिए हज़रत महबूब मुर्शद क्रीम अला मुह अल्हाज पीर सय्यद गुलाम हसीन शाह जेला नी की ज़ात बाबरकात काफ़ी व वाफ़ी है। नेअमतों की कसरत ने जिस तरह हज़रत साहिब रोज़ा पीर हा जी अली अकबर शाह को महसूद बनाया था आज इस कसरत फजल ने हज़रत को भी द्विचार कर रखा है । उन नेअमतों के परवर्दा सिद्दीक़ी उलमा हज़रात की निगाहों को कोई अल्लामा व फ़ुहा मुह याशीख़ वक़्त व पीर मग़ान मुतास्सिरो खेरा नहीं कर सकता था ।
हज़रत महबूब मुर्शद क्रीम मद ज़ला अलाली ने अपनी नुमा Mदगी में मौका बमौक़ा यूपी के मुख़तलिफ़ अज़ीम ख़ा नक़ाहों और दानिश गाहों में वफ़द बना कराण केसाथ राक़िम उलहरूफ़ को भेजामा शा अल्लाह इल्म के पहा ड़ भी नज़र आये, आ मिल शरीअत मशाइख़ नज़र आये ,लाखों मुरीदैन रखने वाले पैरान अजाम से शरफ़ ज़ियारत मिला ।लेकिन जो अख़िला क़ व अत्वार दिल को दीवाना बना दें ,जो गुफ़्ता र व किरदार हवास को बा ख़ता करदें,जो दुआ ईं दलों को तड़पना आंखों को रोना नसीब करदें इस का शमा ख़ा नवादा आ लेह लो नवीय के बुजुर्गों या उन के पीर ख़ा न ख़ानवादा मिलाका तैयार शरीफ़ के अला वह आज के दौर में देखा तो हज़रत मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद साहिब मुजद्दिदी में देखा और बहुत बेहतर देखा ।हज़रत मुफ्ती साहिब को बकौल हज़रत मुर्शद क्रीम मदज़ला अलाली के सिलसिला पाक सेबे पनाह मुहब्बत
थी वह अपनी जान सिलसिला पाक पर निसार करने को तैयार थे ,शायद यही मुहब्बत उन को ता ज़िन्दगी परवा न वार सरगर्दां बनाए रही ।दौर दौर के सफर ,उलमा व मशाइख़ और दीनी मरा कज़ से राबते ,वहाँ के जिम्मा दारों से मिला कातें, नेक मशविरे ,इत्तफा क़ व इत्तिहा द की दावत ,नेकियों की तरफ़ तवज्जो , मरा कबों व मजा हिदों की जानिब उलफ़त , यह सब सिवा ए मुहब्बत के को ई चीज़ नहीं करवा सकती ,इस दर्द का लुत्फ़ और मजा उन से पो छुये जो उन के मरीज हैं :
शाद बाश ए इश्क खुश सौदा ए मा
ए तबीब जुमला इलतहा ए मा
बह्र उलउलूम हज़रत अला मुह मुफ्ती अब्द उलमनान आज़मी ने सौ जा शरीफ़ में उन निमतहाए अज़मी कोआँखों से देखा और उन के दिल ने इस ख़ू शिबू कोपाया तो हज़रत पीर साहिब क़िबला से कहने लगे हज़रत हमारे यू पी में इल्म खूब है लेकिन रूहानी बा लीद गी के लिए आप की वहाँ अज़ हद ज़रूरत है ख़ुदा रा अपने दौरों में यूपी को शामिल कीजिए और हमारे वहाँ के उलमा की तर बीत कीजिए ,बहरालउलूम की तमनाको हज़रत बह्र उल-इरफ़ान ही ने पूराकिया, जा मआ अहमदिया क़ायम फर माकर तसव्वुफ़ को खूब ओज दिया, शरीअत व तरीक़त के संगम उलमा पैदा किए , आफ़ाक़ी उलमा जहां मिले बहमदा ता ली शरीअत व सुन्नत में और तरीक़त व तसव्वुफ़ में ढले हो ए दिखा ई दिए, उन की आ जज़ी और इन्किसारी ज़रब उलमसल है यह उम्दा तरबीयत पीर साहिब क़िबला में देखी जा सकती है या फिर हज़रत बह्र उल-इरफ़ान में पा सकते हैं ।बह्र उलउलूम साहिब क़िबला की तमन्ना थी कि हज़रत मुर्शद क्रीम दौरे करें और उन के फ़ैज़ान से उलमा बाफ़ीज़ हूँ ।लेकिन अल्लाह रब अलालमैन अपने बंदों की तर बीत के लिए क़रीब से सामान पैदा फर माया करता है हज़रत बह्र उल-इरफ़ान को सर जमीन यू पी के लिए पैदा फर माया ,उन के जरियेय अहम और ज़रूरी इंतजाम हुआ, बह्र उल-इरफ़ान ने अपने शागिर्दों के लिए जिस तर्ज़ तरबीयत को अपनायोह चाहते थे कि तमाम अहले इल्म इस उस्लूब पर काम करें और काम के उलमा पैदा करें ।क़न्नौज के स्टेज पर हर किस्म के उलमा व मशाइख़ को बड़ी क़द्र की नगा ह से देखा जाता था उन क़द्र दानियों ने सब को एक सिल्क में का फ़ी हद तक पर्व दिया था कितने मुख़लिसीन आप के काम से मुतास्सिर हो कर दलों में हर तरह के वलवले और जज्बे ले कर जाया करते थे। रहा दौरे तो उसे भी हज़रत बह्र उल-इरफ़ान नेपुरा कर के दिखाया, चनां चह इस शान व शो कित से हज़रत पीर साहिब क़िबला को क़न्नौज व बदायूं का दौरे हज़रत बह्र उल-इरफ़ान ही ने करवाया ।वैसे हुज़ूर पीर साहिब क़िबला मुफ्ती जहा नगीर साहिब को मंज़र इस्लाम बरेली शरीफ़ से लेने के लिए रेहान मिलित के हुक्म पर1402ह
में यू पी तशरीफ़ ले गए थे ,इस दौरे में उस्ताज़ मुहतरम हज़रत अला मुह मुफ्ती सय्यद अहमद शाह धोरा जी और उन के रफ़ीक हज़रत उस्ताज़ मुहतरम मरहूम मौलाना शेर मुहम्मद जा लेखड़ा को तख़सस में दाखिल के लिए जामिआ नईमय में दाखिल किया, वहाँ आप की अला मुह हाजी मुबियन उद्दीन से मुलाक़ात हो ई फर मा ते हैं: उन कोकशफ़ अयाँ हासिल था, नीज़ शैख़ तरीक़ अल्लाह ,मुफ्ती मुहम्मद अयूब साहिब अल्लामा मुहम्मद हाशिम साहिब और मुहतमिम साहिब से मुलाकातें फरमाएं, फिर बरेली शरीफ़ जा कर हज़रत सुबहा नी मियां से मिले, वालिद मुहतरम हज़रत रेहान मिलित का पैग़ाम सुनाया कि वह इस साल लो नी शरीफ़ तशरीफ़ ला ए थे हम ने शैख़ अलहदीस का मुतालिबा किया फ़रमाया कि हमारे यहाँ मुफ्ती जहांगीर साहिब हैं उन को ले आ ईं, सुबहा नी मियां ने फर माया: अगर अबू का हुक्म है, और आप सय्यद साहिब आये हैं तो हम कौन हैं रो कने वाले, चनां चह हज़रत पैरसाहब क़िबला की दावत पर मुफ्ती साहिब क़िबला द व साल के लिए लो नी शरीफ़ आये बादा ’’उदीपुर‘‘ रहने लगे यह दौरे हज़रत पीर साहिब क़िबला का अलग नौईयत का था और गुज़शता साल का बदायूं व क़न्नौज का दौरे मुख़तलिफ़ हैसियत रखता है ।
क़न्नौज का समीनार :
बह्र उल-इरफ़ान व पीर साहिब क़िबला के माबैन आपसी मुहब्बत के कुछ मुख़तलिफ़ जिलो ए क़ारईन कराम की ज़याफ़त तबा केलिये पेश हैं :
इस फ़क़ीर राक़िम उलहरूफ़ ने बार बार क़न्नौज की आ लिमी का नफ़र्स में उन की मुहब्बत के पेश नज़र हज़रत मुहसिन मिलित के हुक्म से हाजिरी दी जिस साल जश्न चहार सद साला मुजद्दिदी था। बासनी से हज़रत अल्लामा हाफ़िज़ सईद साहिब और नात ख़वान जा वेद और एक दूसरे भी थे कुकरा ला से अल्लामा फहीम अहमद साहिब भी तशरीफ़ ला ए हम सब को एक जगह ठहरा या गयाथा ,इमाम रब्बा नी की खद मात पर मुफ्ती फहीम साहिब से गुफ़्तगू हो ई जिस से उन की सिलसिला पाक से और इल्म और मालूमात से वा बस्तगी के अलावा इल्मी पुख्तगी से वा क़फ़ीत हो ई ,फिर उन की इन्किसारी और हर दिलअज़ीज़ी ने मज़ेद क़रीब किया फिर यह बाहम राबिता उन कोसो जा शरीफ़ लाया और राक़िम को बल्कि ख़ुद हज़रत मुहसिन मिलित शम्स अलमशा ख़ ,बानी जामिआ सिद्दीक़ीय को बदायूं और कुकरा ला ले गया ,इल्मी मशविरे ,मक़ाला नवीसी और तसनीफ़ व तालीफ़ के अहम उमूर में उन की मदद रही,मौजूदा दौर की मुफ़ाद परस्त दुनिया में ऐसे मुख़लिस, दूसरों के काम आने वाले और ख़ुद को दूसरों के लिए हर वक़्त तैयार रखने वाले ,कम ही उलमा मिलें गे,सच यह है कि अला मुह फ़ैज़ उलहक़ साहिब के बाद जा मआ अहमदिया और इस के बानी अला मुह बह्रुल-इरफ़ान साहिब
या उन के परवर्दा आफ़ाक़ी उलमा से मरासम मजबूत बना ने में मुफ्ती फहीम का हाथ ज़िया दह है ।
ख़ा निदान लो नी शरीफ़ पर लिखी जा ने वा ली पहली और तारीख़ी किताब ,,तज़किरा सादाद लो नी शरीफ़ व सौ जा शरीफ़ ,, की तर तीब में फिर इस पर तबसरा लिखने में।मिस्बा ही साहिब व अला मुह मुफ्ती मुहम्मद हनीफ साहिब के बाद तीसरे दर्जे पा मुफ्ती फहीम साहिब हैं अल्लाह ता ली उन के इस इख़लास और खद मतों को और इस जज्बा व वलवला को सुला मत रखे और शरफ़ कबूल अता फर मा ए। सकलेनी ख़ा निक़ाह के अला वह रोहिल खंड की 11 मुजद्दिद ई खानक़ाहों में से अज़ीम बड़ी बड़ी खानक़ाहों से राबिता उन के सज्जादा नशीनान व जिम्मा दारान से राबिता में मुफ्ती फहीम साहिब का ही रोल है लेकिन गहरी नज़र से देखा जा ए तो ख़ू द मुफ्ती फहीम जैसों से मिला कात और उन अहम उमूर के ज़ुहूर पज़ीर हो ने का सेहरा ख़ा निक़ाह अहमदिया और जामिआ अहमद यह क़न्नौज के सर सजता है जिस ने उन मुंतशिर दानों को पिरोने का अहम काम किया है और यही बह्र उल-इरफ़ान का ख्वाब था ।
क़न्नौज की पहली हा ज़री में मुफ्ती मुहम्मद निजाम उद्दीन रिज़वी सदर उलमदरसेन जा मआ अशर्फिया मुबा रुकपूर और अल्लामा यास अख्तर मिस्बा ही साहिब से भी मिला कात हो ई उन के रूबरू ख़ा निक़ाह दिहली के सजा दह नशीन हज़रत क़िबला इंस मियां साहिब फ़ारूक़ी मुजद्दिदी की बात चली मुफ्ती फहीम साहिब के पो छिने पर अला मुह यास अख्तर मिस्बा ही ने उन की शान में उम्दा और अच्छे कलिमात इरशाद फर मा ए जिस से मुफ्ती साहिब का जेहन साफ हुआ। राक़िम उलहरूफ़ तो इस गुफ़्तगू से महज़ूज़ इस लिए हुआकि हुज़ूर इंस मियां औलाद शाह अहमद सईद मुजद्दिदी हैं हज़रत शाह अहमद सईद हमारे बुजुर्गों के सिलसिला तरीक़त के बहुत बड़े बुजुर्ग और अहम कड़ी हैं बल्कि बकौल शाह गुलाम अली देहलवी के हज़रत शाह अहमद सईद की औलाद से इमाम महदी फ़ैज़ पा ईं गे उन के फ़रज़न्द औसत हज़रत शाह मुहम्मद उम्र की औलाद से हज़रत इंस मियां हैं जब कि बड़े साहबज़ादे शाह अब्द अलरशीद से ख़ा निक़ाह मासू मि रा मपुर वा ले शाह अब्द अलरशीद हैं और छु टे साहबज़ादे हज़रत शाह मुहम्मद मज़हर की ओला द मदीना मुनव्वरा में सुकूनत पज़ीर रही लेकिन उन का मुकम्मल फ़ैज़ संध में हैद र आबा द के गावम मिला कात्यार शरीफ़ के बुजुर्ग हज़रत शाह सिद्दीक़ अल्लाह को अवैसी तौर पर पहुँचा ,जिस से ख़ा निदान लो नी शरीफ़ ने पहली बार नक़्शबंदी फ़ैज़ हासिल किया ,मिला कात्यार के इस बुजुर्ग को शाह आज़म उन के ख़लीफ़े और फर ज़िंद शाह अब्द अलरहीम को साहिब कबा फिर उन के फर ज़िंद शाह मुहम्मद इसहा क़ को पागारा बादशाह कहते हैं यही पागारा बादशाह हज़रत मुहसिन मिलित शैख़ अलमशा ख़ बानी जा मआ सिद्दीक़ीय के पीर व मुर्शद हैं यों ख़ा निक़ाह मज़हरी दिहली से ख़ा निवाह लो नवीय को ख़ास निस्बत हासिल है न्युजिया खानगाह, शाह मज़हर की
विला दत्त गाह भी है और वहीं शाह मज़हर के जिद अमजद शाह अबू सईद आराम फर मा हैं इस लिए चा हित थी कि इस खानगाह से राबिता हो जा ए ।अल्लामा यास अख्तर साहिब के बयान ने रास्ता हमवार किया वहाँ जाना हुआ निस्बत का ख़याल करते हो ए हज़रत इंस मियां सौ जा शरीफ़ तशरीफ़ ला ए दूसरे साल लो नी शरीफ़ भी उन काजा ना हुआ यह रवा बत भी जलसा जामिआ अहमदिया के जरिये हुए हज़रत बह्र उल-इरफ़ान इस का वास्ता और सबब हैं ।
क़न्नौज की इसी पहली हा ज़री में बरेली शरीफ़ से अला मुह मुफ्ती मुहम्मद हनीफ साहिब तशरीफ़ ला ए उन से मुलाक़ात अगर चह पहले से थी मगर इस मुलाक़ात ने मज़ेद क़रीब किया जिस की बना पर सौ जा शरीफ़ व इमाम अहमद रज़ा एकेड मि के ताल्लुकात ज़्यादा मुस्तहकम हो ए ।जामिआ सिद्दीक़ीय(क़ायम करदा1986)में नशर व इशाअत का मन्सूबा शुरू से था हुज़ूर पीर साहिब क़िबला का इरादा था कि सब से पहले ख़ा निदान लो नी शरीफ़ और ख़ा निदान मिला कातया र शरीफ़ पर नीज़ अला क़्ह था र के फ़िक़रा और उलमा पर लिखा जा ए ,इस मक़सद से क़न्नौज की पहली हा ज़री में अला मुह यास अख्तर मिस्बा ही साहिब से अर्ज़ किया तो फर माया मौलाना ! यह काम आप मुरीदैन व मुतवस्सिलीन उलमा ही सर अंजाम दो गे दूसरा इस क़द्र मेहनत आप के लिए कौन कर ने वाला है इस गुफ़्तगू से इरादा मुस्तहकम हुआ कि काम हमें ही कर ना है जबकि हुज़ूर पीर साहिब क़िबला चंद साल क़ब्ल बार बार फर मा चुके थे कि बुजुर्गों पर लिखो! फ़िक़रा के अहवाल लिखो पस वापस आकर किताब ,,तज़किरा सादाद ,,का मवाद मुरत्तिब किया और यह किताब मंज़र आम पर आगई ,यह ख़ुसूसी मीटिंग और इस अहम काम के लिए दिल में इरादा की पुख्तगी सर जमीन क़न्नौज से हो ना भी हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की सच्चाई का समरा है जिस का उन को अज्र मिलना है उलग़र्ज़ हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान उन की तहरीक और इदारा अहम और ज़रूरी कामों की कुंजी हैं जिन से ऐसे कई अहम उमूर सर अंजाम पा ए हूँ गे और ’’अलदाल अली अलख़ैर क़फ़ाइला,, के पेश नज़र वह उन के अज्र के मुस्तहिक़ करार पा ते हैं। ؏
ख़ुदा रहमत कंद एं पाक तुयन्त रा
अख़िला क़ व आदात:
दुनिया में मौला ता ली के उन गणित और बेशुमार ऐसे बंदे हो ए और हूँ गे जो निगाह कुदरत में खैर की कुंजी हैं और मख़लूक़ ख़ुदा को भी उन के इस वस्फ़ से इंकार नहीं ,हज़रत अला मुह मुफ्ती बह्र उल-इरफ़ान ऐसे ही अज़ीम अलक़द्र नफ़ूस क़ुदसिया में से थे जिन के दिल की सफ़ा ई अख़िला क़ की पा केज़गी और फिरा ख़ दिल्ली ने अहले सुन्नत की खूब तर शीराज़ा बंदी की उलमा ए कराम और मिशा ख़ ,मतमूल तबका व ग़ुरबा ,अपने पुरा ए ,क़रीब के दौर के
सब लोग सत्ता श व तारीफ़ में रतब उल्लिसान हैं जिस ने उन को जितना जाना इतना ही क़रीब हो ता चला गया ,अल्लाह ता ला के नेक बंदे ऐसे ही हुआ करते हैं राक़िम उलहरूफ़ को अपने बुजुर्गों के अख़िला क़ क्रीमाना की झलक हज़रत मौसूफ़ में बदरजा उत्तम नज़र आया करती थी जामिआ अहमद यह के जलसा में जब जब हा ज़री हो ई खूब पिया र से मुलाक़ात का शरफ़ बख्शते हुज़ूर मुहसिन मिलित से निस्बत की बना पर इमतियाज़ बख्शते यह शफकत और मेहरबा नियां मुक़रबान बारगाह इला की तरफ़ से किसी एक के साथ मख़सूस नहीं हो तें वह ’’उल्लास्तक़ा मुह अली अम्र अल्लाह वालिशफ़क़त अली ख़ल्क़ अल्लाह,, पा पो रे उतरते हैं। मख़लूक़ ख़ुदा की खद मत को ही वह रज़ा ए अलहि का ज़रिया समझते और इस को दा रेन की का मिया बी समझते हैं ,यही वजह है कि उन को चा हने वालों में मुस्लिम व गैर मुस्लिम का इमतियाज़ ख़त्म हो जाता है, नमाज़ जनाज़ा में शिरकत के लिए हुज़ूर मुर्शद क्रीम ने वफ़द भेजा तो देखा कि क़न्नौज का हर बाशिंदा आने वाले मेहमानों के लिए आंखें बिछा ए था जिस में अपनों प्रायों का इमतियाज़ न था ,शहर क़न्नौज पूरा सौ ग्वार नज़र आरहा था गोया उन सब के वालिद दुनिया से चले गए हैं और वह सा रे एक ही दिन में यतीम से हो गए हैं, नमाज़ जनाज़ा वाले दिन क़न्नौज में शायद को ई आदमी अपने घर बैठा थावरना मर्द व ज़िन बाहर निकल आये थे, यहाँ केएक सेमीनार में अला मुह अनिवार अहमद बग़दादी से मुलाक़ात हो ई जो अलीमय जिम्मदा शाही के सदर उलमदरसेन हैं दीगर कई उलमा भी थे समीनार से क़ब्ल सुबह 8 बजे मुलाक़ात और ता रफ का वक़्त मुक़रर था, हज़रत बह्र उल-इरफ़ान ने सब को मुलाक़ात का शरफ़ बख्शा और फर माया आप लोगों से हमें बे हद मुहब्बत है, आप जितना क़रीब हूँ गे उन शा अल्लाह हम को इतना मुख़लिस पा व गे इस लफ़्ज़ ने जुमला हा ज़रीन उलमापुर गहरा असर छोड़ा।
एक मर्तबा बैरूनी उलमा क़न्नौज में मदऊ थे जिन से मुलाक़ात के लिए सुबह 8 बजेका टा म मुक़रर था सौ जा शरीफ़ का वफ़द रोना ही से आरहा था मौलाना आफताब साहिब को राबिता करते रहने का हुक्म था वह बराबर राबिता में रहे हती कि उएन साढ़े आठ बजे पहुँचे उन मख़सूस बैरूनी उलमा से मुलाक़ात के दौरान बाकायदा इस वफ़द काआ सतकबाल किया और मख़सूस नशिस्त पर बिठा या गया ।
एक मर्तबा बरेली शरीफ़ से अला मुह अनुआ र अहमद और हज़रत पीर विजा हित मियां और मुफ्ती फहीम साहिब व राक़िम व मौलाना हाशिम साहिब क़न्नौज रात को 11 बजे पहुँचे इस वक़्त भी उलमा को टाइट कर रखा था जिन्हों ने ख़ौर दो नोश और क़याम गाह कामुकमल इंतजाम कयाकनोज में हरसाल दो रोजा प्रोग्राम में पूरा हिंदोस्तान मदऊ हो ता है तर की व अमेरीका और
चेन व बंगला देश से उलमा मदऊ हो ते हैं, अवाम का ठा ठें मारता हुआ समंदर हो ता है ऊरतों का मजमा मुर्दों से कुछ कम नहीं हो ता, औकात इस तरह मुनज़्ज़म तौर से तै किए हो ते हैं कि सर मो फ़र्क़ नहीं आता, हज़रत बह्र उलारफा न हर जगह नज़र आते हैं ,सुबह अशराक़ तक मरा कबा अहले उदार ह पा आम दिनों में तो लाज़िम हैही मगर अस्ना ए जलसा भी इस अमल में नाग़ा न हो ने देते ,तहजद ,शिजरा ख़ू अनी से स्टा फ़ में गफलत न देखी, चलते हो ए जलसा गा ह में काम करतेहुए अक्सर तलबा व स्टा फ़, शिजरा शरीफ़ पढ़ते ज़िक्र व अज़कार करते हो ए नज़र आये। जलसा आम तौर से फ़ज्र तक चलता है नमाज़ फ़ज्र इसी जलसा केमैदान में हुआ करती है मुफ्ती बह्र उल-इरफ़ान साहिब इस में शा मिल रहते ,देखा कि नमाज़ के बाद सुलूक का सबक पढ़ने वाले हज़रात हाला बना कर वहीं बैठ जा ते ताकि हज़रत से तवज्जो ले सकें ,काम के हुजूम में इस चीज़ की फ़िक्र अहले इदारा के नेक और सालिह हो ने की अज़ीम दलील है ,वर्ना अक्सर उदारों का हाल ना गुफ़्ता ब है किसी को बाजमाअत नमाज़ पढ़ता या तस्बीह हाथ में लिए देख कर वह सो फ़ी का इतलाक़ किया जा ने लगता है जिस से मुतनफ़र हो कर इस नेक अमल को छोड़ने की सौ चुने की लगता है ऐसे में एक इदारा की यह पाबंदी यक़ीनन लायक सद तहसीन है।
अरब मुमालिक से या अमेरीका से आये उलमा से उलमा ए क़न्नौज का अरबी और अंग्रेजी ज़बान में गुफ़्तगू कर ना यहाँ के फ़ारिग़ इलतहसील उलमाकी सलाहीयत पर दाल है , आप के एक शागिर्दबंगला देशी सेदारशाद साहिब का बेरू नी उलमा को लाना उन की तक़ा रीर की उर्दू में तर्जुमानी करना ,जामिआ अहमदिया की बड़ी इल्मी ख़िदमत कही जा ए गी, इस सय्यद साहिब पर हज़रत बह्र उल-इरफ़ान साहिब का फ़ैज़ान बहुत ज़िया दह है ,वह बयान करते थे कि मेरी तमन्ना है कि हर साल नये नये उलमा को लावों और जा मआ अहमदिया दिखा वं और वह सिर्फ़ बा तें नहीं बल्कि वह आज तक ऐसा करते आये, ख़ुदा करे वह और दूसरे यह अमल हमेशा जारी रखें ।एक मर्तबा बड़े बड़ों को बुलाया गया, मगर हज़रत मुफ्ती साहिब को लोगों ने भरोसा में रखा सरकारी काग़ज़ी कारवा ई उएन वक़्त पा उन सय्यद साहिब को आकर करनी पड़ी इस पा वह फर मा रहे थे हमारे हज़रत जिल्द भरोसा कर लेते हैं लोग किज़्ब बयानी से मुतमइन कर देते हैं इतना बड़ा काम सर पर ले कर बहुत चुस्त रहना पड़ता है फिर बो ले मुझे सारा काम आकर करना पड़ता है ऐसे मुख़लिसीन काहुज़ूरबहरालारफान को मिलना यक़ीनन ख़ुदा विंद क्रीम की ता ईद है ।
स्टाफ़ व मदरसेन में जिन से हमारी मुलाक़ात हो ती रहती है उन के अख़िला क़ व आदात और लिबास को देखिए तो गोया मुफ्ती साहिब का नमो न हैं ,हज़रत के साहबज़ादों ,भा इयों ,दामादों व दिगर मुअल्लिमीन व
शागिर्दों को बिलकुल अख़िला क़ में नेकी में आप सा पाया जिस से बेसा ख़ता अलहम्द लिल्लाह ज़बान पर आता है ऐसा बहुत कम उदारों में पाया जाता है ।
क़न्नौज एक तारीख़ी शहर है दिहली से क़ब्ल हिंदोस्तान का दारालसल्तनत रहा यहाँ का इतर बहुत मशहूर है गैर मुक़ल्लिदीन अहले हदीस के इक्का बुर क़न्नौज से ताल्लुक रखने वाले थे। रोहिल खंड अवध और आग्रह दिहली के वस्त में वाक़्य क़न्नौज से उठने वाला फ़ित्ना गैर मुक़लदीयत बहुत जिल्द पूरे बुर सग़ीर में फैल गया हमारे अहले सुन्नत के मराकज़ या रोहिल खंड में या अवध याफर मशरिक़ी यू पी में हैं ।इस सूरत हाल में हज़रत बह्रुल-इरफ़ान कापनी तहरीक का मरकज़ क़न्नौज को मुंतख़ब करना कितनी दौर अंदेशी की बात हो गी यही वजह है कि क़न्नौज की यह आफ़ाक़ी आवाज़ बहुत जिल्द पूरे हिंदोस्तान बल्कि बैरून मुमालिक तक पहुँच गई और साला न जलसा में यहाँ की भेड़ देख कर बरेली शरीफ़ या मा रहरा शरीफ़ और सौ जा शरीफ़ की याद आने लगती है ।एक मर्द क़लंदर के दिल की मुहब्बत और लग्न ,सफ़ा ई व सुथरा ई और खैर ख़्वाही ने बहुत जिल्द कितना बड़ा काम किया है अक्ल इंसानी इस मकबू लेत आम्मा को समझने से क़ासिर हो जा ती है ।
हम नाक़िसों में वह ज़र्फ़ नहीं कि किसी की दिलरुबा ईआँ भा नप सकें जो कुछ मुर्शिदान कराम की इनायात से हासिल हुआ इस में यह मेहरबा नियां भी शामिल हैं कि दिलरुबा की राना ईआँ समेटने को ज़र्फ़ अता फ़रमायाआइस में बसेराफर माया जो दिल किसी एक जामा अलकमालात को बोजह इश्क व मुहब्बत जगह दे देता है इस दिल को इस दिलरुबा की निस्बत वा ली चीज़ के अलावा चीज़ नहीं भा ती वह इंसा न दूसरे की तारीफ़ से कतराता है उसे दूसरे के गीत गा ने बहुत मुश्किल हो ते हैं ,आली हज़रत अलैहि अर्रहमा ने इसी वजह से फर माया :
करूँ मदह अहले दौल रज़ा पड़े इस बुला में मेरी बुला
में गुदा हूँ अपने क्रीम का मेरा दीन पारे नां नहीं
मगर मजनूं को लैला के द्रव दीवार बल्कि इस गली में घो मने वाले कुत्तों से भी प्यार था जो चीज़ महबूब की याद दिला दे इस की याद भी महबूब ही की याद हुआ करती है ।हज़रत बह्र उल-इरफ़ान साहिब को अलहम्द लिल्लाह बहुत सी जहतों में हर जिहत से हज़रत महबूब मुर्शद क्रीम से मेल खाता पाया इस लिए उन की ज़ात मुख़तलिफ़ जहतों में लायक तारीफ़ नज़र आती है ।
चारों सलासल के मुरीदैन की बुला तफ़रीक़ तरबीयत व तालीम में, हज़रत मुर्शद क्रीम मुहसिन मिलित और
बह्रुल-इरफ़ान एक से नज़र आते हैं ,सौ जा शरीफ़ और क़न्नौज के दोस्टेज नज़र आये जिन्हें हर सच्चा दीन का मुख़लिस ख़ादिम सराहताआ और वहाँ बार बार आना चा हताहै उलमा की क़द्र , मिशा ख़ की ताज़ीम उन दोनों ख़ा नक़ाहोंमैं एक सी पा ई ।सोफी बा सफ़ा और आलम दीन, मस्लिह कौम और शब् विरोज़ संयत की शीराज़ा बंदी में लगा हुआ एक क़न्नौज के दुल्हा तो दूसरे सौ जा शरीफ़ के दिलरुबा को पाया ।वह आफ़ाक़ थे तो यह आफता ब हैं ।मुरीदैन को सुलूक की मनाज़िल तै कराने उन को तवज्ज्हात अता करने ,उलमा को सोफी बा सफ़ा बना ने में दोनों मुश्तर्क हैं क़द्र मुश्तर्क चीजें दोनों में और भी बहुत सारी हैं जिन्हें शुमार कर ने की गंजा श नहीं ।
हज़रत बह्र उल-इरफ़ान साहिब की एक ख़ा सीयत और बहुत बड़ी ख़ा सीयत यह थी कि वह जहां जा ते वहाँ के दीनी ख़ुदाम में नयी रूह फूँक दिया करते थे ,उन की खद मात को बे लौस सरा हा करते थे ।जा मआ सिद्दीक़ीय में इस साल के उर्स सिद्दीक़ी में उन्हों ने वह हुक्का क़ बयान किए थे जो शायद को ई दूसरा कर सकता है ,सिलसिला पाक की शान व अज़मत और इस की ज़रूरत पा बहुत बो ले ,दारउलउलूम और बानी दारउलउलूम की अज़मत को उजागर कर ने के लिए खूब लोगों को तवज्जो दिला ई ।
आम तौर से उलमा अपने मौज़ू बयान किया करते हैं, मुफ्ती साहिब में यह चीज़ बा लकल नहीं थी बल्कि अक्सर जगह उन से सुना ,फर मा ते थे: उलमा से मेरी शिका यत है कि मौका एक हो ता है और बयान दूसरा किया करते हैं ,आज यह इफ़्तिताह बुखा री शरीफ़ और उर्स सिद्दीक़ी है चा हिये कि इमाम बुखा री और उन की सही बुखा री पा बोला जा एऔर साहिब उर्स हज़रत शाह सिद्दीक़ अल्लाह अलैहि अर्रहमा पा दिल खोल कर बयान किया जा ए ,फिर फर माया: मुझे इस बुजुर्ग के मुताल्लिक़ ज़्यादा मालूम नहीं ,मगर उन के मुर्शद क्रीम हज़रत ख्वा जह मुहम्मद मज़हर मदनी और उन के वालिद हज़रत शाह अहमद सईद मुजद्दिदी का पता है ,फिर उन दो बुजुर्गों नीज़ ख्वा जह बहा वालदैन मुश्किल कुशा के हवाले से सिलसिला पा क की खूब फ़ज़ीलतीं बयान फरमाएं।यू नही जश्न चहार सद साला मुजद्दिदय में उलमा के बाज़ वस्वसों का अला ज करते हो ए इस क़द्र अम्मा म साहिब यह बो ले कि सब के ईमान हरे भरे और ताजे हो गए , मुजद्दिदी फ़ैज़ान से पूरा मजमा तर बितर हो गया ।उन की गुफ़्तगू संजीदा ,आम फ़हम और बा असर हुआ करती थी ,हर किस व नॉक्स ,आम व ख़ास बुरा बुर मुस्तफ़ीज़ हो अ करता था कई किताबों के मुसन्निफ़ ,मुतअद्दिद उलूम के माहिर और दुनिया ए संयत के इस मर्द क़लंदर की तुर्बत पर ख़ुदा विंद क्रीम मूसला धार बारिश रहमत बरसा ए और उन्हें ग़रीक़ जन्नत करे ,उन की खद मात मुख़लिसा न को अपनी बारगाह में कबू ल का शरफ़ बख़्शे ,उन के पस मानदगान को सब्र के
साथ नोम अलबदल नसीब करे ।लिखने को तो और बहुत कुछ है जिसे दूसरे वक़्त के लिए छोड़ा जाता है।आगे वह मिआ न जात व तक़ा रीज़ लिखी जा ती हैं जो उन्हों ने मुख़तलिफ़ औकात में सौ जा शरीफ़ के ताल्लुक से तहरीर फर मा ई थीं ।।।
अबदुर्रहीम अकबरी
जामिआ सिद्दीक़ीय सूजा शरीफ़ ज़िला बाड़मेर राजस्थान
5 ज़ी अलहजा 1440 ह
7अगस्त 2019 चहारशंबा
मुआइना डायरी
अज़:बह्र उल-इरफ़ान हज़रत अला मुह अल्हाज मुफ्ती मुहम्मद आफ़ाक़ अहमद नक़्श बंदी
बानी विसरबराह आली जा मआ अहमदिया क़न्नौज यू पी
19शाबान 1432 ह/22 जो ला ई 11 20 को हज़रत सय्यद पीर गुलाम हसीन साहिब नक़्श बंदी मुजद्दिदी दाम ज़ुल्ला अलाली की ख्वा हश का एहतिराम करते हो ए दार उलउलूम फ़ैज़ सिद्दीक़ीय के सा ला न जलसा के मो क़ा पर हाजिरी का शरफ़ हासिल हुआ ।पर शिकवा उम्मा रत , तलबा की कसरत , शरकएइजलास की कसरत और अकीदत व मुहब्बत और प्रोग्राम की तरतीब , मेहमान ख़ुसूसी व उलमा व मिशा ख़ की कसरत आमद और ख़ुद हज़रत क़िबला पीर साहिब के हसन इंतजाम वगैरहा कोदेख कर अज़ हद ख़ू शी हो ई । इस्लाम व संयत की तरवेज व अशा अत के ताल्लुक से जो आप की मेहनतीं और खद मतें हैं वह निहायत ला क़ सत्ता श हैं ।फिर बीअत व इरादत के ज़रिया इसलाह व इरशाद की जो कोशिशें देखने में आएं वह आम तू र पर बहुत कम नज़र आ ती हैं ।आने वा लूँ का हुजूम और उन की कसरत और वाल्हा न अकीदत हज़रत क़िबला सय्यद साहिब मदज़ला उला ली के अख़िला क़ व कर दार की रोशन दलील है।बा रगा ह रब अलालमैन में अर्ज़ है कि इस पर फ़ित्न दौर में ऐसे ला क़ अफराद हमें कसरत से अता फर मा ए और सय्यद साहिब क़िबला का साया दराज़ फर मा ए ता कि इस्लाम व संयत और तसव्वुफ़ व तरीक़त काकाम हो ता रहे और लो ग फ़ैज़ याब होते रहीं । यह कलबी ता सरात हैं जो सब कुछ देख कर सफ़ा क़िरतास पर सब्त हो ए वर्ना आम तू रिपर फ़क़ीर मुजद्दिदी मुआइना वगैरह बहुत कम लिखता है ।
नीज़ 3 ज़ी उलक़ादा 1437 ह को लिखते हैं: