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अध्याय 26 में से 65पृष्ठ 185–194

मता कारवां जाता रहा

डाक्टर अबदूस्सलाम जैलानी, शोबा तारीख, अली गढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अली गढ़

नवम्बर 2000 महीने की कोई 20-22तारीख थी असरोमगरिब के दरमियान का वक़्त था ,अली गढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अहाते प्रानी चुंगी पर सड़क के किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान पर दोस्तों के साथ चाय पी रहा था और महव गुफ़्तगू था कि अचानक मेरी निगाह एक मियाना कद पुरनूर चेहरा सफेद दाढ़ी और सर पर हरे

रंग के इमामा वाली ज़ात पर पड़ी जो अपने रफ़ीक सफर के साथ जमाल पुर अली गढ़ की तरफ़ से मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दरूदीवार पर ताइराना निगाह डालते हुए आहिस्ता आहिस्ता जानिब स्टेशन गामज़न थी, देखते ही लगा कि यह जरूर कोई आलम बाअमल और सोफी बासफ़ा ज़ात है, में ने आगे बढ़ कर सलाम किया, जनाब वाला ने आशना लहजे में सलाम का जवाब दिया, में ने चाय पीने की दरख़ास्त क,ई बुला तामिल वितकल्लुफ़ हमारे साथ में बैठ गए, चाय पीने लगे और बातें करने लगे इस दौरान चाय भी ख़त्म हो चुकी थी और सूरज की रोशनी भी धीमी पड़ने लगी थी इस लिए हम लोग अपनी अपनी मंज़िल की तरफ़ चलने के लिए उठ खडे हुए चलने लगे तो मेहमान ज़ी वक़ार ने इतर खस की एक शीशी नाचीज़ को इनायत की, और रस्मी जुमले’’ उन शाइआलला फिर मुलाक़ात होगी‘‘कह कर हम लोग एक दूसरे से रुखसत होगए लेकिन उन की सादगी और नरम नरम बोली मेरे दिल विद्माग पर नक़्श कर गई इस वक़्त न तो मेरे पास मोबाइल फोन था और न शायद उन के पास कि जिस के जरिये मुलाक़ात विगुफ्तगू का सिलसिला जारी रहता इस लिए जेहन से इस मुलाक़ात के नुक़ूश मिटने लगे थे कि अचानक एक दिन मेरे पास सय्यद मुस्तफ़ा अली साहिब (जमाल पूरी अली गढ़ ) दारउलउलूम अहमदिया अस्सुन्निया क़न्नौज के सेमीनार का दावत नामा ले कर( शोबा तारीख मुस्लिम यूनिवर्सिटी अली गढ़) आये और बज़िद हुए कि आप को इस सेमीनार में शरीक होना है में ने उन के इसरार पर दावत कबूल कर ली।

हसब प्रोग्राम जनाब सय्यद मुस्तफ़ा अली साहिब के हमराह बज़रीया कार अली गढ़ से क़न्नौज पहूँचे, साथ में कुछ और भी हज़रात थे जो इसी सेमीनार में शरीक होने के लिए जारहे थे, जब दारउलउलूम अहमदिया अस्सुन्निया पहूँचे तो निगाह एक नूरानी चेहरे और रोशन पेशानी वाली ज़ात पर पड़ी जेहन ने रहनुमाई की और अली गढ़ में होने वाली मुलाक़ात की यादें ताजे होगईं, यह वह ज़ात थी बह्र उल-इरफ़ान हज़रत मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी नक़्शबंदी अलैहि अलरहम वालरिज़्वान की जिन से यह मेरी दूसरी मुलाक़ात थी।

बहरहाल! जरूरीयात से फ़ारिग़ हो कर और नाश्ता वगैरह खा कर हम लोग सेमीनार में शरीक हुए, सेमीनार 10बजे दिन में शुरू हो कर शाम के 5बजे ख़त्म हुआ दरमियान में नमाज़ ज़ुहर और ज़ुहराना का वक़फ़ा रहा ,प्रोग्राम ख़त्म होने के बाद हम लोग अली गढ़ के लिए रवाना होने लगे तो मुफ्ती साहिब अलैहि अलरहम ने अपने दस्त मुबारक से हम लोगों को इतर का तोहफा दिया ,इस वक़्त में ने उन्हें अली गढ़ में होने वाली मुलाक़ात और इतर का तोहफा देने वाली बात याद दिलाई गले से लगा कर कहने लगे डाकर साहिब! अब मुलाक़ात होती रहे गी ।

तब से ले कर आप के विसाल तक क़न्नौज मेरा आना जाना रहा, सालाना सेमीनार में शरीक तो होता ही था इस के अलावा भी जब वह कोई प्रोग्राम करते या किसी काम का मन्सूबा बनाते या तलबा विमदरसेन के लिए तर्बीयती प्रोग्राम करते तो नाचीज़ को भी बुलाते ,जहां पर हम लोग ठहरे हुए होते तशरीफ़ लाते ,देर तक बातें करते, बहुत सी बातों और मंसूबों पर तबादला ख़याल करते जब कि वह ख़ुद साहिब बसीरत और वाज़िह मन्सूबा बनाए हुए होते, यही उन की अजुज़ वाणिकसारी दलों को जीतने वाली प्यारी प्यारी बोली लोगों को गर्वीदा करलेती , उन की उन्हें बातों ने मुझे भी उन से क़रीब किया और क़रीब होता गया।

2000 में पहली मुलाक़ात हुई और 2019 तक होती रही, इस दौरान में ने उन की बढती हुई उम्र की वजह से सेहत में तो तब्दीली देखी मगर उन के बोल चाल हसन अख़लाक़ और मामलात विमामूलात में कोई तब्दीली नहीं देखी, वह हद दर्जा मुनकस्रालमिजाज थे मामूलात के सख्त पाबंद और तरीक़त के बुलंद मर्तबा पर फ़ाइज़ थे उन की सतूदा सिफ़ात में एक सिफ़त यह भी थी कि आप जिस शख्स से पहली मुलाक़ात में जिस हसन अख़लाक़ से पेश आते वैसे ही हर मुलाक़ात में इस से पेश आते हती कि लंबे वक़फ़े के बाद भी किसी से मुलाक़ात होती तो सामने वाले को अजनबियत का एहसास तक नहीं होने देते ।

मुफ्ती साहिब अलैहि अलरहम जब भी अली गढ़ आने वाले होते तो टेलिफोन करते और फ़रमाते कि डाक्टर साहिब में फलां जगह पर आने वाला हूँ आप से मुलाक़ात की किया सूरत होगी ?कभी तो में ख़ुद हाजिर ख़िदमत होजाता और कभी अपने गरीब ख़ाना पर आने के लिए उन्हें जहमत देता ,मुलाक़ात के बाद घंटों मजहब,ई इल्मी और मुसलमानों के मौजूदा हालात पर गुफ़्तगू करते ,मुसलमानों की तालीमी पसमांदगी और तहज़ीबी बिगाड़ का ज़िक्र करते और उन्हें दौर करने के लिए मश्वरा करते और लाइहा अमल तैयार करते, वह मुसलमानों की मौजूदा पसमांदगी बे वक़ाती और मफ़लूक अलहाली से बहुत दुखी रहते और उन्हें दौर करने के लिए हैरान व परेशान रहते ।

आज क़न्नौज और इस के अतराफ़ में लोगों के अकीदे में जो पुख्तगी, मजहबी और तालीमी बेदारी नज़र आरही है वह आप की ही कोशिशों का नतीजा है, आप ने मुसलमानों की तालीमी पसमांदगी और तहज़ीबी खराबी को दौर करने के लिए इस इलाक़े में मदरसे और स्कूल क़ायम किए ,दीनी तालीम के लिए क़न्नौज में अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया (बराए तलबा )और जामा अलमहसनात (बराए तालिबात )और असरी तालीम के लिए सरहिंद पब्लिक

स्कूल आठवें दर्जा तक और वारसी पब्लिक स्कूल बारहवीं दर्जा तक क़ायम क,ये जिन में कौम के बचे और बचियाँ तालीम पारहे हैं और खातिर ख़्वाह फायदा उठा रहे हैं ,इस के अलावा दौर दराज़ इलाकों में भी कई उदारे क़ायम किए और बहुतों की सरपरस्ती फ़रमाई।

आप के अगले मंसूबे में यूनिवर्सिटी क़ायम करना था जिस में मुस्लिम नौजवानों को ईमान वाक़ीदा पर मजबूती से क़ायम रख कर असरी उलूम से आरास्ता करना था इस के लिए आप ने अच्छी खासी जमीन भी खरीद ली थी ,अल्लाह तआला उन के वारसीन को इस मन्सूबा को पूरा करने और इस मिशन को आगे बढ़ाने की फ़िक्र वहमत अताकरे और काम में उन की मदद फ़रमाए।(आमीन)

हिंदोस्तान की खानक़ाहों केमौजूदा हालात को देख कर अजीब सी मायूसी होती है क्योंकि ज़्यादा तर खानक़ाहें ख़वांगाह बिन कर रह गई हैं ,किया यह वही खानक़ाही निजाम है जिस को हज़रत ख़्वाजा गरीब नवाज़, हज़रत ख़्वाजा कुतुब उद्दीन बख्तियार काकी, हज़रत निजाम उद्दीन औलिया, हज़रत ख़्वाजा शैख़ फरीद उद्दीन गंज शकर,हज़रत शैख़ बहावालदैन ज़क्रिया मुल्तानी, हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी, हज़रत शाह अबू अलबरकात शैख़ इला उलहक़ पंडवी, हज़रत सय्यद अशरफ जहांगीर समनानी रहिमहुम अल्लाह अजमईन ने क़ायम किया था ?तो इस के जवाब में हर शख्स यही कह सकता है, नहीं हरगिज़ नहीं,वह निजाम मौजूदा खानक़ाही निजाम से मुख़तलिफ़ था।

हज़रत मुफ्ती साहिब अलैहि अर्रहमा भी मौजूदा खानक़ाही निजाम , बे अमल पैरान और उन के तरीका कार से कबीदा खातिर थे और इस का इज़हार वह अपनी तकरीरों ,तहरीरों और मजलिसी वाइज़ों में किया करते थे,चुनांचे एक जगह तहरीर फ़रमाते हैं ’’अब खानक़ाही निजाम क़रीब क़रीब ख़त्म होगया है अगरचे नाम की खानक़ाहें बाक़ी हैं और खानक़ाहों के नाम पर मशाइख़ ज़माना के यहाँ इमारतें भी तामीर होरही हैं, मगर न सुलूक हैं और न ज़िक्रोफ़िकर के ज़रिया मनाज़िल व मराहिल तै कराना है, इसी लिए मारूफ़ ख़लवतें ख़त्म होगईं‘‘(तसव्वुफ़ और इस के फ़वाइद सफ़ा 537)

इसी तरह बे अमल पैरों के बारे में एक जगह तहरीर फ़रमाते हैं:’’ उन फ़ित्नों से कुछ कम आज की पेरी विमरीदी का फ़ित्ना नहीं है, पेरी और मुरीदी या बीअत व इरशाद का ख़ास मक़सद यह था कि लोगों को अहकाम शरएहि व अक़ाइद हुक्का से आरास्ता किया जाए और तसफ़ीया क़ल्ब और तज़किया नफ़्स कर के बातिन को तजल्लियात व अनिवार और मार्फत व इरफान का मस्किन बनाया जाए इसी लिए ज़रूरी था कि पीर हज़रात उलूम ज़ाहिरी से आरास्ता और उन पर

अमल पेरा होते लेकिन अब बिलकुल इस के ब्रअक्स है अक्सर पीर तो इल्म से कोरे हैं वह दूसरों को किया सिखाएं गे, और जिन के पास थोडा या ज़्यादा इल्म है उन में से अक्सर अमल से खाली हैं और जो थोडा बहुत अमल भी करते हैं उन के अक्सर में दूसरों की इसलाह की तरबीयत का न जज्बा है और न फुर्सत ।(तसव्वुफ़ और इस के फ़वाइद सफ़ा नंबर 639)

मगर हज़रत मुफ्ती साहिब अलैहि अलरहम वालरिज़्वान को देखने और उन की खानगाह में जाने के बाद अंदाजा होता कि क़दीम खानक़ाही निजाम और मिजाज का जो ज़िक्र किताबों में मिलता है वह बातें उन की खानगाह और उन के मिजाज में मिलती हैं। यक़ीनन वह फ़ी ज़मानना इस के अलमबरदार थे और इस्लाफ़ की यादगार, यही वजह है कि वह क़दीम खानक़ाही निजाम और मिजाज को बहाल करना चाहते थे ,जिस के लिए उन्हों ने ज़क्रोमराक़बा की मजलिसें क़ायम कीं जिस में सुलूक व मार्फत से वाबस्ता अफराद शरीक होते, ज़िक्रवाज़कार करते और अपने अपने क़ल्ब को मसफ़ी और मज़की करते और ख़ुद हज़रत मुफ्ती साहिब अलैहि अर्रहमा शरीक महफ़िल हो कर उन की तरबीयत व इसलाह फ़रमाते।

मुमकिन है अज़कारो अशग़ाल की महफ़िलें हिंदोस्तान की दूसरी खानक़ाहों में भी सजती हूँ मगर फ़ी उलवक़्त शैख़ तरीक़त का शरीक महफ़िल होकर ज़िक्र व मुराक़बे की तालीम व तरबीयत देना शायद ही किसी और खानगाह में हो इस सूरत में फ़र्द वाहिद तो हामिल अज़कारवाशग़ाल होजाता है मगर अफराद तैयार नहीं होपाते हैं, अल्लाह ताली हज़रत मुफ्ती साहिब अलैहि अर्रहमा की रूह पाक को मुक़द्दस रूहों के हमराह अपने ज्वार रहमत में जगह अता फ़रमाए आप के मर्क़द पर अनवारू रहमत की बारिशें बरसाए और आप के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए उन के वारसीन को हिम्मत व हौसला और अपनी ख़ास तवज्जो व इआनत फ़रमाए। आमीन बजाह सय्यद एल्मरसिलीन।

हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम व इलरिज़्वान की तदरीसी ख़िदमात

मौलाना अब्द उलअज़ीज़ आफ़ाक़ी मुजद्दिदी

ख़ा दम इलतिदरीस अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया क़न्नौज

क़ारईन कराम !इनायत इलाही जब किसी बंदे की यावरी करती है तो इस को हर फजल विकमाल में इस के इकरान व अहबाब पर फ़ौक़ियत अता फरमाती है और उसे हर वस्फ़ में काबिल रषिक और बे मिसाल बना देती है ,

इस के हर कौल व फेअल और हाल में ताईद ग़ैबी शामिल होजाति है ।

हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अल्लामा मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी अलैहि अर्रहमा की मुबारक ज़िन्दगी का हर पहलू इस बात की ताईद करता है कि उन पर मौलाए क्रीम का फजल ख़ास था,इसी वजह से वह अपने हर वस्फ़ में अनोखे नज़र आते हैं,में इस वक़्त उन की तदरीसी ख़िदमात के ताल्लुक सेचंद बातें सुपुर्द क़िरतास कररहा हूँ जिस से क़ारईन यह अंदाजा लगा सकते हैं कि वाक़ई मुबदा फ़य्याज़ ने उन्हें बड़ी फ़राखी से नवाजा था और उन पर रब ज़ो अलजलाल का फजल ख़ास था ।

माह मुहर्रम उलहराम 1398 ह,में हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम व इलरिज़्वान नेजामा अशर फ़ कछौछह मुक़द्दसा से संद हदीस और दस्तार फ़ज़ीलत हासिल करने के बाद तदरीस की तरफ़ रुख किया तोकसी ज़रिया से जामिआ अरबिया नागपुर में तक़र्री की मुकम्मल बात होगई ,और हज़रत क़िबला का बाद रमजान नागपुर जाने का पूरा इरादा बिन चुका था, मगर इसी दौरान जामा अशरफ से एक ख़त मौसूल हो अ जो हज़रत क़िबला के दौरे हदीस के साथी मौलाना कमेल अहमद अशरफी साहिब का इरसाल करदा था ,ख़त में एक जगह कुछ इस तरह से इबारत तहरीर थी कि’’ हज़रत इज़हार अशरफ साहिब ने फ़रमाया है कि तुम आइंदा साल जामा अशरफ पढ़ाने के लिए आजाओ‘‘ इसी वक़्त हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम वालरिज़्वान नियेहतराम सादाद कराम ,एहसान शनासी और मादर इल्मी के साथ वफादारी की वजह से यहाँ की तनख्वाह नागपुरकी तनख्वाह के चौथाई से भी कम होने के बावजूद ब सर व चश्म कबूल करलिया,औरणागपुर वालों से माज़रत करके जामा अशरफ कछौछह मुक़द्दसा में तदरीसी ख़िदमात अंजाम देने का अज़म मुस्मम कर लिया ।

इस तरह माह शवाल 1399ह, से शाबान 1401ह तक मुकम्मल दो साल हमारे सरकार हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान रज़ि अल्लाह अन्हु ने जामा अशरफ में इल्मी व तदरीसी ख़िदमात अंजाम दें ।

तदरीसी दौर का आगाज़ हुआ, चूंकि हमारे हज़रत क़िबला अलैहि अर्रहमा की तदरीस का पहला साल था इसी लिए इबतिदाई कुतुब आप को पढ़ा ने के लिए दे दी गईं, लेकिन (सुबहान अल्लाह ) आप की ख़ुदा दाद सलाहीयत, इफ़हाम व तफ़हीम में ख़ास महारत और अदीम उलमिसाल तदरीसी लियाकत देख कर चंद ही माह में हज़रत मुहतमिम साहिब क़िबला इस क़द्र मानूस व मुतास्सिर हुए कि मज़ेद उपर दर्जात की कुछ कुतुब भी पढ़ाने को दे दें।और इसी साल इत्तफाक़ से जामिआ के एक उस्ताज़ किसी वजह से अचानक दरसगाह छोड़ कर चले गए और उन की जगह पर किसी दूसरे

मदर्स का इंतजाम न होने की वजह से हमारे हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान क़िबला अलैहि अर्रहमा ने ख़ुद ही हिम्मत बांध ली और वह सारी किताबें जो मौलाना मौसूफ़ पढ़ाते थे ख़ुद ही पढ़ाने लगे, अब किताबों की कसरत की वजह से आलम यह था कि हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा व इलरिज़्वान दोनों वक़्त बड़ी मेहनत सेपढ़ाते तब जाकर सारी कुतुब का दर्स होपा ता ।

बफ़ज़्ला तआला एक तरफ़ तदरीस व तफ़हीम के हसन अंदाज़ से तलबा हद दर्जा मुतमइन रहते, तो दूसरी तरफ़ हज़रत क़िबला की रात दिन की मेहनत और ख़िदमत दीन में ऐसी लग्न देख कर हज़रत मुहतमिम साहिब क़िबला की खुशियों की कोई हद न रही, फिर मदर्रिसा की वफादारी, सादाद कराम केअदब व एहतिराम, और मदर्रिसा या मदर्रिसा के मुताल्लिक़ीन पर कभी तन्क़ीद न करने की वजह से हज़रत मुहतमिम साहिब क़िबला हर मौका पर हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान को तरजीह देने लगे ।

रब क्रीम के फजल व कर्म से जामा अशरफ में तदरीस के दौरान ख़ानवादे के नौजवान सादाद की तालीमी ख़िदमत का मौका भी हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान साहिब अलैहि अर्रहमा कोख़ूब हाथ आया, जिन में ख़ुसूसीयत के साथ हज़रत सय्यद निजाम मियां साहिब, व सय्यद हसनैन मियां साहिब, व सय्यद अख़्तरमियां साहिब, सीदहसन मियां साहिब जाइसी, नीज़ हज़रत सय्यद अलीम अशरफ साहिब जाइसी व सय्यद राशिद मियां मक्की साहिब (जोहज़रत सय्यद मदनी मियां साहिब के भतीजे हैं ) व गैरहम ने हज़रत क़िबला अलैहि अर्रहमा से इल्मी इस्तिफ़ादा किया है ।

1402ह में हुसूल रूहानियत व तरीक़त के लिए अपने मुर्शद ग्रामी वक़ारआरिफ़ बिल्लाह हज़रत अल्हाज मौलाना शाह अहमद रज़ा ख़ानसाहब नक़्शबंदी दाम ज़ला अलाली के हुक्म पर जामा अशरफ से मुस्तफ़ी हो कर हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा मदर्रिसा गुलशन रज़ा छप्पय बाजार ज़िला महराज गंज यूपी, (जो पहले ज़िला गोरखपुर में था)तशरीफ़ ले आये और वहाँ तालीमी व तदरीसी काम निहायत पर वक़ार अंदाज़ में शुरू फ़रमाया और मदर्रिसा गुलशन रज़ा में भी फ़ज़ीलत तक की सारी कुतुब कमा हुक्का पढ़ाते रहे , नीज़ तदरीस केसाथ साथ मदर्रिसा की तामीर व तरक्की के लिए भी अनथक जिद व जहद कर्तेरहे,छप्पय में तदरीस केदौरान जिन खुश नसीब तलबा ने हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान साहिब अलैहि अर्रहमा से बा ज़ाबता इल्मी इस्तिफ़ादा किया उन में से चंद यह हैं , हज़रत मौलाना रईस अलख़ैरी साहिब (मख़दूम ज़ादा हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा) हज़रत मौलाना अख़लाक़ अहमद मुजद्दिदी साहिब(बिरादर सगीरहज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा),मौलाना असाद खेरी साहिब,मौलाना मज़हर आलम साहिब

रसूल आबादी,मौलाना ख़ुशनुद आलम भड़ोंसा,मौलानाबहाइवालदैन साहिब जौनपुरी,मौलाना ग़यास उद्दीन साहिब पुरसा खुर्द महराज गंज,वग़ैरहम।

मदर्रिसा गुलशन रज़ा छप्पय में हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा ने शवाल 1402 ؁ह से शाबान 1405 ؁ह तक मुसलसल तीन साल सख्त परेशानियों के साथ सिर्फ़ अपने मुर्शद आली मर्तबत की रज़ा जोई के लिए तदरीसी ख़िदमा त अंजाम दें ,फिर कुछ वजू ह की बना पर वहाँ से मुस्तफ़ी हो कर अपने घर तशरीफ़ ले आये।

और 1405ह माह मुबारक रमजान से क़ब्ल ही क़न्नौज तशरीफ़ लाये अव र मुसलसल मेहनत व कोशिश और ख़ास फजल मौला जल व अला से इसी साल गहवारा इल्म इरफान अल-जामिआ अल-अहमदिया की बुनियाद रखी गई और बाज़ाबता तालीमी , तदरीसी और तामीरी काम शुरू होगया ।

चूंकि हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा की इल्मी सलाहीयत का शहरा बहुत हो चुका था इसी लिए पुराने शागिर्दों के साथ बहुत सेउंची जमातों के नएतलबा भी हज़रत के क़याम क़न्नौज की खबर सुनते ही हुसूल तालीम के लिए क़न्नौज आगये इस तरह इबतिदा ही से अल-जामिआ अल-अहमदिया में मुतवस्सितात तक की तालीम शुरू होगई, और कुछ ही अरसा बादफ़ज़ीलित तक की बाज़ाबता तालीम होने लगी।

हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम वालरिज़्वान सारे स्टाफ़ से ज़्यादा ख़ुद पढ़ाने में दिलचस्पी रखते थे, 1405ह से1440ह तक मुसलसल हर साल बुखारी शरीफ़ और मशकात शरीफ़ का दर्स लाजिमी तौर पर देते थे, इस के अलावा दीगर कुतुब मुख़तलिफ़ा कभी मुलाहसन,तल्ख़ीस अलमफ़ताह,शरह अक़ाइद,काफिया,शरह जामी,मुरक़ात अलफ़राइज़, अलसराजी, उलमाक़तदालमुंतक़िद, व गैरहाकतुब के अलावा बहुत सारी कुतुब अहादीस वितफ़ासीर वफ़क़ा कादर्स किताबें बदल बदल करजारी रहताथा।

और उधर्तक़रीबानदस बारह साल से ज़्यादा तर बुखारी शरीफ़ , मशकात शरीफ़,उलमाक़तद अलमुंतक़िद, और शरह जामी का दर्स पाबंदी से देते रहे हैं,कई मर्तबा लोगों ने राय दी कि हुज़ूर अब पढ़ाना बंद करदें तो जवाबन इरशाद फ़रमाते कि आखिरी सांस तक दर्स हदीस देना हमारे मशाइख़ अलैहिम इलरिज़्वान का मामूल रहा है,तो हम भी उन शा अल्लाह आखिर उम्र तक बंद नहीं करें गे ।

पढ़ाने की फ़िक्र और लग्न काहाल यह था कि अगर चह हज़ारहा केलो मेड़ का सफर करके वापस तशरीफ़ लाये हूँ,ख़्वाह कितनी ही रातों के जागे हुए हूँ , तबीअत कितनी ही निढाल हो,अगरचे रात भर सफर

करके फ़ज्र के वक़्त ही घर पहूँचे हूँ मगर कभी भी दर्स में नाग़ा नहीं होने देते। अंदाज़ तदरीस ऐसा कि कितना ही कंद जेहन तालिब इल्म सामने होता मगर इस हसीन पैराय में बयान फ़रमाते कि इस के भी फ़ौरन समझ में आजाता ।इल्मी इस्तिहज़ार का यह आलम था कि कभी भी कोई भी तालिब इल्म कैसा भी मुश्किल से मुश्किल मसला या कठिन से कठिन सबक पूछने के लिए आता तो हुज़ूर क़िबला अलैहि अर्रहमा बुलातामिल बग़ैर गौर व फ़िक्र किए बड़े आसान अंदाज़ में इस को समझा दिया करते थे ।

एक मर्तबा का वाक़ा है एक मुफ्ती साहिब बनारस से तशरीफ़ लाये हुए थे और उन को किसी मसला में कुरआन पाक से इस्तिदलाल करना था मगर यह गुथी उन से सुलझ न रही थी में इस वक़्त अपनेहज़रत क़िबला की दरसगाह में मशकात शरीफ़ पढ़ रहा था वह आये और आकर अपना मामला हज़रत की बारगाह में पेश किया ,सवाल को मुकम्मल सुनने के बाद फ़ौरन मुझे मेरे हज़रत ने हुक्म फ़रमाया कि जाइव किसी से तफसीरबैजई शरीफ़ ले आइव, में आनन फ़ानन जाकर तफसीर बैजई शरीफ़ ले आया , हज़रत क़िबला नेकिताब अपने हाथ में न ली बल्कि मुझ से फ़रमाया कि फलां सफ़ा खोलू और फलां फलां स्तर पढ़वावरहज़रत मुफ्ती साहिब को दिखाओ, हमारे हज़रत की इस क़द्र ज़हानत और हाजिर जवाबी से मुफ्ती साहिब हैरत ज़दा रह गए,कहनेलगेहज़रत में बहुत दिनों से इस मसले में गौर कर रहा थाऔर बहुत परेशान था मगर आप ने तो चुटकियों में हल करदिया ।

इसी तरह एक मर्तबा जिस वक़्त अल्लामा मुश्ताक अहमद साहिब जिनको अम्मा म अलमंतिक़ कहा जाता था, और मौलाना मुनाज़िर साहिब जिन को माक़ूलात में बड़ी दस्तरस हासिल थी इलजामाचालाहमदिया में फ़राइज़ तदरीस अंजाम दे रहे थे, चूंकि इस दौर में माक़ूलात में गहरा इल्म रखने वाले को ही आलम तसोर किया जाता था बाक़ी और किसी को अहमियत नहीं दी जाती थी, चूंकि हमारे हज़रत बहुत सादगी में रहते थे और ज़्यादा रुजहान तसव्वुफ़ की तरफ़ था इस लिए अल्लामा मुश्ताक साहिब के बाज़ शागिर्दों को यह सुझाकि चलू आज हज़रत मुहतमिम साहिब के पा स चलते हैं और उन से मंतिक़ की फलां फलां इबारत पढ़ाने को कहीं गे देखें पढ़ा पाते हैं या नहीं, इसी प्लान के तहत हज़रत की बारगाह में हाजिर हुए ओरकहने लगे कि हज़रत! हम लोगों को फला M फलां इबार त का मतलब अल्लामा मुश्ताक साहिब के पास ठीक से समझ में नहीं आया है अब आप ही समझा दीजिए , उन की गुफ़्तगू सुनने के बाद हज़रत ने बुला तामिल मंतिक़ की सख्त तरिन इबार त को इस अंदाज़ में पढ़ा और इस की वज़ाहत इस हसीन पैराय में करदी कि अल्लामा साहिब के शागिर्द अंगुश्त ब दंदाँ रह गए और

श्रम से पानी पानी होगए और जब कमरे से बाहर निकले तो हर एक यही कहता नज़र आरहा था कि हम तो झूट में कह रहे थे कि अल्लामा मुश्ताक साहिब के पास यह समझ में नहीं आया मगर हक़ीक़त यह है कि जैसा आज इस इबारत का खुलासा मुफ्ती आफ़ाक़ साहिब ने किया है और इतनी कठिन बात को इतने आसान अलफ़ाज़ में हमारे जेहन व दिमाग में उतार दिया है आज तक अल्लामा मुश्ता क़ साहिब ऐसा कभी नहीं पढ़ा सके हैं। (सुबहान अल्लाह ) यह है शान हुज़ूरबहर उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम व इलरिज़्वान की ।

जहाँलजामाचालाहमदिया सेहज़ारों अफराद इल्म व दानिश की शमा से रोशनी हासिल कर के जाचुके हैं, वहीं अलहम्द लिल्लाह राक़िम उलहरूफ़ को भी बाकायदा व बाज़ाबता हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम व इलरिज़्वान की बारगाह मुक़द्दसा में रह कर इल्म ज़ाहिर व बातिन हासिल करनेकी सआदत नसीब हुई है।