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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiबह्र उल-इरफ़ान: समात व जहातआह !एक मर्द कामिल चल दिए

अध्याय 17 में से 65पृष्ठ 106–123

आह !एक मर्द कामिल चल दिए

मौलाना मुहम्मद यूनुस ज़ुहूर कादरी रिज़वी अत्तारी आफ़ाक़ी

नगरोला राजौरी जम्मू कश्मीर

बह्र उल-इरफ़ान पीर तरीक़त रहबर शरीअत आलम नबील फ़ाज़िल जलील मबलग़ इस्लाम मर्द क़लंदर कुतुब ज़माना हज़रत अल्लामा मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी की रहलत मिलित इस्लामीया में एक अज़ीम सानिहा और ख़सारा हुआ है ,आह! आप की जुदाई से हमारी आंखें नम, दिल पर ग़म, ज़बाँ खामोश और बदन साकित हैं हाय किया कहूँ वह मर्द थे वह आरिफ बिल्लाह वली कामिल हसन व अख़लाक़ के पीकर बाकिरदार नेक सीरत शख्स थे जिन की दीनी ख़िदमात और नेक नामी रहती दुनिया तक बाक़ी रहे गी वह एक फ़र्द नहीं जमात थे अहले सुन्नत व जमात को एक देखना चाहते थे वह हर फ़र्द पर गहरी नज़र रखते थे आप की तवज्ज्हात से न जाने कितने क़ुलूब जाकिर हुए ,आप की मजलिस इल्मी वरूहानी हुआ करती थी आप इल्म व इरफान के साकी थे तालिबेन को मार्फत के जाम पिलाते और मस्त बनाते थे, साहिब हाल थे जो नजरों से पिलाते थे ؎

अभी तो चिराग जिला था हाय किया हुआ

बाद ख़िज़ां ने उसको रहने न दिया

इस दुख भरी घड़ी में आप के अहले ख़ाना व साहबज़ादगान ,ख़ुलफ़ा व मुरीदैन और मुहबीन के ग़म में बराबर का शरीक हूँ अल्लाह तआला उन सब कौसब्र जमील और इस पर अज्र अज़ीम अता करे ।

ऐसा कहां से लावों कि तुझ सा कहूँ जिसे

सय्यद इसहाक़ कादरी, बंगलौर

हज़रत मौलाना मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी नक़्शबंदी रहमत अल्लाह अलैहि की रहलत से मिलित इस्लामीया एक अज़ीम सपूत व मर्द मुजाहिद से महरूम होगई ।

आप ब यक वक़्त मुफ़कर , आलम बाअमल , मुहर्रिक ,संतों के पीकर, बुर्द बारी के इल्म बरदार , बुलंद पाया क़ाइद और वली सिफ़त बावक़ार शख्सियत वाक़्य हुए हैं , इतनी सारी खूबियों के बावजूद एक सादा ज़िन्दगी बसर करना यह दौर हाजिर में मुअम्मा से कम नहीं ।

आप अपनी बेइंतहा खूबियोंऔर सलाहतियों और ख़िदमात के बाइस सारे क़न्नौज इलाक़े के हर दिलअज़ीज़ रहनुमा व रहबर माने जाते थे।

आखिर में दुआ है कि अल्लाह तआला हज़रत आफ़ाक़ की ख़िदमात को कबूल फ़रमाए और जन्नत अलफ़र्दूस से आला मक़ाम अता फ़रमाए आमीन या रब अलालमीन ।

आह! हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान न रहे

मौलाना नदीम अख्तर उलक़ादरी उलहंदी

मुकीम हाल मोरिशस, अफ्रीका

अस्सलाम अलैकुम विरहम अल्लाह वबरकाता!!!

यह खबर इंतिहाई रंज वग़म और अफसोस के साथ दी जारही है कि भारत की रियासत उतर प्रदेश (उलमारूफ़ यूपी) के शहर क़न्नौज की एक इंक़लाबी, हिम्मा जिहत, मशहूर विमारूफ़ इल्मी वफ़करी और रूहानी शख्सियत, पीर तरीक़त, रहबर शरीअत, साहिब तसानीफ़ कसीरा, क़ाज़ी क़न्नौज, मुतअद्दिद दानिश गाहों के बानी वसरपरस्त, मुफ्ती बह्र उल-इरफ़ान हज़रत अल्लामा मौलाना अल्हाज उलशाह आफ़ाक़ अहमद नक़्शबंदी मुजद्दिदी साहिब क़िबला बानी इलजामाज़ अल-अहमदिया (क़न्नौज, यूपी) का 13 जुलाई 2019 बरोज़ सनेचर दिल का दौरे पड़ने से विसाल हो गया है।अना लिल्लाह वाना इलिया राजावन।

हज़रत की दीनी, तालीमी, तसनीफ़ी वितामेरी और रूहानी ख़िदमात नाकाबिल फ़रामोश हैं जो अस्र हाजिर में उन्हें एक मुमताज़ शख्सियत बनाती हैं।इस ग़म की घड़ी में शहजादा हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान हज़रत अल्लामा मौलाना बरकात मियां आफ़ाक़ी मुजद्दिदी नक़्शबंदी दाम ज़ला अलाली और अहले ख़ाना के ग़म में सिग बारगाह ग़ौस आज़म बराबर का शरीक है। अल्लाह तबारक व तआला अपने प्यारे हबीब पाक, साहिब लोलाक, सय्याह अफ़्लाक ﷺ के सदक़े वितफ़ेल हज़रत मुफ्ती बह्र उल-इरफ़ान मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद नक़्शबंदी मुजद्दिदी अलैहि अलरहम वालरिज़्वान को जन्नत अलफ़र्दूस में आला मक़ाम अता फ़रमाए; आप के पसमानदगान, वाबस्तगान विमहबीन और लवाहिक़ीन को सब्र जमील अता फ़रमाए और अहले सुन्नत व जमात को उन का बदल अता फ़रमाए।आमीन यारब अलालमीन बजाह उन्नबी अलामीन उलक्रीम ﷺ

मौत अलालम मौत अलालम

मौलाना मुहम्मद तहसीन रज़ाक़ादरी, दारउलउलूम मुस्तफ़ा कानपुर

मोतबर ज़राए से मालूम हुआ कि महबूब अलालमा शैख़ तरीक़त रहबर राह शरीअत मुफ़कर अहले सुन्नत ना ज़िश् फ़िक्र व फन फख्र ख़िताबत हमदर्द क़ो म व मिलित पीकर ज़हद व तक़्वा आलम बा अमल हज़रत अल्लामा अल्हाज उलशाह मुफ्ती मुहम्मद आफ़ाक़ साहिब नक़्शबंदी मुजद्दिदी कादरी बुर काती बानी अल-जामिआ अल-अहमदिया क़न्नौज का विसाल आज मोख़ा 13. जुलाई 2019 . को सुबह हो गया । अना लिल्लाह व अना इलिया राजावन ।

हादसा फ़ाजा का राक़िम उलहरूफ़ मुहम्मद तेसीर उद्दीन तहसीन रज़ाक़ादरी ख़ादिम दारउलउलूम ज़ियाए मुस्तफ़ा कानपुर को रूही व कलबी सदमा है ।लेकिन मर्जी मौला अज़हमा औला के तहत सब्र व शकर के अलावा कोई चारा नहीं दुनिया की सारी चीजें फ़ानी हैं एक न एक दिन सब को दार फना से दार बका की तरफ़ सफर करनाहै । यकीना मुफ्ती साहिब अलैहि अलरहमता का विसाल दुनियाय इस्लाम वसनीयत के लिए एक अज़ीम ख़ला है जो मुस्तक़बिल क़रीब में पर होना मुश्किल नज़र आरहाहै ।

विसाल की खबर सुनते ही दारउलउलूम ज़ियायमुस्तफ़ा कानपुर में असातिज़ा दारउलउलूम हज़ा की ताज़ियती निशिश्त मुनाक़िद हुई ( जीर सदारत प्रिंसिपल इदारा हज़रत अल्लामा क़ारी सय्यद मुहम्मद अब्बूसईद बुर काती कादरी साहिब क़िबला ) हज़रत मुफ्ती साहिब रहमता अल्लाह अलैहि के हक़ में बुलंदी दर्जात की दा की गई अहले ख़ाना, मुरीदैन मुताल्लिक़ीन, मुतवस्सिलीन, मुहबीन और ख़वेश व अकारिब को सब्र व शकर की तलक़ीन की गई कि अल्लाह तआला मुफ्ती साहिब को ज्वार रहमत में आला जगह अता फ़रमाए आमीन बजाह हबीबुक सय्यद एल्मरसिलीन ﷺ .

नाकाबिल फ़रामोश ख़िदमात अंजाम दें

जुमला असातिज़ा मज़हर उलउलूम गुरसहाय गंज क़न्नौज यू पी

अज़ीज़ग्रामी वक़ार हज़रत मौलाना अहमद सईद व मौलाना बरकात साहिबान

सलाम मस्नून

आज सुबह बाद नमाज़ फ़ज्र निहायत ही अफ़्सुर्दा खबर मौसूल हुई कि आप के वालिद ग्रामी पीर तरीक़त रहबर शरीअत बह्र उल-इरफ़ान मुफ्ती आज़म क़न्नौज हज़रत अल्लामा मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद साहिब क़िबला मुजद्दिदी बानी व मुहतमिम अल-जामिआ अल-अहमदिया क़न्नौज ने दाई उज्जल को लब्बैक कहदिया ।अना लिल्लाह वाना इलिया राजावन

हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की रहलत बुला शुबह इल्मी वरूहानी दुनिया में अज़ीम ख़ला है मुफ्ती साहिब ने दीन व संयत रशद व्हिदायत दावत व तबलीग़ की जो ख़िदमात अंजाम दी हैं यकीना वह ना काबिल फ़रामोश हैं अल्लाह तआला मुफ्ती साहिब के ज़रिया की गई दीन व संयत की राह में ख़िदमात कबूल फ़रमाए आमीन। और उनके शहज़ादगान ज़ा व अक़रबा मुरीदैन व मोतक़िदीन को अल्लाह रब अलाज़त सब्र जमील अता फ़रमाए और अहले सुन्नत विजमाअत को नोम अलबदल अता फ़रमाए । फ़क़त वस्सलाम ।

गोशा मज़ामीन

क़न्नौज बह्रुल-इरफ़ान से क़ब्ल और तशरीफ़ आवरी के बाद

क़न्नौज बह्रुल-इरफ़ान से क़ब्ल और तशरीफ़ आवरी के बाद

मौलाना मुहम्मद ज़िया अलक़मर मुजद्दिदी आफ़ाक़ी*

अलहम्द लिल्लाह हमदन कसीरा वालसलो वस्सलाम अली रसोलह उल्लाइल्ली वाली आला वस्हिबा अजमईन ।

तारों से तवक़्क़े है न उम्मीद सह्र से

हम रोशनी फैलाएं गयाब दाग जिगर से

मायूस न हो ए चमन मिलित बैजा

ज़िंदा हैं तो सींचें गे तुझे खून जिगर से

बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा इस दौर कहत उर्रिजाल में इस्लाफ़ के किरदार व गुफ़्तार का अमली नमूना ,कमालात व फ़्यूज़ात का मंबा मशाइख़ नक़्शबंदिया की निसबतों, विलायतों के हक़ीक़ी अमीन, रशद व हिदायत के सर चश्मे, उलूम नबूय अलैहि इलतहीत वालसना के सच्चे वारिस, मुजद्दिद अल्फ़ सानी के ज़ाहिरी और बातिनी कमालात के जामा और मुजद्दिदी नक़्शबंदी फ़्यूज़ व बरकात व इनामात के हामिल और कामिल व मुकुमुल शैख़ तरीक़त थे।

बह्रुल-इरफ़ान की शख्सियत मुहताज तआरुफ़ नहीं आप की ख़िदमात जलीला ही आप का उम्दा तरिन तआरुफ़ हैं।अब हम क़न्नौज के हालात और उसकी कुछ तफ़सीलात कलमबंद कर रहा हूँ ताकि मालूम होक्का बह्र उल-इरफ़ान ने कण हालात में दीन वसनीयत काक़िला तामीर क्याक्स तरह इस मदेन उलावलिया की अज़मत रफ़्ता की निशात सानिया फ़रमाई।

क़न्नौज बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा से क़ब्ल

क़न्नौज की तारीख़ी हैसियत:

क़न्नौज हिंदोस्तान की सब से बड़ी रियासत उतर प्रदेश का निहायत क़दीम तारीख़ी शहर है।तारीख हिंदोस्तान के मुताबिक क़न्नौज दुनिया की दूसरी या तीसरी आबादी है जिसे हज़रत आदिम अलैहि अस्सलाम के बेटे क़ाबील ने बसाया था।क़दीम जमाने में यह शहर पूरे गैर मुनक़सिम हिंदोस्तान की राजधानी रहा है। तारीख फरिश्ता के बयान से इस की वसात का अंदाजा लगाया जा सकता है। नीज़ अरसा दराज़ तक शुमाली हिंद की राजधानी रहा शहर क़न्नौज की वसात का अंदाजा इस से लगाया जासकता हैकि एक जमाने में 32 हजार तमूल्यों की दुकानें हो अ करती थीं।आज भी यहाँ के नशेब व फ़राज़ के इलाक़े और आसार क़दीमा के खंडरात ,शिकस्ता किले ओरमहलात ,

मकबरे और नवाबों ,जमींदारों की हवेलियां अपनी अज़मत रफ़्ता का पता देते हैं जिन सेकनोज की सक़ाफ़्त निज्तामीर वतहजीब का पता चलता है। क़न्नौज केआकाबिर औलिया, उल्मा व मशाइख़ के मज़ारात और उनके नामों से मंसूब मुहल्ले इस की क़दामत व अज़मत का पता देते हैं। ऋतकाला शरीफ़ में सहाबा कराम के मज़ारात, ख़्वाजा गरीब नवाज़ के दादा पीर हज़रत हाजी शरीफ़ अलैहि अर्रहमा की दरगाह ,हज़रत बालापीयर का रोज़ा।हज़रत जलाल हैदर सालस अलैहि अलर हिमा का रोज़ा और इस से मुत्तसिल मस्जिद मख़दूम जहानियां जहां गश्त ,हज़रत मख़दूम अख़ी जमशेद अलैहि अर्रहमा,की दरगाह, शहंशाह औरंग ज़ेब आलमगीर के असातिज़ा के मज़ारात ,क़बे, पुंज पीर व सुलतान पीर अलैहम अलरहम व इलरिज़्वान वग़ैरहम की मुक़ाबर दावत नजारा दे रही हैं।मज़कूरा बालाआकाबिरीन में से चंद की तफ़सीलात उन शा अल्लाह आगे बयान की जाएँ गी।

महल वक़ूअ:

क़न्नौज शहर कानपुर से दिहली को जाने वाले जी टी रोड से तक़रीबन 80/ किलो मीटर जानिब ग़र्ब और दिहली से तीन सौ चालीस किलो मीटर की दूरी पर जानिब शर्क़ वाक़्य है।

इक़तिसादी हालात: क़न्नौज शहर तिजारत व मईशत के ऐतबार से भी बड़ी अहमियत का हामिल रहाहै। यहाँ का इतर पूरी दुनिया में जाता है और क़न्नौज को इतर व इतिहास की नगरी कहा जाता है।क़न्नौज में मुख़तलिफ़ कारोबार हैं मसला ज़राअत में आलू की पैदावार ज़्यादा की जाती है और आड़ती निजाम में मुसलमानों का कारोबार ना के बराबर है ज़्यादा तर तबका काशित कार या मजदूर पेशा है बड़ाकारोबार तो सिर्फ़ इतर का है जिसके बड़े बड़े कारखाने ,मेल आज भी हैं इबतिदाई दौर में तो सारा अत्रियात का काम मुसलमानों के हां था पर धीरे धीरे गैर मुस्लिमों ने इस कारोबार को अपना लिया आज दस फीसद तक़रीबा ًمسلمانوں के पास है इस में भी जो मुसलमान बड़े कारोबारी हैं वह गैर मुक़ल्लिद या देवबंदी मसलक के हैं सुनियों में मादूदे चंद महलों के मसलानपाटा नाला की इंडिया सेल्स इंटर नेशनल फर्म और अब्द उलमजीद ख़ाँ साहिब एंड संस वगैरह यह हैं और कुछ अफराद हैं जो सुनियों के दीनी ,समाजी उमूर में माली मुआवनत करपाते हैं वर्ना अक्सरीयत माली ज़बूँ हाली का शिकार है।इस शहर की आबादी एक लाख से ज़ाइद है जिस में तक़रीबन 40/ फीसद मुस्लिम आबादी है और अहले सुन्नत को अक्सरीयत हासिल है।

क़न्नौज में सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन:

अल्हम्दुलिल्ला मदेन उलावलियाशहर क़न्नौज को यह शरफ़ भी हासिल है कि यहाँ तीन सहाबा कराम रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम के मज़ारात मुक़द्दसा हैं। ’’अलासाब फ़ी तम्येज़ अलसहाबत‘‘ में इस की सराहत मौजूद है।क़न्नौज के राजा हज़रत सुरबातक हिंदी थे। इब्न असीर ने असदालग़ाबा और हाफ़िज़ इब्न हिज्र ने अलासाबा में क़न्नौज के राजा सुरबातक से मुताल्लिक़ एक रिवायत नकल की है कि रसूल अल्लाह सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम के तीन सहाबा हज़रत हुज़ैफ़ा, हज़रत उसामा ,हज़रत सुहैब रज़ि अल्लाह अन्हुम अजमईन उनके पास इस्लाम का दावत नामा लेकर हाजिर हुए और उन्हों ने इस्लाम की दावत कबूल करली और फिर उन्हों ने सात सौ साल उम्र पाई और अबू मूसा के हवाला से इसहाक़ बिन इब्राहिम तूसी की जुबानी नकल है कि उन्हों ने हिंदोस्तान में क़न्नौज के राजा सुरबातक से मुलाक़ात की और उन से दीन इस्लाम के बारे में गुफ़्तगू भी की -इस वक़्त उनकी उम्र 715बरस थी-अबू हातिम अहमद बिन हामिद बलवी ने लिखा है कि में ने सुरबातक हिंदी रज़ि अल्लाह अन्हु को कहते हुए सुना है कि में ने हज़रत मुहम्मद रसूल अल्लाह सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम को दो मर्तबा मक्का में और एक मर्तबा मदीना में देखा है- आप सिल्ली अल्लाह अलैहि वाला वसल्लम तमाम इंसानों से ज़्यादा खूबसूरत और दरमियाना कद के थे -(अलासाबा जिल्द2- स121)

अन्हुम के मज़ारात मुक़द्दसा हैं। ’’अलासाब फ़ी तम्येज़ अलसहाबत‘‘ में इस की सराहत मौजूद है।क़न्नौज के राजा हज़रत सुरबातक हिंदी थे। इब्न असीर ने असदालग़ाबा और हाफ़िज़ इब्न हिज्र ने अलासाबा में क़न्नौज के राजा सुरबातक से मुताल्लिक़ एक रिवायत नकल की है कि रसूल अल्लाह सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम के तीन सहाबा हज़रत हुज़ैफ़ा, हज़रत उसामा ,हज़रत सुहैब रज़ि अल्लाह अन्हुम अजमईन उनके पास इस्लाम का दावत नामा लेकर हाजिर हुए और उन्हों ने इस्लाम की दावत कबूल करली और फिर उन्हों ने सात सौ साल उम्र पाई और अबू मूसा के हवाला से इसहाक़ बिन इब्राहिम तूसी की जुबानी नकल है कि उन्हों ने हिंदोस्तान में क़न्नौज के राजा सुरबातक से मुलाक़ात की और उन से दीन इस्लाम के बारे में गुफ़्तगू भी की -इस वक़्त उनकी उम्र 715बरस थी-अबू हातिम अहमद बिन हामिद बलवी ने लिखा है कि में ने सुरबातक हिंदी रज़ि अल्लाह अन्हु को कहते हुए सुना है कि में ने हज़रत मुहम्मद रसूल अल्लाह सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम को दो मर्तबा मक्का में और एक मर्तबा मदीना में देखा है- आप सिल्ली अल्लाह अलैहि वाला वसल्लम तमाम इंसानों से ज़्यादा खूबसूरत और दरमियाना कद के थे -(अलासाबा जिल्द2- स121)

इस के बाद यह भी तहरीर है कि 333ह(बमुताबिक945) में सुरबातक हिंदी रज़ि अल्लाह अन्हु 894बरस की उम्र में इंतकाल फ़रमा गए।

इस के अलावा मशाइख़ के मक्शफ़ात भी इस पर शाहिद हैं जैसाकि हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा ने अपनी किताब तज़किरा मशाइख़ मुजद्दिदय सोम में अपने मुर्शद ग्रामी शैख़ अलालम आरिफ बिल्लाह हज़रत मौलाना अहमद रज़ा ख़ाँ बनारसी दाम ज़ला के मक्शफ़ात में लिखा है। क़न्नौज के क़रीब एक ऋतकाला मक़ाम है जब हम क़न्नौज आये तो लोगों ने बताया कि ऋतकाला में सहाबी का मजार है। दरअसल 1931 में एक लाश पानी के कटाव से खिल गई जो बिलकुल सही व सालम थी उन्हें लोगों ने टीले पर लाकर दफन किया जहां लाश बरामद हुई थी कुछ मिट्टी हटाने पर एक बड़ा सा पत्थर नमूदार हुआ जो तुर्बत के साइज़ का था इस में कलिमा शरीफ़ वगैरह के अलावा जो पायतें तरफ़ इबारत लिखी हुई थी इस से 99 ह मफ़हूम होता है इस की वजह से यह मशहूर हो गया कि यह सहाबी हैं। हमारा क़ल्ब बहुत मुतरदद था एक बार हम ने आप से अर्ज़ किया तो आप तशरीफ़ ले गए।काफ़ी देर मुराक़ब रहे फिर बाद में बहुत गर्ये वज़ारी के साथ दुआएं माँगें जिस से हम लोग समझ गए कि यह कोई अहम शख्सियत का मजार है वापसी में हम ने अर्ज़ किया जब इसरार बढ़ा तो फ़रमाया कि हां यह सहाबी हैं और इस

मक़ाम पर दस सहाबा कराम रज़ि अल्लाह अन्हुम दिखाई दिए। हो सकता है कि बाज़ के मज़ारात यहीं क़रीब में हूँ फ़रमाया कि जो नूर महसूस हुआ वह सहाबा का ही था। में ने अर्ज़ किया कि हुज़ूर सहाबा का नूर आम औलिया कराम से जुदा होता है? तो आप ने एक फ़र्क़ यह बयान फ़रमाया कि सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन के मज़ारात पर मुराक़ब होने से जब वह लोग नज़र आते हैं तो उनके बदन से वही खुशबू महसूस होती है जो सरकार अलैहि अलसलो वस्सलाम के जिसम और पसीना से आया करती थी क्योंकि सहाबा कराम का आका अलैहि अस्सलाम के साथ इख़तिलात और मुसाफ़ा व मुअनिक़ा रहता था।यह वाक़ा इस वक़्त पेश आया जब कि हमें उनके बारे में कुछ मालूमात न थीं जबकि यह बात अजीब सी लगती थी कि क़न्नौज में सहाबी का मजार है लेकिन तहक़ीक़ व जुस्तजू शुरू की तो मालूम हुआ कि असाबा नामी किताब में अल्लामा इब्न हिज्र अलैहि अर्रहमा ने एक रिवायत नकल फ़रमाई है जिस से दस सहाबा कराम का क़न्नौज तशरीफ़ लाना साबित है। फिर हमारे एक हम सबक साथी मौलाना मुहम्मद नायाब साहिब ने बताया कि उनके पास एक किताब अरबी में है जो रद्दी में मिल गई थी इस में क़न्नौज में सहाबा कराम की आमद का तफ़सीली तज़किरा है।(तज़किरा मशाइख़ मुजद्दिदय सोम 113,114)

क़न्नौज के अकाबिर उल्मा विमशाइख़

ख़्वाजा गरीब नवाज़ अलैहि अर्रहमा के दादा पैरकनोज में, अज़ीम तरिन बुजुर्ग हस्ती:

मुक़तदाए औलिया,कुतुब अफराद और मशाइख़ वक़्त क़दूत उलावलिया हज़रत ख़्वाजा हाजी शरीफ़ ज़िंदनी रहमत अल्लाह अलैहि आप का नाम शरीफ़ है, लकब नीयर उद्दीन और शहरत ख़्वाजा हाजी शरीफ़ के नाम से है क्योंकि आप ने मुतअद्दिद हज किए। आप ज़िंदनह अज़ बिलाद बुखारा (रूस) में 492ह बमुताबिक 1099 पैदा हुए।

आप की अज़मत के लिए इतना काफ़ी है कि आप हज़रत ख़्वाजा गरीब नवाज़ अलैहि अर्रहमा के पीर हज़रत ख़्वाजा उसमान हारूनी अलैहि अर्रहमा के पीर हैं और हज़रत ख़्वाजा के दादा पीरहीं ।

आप रहमत अल्लाह अलैहि हज़रत ख़्वाजा मौदूद चिश्ती रहमता अल्लाह अलैहि के ख़लीफ़ा थे। हज़रत ख़्वाजा हाजी शरीफ़ ज़िंदनी रहमता अल्लाह अलैहि चौदह साल की उम्र से बावुज़ू रहने लगे थे आप रहमता अल्लाह अलैहि हमेशा पुराने और पैवंद शुदा कपड़े पहनते थे। आप रहमता अल्लाह अलैहि का रोजा भी मुसलसल होता था और तीन दिन के बाद बग़ैर नमक वाली सब्जी से रोजा इफ्तार करते थे।

अहवाल व मुरातिब:

ख़ज़ेन अलासफ़िया व सैर इलाक़ताब में है कि चौदह साल तक की उम्र के बाद आप का वुज़ू सिवाए क़ज़ाए हाजित के ज़ाए नहीं हुआ तमाम उम्र पैवंद लगे कपड़े पहने चालीस साल तक आप जंगल में इबादत अलहि में मशगूल रहे. जिस पर आप की नज़र पड़ती वह वली कामिल होजाता। अहले तसव्वुफ़ का बयान है कि हज़रत हाजी शरीफ़ अलैहि अर्रहमा की रियाज़त इंतिहाई आला मुरातिब तक पहुँच गई थी कि वह जाह विजलाल आप के चेहरा अनवर से टपकता था कि ख़ौफ़ से लोग आप के चेहरे की तरफ़ देख न सकते थे।

आप ने हज़रत सय्यद मख़दूम कुतुब उद्दीन मौदूद चिश्ती रहमत अल्लाह अलैहि के दस्त अक़्दस पर बीअत फ़रमाई। ख़्वाजा ने फ़रमाया: ए शरीफ़! तो नेक बख़्त है, में ने अल्लाह तआला से इलतिमास की है कि तो मेरा जानशीन बने और लोगों को अल्लाह की तरफ़ रागब करे"। शेखؒ ने जो असम आज़म अपने मुर्शिदसे हासिल किया था वह आप को तालीम फ़रमाया जिस से तमाम उलूम आप पर रोज़ रोशन की तरह अयाँ हो गए। आप ने अजिलित नशीनी इख्तियार की तो शैख़ ने रसूल अल्लाह ﷺ का मेराज वालख़िरक़ा बतौर ख़िरक़ा खिलाफत अता फ़रमाया और नसीहत की "दरवेश के लिए ज़रूरी है कि कि शबाना रोज़ याद अलहि में मसरूफ़ रहे, मासुआई अल्लाह दिल से महव कर दे, दरवेशों से मुहब्बत व सोहबत रखे, दरवेश मुहबीन अलहि होते हैं।’’ आप ने कभी दुनिया के माल की तमन्ना न की और न ही कभी किसी दुनिया दार को सदर मजलिस में जगह दी। आप ने 40 साल मुजाहिदा किया, 14 साल की उम्र से आखिरी लम्हात हयात तक आप का वुज़ू सिवाए क़ज़ाए हाजित के कभी बातिल न हुआ।अल्लाह के ख़ौफ़ से हर वक़्त रोते रहते और नमाज़ अदा करते तो मुकम्मल हुज़ूरी हासिल होती। मुजाहिदे में कामिल थे, पैवंद लगी गोदड़ी ज़ेब तन फ़रमाते, तीन तीन चार चार रोज़ का फ़ाक़ा करते और कईई दिन फ़ाक़ा में गुज़ार लेने के बाद बतौर शुक्रिया 100 रकात नवाफ़िल अदा फ़रमाते। अजुज़ व इन्किसारी और मेहमान नवाजी का यह आलम था कि हाज़िरीन हैरान रह जाते, मेहमान के आगे बा अदब बैठते। आप का फरमान है ’’मेरे बदन का हर एक बाल ज़बान हो और तमाम मख़लूक़ की तादाद के मुताबिक नमाज़ अदा करूँ तो भी इस का शुक्रिया अदा नहीं कर सकता।‘‘ज़

120 साल की उम्र में 612ह बतारीख 3 रजब एल्मरजब बमुताबिक 1210 क़न्नौज में वफ़ात पाई ।

दरिया के किनारे आप का मदफ़न है आप ही के नाम से मंसूब मुहल्ला हाजी शरीफ़ है। (अला इख़तिलाफ़

अलरवाय) (सैर इलाक़ताब सफ़ा 90,ख़ज़ेन अलासफ़िया जिल्द दोम, -56,55)

आज भी सदियों से ह आप का सालाना उर्स मुबारक ज़िला क़न्नौज में सब से बड़े पैमाने पर होता है लाखों की भेड़ होती है मीलाद शरीफ़ की आलीशान महफ़िल मुनाक़िद की जाती हैजिस में ख़ुसूसी खिताब हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा का होता था। क़ुल व फ़ातिहा की तक़रीबात में कसीर उल्मा व अवाम बड़ी अकीदत सेशरीक होते हैं। आप के तवस्सुल सेदुआएं मांगते और अपने दामन मुराद कुभरते हैं।

हज़रत शाह जीवना अलैहि अर्रहमा कन्नौजी:

हज़रत मख़दूम जहानियां जहां गश्त अलैहि अर्रहमा की वफ़ात के बाद सादाद शाह जीवना अलैहि अर्रहमा के अज्दाद नेतबलीग़ दीन के लिए क़न्नौज भारत की तरफ़ रुख किया, जहां हज़रत पीर शाह जीवना अलैहि अर्रहमा पैदा हुए। आप के वालिद ग्रामी का असम ग्रामी सय्यद सदरुद्दीन शाह कबीर था, जो एक जीद आलम दीन थे, और सिकंदर लोधी बादशाह हिंद के मुसाहिबीन में से थे।

हज़रत शाह जीवना अलैहि अर्रहमा ने अपनी ज़िन्दगी का बहुत बड़ा हिस्सा (895ह ता 961ह) तक़रीबन 66साल क़न्नौज में गुजारा आप ने शाहान हिंद सिकंदर लोधी, इब्राहिम लोधी, ज़हीर उद्दीन बाबर, नस्रुद्दीन हुमायूँ और जलाल उद्दीन अकबर का अहद देखा । क़न्नौज जोकि अब ज़िला है इस में एक तहसील जलाल आबाद है जोकि सादाद जलाली बुखारी के नाम से मंसूब है। इसी तहसील में कस्बा ’’जीवन‘‘ वाक़्य है।इसी तरह मख़दूम जलाल उद्दीन जहानियां जहां गश्त के नाम से मंसूब मस्जिद भी क़न्नौज में मौजूद है। हज़रत पीर शाह जीवना अलैहि अर्रहमा बाकरामत वली कामिल थे, जब आप क़न्नौज में थे तो वहाँ के राजा के बेटे को पेट में चाकू लगा जिस से इस की मौत वाक़्य होगई, लेकिन आप के दस्त कारसाज़ से अल्लाह के फजल से राजा का बेटा ज़िंदा सलामत उठ बैठा। जिस से आप ’’ शाह जीवना पाटे सेवना‘‘ मशहूर होगए और आप की इस करामत को देख कर राजा और इस की रिआया के लोग मुसलमान होगए।हज़रत पीर शाह जीव न को यह करामत विरसा में मिली थी। आप के जिद अमजद मख़दूम जलाल उद्दीन सुर्ख बुखारी के मुताल्लिक़ किताब हदीक़त उलावलिया औरांवार उलावलिया मूल्फा रईस अहमद जाफ़री में उन करामात का ज़िक्र है।

हज़रत पीर शाह जीवना तबलीग़ इस्लाम के लिए 558ह में क़न्नौज से पेल पधराड़ के इलाक़ा में तशरीफ़

लाये और यहाँ के कबाइल को कलिमा हक़ पढ़ाया, यह इलाक़ा पहले बिलकुल बंजर था लेकिन आप की बरकत से सरसब्ज़ होगया, और लोगों ने यह करामत देख कर जौक़ दर्जोक़ इस्लाम कबूल करलिया।पेल पधराड़ से आप झंग(पाकिस्तान) में मौजूद शहर शाह जीवना के इलाक़ा में तशरीफ़ लाये।(माख़ूजाज़ किताब चिराग फ़िक्रमूलफा हाजी गुलाम रज़ा)

माहिर उलूम अक्लिया व नक़लय हज़रत अल्लामा सय्यद मुहम्मद कन्नौजी अलैहि अर्रहमा:

आप क़न्नौज के रसूलदार सादाद में से थेफतावा आलमगीरी की मजलिस मूलफ़ीन के हिस्सा दार्थेरियाज़ी और अदब के माहिर और क्रीम अलख़लाक़ अपने वक़्त के अज़ीम आलम, फ़ाज़िल थे फ़िक्रू तसव्वुफ़ की चाशनी मिजाज में दाखिल थी और सिलसिला चिश्तिया में बीअत थे शाहजहाँ की नज़र बंदी के जमाने में मोंस व दमसाज़ थे तमाम उम्र दर्स वितदरीस में बसर की और इनायत शाही के हक़दार रहे 1091ह के बाद इंतकाल हो औरकनोज में अपने आलीशान बाग में मदफ़ून हैं। हाशिया मतूल उनकी इल्मी यादगार है।(फतावी आलमगीरी के मूलफ़ीन)

मज़ेद बरआँ मुख़तलिफ़ सलासल के कईई बुजुर्गों के मज़ारात भी क़न्नौज की अज़मत रफ़्ता के गवाह हैं। जैसे हज़रत बाला पीर, हज़रत सुलतान पीर, हज़रत मख़दूम अख़ी जमशेद, हज़रत मख़दूम जहानियां रहिमहुम अल्लाह तआला। नीज़ ख़ुद हज़रत ख़्वाजा हिंदोस्तान ख़्वाजा गरीब नवाज़ क़ुद्दिस सरह के ख़ास ख़लीफ़ा हज़रत शैख़ अहमद रहमत अल्लाह तआला अलैहि भी यहाँ तशरीफ़ लाये और यहीं मदफ़ून हुए। आज भी आप के नाम से मुहल्ला अहमदी टोला, आबाद है।मज़मून की तवालत के पेश नज़र उन्हें अकाबरके अहवाल पर इकतिफ़ा किया गया है वर्ना दफ्तर दरकार होगा क्योंकि क़न्नौज मदेन उलावलिया रहाहै।

मज़ाहिब व मसालिक

क़न्नौज की क़दीम तारीख सेपता चलताहै कि तक़रीबा सारे वह मज़ाहिब जोकि हिंदोस्तान में मुरूज थे वह यहाँ पाए जाते थे क्योंकि यह मुल्क की राजधानी रहा इस लिए यहाँ सब मजहब के लो ग थे पर मौजूदा दौर में अक्सरीयत में इस्लाम और हिंदू मजहब के पैरोकार पाए जाते हैं और निहायत अक़ल्लीयत में इसाई

क़न्नौज की क़दीम तारीख सेपता चलताहै कि तक़रीबा सारे वह मज़ाहिब जोकि हिंदोस्तान में मुरूज थे वह यहाँ पाए जाते थे क्योंकि यह मुल्क की राजधानी रहा इस लिए यहाँ सब मजहब के लो ग थे पर मौजूदा दौर में अक्सरीयत में इस्लाम और हिंदू मजहब के पैरोकार पाए जाते हैं और निहायत अक़ल्लीयत में इसाई हैं।जिस तरह बनाम मुसलमान शीया फ़िर्क़ा क़न्नौज शहर में सिर्फ़ एक घर शीया का बाक़ी सब सन्नी हैं।

मसालिक:

मुसलमानों में तीन मसलक यहाँ पाए जाते हैं। अहले सुन्नत विजमाअत,देवबंदी , गैर मुक़ल्लिद।

देवबंदीत:

देवबंदी फ़िरक़े ने जब से हिंदोस्तान में जन्म लिया इसी वक़्त से यहाँ देवबंदीत पैदा पोगई कोई सन्नी आलम न होने की वजह से यहाँ देवबंदीत को खूब फैलाने का मौका मिला जिस की वजह से अक्सरीयत उन की होगई देवबंद से कई मौलवी पढ़ करआए और कई महलों में छोटे छोटे मदरसे क़ायम किए।ओहरजमाअतों की भी आमद व रफ्त से काफ़ी फ़रोग़ मिला इस के अलावा देवबंदी मशहूर आलम मसला सिद्दीक़ हितोड़ा और अबरार उलहक़ हरदोई वगैरह आते औरपेरी मुरीदी के नाम पर्सीधे अवाम को गुमराह कर देवबंदी बनाते रहे।

गैर मुक़लदीयत:

क़न्नौज की गैर मुक़लदीयत क़दीमी है बल्कि हिंदोस्तान में गैर मुक़ल्लिद फ़िरक़े के बान्येन में नवाब सिद्दीक़ हसन ख़ाँ काआबाई वतन क़न्नौज रहा है जिसके दौर में क़न्नौज की गैर मुक़लदीयत परवान चढ़ी। जिसका ताल्लुक क़न्नौज के मशहूर नकवी सादाद से है सादाद क़न्नौज की अज़ीम तारीख है।क़न्नौज में गैर मुक़लदीयत क़दीमी और माली ऐतबार से मजबूत रही मगर बह्रुल-इरफ़ान की मसाई जमेला से सिर्फ़ एक मुहल्ला के चंद अफ़रादावर एक खानदान में सिमट कर रह गई।

अहले सुन्नत व जमात:

गुज़श्ता उद्वारमें क़न्नौज में संयत ही थी मगर माज़ी क़रीब में बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा केकनोज आने से क़ब्ल सुनियों के हालात निहायत बद तर हो गए थे इस दौरान फ़र्क़ बातिला को खूब मौका मिला , मगरबहर उल-इरफ़ान की आमद के बाद अल्हम्दुलिल्ला संयत ग़ालिब आई और तमाम फ़िर्क़ों की कमर टूट गई हर सौ, शहर वातराफ़ में संयत की बिहारें आगईं अल्हम्दुलिल्ला आज क़न्नौज में 90 फीसद संयत है । उसकी मज़ेद तफ़सीलात आगे आरही है।

क़न्नौज के दीनी हालात:

गुज़श्ता उद्वार में क़न्नौज उल्मा विमशाइख़ का मरकज़ रहा मगर मरूर ज़माना के तहत हालात मुतग़य्यर होते रहे और आहिस्ता आहिस्ता अज़ीम शख़्सियात के उठ जाने से दीनी सरगर्मियां सर्द पड़ गईं और जहालत की तारीकियां छा गईं संयत का बड़ा नुकसान हुआ बातिल फ़िरक़े वहाबिय और दयाबिना ने अपनी कोशिश जारी रखें इस तरह क़न्नौज शहर और मुज़ाफ़ात में भी देवबंदीत का असरोरसूख़् बढ़ गया।

बह्रुल-इरफ़ान की आमद से क़ब्ल हालात यहाँ तक बिगड़े हुए थे कि शहर क़न्नौज की तक़रीबन पचासी मसाजिद में कोई सन्नी इमाम तक न था और पूरे शहर में कोई सन्नी आलम न मुक्तब विमदरसा था अक्सर मसाजिद में देवबंदी इमाम थे और बाक़ी में इमाम तक न थे और उन में भी जमातों की आमदरफ़्त थी इस तरह उन्हें का कब्जा था शहर की इमामत वक़्यादत उन्हें के ज़ीरंगें थी मजहबी उमूर में अवाम उन्हें के अइम्मा और मदारिस के जिम्मा दारों से रुजू करती हालाँकि अवामी अक्सरीयत मामूलात अहले सुन्नत विजमाअत पर कारबन्द थी मगर किसी सन्नी आलम और हुफ़्फ़ाज़ वक़रा की अदम मौजूदगी और क़ाइद न होने की वजह से मीलाद वफ़ातहा ख़वानी और बुजुर्गों के आरास के प्रोग्रामों को भी देवबंदी अपनी शातिराना चालों से सीधे सादे सुनियों की महफिलों और मीलाद शरीफ़ के प्रोग्रामों को अपने तौर तरीके से रस्मा अदा करते, मीलाद शरीफ़ में बजाए अज़मत मुस्तुफ़ाई सिल्ली अल्लाह अलैहि व सल्लम के और आरास में बुजुर्गों की सीरत वितज़करे बयान करने के अपने बातिल व फ़ासद अक़ाइद बयान करते जिस से दिन बदन संयत का नुकसान हो रहा था।

दूसरी जानिब आम सुनियों की जहालत और दीन से दूरी का यह आलम था कि अक्सर फ़ातिहा ख़वानी और कुरआन ख़वानी के लियेहती ٰکہ ईद वबक्र ईद, नमाज़ जनाज़ा पढ़ाने के लिए कोई देनदार शख्स तक मयस्सर न आता थाजिस के लिए काफ़ी दौर दराजसे किसी हाफ़िज़ साहिब वगैरह को बुलाना पड़ता।

राक़िम से क़न्नौज केबाअज़ बुजुर्ग लोगों ने बताया कि हज़रत बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा के आने से क़ब्ल क़न्नौज में सब से बड़ी दिक्कत अहले सुन्नत व जमात की यह थी कि फ़ातिहा विद्रूद और मस्जिदों की इमामत और किसी इंतकाल के होजाने पर जल्दी कोई नमाज़ पढ़ाने वालान्हें मिलता था हम लोग कभी मकिन पुर शरीफ़ हज़रत मदार साहिब अलैहि अलरहम वालरिज़्वान के इलाक़ा से किसी को बुला कर लाते और नमाज़ जनाज़ा वगैरह पढ़वाते थे।

क़न्नौज और अतराफ़ क़न्नौज की दीनी हालत बड़ी ख़स्ता थी । देहात की हालात निहायत ही खराब थेहनोद की सोहबत की वजह से उन के रस्म व रिवाज का इतनासर पड़ाकि क़न्नौज के बाज़ मवाज़आत जिन में मुसलमान अक़ल्लीयत में रहते हैं वहाँ की अव्रतें मंदिरों में चढ़ावे और नज़ रें पेश कर नेजातें और नाम तक अपने बच्चों के कुफ़्फ़ार विमशरिकीन के नाम पर रख लेते आधा नाम मुस्लिम तो आधा नाम मुशरिकाना होता।

क़ादियानियत भी बाज़ इलाकों मेंपनी मादी ताकत के बना पर फैलाने लगी थी क़ादियानियों ने क़न्नौज के इस इलाक़े को खाली देखा तो अपने मजहब की तबलीग़ के लिए कसीर माल वुज़र गरीब मुसलमानों में सिर्फ़ करके बाज़ अफराद को दीन से मुनहरिफ़ कर लिया।

इसी तरह क़न्नौज और अतराफ़ के दीनी हालात बहुत ज़्यादा भयानक होते जारहे थे संयत की कोई देख भाल करने वालाना था मर्कज़ीयत से कोई राबिता न था और न ही हिंदोस्तान के किसी आलम या पीर का यहाँ आना होता था और जमात अहले सुन्नत का कोई राबिता न था जिस की बना पर यह इलाक़ा अहले सुन्नत व जमात के हाथ से जाता रहा और बातिल फ़िर्क़ों को खूब फैलाने का मौका मिल गया।

एक जमाने में इस शहर क़न्नौज की संयत इतनी मारूफ़ विमकबूल थी कि मुल्क व बैरून मुल्क में भी यहाँ के अकाबिरीन के कारनामों और ख़िदमात दयनीय की वजह से इस शहर को मर्कज़ीयत हासिल थी मगर हालात की सितम ज़रीफ़ी अपनों की बे एतिनाई कि बुजुर्गों के क़दीमी शहर को बिलकुल नज़र अंदाज़ कर दिया गया था हालाँकि यह शहर ख़्वाजा गरीब नवाज़ अलैहि अर्रहमा के दादा पीर हाजी शरीफ़ अलैहि अलरहम वालरिज़्वान की नशिस्त गाह और आरिफ़ान हक़ और मशाइख़ चश्त का मरकज़ रहा था. धीरे धीरे वहाबियत की ज़िद में आ गया और जहालत की तारीकियों में डूब गया और हालात निहायत नाजुक हो गए, अलमुख़्तसर यह कि संयत का अज़ीम नुकसान हो चुका था जिस की तलाफ़ी बजाहिर बहुत मुश्किल थी ।

क़न्नौज के हालात के हवाले से बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा ख़ुद अपनी किताब ‘‘तहदीस नेमत’’ में यों बयान फ़रमाते हैं: कि जामिआ के क़याम के लिए इस वक़्त जो मुनासिब जगह ख़याल में आई वह क़न्नौज थी यहाँ कोई अहले सुन्नत का जामिआ या मदर्रिसा तो बड़ी बात है कोई अच्छा मुक्तब तक न था न कोई आलम यहाँ तोहफ़्ज़ संयत का काम कररहे थे क़रीब क़रीब पूरा शहर देवबंदियों की लपेट में था मसाजिद में इमाम उन्हें के थे ईदेन वजुमा की नमाज़ें वही पढ़ाते थे आम तौर पर लोग मजहबी मामलात में उन्हें की तरफ़

रुजू करते थे हद तो यह मीलाद के नाम पर जो मुहाफ़िल मुनाक़िद होतीं वही लोग आकर तकरीरें करते और बग़ैर क़याम वस्सलाम केमुहाफ़िल का इख़तताम हो जाता जनाज़ों की नमाज़ें वही पढ़ा ते चूंकि इस दयार में क़न्नौज को एक मर्कज़ीयत हासिल थी इस लिए उन का असर मवाज़आत और गावों पर भी बहुत पड़ रहा था मालदार तबका ज़्यादा तर मुकम्मल उन के हाथ में आचुका था कुरआन ख़वानियों में हर जगह वही बुलाए जाते थे। (तहदीस नेमत )

मज़कूरा बालाआहवाल से वाज़िह होता है कि बुजुर्गों के इस शहर की कियाहालत हो गई थी और कितने भयानक और नामुसाइद हालात थे और मुसलमान दीन से इतना दौर होरहे थे कि कोई दीन का दर्द रखने वालाना था जो संयत के इस लटते काफिले का तोहफ़्ज़ करसके और शिकस्ता किला की तामीर नो कर सके अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल का फजल और यहाँ के मशाइख़ व बुज़ुर्गान दीन का कर्म हुआ कि संयत की बाज़याबी के लिए इस फसल खरीफ को "फसल बिहार बनाने के लिए और दीन की सरबुलंदी और इस की ज़वाफ़िशाई के लिए बुजुर्गों की अज़्मतों को ख़ल्क़ ख़ुदा में उजागर करने के लिए बदकीदगी ऊर्जिहालत की तारीकियों को दौर करने के लिए ,इल्म वामल , हसन अख़लाक़ और किरदार विगुफ़तार और इत्तिबा रसूल सेआरास्ता करने के लिए रब कदीर ने इल्म व फजल, विलायत और रूहानियत के ताजदार उस्ताज़ालाल्मा हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अलरहम वालरिज़्वान को इस खित्ते में भेज दिया ।इस तरह आमद बह्रुल-इरफ़ान के बाद इस ख़िज़ां रसीदा चमन में हर तरफ़ फसल बिहार आगई।

क़न्नौज बह्रुल-इरफ़ान की तशरीफ़ आवरी के बाद

क़न्नौज में आमद:

हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा मज़कूरा हालात में बग़ैर किसी तआवुन के बेयारों मददगार बे सर्वसामानी में तन तन्हा तोकल अली अल्लाह की चादर ओढ़े अज़म वहमत और कुछ करने का हौसला और ख़िदमत दीन का जज्बा ले कर मशाइख़ और बुजुर्गों की इनायत के सहारे "1984" को इबतदाए रमजान उलमुबारक में क़न्नौज तशरीफ़ लाये।

क़याम जामिआ:

इब्तिदान अल्लाह के इस वली हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अर्रहमा नेसिलसिला चिश्तिया के अज़ीम बुजुर्ग हज़रत हज़रत ख़्वाजा गरीब नवाज़ अलैहि अलरहम वालरिज़्वान के दादा पीर हज़रत ख़्वाजा हाजी शरीफ़ अलैहि अर्रहमा की बारगाह में बारियाबी हासिल करके अपनी दीनी ख़िदमत का आगाज़ फ़रमाया शब् अव्वल दरगाह में गुजारी और नमाज़ फ़ज्र के बादशहर में निकले और मुख़तलिफ़ महलों में जा जा कर लोगों से मुलाकातें कीं अपने दीनी ख़िदमात केइरादे ज़ाहिर कईए बाज़ मुक़ामात पर सिर्फ़ तसल्ली और बाज़ से मायूसी हुई बिलआख़िर तीन रोज़ की तग विद्व के बाद मुहल्ला अहमद नगर( हमाली पूरा) में वाक़्य एक छोटी मस्जिद से मुत्तसिल आप ने 5रमजान उलमुबारक को इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी के नाम नामी से मंसूब अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया का क़याम फ़रमा या औरएक पेड़ के नीचे इस वक़्त केमुहद्दिस ,मुफ्ती और मुफ़कर,उलूम व फ़नून के माहिर उस्ताज़ ने दीन की खातिर कायदा बग़दादी के बच्चों से अपने सफर का आगाज़ किया इस के बाद आप के तलामज़ा परवानों की तरह इस मुहद्दिस विमदर्स ज़माना की बारगाह में जमा होगए शवाल से बाज़ाबता दर्स निज़ामी का आगाज़ होगया बैरूनी तलबा के क़याम के लिए मुहल्ला के कुछ लोगों ने कमरे दे दिए तआम के लिए घरों से इंतजाम करदिया गया. और फिर हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान ने शब् व रोज़ दौर धूप करते जामिआ की तौसीअ और तबलीग़ दीन के लिए रोज़ उन्ह दरसगाह से तलबा को पढ़ाने के बाद निकल जाते और बड़ी जिद वजहद करते और भूक विप्यास से बे प्रवाह होकर जामिआ के लिए दौड़ते रहते मेलों मेल गावम गावम कभी पैदल तो कभी साइकल से सफर फ़रमाते।

में बारियाबी हासिल करके अपनी दीनी ख़िदमत का आगाज़ फ़रमाया शब् अव्वल दरगाह में गुजारी और नमाज़ फ़ज्र के बादशहर में निकले और मुख़तलिफ़ महलों में जा जा कर लोगों से मुलाकातें कीं अपने दीनी ख़िदमात केइरादे ज़ाहिर कईए बाज़ मुक़ामात पर सिर्फ़ तसल्ली और बाज़ से मायूसी हुई बिलआख़िर तीन रोज़ की तग विद्व के बाद मुहल्ला अहमद नगर( हमाली पूरा) में वाक़्य एक छोटी मस्जिद से मुत्तसिल आप ने 5रमजान उलमुबारक को इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी के नाम नामी से मंसूब अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया का क़याम फ़रमा या औरएक पेड़ के नीचे इस वक़्त केमुहद्दिस ,मुफ्ती और मुफ़कर,उलूम व फ़नून के माहिर उस्ताज़ ने दीन की खातिर कायदा बग़दादी के बच्चों से अपने सफर का आगाज़ किया इस के बाद आप के तलामज़ा परवानों की तरह इस मुहद्दिस विमदर्स ज़माना की बारगाह में जमा होगए शवाल से बाज़ाबता दर्स निज़ामी का आगाज़ होगया बैरूनी तलबा के क़याम के लिए मुहल्ला के कुछ लोगों ने कमरे दे दिए तआम के लिए घरों से इंतजाम करदिया गया. और फिर हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान ने शब् व रोज़ दौर धूप करते जामिआ की तौसीअ और तबलीग़ दीन के लिए रोज़ उन्ह दरसगाह से तलबा को पढ़ाने के बाद निकल जाते और बड़ी जिद वजहद करते और भूक विप्यास से बे प्रवाह होकर जामिआ के लिए दौड़ते रहते मेलों मेल गावम गावम कभी पैदल तो कभी साइकल से सफर फ़रमाते।

तरीका कार बह्र उल-इरफ़ान:

आप का तरीका कार यह था कि सुबह को नमाज़ फ़ज्र से फ़राग़त के बाद अपने औरादो वज़ाइफ़ विमराक़बा से फ़ारिग़ होते और चासत की नमाज़ अदा फ़रमाते फिर जामिआ में आते और तलबा को पढ़ाते इस के बाद ख़िदमत ख़ल्क़ में मसरूफ़ हो जाते ओरलोगों के मिसाइल हल फ़रमाते दुआ वितावीज़ के ज़रूरत मंदों को तावीजात फ़रमाते और फिर बाक़ी वक़्त शहर या गावम में तबलीग़ दीन और जामिआ के फ़रोग़ के लिए निकल जाते देर रात को घर आते ,घर किया था वह भी पेड़ के नीचे एक तख़्त था जिस पर आप आराम फ़रमाते और कमरों में तलबा को क़याम कराते कुछ दिनों बाद मस्जिद के एक निहायत ख़स्ता हुजरे में क़याम फरमाने लगे जिस में सालों तक आप ने क़याम फ़रमाया जामिआ की तामीरात का सिलसिला शुरू किया बड़े बड़े कमरे बनाए, हाल, दारालाकामा बनाया मगर इस ख़ुदा के बंदे ने अपने घर की कोई प्रवाह न की अहबाब के इसरार के बावजूद अपने अहले ख़ाना को इस छोटे से कमरे में रखा और जामिआ की तौसीअ में लगे रहे , आप जामिआ के लिए हरमुमकिन कोशिश करते।

दावत व तबलीग़ :

दीन वसनीयत के फ़रोग़ के लिए हिम्मा वक़्त कोशां रहते इस के लिए आप ने अपना निजाम अलावकात कुछ इस तरह मुरत्तिब किया कि हर रोज़ शहर की एक मस्जिद में अपने कुछ तलबा के साथ जाते और लोगों को दीन की दावत देते और तकरीरोबियान फ़रमाते नमाज़ की तरग़ीब देते मुख़तलिफ़ महलों में दीनी मजलिस करते बलामावजा लोगों केयहां जाते उन के दुख दर्द में शरीक होते और कुरआन ख़वानियां मीलादें कराते और जनाज़ों में शिरकत करते ख़ुद बह्रुल-इरफ़ान ने फ़रमाया कि क़न्नौज की कोई गली और चौराहा पर कोई दुकान ऐसी न थी जहां हम न गए हूँ और लोगों को दावत दीन न दी हो, फ़रमाते कि ख़ास कर वह चौराहे और चाय की दुकानें जहां पर लोग जमा रहते हैं वहाँ देर तक बैठते और उन को तबलीग़ करते और रगबत दीन और जज़्बात पैदा करते धीरे धीरे आप की दावत वितबलग़ का असर ज़ाहिर हुआ और लोग वाबस्ता होने लगे जामिआ के लिए भी राहें हमवार हुईं इस के लिए आप ने सालाना इजलास का भी इनइक़ाद किया जिस में तलबा की फ़राग़त हुई और दस्तार दी गई उल्मा विमशाइख़ की आमद का सिलसिला शुरू हुआ और संयत और मसलक आली हज़रत को खूब फ़रोग़ मिला।

शहर की अक्सर मसाजिद बह्रुल-इरफ़ान की दौर अंदेशी और काविशों से सुनियों के कब्जे में आगईं आप ने जामिआ के तलबा को बुला तनख्वाह मस्जिद में इमाम रखा और बाज़ अइम्मा की तनख्वाह का इंतजाम अपने पास से किया।

हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान की मसाई जमेला और मुख़ालिफ़ीन :

जब शहर क़न्नौज में हज़रत की मसाई जमेला रंग लाने लगींतो देव बंदी और वहाबी मसलक के लोग चिराग पा होगभा नहों ने आप की मसाई पर क़दग़न लगाने की हर चंद कोशिशें की लेकिन ख़ुदा के इस बंदे के साथ जो नुसरत रबी और फ़ैज़ान औलिया रहा इस के सामने मुख़ालिफ़ीन नाकाम हुएइस तरह अल्हम्दुलिल्ला शहर की अक्सर मसाजिद सुनियों के पास आगईं 85 मस्जिदों में से सिर्फ़ दो महलों में चंद मसाजिद दोनों फ़िर्क़ों (देवबंदी और गैर मुक़ल्लिदीन ) की रही और उन महलों में भी बह्र उल-इरफ़ान केहसन अख़लाक़ औरदावत वितबलीग़ के जरिये संयत बढ़ने लगी।

तब्लीग़ी जमात पर पाबंदी

दयाबिना ने अपनी शातिराना चालों सेबहर उल-इरफ़ान के बढ़ते क़दम रोकने की हर मुमकिन कोशिश की जो

नाकाम हुई। तो उन्हों ने आप की दावत वितबलग़ रोकने के लिए अपनी जमात के सरबराह लोगों से मश्वरा किया और क़न्नौज में बाहर से ढाई सौ लोगों पर मुश्तमिल एक बड़ी जमात चार महीने के चले पर तबलीग़ के लिए बुलाई और इस को पूरे शहर में मन्सूबा बंद तरीके से जगह जगह फैलादिया और जबरदस्ती सुनियों के महलों और मस्जिदों और घरों में जा जा कर सुनियों को परेशान करने लगे ।हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान अलैहि अलरहम वालरिज़्वान ने अपनी फ़िक्रोतदबर से शहर के चुनिंदा अफराद को एतिमाद में ले कर अपने तलामज़ा और मुहबीन के जरिये देवबंदियों की इस बड़ी साजिश को भी नाकाम बना दिया ।

हज़रत के तरीके के मुताबिक जामिआ से चंद उल्मा विंबलग़ीन दावत दीन के लिए मुहल्ला बी बी चिमनी की मस्जिद में तबलीग़ के लिए गए तो वहाँ के कुछ देवबंदी अफराद ने उन को मस्जिद में बयान करने से रोक दिया और बहस व मुबाहिसा किया इस को लेकर शहर में चर्चा हुआ हालात नासाज़ बिन गएकाफी हंगामा हुआ पुलिस इंतिज़ामीया तक बात पहुँची दोनों फ़रीक़ों को बुलाया गया देवबंदियों ने अपनी बात रखी कि हमारी जमातें चार महीने के लिए यहाँ आएं हैं हम यहीं रुकीं गे और ऐसे ही अपने मिशन को पूरा करें गे इस पर सुनियों ने कहा कि ऐसा हरगिज़ नहीं होगा क्योंकि यह बैरूनी लोग यहाँ रहीं गे तो शहर का माहौल खराब हो गा और यह लोग सुनियों की मस्जिदों और मुहल्ले में जाएँ गे और अपनी तालीमात दूसरे मसलक के लोगों पर थोपें गे इस तरह लड़ाई बढ़े गी निजाम शहर दिरहम ब्रह्म होगा इस पर पुलिस इंतिज़ामीया ने दयाबिना को कड़ी फटकार लगायी कि तुम लोगों को बाहर से बुला कर शहरियों को परेशान कर ते हो,माहौल खराब करते हो लहज़ा जमात को यहाँ से भेज देना चाहिए. पहले दिन की नशिस्त हुई पुलिस ने जमात कोही फसाद का सबब करार दिया और उन को शहर छोड़ कर जाने के लिए कहा, इस के बाद देवबंदी वहाबी फिराकट्ठा हुए। दूसरे दिन मीटिंग की गई इस में भी दोनों फ़रीक़ जमा हुए दयाबिना, वहाबिय आस पास के इलाकों ,फ़र्ख़ आबाद वगैरह से भी आये और पुलिस पर जोर बनाया पैसे का लालच दयाताकि फैसला उन के हक़ में होजाए।

उधर बह्रुल-इरफ़ान के मुहबीन ने मामले की नज़ाकत को और उनकी शैतानी चाल को जान लियाफ़ौरन बह्र उल-इरफ़ान के शागुर्दो जामिआ के उस्ताद हज़रत मौलाना हाफ़िज़ शाहिद साहिब मुजद्दिदी और हाजी मुईन साहिब हाजी शमशाद वगैरह ने दरोगा से कहा कि मसला शहर का है तो यह बैरूनी लोग फैसले करने क्यों आये हैं निज़ाअ की जुड़ तो बैरूनी लोगों काजमाअत का शहर में आना है इस पर मज़ेद यह बैरूनी लोग मसले को भड़काने लगे हैं ।