अध्याय 18 में से 65पृष्ठ 124–141
क़दीम नाफ़े और जदीद सालिह का संगम
दरोगा और आली ओहदे दारों ने हालात की संगिनी कामुकमल जायजा ले लिया तो यह फैसला तै पायाऔर तहरीरी तौर पर कलम बंद करदिया । कि आज के बाद क़न्नौज में कोई भी जमात नहीं रहे गी और आइंदा कोई भी जमात बाहर से नहीं आये गी इस तरह अहले सुन्नत व जमात को कामयाबी वकामरानी हासिल हुई और बह्रुल-इरफ़ान की तदबीर से बुजुर्गों के फ़ैज़ान से हमेशा के लिए जमातों पर पाबंदी लगा दी गई हिंदोस्तान में इस तरह की मिसालें शाज़ वनादर ही मिलती हैं।
हाजी शरीफ़ मस्जिद की बाज़याबी :
हज़रत के मुरीद मौलाना महफूज़ मियां आफ़ाक़ी साब ने राक़िम से बता या कि हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान ने शहर में जगह जगह अपने लोगो M को मसाजिद में दर्स वामामत के और बच्चों की तालीम के लिए लगाना शुरू किया इसी दौरान मालूम हो इक्का ख़्वाजा हाजी शरीफ़ अलैहि अर्रहमा की मस्जिद में देवबंदी इमामत करताहै हालाँकि वहाँ इंतिज़ामीया सन्नी है आप ने माहौल साज़ी की और मुझे वहाँ ले गए और मुसलियान के सामनेफ़रमाया कि आज से यहाँ यह महफूज़ मियांआमामत करें गे और बच्चों को भी पढ़ाएं गे को ई तनख्वाह वगैरह नहीं लेंगे ।नो महीने लगातार वह देवबंदी आता रहा और बच्चों को भी पढ़ाता रहा बिलआख़िर मायूस होकर चला गया इस तरह यह मस्जिद भी मुकम्मल तौर सुनियों के कब्जे में आगई और फिर हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान ने वहाँ जुमा भी क़ायम फ़रमादिया ताकि लोग जुमा भी वहीं पढ़ें ।आज अल्हम्दुलिल्ला वहाँ सब निजाम सुनियों के हाथ में है ।इमाम भी इंतिज़ामीया भी अवाम भी सब सन्नी हैं।
बह्र उल-इरफ़ान ने अपनी फ़िरासत व तदबीर व हिक्मत सेइस तरह सैंकड़ों मसाजिद देवबंदियों के कब्जे से आजाद करायें और सन्नी इमाम मुक़रर कईए जिस से हजारों लोगों ईमान महफ़ूत कईए ,कहा जाता है कि जिस का मसल्ली इस का मुहल्ला क्यू निका इस्लामी दावत व तबलीग़ में मसाजिद का बहुत बड़ा दखल है ।
फ़ित्ना क़ादियानी की सरकूबी:
बह्रुल-इरफ़ान क़ुद्दिस सिर्रहू अलैहि अर्रहमा अपने शागिर्दों और मुरीदों को दावत व तबलीग़ के लियीशहर व अतराफ़ में भेजते थे जिस का फायदा यह हुआ कि तमाम इलाकों में संयत बहुत मजबूत हो गई और लोगों की इसलाह के साथ साथ तालीमी बेदारी भी पैदा होने लगी क़न्नौज के मुज़ाफ़ात में एक गावम कपूरा पुर है जोकि मानी मउ स्टेशन से मुत्तसिल है इस इलाक़े में एक क़ादियानी आज्ञा और इस ने कुछ लोगों को गुमराह कर लिया सीधे
साधे लोग थे उन्हें हर दीन की बात करने वालास्चा मुसलमान ही नज़र आता । इस लिए वह क़ादियानी की बातों में आगये इस ने अपने को ज़ाहिर कईए बग़ैर उनके बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दियागरीब लोग थे माली इमदाद भी करने लगा ईद के मौका पर हर फ़र्द को कपड़े और पैसे तकसीम करने लगाधीरे धीरे लोग इस के दाम फरेब में आने लगे और इस ने अपने अक़ाइद व नज़रियात बयान कर के बाज़ कौमुनहरिफ़ भी कर लिया। एक बार आवर कंडीशन बसों में काफ़ी तादाद में लोगों को क़ादियान भी लेकर गया क़ादियान जोकि क़ादियानियों का मरकज़ है वहाँ से यह लोग दुनिया भर में अपने झूटे नबी की तबलीग़ को आम करते हैं इस के लिए बे इन्तहा पैसा खर्च करते हैं बातिल ने हक़ के मुक़ाबिल हमेशा माद्दियत से काम लिया है लेकिन जा उलहक़ व ज़हक़ अलबातल के मुताबिक हक़ ही हमेशा ग़ालिब हुआ है।
राक़िम के अजीज़ दोस्त हज़रत मौलाना मुशाहिद आफ़ाक़ी मुजद्दिदी साहिब जिन को हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान क़ुद्दिस सिर्रहू इस इलाक़े में दावत व तबलीग़ के लिए भेजते थे मौसूफ़ ने बताया कि एक मर्तबा में इस गावम में पहुँचा लोगों को दावत दी और बयान वगैरह किया इस के बाद एक घर से एक बच्चा मुझे बुलाने आया और कहा कि घर में आप को बुलाया गया है में ने मालूम किया कि घर में मस्तूरात के अलावा कोई मर्द है कि नहीं ,बताया गया कि हैं इस के बाद में वहाँ पहुँचा तो एक ख़ातून ने कहा कि आप हमें कुछ यसरना उलक़ुरआन मंगा दें मौलाना ने मुताजब होकर दरयाफ्त किया कि किस लिए ?जवाब दिया कि हमारे यहाँ एक हाफ़िज़ साहिब आये हैं वह बचे पढ़ाते हैं पूछा कहां हैं? इतने में एक शख्स तौलिए बांधे नंगे बदन बे रेश चारपाई प्रबेठा दिखा उन्हों ने इशारा करके बताया कि यह हाफ़िज़ साहिब हैं लखनऊ से आये हैं मौलाना ने जब इस से बात की तो इस ने बताया कि उसे लखनऊ क़ादियानी मर्कज़्से भेजा गया है मौलाना ने इस से काफ़ी देर तक बहस व मुबाहिसा किया और इस के बातिल अक़ाइद का रद्द बलेग़ किया मगर वह न माना मौलानाने उसकी हक़ीक़त से लोगों को आगाह किया कि यह शख्स मुसलमान के लिबास में गैर मुस्लिम है क्योंकि क़ादियानी मुसलमान नहीं होते हैं इस पर कुछ लोग मुतास्सिर हुए मगर बाज़ वह जो उसके माल के लालच में आगये थे वह न माने और उसके दिफ़ा में खडे होगए इस के बाद गावम में और आस पास के मवाज़आत में भी काफ़ी चर्चा होगया उधर मौलाना ने जामिआ आकर हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान की बारगाह में सारा मामला अर्ज़ किया हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान ने फ़ौरन ही इस गुस्ताख और बददीन के खिलाफ़ एक्शन लिया और इलाक़े केसरकरदा सन्नी मुसलमानों के जरिये जिन में हज़रत के मुरीद ख़ास जनाब
मास्टर यूनुस साहिब मख़दूमा पुर और हाफ़िज़ शाहिद साहिब वगैरह काफ़ी पेश पेश थे इस गावम में फैलती क़ादियानियत पर कद ग़ुन लगाया माहौल संगीन होगया थाजिस की वजह से आप को काफ़ी जिद वजहद करनापड़ी मगर यह मर्द मुजाहिद कभी बातिल से नहीं घबराया बल्कि सामने से उसको ललकारा ,क़ादियानी के तरफदारों ने इस का भर पुर स्पोर्ट किया सुनियों ने उसको गावम छोड़ कर जाने केलिए कहा पर वह और उसके बही ख़्वाह तैयार न हुए जिस से लड़ाई के हालात बिन गए मामला थाना तक पहुँचा और थाने में मामले की सुनवाई के बाद इस क़ादियानी को फ़ित्ने की असल करार दिया गया जिस के बाद वह छिप कर वहाँ से रुपोश होगया औरइस के वरग़लाए लो ग भी ताइब हो कर सन्नी मुसलमान होगए इस तरह यह फ़ित्ना हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की फ़िक्र वतदबीरावर जिद वजहद से हमेशा केलिए क़न्नौज से ख़त्म हो गया।
इस तरह के बहुत से वाक़ियात आये दिन पेश आये जिनकी तफ़सीलात कलमबंद करने के लिए दफ्तर दरकार होगा वहाबिय क़दम क़दम पर रुकावटें खड़ी करते लेकिन यह मर्द क़लंदहर रुकावट का जवाब निहायत अक्लमंदी से देता और संयत के लिए हर जिद व जहद करता ।
देवबंदियों की प्रानी साजिश रही है कि उन्हों ने अपने फ़िरक़े को फ़रोग़ देने के लिए हर शहर व गावम की मस्जिदों में अइम्मा को तरबीयत देकर बुला तनख्वाह मुक़रर किया और तनख्वाहों के लिए अपने मर्कज़ों से इंतिज़ामात कईए और अवाम को वरग़लाया कि हम दीन की खातिर फ़ी सबील अल्लाह इमामत करते हैं इस तरह अवाम के दलों में उनकी अकीदत व अहमियत बढ़ जाती और वह धीरे धीरे उनके दाम फरेब में आकर दीन हक़ से बेज़ार होजाते और इस तरह बड़े बड़े शहरों की जामा मस्जिदों और ईदगाहों पर उनका कब्जा होगया अहले सुन्नत व जमात में इस तरफ़ से गफलत रही और यों हर जगह संयत का ख़सारा होता गया।
मगर मशाइख़ नक़्शबंदिया के फ़ैज़ान से मालामाल इस मर्द ख़ुदा आगाह ने वहाबियत व देवबंदीत के किलों को मिस्मार करदिया और उनके हर्बों को नाकाम बनादिया हर मैदान में उन से बेहतर व नुमायाँ काम सर अंजाम दिया मज़कूरा मैदान में वह शानदार कारनामा सरअंजाम दिया कि जिस पर आज भी बड़े बड़े मशाइख़ व उल्मा और दानिश्वरान अंगुश्त बदंदाँ हैं कि इस गरीबी और बे माएगी में बह्र उल-इरफ़ान मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी नक़्शबंदी अलैहि अर्रहमा ने क़न्नौज जैसे मग़्लूब इलाक़े में जहां सुनियों की शिनाख्त दम तोड़ रही थी वहाँ अतनाबड़ाकाम कर दिया कि आज तक़रीबन इसी80 से ज़ाइद मसाजिद अहले सुन्नत व जमात की हैं।
आज हर जगह मसलक अहले सुन्नत व मसलक आली हज़रत का बोल बाला है आज तक यही कहा जाता था कि फलां इलाक़ा में सुनियों की मस्जिद देवबंदियों के कब्जे में चली गई लेकिन अल्हम्दुलिल्ला बह्र उल-इरफ़ान ने अपने किरदार व अमल से इस तस्वीर का रुख फेर दिया और हर नामुमकिन को मुमकिन बना दिया। बकौल शाएअर
यकीन मुहकम अमल पैहम मुहब्बत फ़ातिह आलमजिहाद ज़िन्दगानी में हैं यह मुर्दों की शमशीरीं
अल्हम्दुलिल्ला आज शहर क़न्नौज के मुख़तलिफ़ महलों में कसीर मकातिब व मदारिस बह्र उल-इरफ़ान के जीर निगरानी दावत व तालीम काकाम कर रहे हैं और अहले सुन्नत विजमाअत को हर मैदान में ग़लबा हासिल है देवबंदीत मग़्लूब है ज़िला व शहर की क़ियादत व नुमाइंदगी हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान के दम क़दम से सुनियों को हासिल है आज हर मामलेमें अवाम व ख़वास दीनी व इली मिसाइल में जामिआ और बांई जामिआ से रुजू करते हैं हर तरफ़ संयत का बोल बाला है हर मुहल्ला में मीलाद के जलसे मुहर्रम के यूम आशूरा तक जलसे बड़े तज़क व एहतिशाम के साथ मुनाक़िद कईए जाते हैं बुजुर्गों के आरास की मुहाफ़िल मुनाक़िद होती हैं उल्मा अहले सुन्नत की तक़ारीर पर जोर अंदाज़ में होती हैं अवाम अहले सुन्नत का अज़दहाम महफिलों में शरीक होताहै।
जो उमूर व मामूलात अहले सुन्नत के यहाँ बंद हो चुके थे आज वह बड़े फख्र से और आला पैमाने पर घर घर कईए जाने लगे हैं और यह सब बह्र उल-इरफ़ान की काविशों का नतीजा हैं कि जिन्हों ने इस दयार में फ़ित्नों की सर कोबी की जिस तरह इमाम रब्बानी ने अकबरी फ़ित्ना की सर कोबी की इसी तरह बह्रुल-इरफ़ान ने वहाबियत के बातिल अक़ाइद और फसाद को ख़त्म कर के अहले सुन्नत के मामूलात को बहाल किया यह कारनामा अपने आप में तारीख साज़ है।
अब हम इस तारीख साज़ शख्सियत के कारहाए नुमायाँ में से चंद एक की तफ़सीलात यहाँ कलम बंद कररहे हैं कि जिस को देख कर दुनिया के लोग हैरत ज़दा हैं कि सिर्फ़ 35साला दौर हयात में बह्रुल-इरफ़ान ने क़न्नौज जैसे संगलाख़ इलाक़े में अपनी जहदमसलसल और जाँ फ़िशानी से दीन व संयत के आली तरिन किले तामीर कर दिए।
सब से पहले हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अलरहम ने अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया का क़याम फ़रमाया एक छोटे मदरसे से सफर का आगाज़ किया जो कि अब एक इस्लामी यूनिवर्सिटी बिन गया है जिस के जीर इंतजाम व एहतिमाम दर्जनों तालीमी शोबे,इस्लाही दावती फ़लाही उदारे काम कर रहे हैं जिन में हजारों तलबा तालीम हासिल
कररहे हैं नीज़ मुल्क केतूल वारज़ में जामिआ की मुतअद्दिद शाखें हैं जिस की एक अज़ीम शाख जामिआ निस्वां जामा अलमहसनात है जिस में तक़रीबन छ सौ तालिबात को जेवर इल्म से आरास्ता और तरबीयत नबवी देकर नुक़ूश फ़ातिमा व सिद्दीक़ा प्रगामज़न किया जाता है औरइस्लामियात के तमाम शोबों में माहिर बनाया जाता है एक अच्छे और पाकीज़ा मुआशरे की तामीर में ख़वातीन का बहुत किरदार रहता है इस लिए उनको उमूर ख़ाना दारी से लेकर इस्लामियात के तमाम शोबों की आला तालीम व तरबीयत दी जाती है।इस उदारे की ख़ुसूसीयत यह भी है कि इस की तालिबात व फ़ारग़ात क़ुर्ब व ज्वार के मुख़तलिफ़ शहरों , जिलों ,और कस्बात में ख़वातीन के इजतिमाआत के जरिये इस्लामी ख़वातीन में दावत व तबलीग़ का अहम फ़रीज़ा अंजाम दे रही हैं और उन में इल्मी व अमली बेदारी पैदा कर रही हैं ।
शहर क़न्नौज इल्म वामल का गहवारा औरत्तिफ़ाक़ी काविशें
बह्र उलारफा न की जिन काविशों नेकनौज शहर को इल्म व अमल का गहवारा बनादिया मुंदरजा जेल हैं।
दर्स तसव्वुफ़ :
हर सोमवार कोमहला हमाली पूरा की मस्जिद नक़्शबंद उलमारूफ़ हज़रत वाली मस्जिद में आप तसव्वुफ़ का दर स देतेबहरालारफान अलैहि अर्रहमा की ज़ात फ़ैज़ान नबवी से उलूम ज़ाहिरी व बातिनी कासंगम थी,जिस तरह आप ने उलूम इस्लामीया की बका वितहफ़्ज़ और नशर व इशाअत के लिए दर्जनों उदारे और शोबे क़ायम कईए इसी तरह फ़रोग़ तसव्वुफ़ वरूहानियत के लिए और लोगों को हक़ीक़ी तसव्वुफ़ की तालीम और तज़किया नफ़ूस और्तसफ़िया क़ुलूब के लिए एक शैख़ कामिल व मुकम्मल की हैसियत से खानगाह की असली तालीमात से आरास्ता करने के लियेहफ़्ता वारी दर्स तसव्वुफ़ का इनइक़ादफ़रमाते जिस में जामिआ के मुअल्लिमीन व मुतिल्लिमैन और दौर दराज़ से उल्मा और मुरीदैन वग़ैरहम कसीर तादा द में शिरकत करते आज भी इस महफ़िल के असरात आप के मुरीदैन विमुताल्लिक़ीन में नुमायाँ नज़र आते हैं।
इस महफ़िल पाक की अज़मत वाहमियत तो दर हक़ीक़त आप की सोहबत बाबरकत में बैठने वाले खुश नसीब ज़ाकिरेन ही बखूबी जानते हैं । आप के दर्स तसव्वुफ़ से बे शुमार लोग जाकिर व शाग़ुल हुए फ़ासिक़ व फ़ाजिर नेक व पारसा बिन गए।दुनिया तसव्वुफ़ में अहया तसव्वुफ़ का वह कारनामा आप ने अंजाम दिया है जो बे नज़ीर व बे
मिसाल है। हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान केआहया तसव्वुफ़ ओर्तसूफ़ की इल्मी व अमली ख़िदमात के हवाले से मुकम्मल तफ़सीलात हज़रत अल्लामा मुफ्ती आसिफ रज़ा साहिब क़िबला शैख़ अलादब जामिआ क़न्नौज ने अपने मक़ाले में कलमबंद की हैं उन शा अल्लाह इसी नंबर में शामिल इशाअत होंगी वहाँ से मुताला फरमाएं।और ब्राह रास्त हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की अज़मत वरीअत, ज़िक्र विमराक़बा और तसव्वुफ़ वरूहानियत की ख़िदमात से रोशनास होने के लिए मेरे अज़ीज़तरीन लायक कर्म फ़रमा दोस्त हज़रत मौलानाआफताब आलम आफ़ाक़ी मुजद्दिदी साहिब क़िबला जो कि हुज़ूर के सफर वहज़र नशिस्त वबरखास्त ,ख़लवत विजलोत में हिम्मा वक़्त ख़िदमात अंजाम देते रहे।राबिता कर सकते हैं।
दर्स कुरआन:
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा की तबीअत हस्सास रही दीन की तरवेज व इशाअत के लिए हमेशा सरगर्म अमल रहा करते थे कुरआन मजीद से लोगों की बे रग़बती देख कर आप बहुत रंजीदा रहते ।आप अक्सर फ़रमाते थे कि कुरआन की तिलावत की कसरत किया करोऔर इस के मआनी व मफ़ाहीम में गौर करू ।उल्मा और तलबा की कुरआन से बे एतिनाई से अक्सर नालां रहते। इस लिए आप ने अवाम में कुरआन की अहमियत व अज़मत और फ़हम कुरआन की सलाहीयत व रगबत पैदा करने के लिए शहर क़न्नौज में दर्स कुरआन के प्रोग्राम का आगाज़ फ़रमाया और फ़क़ीर आफ़ाक़ी को इस अज़ीम काम के लिए हुक्म फ़रमाया , शहर की अहम नूरी तैबा मस्जिद जो कि शहर की मर्कज़ी अहमियत की जगह वाक़्य है वहाँ सेइस काम काआग़ाज़ हफ्ते वारी दर्स कुरआन के अनवान से फ़रमा याआइस दर्स कुरआन के प्रोग्राम से नौजवान तबका में गैर मामूली तब्दीली आई शहर के बहुत से अवाम और बिलख़सूस नौजवान जो कि संयत से बहक रहे थे पके सन्नी और पाबंद नमाज़ हो गए। यह दर्स कुरआन का प्रोग्राम हर जुमा को एक घंटा बाद नमाज़ इशा किया जाता है इस प्रोग्राम के अख़ीर में दस मिनट वक़फ़ा इस्लामी सवालात विजवाबात रखा जाता है जिस से लोगों की दीनी मालूमात में बे हद इजाफा हो जाता है।फ़क़ीर आफ़ाक़ी ताहाल अपने मुर्शद हुज़ूर बह्र इउलारफान अलैहि अर्रहमा के कर्म सेइस ख़िदमत को बखूबी अंजाम दे रहा हैजिस से आज भी आफ़ाक़ी फ़ैज़ान जारी है।
दर्स हदीस:
हुज़ूर बह्र उलारफा न अलैहि अर्रहमा क्वाहादीस नबूय से हद दर्जा मुहब्बत थी अहादीस की बड़ी क़द्र फ़रमाते
अपनी पूरी हयात तैबा बुखारी विमुस्लिम शरीफ़ का दर्स देते रहेरएकसर अपने मुसाहिबीन व मुरीदैन को अहादीस करीमा के मुताला की तलक़ीन फ़रमाते रहते अहादीस पर इस क़द्र उबूर था कि आप की गुफ़्तगू उमूमन अहादीस नबूय से पर होती थी आप नेइसी जज्बे के पेश नज़र अवाम के इस्तिफ़ादा के लिए शहर में कईई मुक़ामात पर दर्स हदीस का प्रोग्राम जारी फ़रमाया जिस में आज भी कसीर तादाद में लोग शरीक होते हैं और फ़ैज़ान हदीस से मालामाल होते हैं शहर के एक अहम मुहल्ला ताजपुर नौकाशित की मस्जिद में हुज़ूर बह्र उलारफा न अलैहि अर्रहमा केबरादर सग़ीर उस्ताज़ अलालमा हज़रत अल्लामा अख़लाक़ अहमद मुजद्दिदी साहिब क़िबला हर हफ्ते को दर्स हदीस देते हैं और शहर की सब से बड़ी मुस्लिम सन्नी आबा दी वालामुहला शेखाना में आप के शागिर्द रशीद हज़रत मौलाना अब्द उलअज़ीज़ आफ़ाक़ी साहिब क़िबला हदीस मुबारक का दर्स देते हैं जिस के उम्दा नताइज ज़ाहिर हो रहे हैं ।
दस रोजा मुहाफ़िल सीरत मुस्तफ़ा ﷺ:
रबी उलनूर के महीने में हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान ने अवाम में सीरत नबवी को आम करने के लिए रिवायती जलसो M सेहट कर शहर की मसाजिद में दस रोजा सीरत के प्रोग्राम का आगाज़ फ़रमाया जो कि निहायत मकबूल और मुफीद साबित हुआ जिस के लिए मुंदरजा जेल यौमिया अनवानात के तहत यौमिया महफ़िल का इनइक़ाद कियाजाता है।
अनवानात दस रोजा मुहाफ़िल सीरत मुस्तफ़ा ﷺ:
1। विलादित से पहले आमद की बशारतें
2। ज़ुहूर मुहम्मदी सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम
3। रज़ाअत
4। कफ़ालत
5।इनफ़वान शबाब से ऐलान नुबुव्वत से क़ब्ल तक
6।ऐलान नुबुव्वत
7।तबलीग़ दीन के मुख़तलिफ़ उद्वार
8। मेराज और हजरत
9। ग़ज़वात व सराया
10।तालीमात रसूल ﷺ
जुलूस मुहम्मदी ﷺ:12 रबी उलअव्वल ईद मीलाद उन्नबी के मौका पर क़न्नौज शहर का तारीख साज़ जुलूस मुहम्मदी हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा की क़ियादत में हर साल बड़े ही तज़क वाहतिशाम के साथ निकलता हैजिस में अवाम ख़वास बड़े शौक वर्गबत के साथ शिरकत करते हैं पानी व शरबत की सबीलें लगायी जाती हैं नबी पाक ﷺ के नाम प्रनज़र विनियाज़ और लंगर तकसीम किए जाते हैं क़न्नौज के आस पास गावों के लोग भी इस जुलूस में शरीक होते हैं।हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान से क़ब्ल यह जुलूस जोकि हामिद ख़ान साहिब मरहूम साकिन पाटानाला सफदर गंज क़न्नौज ने निकालना शुरू किया थाचंद लोगों पर मुश्तमिल होता थाहजूर बह्र उल-इरफ़ान इस जुलूस मुहम्मदी के लिए अनथक मेहनत फ़रमाते महीना से क़ब्ल जगह जगह मीटिंग फ़रमाते और शहर और गावों की मसाजिद के अइम्मा से पुरजोर अपील करते अज़मत रसूल के पर्चा छपवाकर तकसीम फ़रमाते तकरीरों में ऐलान फ़रमाते सालहा साल मेहनत फ़रमाते आज इस का नतीजा है कि क़न्नौज का जुलूस मुहम्मदी ﷺअपनी मिसाल आप है दौर दराज़ से लोग देखनेऔर हजारों आशिक़ान मुस्तुफ़ाई इस मैन बाअदब शरीक होते हैं इस जुलूस में हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा बनफ़स नफीस बड़े शौक से आगे आगे नाअतें और दुरूद पढ़ते हुए दीवाना वार शहर की गलियों से घूमते हुए निकलते थे और ईद गाह क़न्नौज पर ग़ुलामान मुस्तफ़ा के जिलो में पहुँचते और वहाँ शान रिसालत पर शानदार खिताब फ़रमाते थे जिस को सन कर हर आशिक रसूल मचल उठता था।
राक़िम उलहरूफ़ 15 साल से इस जुलूस में अपने मुर्शद ग्रामी के साथ शरीक होता जितना खुश में ने हुज़ूर को इस जुलूस में देखा पूरी हयात कभी इस तरह खुश नहीं देखा फ़रमाते थे मेरे नबी का जश्न मीलाद है अपने आका की आमद की खुशियाँ मनाओ यह सब कुछ उन्हें के दम से है अपने एक शेअर में इसी को बयान फ़रमाते हैं ।
दुनिया उन की उक़्बा उन का सब कुछ तो आफ़ाक़ हैइन काउन का है एहसान सभी पर शाफ़े मह्शर शाफ़े मह्शर
हालाँकि मिज़ाजन आप भेड़ भाड़ से बहुत घबराते थे हती कि आप हज के मौका पर भी कसरत हुजूम से इजतिनाब करते थे और ख़लवत मैन इबादत को पसंद फ़रमाते थे फ़क़ीर आफ़ाक़ी ने अपने मुर्शद रब्बानी के साथ दोबार सफर हरमैन शरीफ़ैन का शरफ़ हासिल कियाएक हज और एक उमरे की भी सआदत हासिल की मगर इस मौका पर इश्क मुस्तफ़ा ﷺ का मंज़र कुछ और ही नज़रआता था।
आप की मसाई जमेला से क़न्नौज का यह जुलूस तारीख़ी होता है मुसलमानून को हौसला देता है और कफा र व
आप की मसाई जमेला से क़न्नौज का यह जुलूस तारीख़ी होता है मुसलमानून को हौसला देता है और कफा र व गुस्ताखान रसूल के लिए मायूस कण और हौसला शकुन होता है।
बह्र उल-इरफ़ान का चार नकाती प्रोग्राम
तालीम, दावत, तसव्वुफ़, बहाली मईशत
जुमला मिसाइल अहले सुन्नत के हल और सुन्नत वसनीयत और तसव्वुफ़ हक़ीक़ी की तरवेज व इशाअत के लिए बह्र उलारफा न अलैहि अर्रहमा ने जामिआ के जीर एहतिमाम अपना चारणकाती प्रोग्राम मुरत्तिब फ़रमाया और उनका मर कज़ शहर कन्नू ज बनाया जहां से आप का यह मिशन आज भी अपनी मंज़िल की तरफ़ रवाँ दवां है।
तालीम:
उलूम अरबिया ख़ास क्रशरएहि के बका व तोहफ़्ज़ और नशर वाशाअत केलिए अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया का क़याम फ़रमाया जो तमाम उलूम वफ़नून के तमाम शोबा जात का जामा है इस की कुछ तफ़सीलात बयान की जा चुकी हैं।
दावत:
संयत का ख़सारा और फ़र्क़ बातिला के बढ़ने का सबब आम तौर पर दावत अली उलहक़ का फ़ुक़दान है हुज़ूर क़िबला ने इस के लिए मुस्तक़िल शोबा कली अलदावत के नाम से क़ायम किया है इस के ज़रीआ ख़ुद जामिआ तलबा व तालिबात की दायाना तरबीयत और इसलाह अवाम केलिए वफ़ूद व वकाफिले निकालना, तालीम याफताह हज़रात तक मुफीद किताबें पहुँचाना और हर सूबे के हम शहरों में मराकज़ दावत का क़याम और मुख़तलिफ़ अँड़नेशनल ज़बानों में दाई तैयार कर ना।
तसव्वुफ़:
दौर हाजिर में तसव्वुफ़ के फ़ुक़दान से आज अख़लाक़ी व रूहानी बे पनाह खराबियां पैदा हो रही हैं इस के लिए बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा ने अख़लाक़ हसना से आरास्तगी और अख़लाक़ सुइया से पाकी के लिए फ़रोग़ तसव्वुफ़ फाउंडेशन शोबा का क़याम फ़रमाया।
फ़रोग़ तसव्वुफ़ फाउंडेशन:
तसव्वुफ़ व सुलूक के अहया व फ़रोग़ व तरवेज के लिए यह शोबा अमल में लाया गयाउसके तहत खानगाह मुजद्दिदय व तहरीक तसव्वुफ़ चल रही है जिसके तहत मुंदरजा जेल काम होते हैं:
।रूहानियत व सुलूक से लोगों को आरास्ता करना 2 तसव्वुफ़ की बा ज़ाबता फ़न्नी हैसियत से तालीम देना.3 मुख़तलिफ़ सलासल के अज़कार व अशग़ाल को आम करना और और हर हर सिलसिले के इरादतमंदों को उनका ज़िक्र बताना और इस के ज़वाबत विश्राइत से आगाह करना. 4 सोफिया कराम की सीरत और उनके अख़लाक़ के माफ़िक़ तरबीयत देना.5 सोफिया की अज़्मतों का तोहफ़्ज़ करना और उनके मुआनदीन व मोतरिजीन के जवाबात देना6 तसव्वुफ़ व सुलूक पर तहक़ीक़ी काम करना7 मुतक़द्दिमीन व मताख़रीन की किताबों को जमा करना और उनकी इस्लामी ख़िदमात को अवाम व ख़वास तक पहुँचाना।
शोबा दावत व तबलीग़ :
इस शोबा से मुंदरजा जेल अमो र वाबस्ता हैं ।
(अल्फ़) जामिआ के तलबा को दावत व तबलीग़ के उसू ल की तालीम दी जाती है और अमली मश्क़ के लिए उनको मुख़तलिफ़ शहरों और मवाज़आत में वफ़ूद और काफिलों की सूरत में भेजा जाता है।
(ब) जहां इमामों और मुअल्लिमीन की जरूर त होती है वहाँ सालिह इमाम और लायक मुअल्लिम फ़राहम कईए जाते हैं ।
(ज) ख़ास कर उन मवाज़आत में तवज्जो दी जाती है जहां मुसलमान,ग़ैरमुस्लिमों के मुक़ाबिल कम तादाद में हैं और मसाजिद व मकातिब भी नहीं हैं वहाँ के लोगों को इस्लामी अक़ाइद व अहकाम मुख़तलिफ़ तरीकों से सिखाए जाते हैं ।
(द) मवाज़आत मज़कूरा में हसब ज़रूरत मसाजिद की तामीरात का इंतजाम किया जाताहै ।
(ह) स्कूलों, कॉलेजों वगैरह के तलबा को इस्लामी अक़ाइद व आमाल सिखाए जाते हैं और उन में जज्बा दावत पैदा किया जाता है ।
(व) उर्दू ,हिंदी , वगैरह में मुफीद और मालूमाती किताबें तालीम याफताह लोगों तक पहुँचाई जाती हैं ।
(ज़) इस शोबा के जरिये उन जगहों पर भी ख़ास तवज्जो दी जाती है जहां इस्लाम व संयत के लिए ख़तरात ज़्यादा होते हैं ।
(ह) जामिआ की हसब ज़रूरत मुख़तलिफ़ जगहों पर शाखों का क़याम भी इसी शोबा से मुताल्लिक़ है।
(त) जिन जगहोंपर हुफ़्फ़ाज़ व उल्मा नहीं हैं या इस्लामी असरात कम हैं वहाँ के लोगों को तालीम की तरफ़ रगबत दिला कर उनके बच्चों और बच्चयों को जामिआ या इस की शाखों में ला कर उन्हें बेहतरीन तालीम व तरबीयत दी
तंज़ीम अहले अलसन:
इस शोबे से ख़ास मक़ासिद यह हैं:
1।उल्मा व मशाइख़ अहले सुन्नत को बाहम मरबूत करना।
2।अइम्मा मसाजिद वगैरह को मुहाफ़िल व मजालिस ख़ुसूसी के ज़रिया और नेट के ज़रिया जुमला फ़र्क़ बातिला के अक़ाइद फ़ासदा से आगाह करना और उनके जुमला एतराज़ात व सवालात के जवाबात सिखाना ।
3।दीनी दावत व तबलीग़ की अहमियत व इफ़ादीयत और उसके लज़ूम व वजूब का एहसास दिलाना और मुनज़्ज़म तौर पर इस्लाम व संयत की नशर व इशाअत करने की तरग़ीब देना ।
यह वह तमाम शोबे हैं जिनका ख़ास ताल्लुक उलूम अरबिया दयनीय की नशर व इशाअत और तहजीब अख़लाक़ और अहले सुन्नत को बाहम मरबूत करने से है ।
दायर अलख़ैरात :
दर असल यह जामिआ का नश्रू इशाअत का शोबा है ,ख़ुद जामिआ के तलबा व तालिबात और मदरसेन के उम्दा मज़ामीन मक़ाले और तसनीफ़ात व तालीफ़ात नीज़ मुफीद कुतुब के तराजुम या तशरीहात के साथ किताबें शाय की जाती हैं नीज़ इस से मुताल्लिक़ एक मकतबा मुजद्दिदय भी है जहां से मुख़तलिफ़ मुसन्निफ़ीन की मुफीद किताबों को फ़राहम किया जाता है ।
इमामत ट्रेनिंग सेंटर :
जामिआ अहमदिया और दीगर मदारिस व जमिआत के तलबा को इमामत ,मकातिब व मदारिस में तालीम और दावत व तबलीग़ की तरबीयत दी जाती है औरइन को तसहीह कुरआन , ज़रूरी अक़ाइद व मिसाइल ,और उसूल दावत व तबलीग़ और मकातिब में पढ़ने वाले बच्चों और बच्चयों की तालीम व तरबीयत के मुफीद तरीके सिखाए जाते हैं ।
अलवारिस इस्लामिक रिसर्च सेंटर :
मुख़तलिफ़ इस्लामी उलूम व फ़नून उद्यान व मज़ाहिब ,इंग्लिश व ज़बान व अदब,और अज़ीम शख़्सियात जैसे अहम
मौज़ूआत पर फ़ारिग़ इलतहसील उल्मा व फुज़ला नीज़ असरी तालीम याफताह हज़रात केलिए तहक़ीक़ ( रिसर्च) की ताबनाक आमाजगाह ।
उलमासूम कम्प्यूटर सेंटर :
जामिआ के इस शोबे में तलबा व तालिबात को कम्प्यूटर की बेसिक तालीम के साथ साथ उर्दू अरबी इंग्लिश में किताबत (Typing) डिजाइनिंग, और टेली नीज़ इस के अलावा तलबा व तालिबात को हसब मुरातिब मज़ेद कोर्सेज़ सिखाए जाते हैं।
वारसी पब्लिक इंटर कालिज:
इस में नर्सरी से इंटरतिक की तालीम दी जाती है नेज़ासर ई तालीम के साथ साथ दीनी तालीम व तरबीयत लाज़िम व ज़रूरी है और कोशिश यह है कि हाई स्कूल तक पहुँचते पहुँचते तलबा के अंदर इस्लामी मिजाज , दीनी अक़ाइद व आमाल की अच्छी वाक़फ़ीयत ,दूसरों को अंग्रेजी ज़बान में दावत व तबलीग़ का जज्बा और तरीका नीज़ उर्दू ज़बान व बयान पर बेहतरीन कुदरत पैदा करदी जाए । अलहम्द लिल्लाह यह शोबा अपनी पूरी कामयाबी के साथ तरक्की की राहों पर गामज़न है ।
सरहिंद पब्लिक स्कूल :( EnglishMeadium Schoo
यहSIRHIND PUBLIC SCHOOL)) इस में प्ले ग्रुप से प्राइमरी तक(P.G. TO PRIMERY) की तालीम दी जाती है ।यह अपनी नौईयत का एक अनोखास्कूल है जिस में पढ़ने वाले बच्चों में इंग्लिश तालीम के साथ साथ उर्दू और अरबी ज़बान की ऐसी सलाहीयत पैदा करदी जाती है, जिस की बना पर वह नर्सरी से आठवें तक पहुँच कर कुरआन क्रीम का तर्जुमा उर्दू और इंग्लिश ज़बान में अच्छी तरह कर ने के लायक हो सकें।नीज़ इस शोबे में भी अस्र ई तालीम के साथ दीनी तालीम व तरबीयत लाज़िम व जरूर ई है।
क़न्नौज शहर में यह दोनों उदारे दीनी और असरी ऐतबार से मयारी हैं अपनी नौईयत के मुनफ़रद उदारे हैं बह्र उल-इरफ़ान ने अपनी दौर अंदेशी सेअपनी कौम का मुस्तक़बिल महफूज़ करने और उनके दीनी अक़ाइद वामाल और इस्लामी शिनाख्त को बुर करार रखने के लिए क़ायम फ़रमाए।
अलमुख़्तसर यह कि बह्र उल-इरफ़ान की सरगर्मियों का सिलसिला क़न्नौज शहर व मुल्क व मिलित और दीन इस्लाम के लिए इस
क़द्र वसीअ है जवाहाता बयान से बाहर है ।
आप की किताब ज़िन्दगी का हर वर्क इस क़द्र सुथरा उजला और मनोर है कि उसे पढ़ते हुए दिल व दिमाग रोशन होजाते हैं।आप की सरगर्मियों का दायरा बहुत वसीअ है और उन्हें बयान करना इस लिए भी आसान नहीं कि यह छ दहाहियों पर मुहीत तसलसुल है। इल्म व फजल का यह झरना गुज़शता छ दहों से मुसलसल बहता रहा और न जाने कितने अफराद उदारों और जमिआत कोसेराब करचुका ।मुल्क भर में बे शुमार मदारिस इस्लामीया का अहया व इंशा ,दीनी तहरीकों का क़याम, उलूम इस्लामीया बिलख़सूस सुन्नत व संयत की इशाअत और तसव्वुफ़ रूहानियत की नशर व इशाअत के लिए अनथक जद्दोजहद ,दीन के फ़रोग़ के लिए सरगर्मियां ,मसाजिद में दुरूस् का सिलसिला ,दर्जनों इल्मी व तहक़ीक़ी किताबों की तसनीफ़ व तालीफ़ ,तराजुम व तहक़ीक़ात दर्स व तदरीस मवाइज़ व इर्शादात मार्फत व रूहानियत की मजालिस उल्मा की नयी नस्ल की तरबीयत और मुख़तलिफ़ उदारों के इंतिज़ामी उमूर की निगरानी जैसे दर्जनों वक़ीअ काम एक तन्हा ज़ात ने अंजाम दिए।यह सब वह ख़िदमात हैं जिन पर हल्की सी रोशनी भी डाली जाए तो सैंकड़ों सफ़हात नाकाफी हूँ गे। आप की ख़िदमात जलीला देख कर यह महसूस होता है कि यह एक फ़र्द बशर का काम नहीं बल्कि एक जमात है जो हुज़ूर बह्र उलारफा न के वजूद की शक्ल में क़न्नौज में नमूदार हुई जिस ने अपने इल्म व इरफान के फ़ैज़ान से क़न्नौज को रषिक अरम बना दिया । और आने वाली नस्लो M के लिए एक इल्मी किला तामीर करदिया जिस का फ़ैज़ रहती दुनिया तक जारी वसारी रहेगा।
63 साला सफर तै करने के बाद इल्म व इरफान काया सूरज9 ज़ी कादा 1440 हिजरी मुताबिक 13 जुलाई 2019 बरोज़ हफ्ते को शहर क़न्नौज में ग़ुरूब होगया।और अपने ख़ालिक़ हक़ीक़ी से जामुला।
आसमां तेरी लहद पा शबनम अफ़्शानी करे
सब्ज़ा नो रस्ता इस घर की निगहरानी करे
अल्लाह ताली हुज़ूर इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी व मशाइख़ नक़्शबंदिया के सदक़े मुर्शदी हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम व इलरिज़्वान के मिशन को आम करने और उन के नक़्श क़दम पर गामज़न रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन बजाह सय्यद एल्मरसिलीन ﷺ
एक ज़ात जो क़दीम नाफ़े व जदीद सालिह का संगम थी
मौलाना नबील अख्तर नवाज़ ई आफ़ाक़ी*
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान हज़रत मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी नक़्शबंदी अलैहि अर्रहमा की ज़ात बरसग़ीर (हिंदू पाक और बंगला देश) में मुहताज तआरुफ़ नहीं है। आप बे शुमार खूबियों के मालिक थे आप बैक वक़्त मदर्स भी थे मुसन्निफ़ भी थे फ़क़ीह रोजगार भी थे मुहद्दिस ज़माँ भी थेमुंतज़िम आली भी थेज़बान व बयान पर कामिल कुदरत रखने वाले अदीब व ख़तीब भी थे ,बेहतरीन मुंतज़िम आली के साथ साथ बेहतरीन मदबर भी थे, मुफ़कर भी थे, निबाज़ कौम व मिलित भी थे और उन तमाम खूबियों से बढ़ कर जो सब से बड़ी खूबी थी वह यह थी कि आप मुतबा सुन्नत भी थे और पूरे तौर पर सुन्नत रसूल की पैरवी करने वाले पीर कामिल भी थे। इत्तिबा सुन्नत और मुहब्बत मुर्शदसिलसला नक़्शबंदिया की असास है। और आप पूरी ज़िन्दगी इसी असास को न सिर्फ़ बुर सग़ीर में बल्कि पूरी दुनिया में फैलाने की सई पैहम करते रहे। उन के सीने में एक मुस्तक़िल धड़कता हुआ दिल था जो नुसरत मुसलमां के लिए हर आन फड़कता रहता था जिस की गवाही हर वह शख्स दे सकता है जो उन की महफ़िल में एक लम्हा के लिए भी शरीक रहा हो।हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान की परवरिश व पर्दाख़्त खालिस मजहबी ,दीनी रूहानी और खानक़ाही पस मंज़र में होई थी मगर आप ने हालात ज़माना की रियायत करते हुए जहां खानक़ाहों के क़याम को ज़रूरी समझा वहीं असरी तालीम गाहों के क़याम को भी तरजीह दी, आप ने जहां मुल्क भर में सैंकड़ों मदारिस व मकातिब का जाल बिछाया वहीं इंग्लिश मीडियम स्कूलज़ के नेट वर्क की भी तौसीअ की , जहां एक तरफ़ शानदार अल-जामिआ अल-अहमदिया की इमारत इस बात की गोई दे रही हैकि हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान, मुस्लिम बच्चों की दीनी तालीम व तरबीयत के लिए फ़िक्र मंद थे वहीं जामा अलमहसनात का वसीअ वारीज़ आंगन इस बात पर फख्र कर रहा है कि हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की मेहनतों के नतीजा में आज इस्लाम की पाकबाज़ शहज़ादीयां मेरी आगोश में सीरत आयशा व किरदार फ़ातिमा को अपना कर एक आइडियल इस्लामी मुआशरा की तशकील में नुमायाँ रोल अदा कर रही हैं जो हमारे लिए बाइस फख्र है और दीगर इस्लामी उदारों के लिए बाइस तक़लीद भी है।
हुज़ूर बहरालारफा न बहैसीयत मुअम्मार कौम व मिलित:
हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान हमेशा अपनी शिनाख्त और इस्लामी हदूद में रह कर जदीद नाफ़े से इस्तिफ़ादा करने के हामी रहे, इस के लिए आप ने बड़े मशहूर व मारूफ़ असरी उलूम व फ़नून के माहिरीन से इर्तिबात कामिल करते हुए असरी तालीम के मैदान में बड़ी पेश रफ्त फ़रमा रहे थे और एक अज़ीम यूनिवर्सिटी के लिए पूरा खाका आप तैयार कर चुके थे और एक यूनिवर्सिटी के लिए जितनी अराज़ी की ज़रूरत थी इस का आप मुकम्मल इंतजाम करचुके थे गोया आप जहां मजहबी तालीम के जबरदस्त हामी थे वहीं असरी व उलूम व फ़नून से मुस्लिम तलबा व तालिबात को आरास्ता व पारास्ता करने की भर पुर कोशिश ज़िन्दगी भर करते रहे, जिस की बेहतरीन मिसाल वारसी इंटर कालिज, और सरहिंद पलक स्कूल है जिस का क़याम आप ने अल-जामिआ अल-अहमदिया और जामा अलमहसनात ललबनात के साथ ही शहर क़न्नौज में फ़रमाया और उन इंग्लिश मीडियम स्कूल ने शहर में वह इंकलाब लाया जिस के मुतमन्नी हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान थेयानी हजारों की तादाद में शहर के गरीब मुसलमानों के बचे आज एक आईडियल शहरी के तौर पर मुख़तलिफ़ शोबा जात में अपनी ख़िदमात पेश कर रहे हैं और डाक्टर, इंजीनियर, मुअल्लिम और ताजिर बिन कराली शिनाख्त के हामिल बिन चुके हैं।हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की हिम्मा जहती सिर्फ़ अपनों को मुतास्सिर नहीं करती है बल्कि हर इस शख्स को कायल करती है जो मुस्लिम उम्मा की तरक्की का हामी है आप ने चटाई पर सूकर और खुरदरी, दरी पर बैठ कर एक ऐसी नस्ल नो की तशकील की जो इस्तिग़नाए सुलेमानी और फक्र बोज़री के हामिल हैं और उन के सीनों में जोर हैदरी वाफ़र मुक़द्दरा में पाया जाता है, इस नस्ल नो की निगाहें बुलंद हैं सखुन दिलनवाज़ हैक़लब तरोताजा है जिस को ज़िक्र व फ़िक्र से हमेशा जिला बख्शते रहते हैं।यानी एक ऐसी तस्वीर शहर क़न्नौज में उभरती है जो क़र्न अव्वल के मुसलमानों की याद ताजे कर देती है, जो दिन में फ़रसान अलनहार और रात में रहबान अललील की अमली तस्वीर पेश करती है, और में इस नतीजा तक पहुँचता हूँ कि मौजूदा वक़्त में बहैसीयत शैख़ तरीक़त आप, औरं से मुमताज़ और आली नज़र आते हैं ,जिस क़द्र आप ने अहले ज़िक्र की अफ़्वाज तैयार की है वह शायद व बायद इस सदी में किसी और शैख़ तरीक़त ने किया होऔर मेरे इस दावी की दलील चाहते हैं तो आप हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की क़ायम करदा खानगाह ,शहर क़न्नौज में तशरीफ़ लाएं, जहां आप की आखिरी आरामगाह भी, और आज अनिवार व तजल्लियात की बरसात हिम्मा वक़्त होरही है जिस का मुशाहिदा अहले दिल कर रहे हैं।
हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान का वीज़न:
आप का अव्वलीन मक़सद यह था कि हिंदोस्तान के मुसलमान शौकत मुसलमानी के साथ अपने वतन में ज़िन्दगी के शब् व रोज़ गुज़ारें, और किसी तरह के भी एहसास कमतरी के शिकार न हूँ, दुश्मन चाहे जिस क़द्र भी चालबाज़ियां मकारियां, अय्यारियां करें इस के बाजूद उम्मत मुस्लिमा के हर फ़र्द को इस साजिश का बुर वक़्त पर्दा फ़ाश करने की सलाहीयत हो और यह सलाहीयत नस्ला बाद नस्ल मुंतक़िल होती रहे ताकि नई नस्लें भी आदा के शरूर व फ़ित्न से महफूज़ रहीं इस के लिए आप ने एक मजबूत लाइहा अमल तैयार किया था, जिस की तरफ़ आप बड़ी सुरअत के साथ पेश कदमी फ़रमा रहे थे। आप हमेशा मुस्लिम नौजवानों को ख़ुद एतिमादी की दावत देते थे, ख़ुद नफ़सी, ख़ुद फरेबी और ख़ुद सताइश के दिलदादा नौजवानों को मुशफ़िक़ाना और पदाराना शफकत के साथ ज़िन्दगी के रहनुमा उसूल जेहन व दिमाग और क़ल्ब व जिगर में बसादेते थे।और इस का असर यह होता था कि सख्त दिल और क़ल्ब सिंग रखने वाले अफराद भी रकीक़ अलक़लब अवरनरम जान बिन जाते थे जूमुआशरा इंसानी के लिए उमूमा और मुस्लिम मुआशरा के लिए ख़ुसूसन सूद मंद साबित होते।
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रूहानी शख्सियत और नज़रियात:
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान एक ऐसी रूहानी शख्सियत का नाम है जिन्हों ने अपनी नज़र कीमिया से सैंकड़ों ऐसे अफराद को जो गुमराह्यत की शब् तारीक में भटक रहे थे उन के क़ल्ब को आली इस्लामी अख़लाक़ और एहसान के नूर से रोशन करते हुए उन्हें रूहानी बालीदगी अता की जिस के ज़रिया वह अफराद मुल्क के मुख़तलिफ़ हिस्सों में एहसान व सुलूक और आली इस्लामी इक़दार की तरवेज व इशाअत में शब् व रोज़ लगे हुए हैं ,जिन की कोशिशों के नताइज न सिर्फ़ समर आवर हैं बल्कि दाइमी औरमज़बूत हैं। आप इस्लामी तारीख के एक नाकाबिल फ़रामोश आलम रब्बानी हैं जो शहरत व अज़मत की इंतिहावों तक पहुँचने के बावजूद मोमिनाना शान और आली इस्लामी रवायात के हामिल रहे, इल्म व फन की गहराइयों के साथ बुलंदी ज़ात से मुत्तसिफ़ होकर तामीर अहद और तामीर शख्सियत का ऐसा नमूना पेश किया जिस की नज़ीर अस्र हाजिर में कहीं नहीं मिलती उन के इर्द गिर्द बे शुमार तलबा, उल्मा, मुरीदैन अहबाब, और परेशान हाल लोगों का जमघटा लगा रहता इस के बावजूदोह इरफान ज़ात से बे खबर नहीं रहे। बुला शुबह आप की ज़ात इस दौर पर फ़ित्न में ब्या बाँ की शब् तारीक में क़ंदील रहबानी की तमसील थी।
अगर रूहानियत रूह की बालीदगी तसव्वुफ़ सफ़ाए क़ल्ब और तक़्वा काँटों भरी दुनियामें दामन बचा कर गुज़र जाने का नाम है तो हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की शख्सियत इस की उम्दा और ताजे मिसाल थी, उन की मुकम्मल ज़िन्दगी अपने तमाम तर मामलात में इसी मर्कज़ी महवर के इर्द गिर्द घूमती हुई नज़र आती है, उन की ज़ात ख़ुद रूहानी तरक्की की अलामत और सूफ़ियाना कमालात की मेराज थी।ऐसा आलम रब्बानी जो सदियों में कभी ख़ाल ख़ाल ही पैदा होता है, जिस की पूरी ज़िन्दगी शरीअत के हिसार में मुक़य्यद हो, जिस की सारी तवानाइयां कुरआन वसंत, इस्लामी कानून और तसव्वुफ़ की गुथियां सुलझाने और आलमी सतह पर उन की नुमाइंदगी करने में सिर्फ़ हुई हूँ, जिस ने अपनी तमाम सलाहीयतों और तवानाइयों को अपनी ज़ात के लिकिनहीं बल्कि दीन इस्लाम की सरबुलंदी के लिए खर्च किया, जिस के पास अपने लिए कुछ नहीं था मगर ग़म जहान कल अपने सीने में समोए हुए था लेकिन इस का ग़म बांटने वाला कोई न था जिस ने अपने लिए एक तिनका भी जमा नहीं किया लेकिन कौम व मिलित को इल्म व फन की दौलत जावेदाँ दे गयाजिस ने आसमानी सितारों की गुज़र गाहें दरयाफ्त नहीं कीं, लेकिन इल्म व फन के सीआरों पा कमंदीं डालें जिस के वजूद से ईमान की शुवाएं फूटती थीं और जिस का सरापा इस्लामी अख़लाक़ और एहसान व सुलूक का आईना दार था ।
नज़रिया इस्लामी और आप का तसलब:
आप हमेशा इस नज़रिया के फ़रोग़ के लिए कोशिशें करते रहे जिस नज़रिया में किसी तरह की मिलावट और आमेज़िश की कोई गुंजाइश न थी यानी नज़रिया इस्लामी जो सहाबा कराम, ताबईन अजाम और अकाबिरीन इस्लाम का नज़रिया था जिस को अपना कर एक मुसलमान बड़ी से बड़ी ताकत से टकराने का हौसला और उमंग रखता है, इंसानी ज़िन्दगी में नज़रिया की बड़ी अहमियत होती है ,दुनिया में तमाम हौलनाक जंगें नज़रिया की बुनियाद पर ही बरपा हुई हैं जिस में लाखों इंसानों की जानें ज़ाए हुई हैं, नज़रिया हर तबका और हर गिरोह की शिनाख्त होती है, मजबूत नज़रिया रखने वाले बड़ी ताकतों के सामने कभी घटने टेकने पर मजबूर नहीं होते वह अपनी जानें कुर्बान करसकते हैं लेकिन अपने नज़रिया का सौदा नहीं कर सकते। हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अपने नज़रिया पर मजबूती से तादम ज़ीस्त क़ायम रहे और बुला ख़ौफ़ वख़तर अपने नज़रिया इस्लामी को दुनिया के सामने पेश करते रहे।
हक़ीक़ी तसव्वुफ़ और इस का तआरुफ़:
हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की तमाम तर ख़िदमात और कारनामों में सब बड़ा और अज़ीम कारनामा तसव्वुफ़ हक़ीक़ी से नयी नस्लों को अमला मुतआरिफ़ और रोशनास कराना है, आप की ज़ात तसव्वुफ़ हक़ीक़ी की चलती फिरती तस्वीर थी, आप जहां जाते वहीं खानगाह बिन जाती, ख़ुद ज़िक्र व फ़िक्र में मशगूल हो जाते और मुरीदैन व तालिबेन भी आप की इत्तिबा में ज़िक्र व फिक्रमें लग जाते, और इस तरह आम मुसलमान को सफ़ाई क़ल्ब का मौका मिल जाता और इस का असर भी देर पा होता ,बसा औकात बहुतों का क़ल्ब भी एक या दो निशिश्त में ही जाकिर होजाता और इस तरह इस के दिल की दुनिया बदल जाती। तसव्वुफ़ वरूहानियत भी दीगर उलूम वफ़नून की तरह एक अहम तरिन इल्म है और इस की ज़रूरत भी मुसलमानों को इसी तरह है जिस तरह कि इल्म उलक़ुरआन, इल्म अलहदीस और इल्म अल्फ़िक़ा की है, और दीगर तमाम इस्लामी उलूम की तरह इस का सरचश्मा भी कुरआन वहदेस और आसार सल्फ ही हैं, यही वजह है कि दीगर उलूम की तरह इल्म तसव्वुफ़ के मुज्तहिदयन ने भी काम किया और हर दौर के तक़ाज़ों के मुताबिक मर्तबहु एहसान के हुसूल, ज़ौक़ इबादत की आबयारी, तज़किया और इलाज बातिन के नये नये तरीके वज़ा किए, जिन में से हर एक की असल कुरआन वहदेस में मौजूद है, उन में से किसी को महज़ इस लिए चैलेंज नहीं किया जासकता कि यह इस्तिलाह नयी है। मसलन हदीस में एहसान की तारीफ़ यह की गई कि:
उन्न ताबद अलल्लाआ कान्नक तिराह फ़ान लिम तकण तिराह फ़ान्ना युराक (सही अलबख़ारी ज1 स27 हदीस नंबर 50 त दार इब्न कसीर उलेमामा बेरूत)
तर्जुमा: अल्लाह पाक की इबादत इस तरह करू गोया उसे देख रहे हो, लेकिन अगर उसे नहीं देख सकते तो वह तुम्हें देख रहा है।’’
अब सूफ़िया ने इस हदीस पर मेहनत की, और इंसान अपनी इबादात; बल्कि जुमला मामलात में रब अलालमीन को अपनी निगाहों के सामने किस तरह मुस्तहज़र रख सकता है? और ख़ुदा की हर आन मौजूदगी का तसोर कैसे क़ायम होसकता है? इस के मुख़तलिफ़ तरीके बताये, अगर ऐसा न किया जाता तो साहिब शरीअत की मंशा पूरी न होती, नमाज़ रोजा और जुमला इबादात विमामलात महज़ रस्म बिन कर रह जाते, और ख़ौफ़ ख़ुदा, एहसास जवाब दही और ख़ुशू वख़ुज़ू के बे रूह अलफ़ाज़ सिर्फ़ किताबों की जीनत बिन कर रह जाते, रियाज़त विमेहनत के यह जुमला सूफ़ियाना तरीके दरअसल इसी मंज़िल के हुसूल का ज़रिया हैं जिस का नाम एहसान है, उन में अजमी तस्वरात का कोई