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अध्याय 19 में से 22पृष्ठ 217–228

विलायत इलिया

जब इंसान विलायत कुबरा के दायरे को तमाम कर लेता है तो उसे विलायत इलिया का दायरा मशहूद होता है यह चौथा दायरा है इस दायरा में असम अलबातिन में सैर होती है जैसा कि इस से पहले असम अलजाहिर में सैर थी,हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू अपने फ़रज़न्द अकबर सय्यदना ख़्वाजा मुहम्मद सादिक क़ुद्दिस सिर्रहू को मक्तूब 260 में इस सैर का हाल ज़िक्र करते हुए फ़रमाते हैं:

‘‘ए फ़रज़न्द!सैर असम अलबातिन के बारे में किया लिखे कि इस सैर के बारे में हाल इस्तता र व तबतन है,इस क़द्र इस मक़ाम से ज़ाहिर करता हूँ कि असम अलजाहिर में सैर सिफ़ात में सैर है बग़ैर इस के कि उन सिफ़ात के ज़िमन में ज़ात तआला मलहूज़ हो,और असम अलबातिन में सैर भी हर चंद असमा में सैर है लेकिन उन के ज़िमन में ज़ात तआला मलहूज़ है और वह असमा ढालों के मसल हैं जो कि हज़रत ज़ात तआला वितक़दस के लिए रुपोश बिन गए मिसाल के तौर पर सिफ़त अलालम में ज़ात तआला बिलकुल मलहूज़ नहीं है और असम अलालीम में ज़ात तआला मलहूज़ है सिफ़त के पस पर्दा ज़ात तआला मलहूज़ है क्योंकि अलीम इस ज़ात को कहते हैं जिस को इल्म है पस इल्म में सैर असम अलजाहिर में सैर है और अलीम में सैर असम बातिन में सैर है,इसी पर बाक़ी असमा और सिफ़ात को

कयास कर लीजिए।’’

और यह असमा जो कि असम अलबातिन से ताल्लुक रखते हैं मिला आला कि मलाइका के मुबादी तैनात हैं अला नबीना वालैम अस्सलवात वालतहयात,उन असमा में सैर शुरू करना विलायत इलिया में क़दम रखना है जो कि मिला आला की विलायत है,असम अलजाहिर और असम अलबातिन के बयान में इल्म और अलीम के दरमियान में जो फ़र्क़ है इस फ़र्क़ को थोडा ख़याल न करें और न कहू कि इल्म से अलीम तक थोडा रास्ता है,नहीं! बल्कि जो फ़र्क़ मरकज़ खाक और मुहदब (कबा) अर्श के दरमियान है इस फ़र्क़ की निस्बत दरयाय मुहीत की निस्बत क़तरा का हुक्म रखता है कहने में क़रीब है और हासिल हो ने में दौर।

और इसी क़बील से है उन मुक़ामात का ज़िक्र जिन का ज़िक्र इजमाला हुआ मसला कहा गया है कि आलम अम्र के पंजगाना को तै कर के उन के उसूल में सैर करे ताकि दायरा इमकान तमाम हो जाए,इस इबारत में पूरी सैर अला अल्लाह ज़िक्र कर दी गई और इस सैर के हुसूल को पचास हजार साल की मुद्दत के साथ मुक़रर किया है,हां! यह हो सकता है कि इनायत ख़ुदावंदी की कशिश से क़रीब है कि इस लंबी मुद्दत के काम को पलक झपकते मयस्सर करदे؏

बा क्रीमां कारहा दुश्वार नेस्त

इसी तरह कहा गया है कि दायरा असमा व सिफ़ात व शेवन व एतबारात को तै कर के उन के उसूल में सैर करे,जमी असमा वस्फ़ात व शेवन व एतबारात कहने में आसान हैं और तै करने में बहुत मुश्किल हैं,इस तै की दुश्वारी की वजह से मशाइख़ ने फ़रमाया है‘‘मनाज़िल अलूसूल ला तन्क़ते अब्द अलाआ बद्दीन’’यानी वसूल की मंजिलें कभी भी ख़त्म नहीं होती हैं,और उन मुरातिब की पूरी सैर को मना फ़रमाया है।’’(मक्तूब 260 मा इख़तिसार)

विलायत इलिया के कमालात:

हज़रत सय्यदना शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू इस विलायत के कमालात के बारे में फ़रमाते हैं:‘‘इस विलायत में सिवाए अंसर खाक के बाक़ी तीन अनासिर(आग,हुआ,पानी) से काम पड़ता है,इस जगह इस ज़ात का मुराक़बा करते हैं जो कि मुसम्मी है हवालबातिन की,ज़िक्र तहलीली और नमाज़ इस जगह तरक्की बख्शते हैं और तवज्जो व हुज़ूर व उरूज व नुज़ूल अनासिर सलासा को हासिल हो ते हैं,कभी बदन एक चश्म निगरां के महसूस होता है और सुलतान अलाज़कार के वक़्त में कि मुबतदियों को हासिल होता है और बदन को सफ़ाई देता है वह सफ़ाई दूसरी है और यह अनासिर का तसफ़ीया दूसरा है,हालात व कैफियात इस जगह लताफ़त व नज़ाकत के साथ हैं।

अजीब वसात व कुशादगी बातिन में पैदा होती हैऔर मिला आला के साथ मुनासबत हासिल होती है,हो सकता है कि मलाइका कराम ज़ाहिर होना शुरू करें और जो इसरार छिपाने के लायक हैं मालूम हूँ।

इस मक़ाम में रुखसत पर अमल अच्छा नहीं है क्योंकि रुखसत पर अमल आदमी को बशरियत की तरफ़ खींचता है और अज़ीमत पर अमल मुल्कीयत के साथ मुनासबत पैदा करता है पस जिस क़द्र मलकियत के साथ मुनासबत ज़्यादा होगी इसी क़द्र इस विलायत में जिल्द तरक्की हासिल हो गी।’’

आप गुज़शता औराक़ में पढ़ चुके हैं कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक आलम ख़ल्क़ को आलम अम्र पर फ़ज़ीलत हासिल है,उन तीनों विलायात की तफ़सीलात पढ़ने से यह बात अच्छी तरह जेहन नशीन हो गई हो गी कि आलम अम्र के लताइफ़ से विलायत सुग़रा तक काम पड़ता है इस के बाद विलायत कुबरा में भी दर असल मौरिद फ़ैज़ लतीफ़ा नफ़्स होता है और इस विलायत में काम अनासिर से पड़ता है,इस से ज़ाहिर हुआ कि तरीका

नक़्शबंदिया में जो आलम अम्र से आगाज़ कर के आलम ख़ल्क़ की तरफ़ आते हैं इस में तरतीब तिब्बी यानी अदना से आला की तरफ़ तरक्की मलहूज़ है।

विलायत सह गाना में वजूह फ़र्क़:

मज़कूरा बाला तकरीर से आप ने तीनों विलायतों को समझ लिया होगा कि विलायत सुग़री की जहां इन्तहा हो ती है वहाँ से विलायत कुबरा का आगाज़ हो ता है और जहां और जिस जगह से विलायत कुबरा की इन्तहा होती है इस जगह से विलायत इलिया का आगाज़ होता है,पस ख़ुदावंद क़ुद्दूस के नज़दीक तर विलायत इलिया है फिर विलायत कुबरा और फिर विलायत सुग़रा।

विलायत सुग़रा विलायत ज़ुली है और कुबरा असली अव्वल में तजल्ली बर्क़ी ज़ाहिर होती है और दोम में तजल्ली दाइमी क्योंकि इनफ्स व आफ़ाक़ के आईनों में जो भी ज़ाहिर होता है वह सब दाग ज़लीयत से दागदार है लिहाज़ा लायक नफ़ी है ताकि असल का इस्बात हो सके और जब मामला इनफ्स व आफ़ाक़ से उपर जाता है तब ज़लीयत से छुटकारा हासिल होता है।

दायरा ज़लीयत इनफ्स की इन्तहा से मनतही हो जाता है पस आफ़ाक़ व इनफ्स में जो भी ज़ाहिर होगा वह ज़ुली हो गा व लिहाज़ा जो तजल्ली भी वहाँ ज़ाहिर होगी वह ज़ुली हो गी अगर चह उसे कोई फेअल वस्फ़त की तजल्ली समझे मगर दर हक़ीक़त इस का ताल्लुक फेअल व सिफ़त के ज़लाल से होगा,ख़याल रहे तजल्ली बर्क़ी भी उन लोगों को मयस्सर आती है जो दायरा ज़ुल की इन्तहा पर होते हैं,निहायत कमाल विलायत ज़ुली यानी सुग़रा में तजल्ली बर्क़ी है और यही तजल्ली बर्क़ी विलायत कुबरा के भी क़दम अव्वल में शुमार होती है,और जब मुकम्मल तौर पर ज़लीयत से छुटकारा हासिल हो जाता है और असल तक रसाई हासिल हो जाती है तो यही तजल्ली मज़कूर उन के लिए दाइमी हो जाती है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:‘‘यह फ़क़ीर इतना जानता है कि निस्बत व हुज़ूर

नक़्शबंदिया जब कमाल को पहुँचता है तो विलायत कुबरा से पैवस्त होजाता है और इस विलायत से हज़ वाफ़र हासिल करता है,इस के बरख़िलाफ़ दीगर तरीकों में कि निहायत कमाल तजल्ली बर्क़ी तक है।’’

विलायत सुग़रा और कुबरा में एक फ़र्क़ यह भी है कि सालिक जब तक दायरा ज़ुल में रहता है वहम व ख़याल से छुटकारा हासिल नहीं हो पाता है और जब इस से निकल गया तो वहम व ख़याल से निजात हासिल हो गई।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इरशाद फ़रमाते हैं:‘‘जानना चाहिए कि जो सैर आफ़ाक़ व इनफ्स के सैर के बाद मयस्सर होती है वह हक़ तआला की अक़्रबीयत में सैर है क्योंकि अल्लाह तआला का फेअल हम से ख़ुद हम से नज़दीक तर है यानी जितना कि हम ख़ुद अपने आप से क़रीब हैं इस सत ज़्यादा क़ुरबत फेअल हक़ को हम से है,इसी तरह हक़ तआला की सिफ़त हम से और फेअल हक़ ख़ुद हम से अक़्रब है और इस की ज़ात ख़ुद हम से और इस के फेअल व सिफ़त से क़रीब तर है,पस उन मुरातिब में सैर,अक़्रबीयत में सैर है।

तजल्ली फेअल,तजल्ली सिफ़त,तजल्ली ज़ात इस मक़ाम में साबित होती हैं और ग़लबा वहम व ख़याल से इस जगह निजात हासिल हो जाती है क्योंकि वहम व ख़याल के ग़लबा को दायरा आफ़ाक़ व इनफ्स के बाहर सल्तनत हासिल नहीं,वहम की इन्तहा ज़ुल की इन्तहा तक है,जिस जगह ज़ुल न होगा वहम न होगा पस लामुहाला कैद वहम से छुटकारा विलायत ज़ुली में मौत के बाद मयस्सर होगा कि वहम का रुख अदम की तरफ़ होजाता है,और विलायत असली में कि विलायत कुबरा है वहम व ख़याल की कैद से खुलासी इसी दुनिया में मयस्सर आजाती है,वहम के मौजूद होते हुए वहम से आजादी होती है जो कुछ पहले गिरोह को आख़िरत में है दूसरे को इसी जगह मयस्सर है,विलायत ज़ुली में इस दुनिया में मतलूब का हुसूल वहम व खयाल की गर्दिश के अलावा नहीं है और विलायत असली में मतलूब गर्दिश वहम की इल्लत से मुनज़्ज़ह और मुबर्रा

है।’’(मक्तूब 3 दफ्तर दोम)

विलायात सह गाना में मज़ेद फ़र्क़ आइंदा तहरीरात में वाज़िह हो जाए गा।

तीसरी ख़ुसूसीयत:

मुजद्दिदी तरीक़ की एक ख़ुसूसीयत यह भी है कि इस के बुलंद परवाज़ सालकेन पर तीन किस्म के कमालात मुनकशिफ़ होते हैं(1)कमालात नुबुव्वत(2)कमालात रिसालत(3)कमालात ओलवालाज़म,हम इस सिलसिले में तफ़सील सुपुर्द कलम करना चाहते हैं ताकि आप के जेहन में क़ुर्ब विलायत,क़ुर्ब नुबुव्वत और उन के कमालात अच्छी तरह जेहन नशीन हो जाएँ जिस से राह सुलूक के मुसाफ़िरेन बहुत सारे अक़्वाल व इर्शादात का महल और मक़ाम नुबुव्वत व रिसालत की बुलंदी शान और उन के कमालात के हामिलियन औलिया कराम की अज़मत वरीअत के सिलसिले में धोका न खायें।

क़ुर्ब नुबुव्वत और क़ुर्ब विलायत:

विलायत दरअसल इस क़ुर्ब इलाही का नाम है जो ज़लीयत की आमेज़िश के बग़ैर मुतस्व्वर नहीं हो सकता है और हिजाबात के हाइल हुए बग़ैर हुसूल कबूल नहीं करता है क्योंकि अगर विलायत ओलिया है तो वह दाग ज़लीयत से दागदार और अगर विलायत अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात है तो यह अगर चह ज़लीयत के दायरा से बाहर है लेकिन इस में भी असमा व सिफ़ात के हिजाबात हाइल हो ते हैं बग़ैर इस हैलोलित के इस विलायत का तहक़्क़ नहीं हो सकता है और विलायत मिला आला अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात अगर चह असमा वस्फ़ात के हिजाबात से बुलंद है लेकिन शेवन व एतबारात ज़ातीय के पर्दे यहाँ भी मौजूद हैं ग़रज़कि इस विलायत में भी उन के बग़ैर चारा नहीं।

जबकि नुबुव्वत इस क़ुर्ब असली का नाम है जो ज़लीयत का शाइबा और आमेज़िश न रखता हो और सिफ़ात व एतबारात के हिजाबात को राह में छोड़ दिया हो,इस के उरूज का रुख हक़ की

तरफ़ होता है और नुज़ूल का ख़ल्क़ की तरफ़ यह क़ुर्ब बालासाल अनबया कराम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात का नसीब है और यह मन्सब उन्हें बुजुर्गों के साथ मख़सूस है,इस मन्सब के ख़ातिम सय्यद अलबशर ﷺ हैं इसी लिए हज़रत ईसा रूह अल्लाह अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम नुज़ूल के बाद आप की शरीअत की इत्तिबा करें गे।

हां! मगरात्तिबा करने वालों और ख़ादिमों को साहिबान दौलत हज़रात के टुकड़े और उन के ख़ूर्दा का बाक़ी मांदा मिल जाताहै लिहाज़ा अनबया कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात के कामिल ताबईन को भी हिस्सा मिलता है और इस मक़ाम के उलूम व मआरिफ़ और कमालात बितरीक़ विरासत उन के मुतबईन का भी नसीब होते हैं,इस से आप ने यह समझ लिया होगा कि कमालात नुबुव्वत का वसूल बितरीक़ विरासत व तबईत ताबईन को ख़ातिम अलर्सल ﷺ की बिअसत के बाद आप की खातमीयत के मुनाफ़ी नहीं है।

दोनों क़ुरबों में वजूह का फ़र्क़:

जब सालिक विलायत इलिया का दायरा तमाम कर लेता है पस अगर इनायत ख़ुदावंदी शामिल हाल है तो दायरा कमालात नुबुव्वत में सैर मयस्सर आती है लिहाज़ा यह राह ख़ुदावंद क़ुद्दूस से क़रीब तर हुई विलायत की ब निस्बत इस लिए कि विलायत में शाइबा ज़लीयत होता है या दीगर हिजाबात जैसा कि आप पढ़ चुके हैं जबकि नुबुव्वत में कोई चीज़ हाइल नहीं होती है तो नुबुव्वत विलायत से अफ़ज़ल हो ई और नुबुव्वत का क़ुर्ब असली और ज़ाती हुआ।

इस से मालूम हुआ कि नुबुव्वत में वसूल होता है और विलायत में हुसूल क्योंकि हुसूल ज़लीयत के मुलाहिजा के बग़ैर को ई सूरत नहीं रखता है इस के बुर खिलाफ़ वसूल क्यों कि इस में मुलाहिजा कुछ भी दरकार नहीं ।

सोम यह कि कमाल हुसूल में रफा असनैनीत है यानी दोई का ज़वाल हो जाता है और कमाल वसूल में बका असनैनीत है पस दोई का ज़वाल मक़ाम विलायत के मुनासिब है

पस सकर ला मुहाला मक़ाम विलायत को लाज़िम हो गा और मर्तबा नुबुव्वत में दोई की बका रहती है इस लिए सहव इस मर्तबा के ख़वास से होगा।

चहारम तजल्लियात का हुसूल ख़्वाह सूर व इशकाल के लिबास में हो या ख़्वाह अलवान व अनिवार के पर्दों में सब मक़ाम विलायत में और इस के मुक़द्दमात व मुबादी तै करने में है इस के बरख़िलाफ़ मर्तबा नुबुव्वत में वासल के साथ वसूल होता है और तजल्लियात व ज़हूरात से इस्तिग़ना क्योंकि यह उमूर इस असल के ज़लाल हैं और जब असल से वसूल है तो ज़ुल से किया ताल्लुक?

ख़याल रहे जिस तरह मर्तबा नुबुव्वत में तजल्लियात व ज़हूरात की कुछ हाजित नहीं इसी तरह इस के मुक़द्दमात व मुबादी तै करने में भी उन की एहतियाज नहीं है,हां! अगर उरूज राह विलायत से वाक़्य हो तो इस विलायत की वजह से उन तजल्लियात का हुसूल होगा,राह वसूल नुबुव्वत की मुसाफ़त तै करने की वजह से नहीं।

खुलासा यह कि तजल्लियात व ज़हूरात सब ज़लाल की खबर देते हैं जो ज़लाल की गिरफ्तारी से आजाद हो गया वह तजल्लियात से छुटकारा पा गया,‘‘माज़ाग अलबसर’’ का भेद इसी जगह ज़ाहिर होता है।

मालूम होना चाहिए कि मुहब्बत की शोरिश और इश्क का वलवला,शौक अंगेज़ नारे,दर्द आमेज़ आहें,वज्द व तवाजदावर रक़्स व रक़ासी सब मुक़ामात ज़लाल और ज़हूरात व तजल्लियात ज़लीय के औकात में है,असल से वसूल के बाद उन उमूर का हुसूल मुतस्व्वर नहीं है इस महल में मुहब्बत बमाना इरादा ताअत है जैसा कि उलमा ने फ़रमाया है,इरादा ताअत से ज़ाइद कोई माना मुराद नहीं जो कि शौक व ज़ौक़ का मंशा हूँ जैसा कि बाज़ सूफ़िया ने समझा है।

फायदा:

आप पढ़ चुके कि मक़ाम विलायत में चूंकि दोई का ज़वाल मतलूब होता हैइस लिए नाचार औलिया कराम ज़वाल इरादा की कोशिश करते हैं हज़रत सुलतान उलारफ़ैन बायज़ीद बस्तामी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:‘‘अरीद उन ला अरीद ’’ और मर्तबा नुबुव्वत में चूंकि दोई का ज़वाल दरकार नहीं होता है इसी लिए नफ़्स इरादा का ज़वाल भी मतलूब नहीं।

इसी तरह मक़ाम विलायत में तमाम सिफ़ात बश्री की नफ़ी की कोशिश करते हैं और मर्तबा नुबुव्वत में असल सिफ़ात की नफ़ी नहीं करते हैं बल्कि बुरे मुताल्लिक़ात की नफ़ी करते हैं,हां! यह ध्यान रहे कि सिफ़ात बशरियत की नफ़ी विलायत ज़ुली यानी विलायत सुग़रा में होती है मगर जब सालिक विलायत कुबरा की हदों में दाखिल हो जाता है तो ज़लीयत से निजात पा जाता है लिहाज़ा वहाँ नफ़्स सिफ़ात की नफ़ी नहीं होती है।

पंजिम फ़र्क़ यह है कि मक़ाम विलायत में दुनिया और आख़िरत दोनोन से हाथ धोना पड़ता है और आख़िरत की गिरफ्तारी को दुनिया की गिरफ्तारी की तरह शुमार किया जाता है,दर्द आख़िरत को दर्द दुनिया की तरह अच्छा नहीं समझा जाता ह,हासिल यह कि फना जो कि हक़ के मासवा को भूल जाने और फ़रामोश कर देने का नाम है वह दुनिया और आख़िरत दोनों को शामिल है और फना व बका दोनों विलायत के जुज़ हैं पस विलायत में आख़िरत का निस्यान ज़रूरी है।

और मर्तबा नुबुव्वत में आख़िरत की गिरफ्तारी महमूद ,दर्द आख़िरत पसंदीदा व मकबूल है बल्कि इस महल में दर्द दर्द आख़िरत है और गिरफ्तारी आख़िरत की गिरफ्तारी है उन बुज़ुर्गवारों का गर्ये व नाला अहवाल आख़िरत याद करने के सबब है उन का रंज व ग़म अहवाल कयामत के डर की वजह से है,यह हमेशा फ़ित्ना कब्र से पनाह चाहते हैं और अज़ाब नार से

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।में चाहता हूँ कि मेरा इरादा ख़त्म हो जाए।

छुटकारे के जोयाँ रहते हैं और इस के लिए गुड़ गड़ाते हैं,हक़ सुब्हानहू का दर्द उन के यहाँ दर्द आख़िरत है और उन का शौक व मुहब्बत आख़िरत का शौक व मुहब्बत है।

इस की वजह यह है कि अगर लिक़ा है तो आख़िरत के वाअदे पर और अगर रज़ा है तो इस का कमाल भी आख़िरत पर मौक़ूफ़ है इस लिए कि दुनिया अल्लाह तआला की मबगौज़ है और आख़िरत इस की मर्जी व पसंदीदा,मबगौज़ को मर्जी (पसंदीदा) के साथ किसी चीज़ में बराबर नहीं कर सकते हैं क्योंकि मबगौज़ काबिल आराज़ है जबकि मर्जी लायक इकबाल व तवज्जो,मर्जी से आराज़ करना उएन कुफ्र है और अल्लाह तआला के मदऊ व मर्ज़ा के खिलाफ़,अल्लाह तआला का इरशाद है:‘‘वाल्लाह यदाव अला दार अस्सलाम’’

ख़याल रहे कि जिन बुजुर्गों ने तर्क आख़िरत के लिए फ़रमाया है उन के सब इर्शादात मक़ाम विलायत से नाशी हैं इस की क़दरे तफ़सील देखना हो तो मक्तूब 302 दफ्तर अव्वल मुलाहिजा कीजिए,नीज़ ध्यान रहे कि तवस्सुत अहवाल में मक़ाम फना में दुनिया व आख़िरत का निस्यान मयस्सर आता है और आख़िरत की गिरफ्तारी को दुनिया की तरह जानता है लेकिन जब सालिक बका से मुशर्रफ़ होता है और काम अंजाम पज़ीर होता है और कमालात नुबुव्वत अपना परतो दालते हैं इस वक़्त सब दर्द आख़िरत होता है।

कमालात नुबुव्वत तक पहुँचाने वाले रास्ते:

कमालात नुबुव्वत तक पहुँचाने वाले रास्ते दो हैं एक यह कि मक़ाम विलायत के तमाम कमालात बालतफ़सील तै किए जाएँ,यह रास्ता तजल्लियात ज़लीय और मआरिफ़ सक्रिय जो कि मर्तबा विलायत के मुनासिब है के हुसूल से वाबस्ता है उन कमालात को तै करने और उन तजल्लियात को हासिल करने के बाद कमालात नुबुव्वत में क़दम रखना मयस्सर आता है इस मक़ाम में असल के साथ वसूल मयस्सर आता है और ज़लीयत की तरफ़ इलतिफ़ात गुनाह शुमार हो ती है।

दूसरी राह वह है कि उन कमालात विलायत के वास्ते के बग़ैर कमालात नुबुव्वत तक वसूल मयस्सर आजाए यह दूसरा रास्ता शाहराह की हैसियत रखता है और वसूल में अक़्रब है आम तौर पर जो लोग कमालात नुबुव्वत तक पहुँचे हैं वह इसी राह से वासल हुए हैं ख़्वाह अनबया कराम हूँ या उन की तबईत व विरासत में उन के अस्हाब कराम।

पहला रास्ता बहुत दौर दराज़ है और हुसूल के लिहाज से दुश्वार और वसूल के लिहाज से मुताज़र ,हां! यह हो सकता है कि किसी शख्स को पहले रास्ते से वसूल हासिल हो और विलायत व नुबुव्वत के तमाम कमालात मुफ़स्सिला मयस्सर आजाऐं और उन दोनों मुक़ामों के कमालात में मुकम्मल इमतियाज़ भी हासिल कर ले और हर एक के उरूज व नुज़ूल को जुदा करले,जो शख्स उन दोनों मुक़ामों से और उन के कमालात से वाकिफ़ होगा इस की नज़र में नबी की विलायत से इस की नुबुव्वत बेहतर हो गी।

फायदा:

जो शख्स दूसरी राह से मर्तबा नुबुव्वत तक वसूल हासिल करे गा उसे विलायत के तफ़सीली कमालात अगर चह हासिल न हो सकें गे लेकिन उन का खुलासा बोजह अहसन मयस्सर आजाता है बल्कि कहा जा सकता है कि अहले विलायत को कमालात विलायत से छिलका हासिल हुआ और इस (इस कमालात नुबुव्वत के) वासल ने मग़ज़ हासिल किया,हां! बाज़ उलूम सक्रिय और ज़हूरात ज़लीय जो कि अर्बाब विलायत को हासिल हो ते हैं यह वासल उन उलूम वज़होरात से क़लील अलंसीब होता है लेकिन यह चीज़ अर्बाब विलायत के लिए इस वासल पर फ़ज़ीलत का सबब नहीं बिन सकती है बल्कि वह वासल उन उलूम व ज़हूरात से क़लील अलंसीब होता है लेकिन यह चीज़ अर्बाब विलायत के लिए इस वासल पर फ़ज़ीलत का सबब नहीं बिन सकती है बल्कि वह वासल उन उलूम व ज़हूरात से शरह करता है वह ऐसी जगह पर होता है कि

ऐसे उलूम व ज़हूरात को गुनाह और बे अदबी तसोर करता है

क्योंकि जो असल से वासल हो गा वह इस असल के ज़लाल से हमेशा गुरेज़ां और मुतनफ़र होगा,ज़लाल के साथ गिरफ्तारी इसी वक़्त तक है जब तक असल से वसूल न हो जब असल से वसूल हो गया तो ज़ुल बे फायदा है और ज़ुल की तरफ़ तवज्जो बे अदबी।