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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiबह्र उल-इरफ़ान: समात व जहातबह्र उल-इरफ़ान एक अंजुमन थे

अध्याय 50 में से 65पृष्ठ 336–340

बह्र उल-इरफ़ान एक अंजुमन थे

मौलाना मुहम्मद मसीह उद्दीन मिस्बाही*

मनक़ूल है कि मंसूर इब्न अम्मार रहिमा अल्लाह बहुत ही बुजुर्ग और कामिल इंसान थे।उन के वाज़ में ऐसी तासीर थी कि मुस्लिम तो मुस्लिम गैर मुस्लिम भी उन का बयान सन कर रो पड़ते थे और उन के लबों प्रबे साख़ता लाआला अलाइलिला मुहम्मद रसूल अल्लाह जारी होजाता था। तक़रीबा नवे साल की उम्र में उन की वफ़ात हुई ।जब दफन किया गया तो एक साहिब मुशाहिदा ने देखा कि उन पास फरिश्ते आये और पूछा।मिन रबक?(तेरा रब कौन है)हज़रत मंसूर को उन का सवाल नागवार गुजरा और क़दरे तल्खी से गोया हुए।

स्नोमेरी उम्र जब बेस साल थी तब से तो में ने तौहीद वरिसालत के बारे में वाज़ व नसीहत करना शुरू करदिया था और मुसलसल सत्र साल तक यही काम करता रहा ।जिस के नतीजे में एक दुनिया ने हिदायत पाई और कितने गैर मुस्लिम दौलत ईमान से मुशर्रफ़ हुए।अब तुम बताओ कि जिस शख्स ने पूरे सत्र साल रब की तरफ़ दावत दी हो और जो रब को जानते ही न थे उन को रब की पहचान कराई हो आज तुम इसी से आकर पूछते हो कि तेरा रब कौन है?मलाइका हैरान रह गए ।बारगाह उला की तरफ़ मुतवज्जा हुए तो कहा गया।दुरुस्त कहता है मेरा बंदा मंसूर इस को इस के हाल पर छोड़ दो।

में साहिब मुशाहिदा तो नहीं हूँ लेकिन बह्र उल-इरफ़ान हज़रत अल्लामा मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी अलैहि अर्रहमा ने जिस अंदाज़ में ज़िन्दगी गुजारी है इस के हवाले से वह भी निकेरेन से कह सकते हैं कि मेरी ज़िन्दगी का तो हर लम्हा रब की अज़्मतों का डंका बजाने के लिए वक्फ था में ने तो अपनी हयात मुस्तआर का हर लहज़ा लोगों के दलों में इश्क रसूल ﷺ की शमएँ फ़िरोज़ां करने में गुज़ारदिया और मेरा तो पूरा जीवन ही इस्लाम की आबयारी और इस के फ़रोग़ व इशाअत में बीत गया ,अब तुम मुझ ही से आकर सवाल करते हो कि तेरा रब कौन है?नबी कौन हैं?और दीन कौन सा है?मुझे सौ फीसद यकीन है कि अगर बह्र उल-इरफ़ान ,दाई बरहक़,ताजदार रशद व्हिदायत हज़रत मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी अलैहि अर्रहमा ने यही अंदाज़ इख्तियार किया तो बारगाह रब अलाज़त से मलाइका को यही निदा आये गी कि ठीक कहता है मेरा बंदा आफ़ाक़ अहमदास को इस के हाल पर छोड़ दो।

बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा की शख्सियत के कई पहलू थे।हर पहलू बहुत जानदार और निहाहित शानदार

था।आप आलम बाअमल,मुत्तक़ी व परहेज़ गार,तफसीर वहदेस के माहिर ,इल्म फ़िक़्ह के मदबर,बेहतरीन उस्ताज़,बुलंद पाया मुफ्ती और दीन की तड़प से मालामाल बहुत मुख़लिस मुसलमान थे। बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा मैदान अमल के बादशाह थे ,सस्ती और काहिली को आप ने कभी अपने क़रीब न आने दिया ,थक जाना तो आपने सीखा ही नहीं था,इंतिहाई मुहर्रिक व मुतहर्रिक जो हिम्मा वक़्त तैयारी की हालत में रहते ,हर लम्हा कुछ कर दिखाने की जुस्तजू रहती ,एक बिजली सी थी जवान की रग व पे में दौड़ ती थी,साठ साल की उम्र होने के बावजूद आप मुकम्मल फ़ुट इंसा न थे तक़रीबा अठारह घंटे रोजाना मसरूफ़ कार रहने के आदी थे।बह्र उल-इरफ़ान का मशहूर मक़ूला था काम, काम, काम, मरने के बाद आराम, अपने इस मक़ूला पर ख़ुद बह्र उल-इरफ़ान अमल पैराँ रहे इस को हर वह शख्स बखूबी जानता और पहचानताहै जिसे उन के साथ कुछ वक़्त गुजारने की सआदत हासिल हुई हो।

आम तौर पर देखने में आया है कि बाज़ लोग बड़ी क़द्र विमंजिलत के मुस्तहिक़ होते हैं लेकिन अपनी ज़िन्दगी में उन को वह हक़ीक़ी मक़ाम विमर्तबा नहीं मिल पाता जो उन्हें मिलना चाहिए।अलबत्ता दुनिया से रुखसत होजाने के बाद हर तरफ़ से उन के लिए तारीफ़ वितौसीफ़ की बारिश होने लगती है ।बकौल शाएअर के

उम्र भर सिंग ज़नी करते रहे अहले वतन

यह अलग बात है दफनाएं गे एज़ाज़ के साथ

लेकिन बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा उन खुश बख्तों में शामिल हैं जिन की हयात में ही बहुत पज़ीराई हुई ,उन की इज्जत व तौक़ीर की गई ,अवाम वख़वास की तरफ़ से उन को वह मक़ाम दिया गया जिस के वह मुस्तहिक़ थे।बल्कि यह कहा जाए तो बे जाना होगा कि आप मक़ाम महबूबीयत फ़ाइज़ थे और महबूब तो फर्महबूब होता है।

यों तो राक़िम उलहरूफ़(में) बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा से अल-जामिआ लाशर्फिया मुबारकपुर के अहद तालिब इल्मी से ही ग़ायबाना मुतआरिफ़ था लेकिन जब फ़राग़त के बाद अल-जामिआ इलरिज़ोय मज़हर उलउलूम गुरसहाय गंज में जीर तदरीस और जामा मस्जिद मृगावां के ओहदा ख़िताबत व इमामत पर मामूर हुआ तो इत्तिफ़ाका एक ताज़ियती मजलिस में पहली बारबालमशाफ़ाह शरफ़ मुलाक़ात हुई।मुहब् मुकर्रम मौलाना नूरउलऐन आफ़ाक़ी ने जब मेरा तआरुफ़ किराया तो फोरा आप ने मुझे गले से लगाया और खैर व आफ़ियत के बाद क़न्नौज आने की दावत दी।

फ़क़ीर मिस्बाही पहली ही मुलाक़ात में आप के हसन ख़ल्क़ ,ख़ल्क़ दोनों से काफ़ी मुतास्सिर हुआ।फिर यह मुलाक़ात व ज़ियारत का सिलसिला ता विसाल जारी रहा ।राक़िम (में) जब कभी शरफ़ मुलाक़ात के लिए आप की ख़िदमत अक़्दस

में हाजिर होता तो बड़े तवाज़ा के साथ मुसाफ़ा व मुअनिक़ा करके अपने क़रीब में बिठाते ,उम्दा ज़याफ़त का एहतिमाम करते,तालीम वित्ताल्लुम और इसलाह मुआशरा के अनवान पर काफ़ी नसीहत आमेज़ गुफ़्तगू करते ,और उम्मत मुस्लिमा के दरपेश मिसाइल,मुश्किलात और इस के हल के लिए कुछ राह अमल और तरकीब की तरफ़ तवज्जो दिलाते रहते थे(आप की गुफ़्तगू में एक नुमायाँ ख़ुसूसीयत जो महसूस करता था वह यह हैकि आप सिर्फ़ अपनी बात सुनाते नहीं थे बल्कि अपने से छोटों की बातें भी खूब गौर से सुनते थे।और इस का तश्फ़ी बख्श जवाब देते थे ) वापसी प्रभी मुझ से ऐसा ही मुहब्बत भरा सुलूक करते थे।और उधर गुज़श्ता कई सालों से अल-जामिआ लाहमदिया क़न्नौज के सालाना आलमी कान्फ़र्स व दस्तार बंदी के मौका पर शिरकत की दावत ख़ास देते थे और में तसलसुल के साथ हाजिर हो कर मुस्तफ़ीद विमुस्तफ़ीज़ होता था।

बिलाशुबा बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा बहुत सारे औसाफ़ हमीदा से मुत्तसिफ़ थे लेकिन हज़रत के अंदर राक़िम (में) ने चंद ऐसी नुमायाँ ख़ुसुसीआत जो देखा है उसे सुपुर्द कलम करके अपनी बात ख़त्म कररहा है

तक़्वा व परहेज़ गारी:

बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा जहां इल्म के एक मीनार थे वहीं अमल के भी निहायत हसीन शाहकार थे।हज़र में नमाज़ तकबीर औली के साथ बाजमाअत नमाज़ अदाकरते थे और उमूमासफर में भी इस का इल्तिज़ाम करते थे,नीज़ दीगर फ़राइज़ पर मदामत और इत्तिबा सुन्नत के साथ साथ परहेज़गारी में अपनी मिसाल आप थे ।

हसन ख़ल्क़ :

अख़लाक़ तो ऐसा था कि पहली ही मुलाक़ात में मिलने वाला आप का गर्वीदा होजाता था।आप हर आने वाले की तवाज़ा करते थे।हर मिलने वाला यही समझता कि हज़रत की शफकत उमझ पर सब से ज़्यादा है।

छोटों पर शफकत और बड़ों की अदब वित्ताजीम मौजूदा वक़्त में कम ही अफराद देखने को मिलते हैं जो छोटों पर शफकत और बड़ों की अदब व ताज़ीम करते हैं लेकिन यह वस्फ़ बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा के अंदर बदरजा उत्तम मौजूद थी।में ने देखा है कि आप मुझ जैसे छोटों से जब कभी मिलते थे तोखूब रफ़ुक़ व नरमी और शफकत से नवाजते थे,कभी इस की प्रवाह नहीं की कि मजलिस में हैं कान्फ्रेंस में।राक़िम ने देखा है कि जब उस्ताज़ ग्रामी मंबा उलउलूम वालमारफ़ हज़रत अल्लामा मुहम्मद अहमद मिस्बाही दाम ज़ला नाज़िम तालीमात जामिआ अशर्फिया

मुबारकपुर(जो बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा के हमासर और उम्र में कुछ बड़े हैं) क़न्नौज तशरीफ़ लाते थे तो खूब खूब अदब वित्ताजीम करते थे इसी तरह अपने पीर विमर्शद समेत दीगर उल्मा व मशाइख़ के साथ भी रवैया रखते हैं।

दावत व हिदायत में मोतदिल अंदाज़ इख्तियार करना आप के अंदर यह ख़ुसूसीयत थी कि बग़ैर अफराद व तफ़रीत के आप लोगों को रशद व्हिदायत की तरफ़ माइल करते थे ,संजीदा गुफ़्तगू,आसान लब विलहजा,हिक्मत से भरी नसीहत आप के खिताब का तुर्रा इमतियाज़ था यही वजह है आप की बातों से अवाम तो अवाम ख़वास का काफ़ी मुतास्सिर होते थे।

उलहब फ़ी अल्लाह व अलबुग़ज़ फ़ी अल्लाह आप इस वस्फ़ के कामिल मिस्दाक़ थे।कभी ज़िन्दगी में मज़बज़िब वस्फ़ क़बह को अपने क़रीब आने नहीं दिया।जिस से भी दोस्ती व ताल्लुक बनाया अल्लाह और इस की शरीअत के वास्ते और जिस से भी बीयर,दुश्मनी की अल्लाह ताली के बुग़ज़ की वजह से

फ़रोग़ इल्म में हद दर्जा लग्न और दिलचस्पी लेना आप तलबा को खूब इल्म की तरफ़ माइल करते थे और कभी हालत इक़ामत में कभी अपनी जीर तदरीस घंटियों को नहीं छोड़ते थे और अपने इदारा के असातिज़ा को भी इस का आदी बनाते थे और कभी बर्जरूरत सख्ती भी करते थे और उन से नसीहताफ़रमाया करते थे यह तलबा इस्लाम के मुस्तक़बिल हैं यही आइंदा कल इस्लामी अज़मत व वक़ार को बुलंद करें गे लहज़ा उन को खूब उलूम वफ़नून से आरास्ता वपारास्ता करें,उन के वक़्त को बर्बाद होने से बचाएं,बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा के मोतमिद और चहेते शागिर्द हज़रत मौलाना मुहम्मद आसिफ मुजद्दिदी दाम ज़ला बताते हैं कि बाज़ दफ़ा हज़रत रात भर सफर करके सुबह जब क़न्नौज पहुँचते थे तोघरजाने के बजाए सीधे (अल-जामिआ अल-अहमदिया) चले आते थे और आते ही पढ़ाना शुरू करदेते थे।फिर हसब मामूल सारा दिन इल्मी व दीनी मस्रुफ़ियात में गुजार कर रात गए घर तशरीफ़ ले जाते थे,तवील सफर से हर आदमी थक तो जाता ही है मगर शब् भरके सफर की थकावट के बावजूद बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा मसंद तदरीस पर महज़ इस लिए आबेठते थे कि तलबा का वक़्त ज़ाए न हो और उन की पढ़ाई में हर्ज वाक़्य न हो ।बहुत कम ही ऐसा कोई उस्ताज़ हो जो तलबा पर इस क़द्र शफ़ीक़ व मेहरबान हो में ने मुशाहिदा किया है कि आप ख़ुद और अपने बिरादरासगर मौलाना अख़लाक़ अहमद मुजद्दिदी के जरिये गावम,इलाक़ा का जायजा लेते थे जहां कहीं तालीम व ताल्लुम का बंदोबस्त न रहता वहाँ इंतजाम करते थे ।और इस में बहुत हद तक

कामयाबी भी मिलती थी।

वही बज़्म है वही धूम है वही आशिक़ों का हुजूम है

है कमी तो बस इसी चांद की जो तह मजार चला गया

खुलासा हज़रत बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा एक फ़र्द वाहिद का नाम नहीं है बल्कि आप एक अंजुमन,एक दर्स गाह, और एक तहरीक का नाम है ।इसी तरह आप की मौत भी फ़र्द वाहिद की मौत नहीं बल्कि मौत अलालम मौत अलालम के मुताबिक एक जहान की मौत है।

मौला ता ला हज़रत बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा को अपने ज्वार रहमत में मक़ाम रफ़ी अता करे और आप के जानशीन व साहबज़ादे मौलाना अहमद सईद मुजद्दिदी हफ़ज़ा अल्लाह तआला को सब्र वास्तिक़ामत दे आमीन बजाह सय्यद एल्मरसिलीन ﷺ।

*उस्ताज़ जामिआ सूफ़िया कछौछह मुक़द्दसा