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अध्याय 16 में से 22पृष्ठ 185–196

लताइफ़ की तफ़सील

आप पहले पढ़ चुके हैं कि कायनात के मजमूआ को आलम कबीर कहते हैं ख़ल्क़ हो या अम्र, जिस तरह लताइफ़ आलम ख़ल्क़ के उसूल आलम कबीर में अर्श के नीचे मौजूद हैं इसी तरह आलम अम्र के लताइफ़ के उसूल आलम कबीर में अर्श के उपर मौजूद हैं।

ख़ुदावंद क़ुद्दूस ने जब इरादा फ़रमाया कि बार खिलाफत इंसान पर डाला जाए तो इंसान अपनी कमज़ोरी व ज़ईफी के सबब इस अज़ीम बार का मुतहम्मिल न हो सकता था लिहाज़ा आलम ख़ल्क़ व अम्र के अजज़ा से मिला कर इंसान की तरकीब फ़रमाई और इस को ज़ाहिर व बातिन और अम्र व ख़ल्क़ का जामा बनाया इसी वजह से इंसान अशरफ अलमख़लूकात हो गया।

और इंसानी बदन की चंद जगहों से आलम अम्र के लताइफ़ को मुहब्बत व इश्क बख्शा चों कि यह लताइफ़ अनिवार मुजर्दा थे, इस इंसानी ज़ुल्मत कदा में आकर अपने आप को और अपनी असल को फ़रामोश कर बैठे और कदूरत की वजह से क़रीब होने के बावजूद अल्लाह इज़ विजल से दौर जा पड़े। मशाइख़ नक़्शबंदिया इसी लिए उन लताइफ़ अम्र पर तवज्जो डालते हैं नीज़ अज़कार व औराद की भी तलक़ीन करते रहते हैं ताकि यह लताइफ़ अपने उसूल याद करके फिर उन की तरफ़ उरूज करें और फना व बका हासिल करें।

लतीफ़ा क़ल्ब:

लतीफ़ा क़ल्ब का महल बाएं स्तान से दो अंगुल नीचे माइल ब पहलू एक गोश्त का लोथड़ा है जिस को क़ल्ब सनोबरी कहते हैं सनोबर एक फल को कहते हैं चों कि सनोबर

की तरह इस की शक्ल औंधी होती है और क़ल्ब भी अरबी में उलटे हुए को कहते हैं, इस लतीफ़ा का नूर जर्द है।

क़ल्ब के दो इतलाक़:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते कि अर्बाब विलायत क़ल्ब बोल कर इंसान की हक़ीक़त जामिआ मुराद लेते हैं जो आलम अम्र से है इस मानी कर यह एक लतीफ़ा ग़ैबेह है जिस की तजल्ली गाह वही क़ल्ब बमानी पारे गोश्त है जिस की तफ़सील सुतूर बाला में मज़कूर हुई।

और बज़बान नुबुव्वत क़ल्ब इस पारे गोश्त को कहते हैं जिस की दुरुस्तगी के साथ बदन इंसान की दुरुस्तगी और इस के फसाद से बदन का फसाद वाबस्ता है यह आलम ख़ल्क़ से है इतलाक़ अव्वल के ऐतबार से जो ज़ुहूर क़ल्ब से मुताल्लिक़ है अर्श के ज़ुहूर ताम की बनिस्बत सिर्फ़ एक परतो है इस मक़ाम में फजल कली सिर्फ़ अर्श के लिए और वह वसात व फ़राखी जो इस हदीस क़ुदसी:

लायसानी अर्ज़ी व ला समाई व लाकन यसानी क़ल्ब अबदी उलमोमिन

मेरी गुंजाइश न मेरी जमीन रखती है न आसमान लेकिन मेरे मोमिन बंदे का क़ल्ब रखता है।’’

में बयान हुई है इस का ताल्लुक पारे गोश्त से है इस इतलाक़ के ऐतबार से क़ल्ब में अर्श की बनिस्बत ज़ुहूर उत्तम है इसी ऐतबार से वह अहदेत मुजर्दा का आईना बना है, अर्श के लिए अगरचे ज़ुहूर ताम यानी ज़ुहूर असल से वाफ़र हिस्सा है लेकिन इस मक़ाम में सिफ़ात की आमेज़िश है और सिफ़ात चों कि हज़रत ज़ात के ज़लाल हैं इस लिए यह ज़ुहूर ज़लीयत की आमेज़िश से खाली नहीं।

इसी लिए कहागया है कि अर्श को ज़ुहूर इंसानी से जो कि असल सिर्फ़ से ताल्लुक

रखता है बहुत सी उम्मीदें वाबस्ता हैं और इस मामला का मरकज़ भी इंसान है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि क़ल्ब इस मानी कर तंग भी बहुत है और वसीअ भी बहुत, तंग तो इतना है कि जज़ ला यतजज़ा जो बहुत हक़ीर जुज़ है, इस क़ल्ब के मुकाबले में बाज़ औकात आसमानों और ज़मीनों के तबक़ात की तरह अज़ीम दिखाई देता है इस की यह तंगी इस वजह से है कि हक़ सुब्हानहू के मासवा की इस में गुंजाइश नहीं और वसीअ इतना कि कि अर्ज व समा इस के मुक़ाबिल कुछ हैसियत नहीं रखते यह वसात इस की वजह से है कि इस में अनिवार क़दम का ज़ुहूर बालजुमला क़ल्ब आलम ख़ल्क़ से होने के लिहाज से इस क़ल्ब से अफ़ज़ल है जो आलम अम्र से है जिस से हक़ीक़त जामिआ मुराद है क्यों कि आप पढ़ चुके हैं कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस रह के नज़दीक आलम ख़ल्क़ आलम अम्र से अफ़ज़ल है, आप फ़रमाते हैं:

इस पारे गोश्त की हक़ीक़त मुझ से सुनो, अवाम का तो यह पारे गोश्त अनासिर अर्बा की हक़ीक़त से बना है और ख़वास बल्कि अख़स ख़वास का यह पारे गोश्त वह है जो सुलूक व जज्बा, तसफ़ीया व तज़किया, तमकीन क़ल्ब, इतमीनान नफ़्स के बाद बल्कि महज़ फजल ख़ुदावंदी से अजज़ा अशरा से तरकीब पाकर एक मख़सूस सूरत में बना है।

अजज़ाए मज़कूरा अगरचे आपस में मुतज़ाद व मुतबाइन हैं लेकिन अल्लाह तआला की कुदरत कामला से उन का आपसी तज़ाद ज़ाइल होगया और सब के इजतिमा से एक वहदानी हैसियत व सूरत हासिल कर ली है इस मामले में जुज़ु आज़म अंसर खाक है यह वहदानी सूरत व हैयत भी जुज़ु खाकी के रंग में ज़ाहिर हुई है और खाक ही से करार पाया।

हज़रत इब्राहिम खलील अल्लाह अला नबीना व अलैहि अस्सलात वस्सलाम ने जिस इतमीनान कलबी का सवाल किया था वह यही पारे गोश्त है नीज़ हुज़ूर सर्वर कौन व मकां ﷺ ने बाज़ दुआओं में जिस क़ल्ब का सबात तलब किया है वह यही है।

दोनों में वजूह फ़र्क़:

क़ल्ब के उन दोनों इतलाक़ में कई वजूह से फ़र्क़ है अव्वल यह कि हक़ीक़त जामिआ जो कि आलम अम्र से है इस को तसफ़ीया व तज़किया के बाद तमकीन ताम मयस्सर आजाती है इस के बरख़िलाफ़ पारे गोश्त कि इस का इतमीनान इदराक हवास से वाबस्ता है जब तक किसी क्षे को हवास से इदराक न करे बे करारी रहती है।

दोम यह कि हक़ीक़त जामिआ ज़िक्र का असर कबूल करती है और जब ज़िक्र तक पहुँचती है तो ज़िक्र के साथ मुत्तहिद हो जाती है और ज़िक्र के साथ क़ायम हो जाती है इस मक़ाम को साहिब अवारिफ़ क़ुद्दिस सिर्रहू ने रोशन तर मक़ाम कहा है और क़ल्ब के इस मक़ाम को ज़िक्र ज़ात से ताबीर किया है इस के बरख़िलाफ़ पारे गोश्त कि ज़िक्र के लिए इस की तरफ़ कोई राह नहीं है ज़िक्र से असर पज़ीर होना और ज़िक्र के साथ क़ायम होना तो बाद की बात है, हां इस पारे गोश्त में बालासालित मज़कूर जलवा फ़रमा है और ज़ाहिर है ज़लीयत का वहाँ शाइबा नहीं और ज़िक्र के उरूज की इन्तहा मज़कूर की दहलीज़ है।

सोम यह कि हक़ीक़त जामिआ जब नहाय अलनहाय तक पहुँचती है और विलायत खासा से वाफ़र हिस्सा हासिल कर लेती है ऐसी सूरत में अगर मतलूब की आईना दार बिन जाए तो ज़ाहिर इस में मतलूब का ज़ुल होगा उएन मतलूब ज़ाहिर न होगा जैसे आईने में शख्स की मिसाल ज़ाहिर होती है उएन शख्स ज़ाहिर नहीं होता है बख़िलाफ़ पारे गोश्त के इस में जो कुछ ज़ाहिर होता है उएन मतलूब है ज़ुल नहीं इस लिए हदीस में यह अलफ़ात फ़रमाए गए यसानी क़ल्ब अबदी उलमोमिन यह मामला नज़र व फ़िक्र से बुलंद है।

चहारम यह कि हक़ीक़त जामिआ की वसात इस ऐतबार से है कि इस में अश्या की सूरतों का ज़ुहूर है और पारे गोश्त की वसात जो इस की तंगी के बाद सामने आती है मतूब की गुंजाइश के ऐतबार से है जो लामहदूद और गैर मुतनाही है और वह तंगी दर असल

इस की तंग दहलीज़ है जिस की वजह से हक़ के मासवा को घुसने की गुंजाइश नहीं मिलती हतिया कि ज़िक्र को भी नहीं छोड़ती कि मज़कूर के पर्दा में दाखिल हो न ही शाइबा ज़लीयत को इस ख़ाना मुक़द्दस के गिर्द घूमने दे ग़रज़कि यह पारे गोश्त कोई मामूली चीज़ नहीं बल्कि निहायत कीमती जौहर है जिस में आलम ख़ल्क़ के ख़ज़ाने और इसरार वदीअत रखे गए हैं और आलम अम्र के दफ़ीने और मख़फ़ी उमूर भी मदफ़ून हैं इस के अलावा वह अश्या भी जो आलम अम्र व ख़ल्क़ में जुदा जुदा मौजूद हैं यह इस के मामलात खासा हैं जो इस की वहदानी हैयत से ताल्लुक रखते हैं।

ख़याल रहे कि यह तमाम कमालात जो पारे गोश्त में पाए जाते हैं मक़ाम क़ाब व क़ौसैन में हैं (मज़कूरा उमूर की तफ़सील के लिए मक्तूब 21, दफ्तर दोम मुलाहिजा हो)

क़ल्ब शिष् जिहत:

हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग सय्यद मुहम्मद बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया है : मशाइख़ में से हर एक के आईने की दो जिहतें हैं और मेरे आईने की छ।’’

इस कौल से किया मुराद है? इस को सब से पहले हज़रत इमाम रबानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू ने बयान किया, मुबदा व मुआद में आप फ़रमाते हैं कि आईना से मुराद आरिफ का क़ल्ब है जो कि रूह, नफ़्स के दरमियान बर्ज़ख़ है और दो जिहत से मुराद जिहत रूह और जिहत नफ़्स है। पस मशाइख़ को मक़ाम क़ल्ब में वसूल के बाद क़ल्ब की दो जिहतें मुनकशिफ़ होती हैं और उन दोनों मुक़ामों के वह उलूम व मआरिफ़ जो क़ल्ब के मुनासिब हैं फ़ाइज़ होते हैं।

इस के बरख़िलाफ़ वह तरीका जिस से हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू मुमताज़ हैं और निहायत इस महल में बदायत में मुंदरज है क़ल्ब के आईने की इस में छ जिहतें ज़ाहिर होती हैं इस का बयान यह है कि इस बुलंद तरीका के अकाबिर पर मुनकशिफ़ किया गया है कि

जिस तरह पूरे इंसानी बदन में छ लताइफ़ साबित हैं तन्हा क़ल्ब में भी वह छ लताइफ़; नफ़्स, क़ल्ब , रूह, सर, ख़फ़ी, अख़फ़ा साबित हैं और छ जिहत से मुराद यही छ लताइफ़ हैं। पस तमाम मशाइख़ की सैर ज़ाहिर क़ल्ब पर है और उन बुज़ुर्गवारों की बातिन क़ल्ब में और इसी सैर से अबतन बतून तक पहुँचते हैं और उन छ लताइफ़ के उलूम व मआरिफ़ मक़ाम क़ल्ब में मुनकशिफ़ होते हैं वह उलूम व मआरिफ़ नहीं जो इस मक़ाम के मुनासिब नहीं हैं।

कल्ब क़ल्ब के कमालात:

हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग क़ुद्दिस सिर्रहू के मज़कूरा बाला मुश्किल कौल का हल बयान करने के बाद हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने वह इसरार इस मक़ाम में बयान फ़रमाए जिन से आप के रब ने ख़ुसूसीयत के साथ आप को नवाजा और आप ने बराए नफा आम और बतौर तहदीस नेमत के बयान फ़रमाए, फ़रमाते हैं: मालूम होना चाहिए कि कल्ब क़ल्ब भी क़ल्ब के कयास पर लताइफ़ को मुतज़िमन है लेकिन कल्ब क़ल्ब में दायरा की तंगी या किसी दूसरे भेद के सबब लताइफ़ सता (छ) में से दो लतीफ़े ज़ाहिर नहीं होते हैं, लतीफ़ा नफ़्स और लतीफ़ा अख़फ़ा।

और यही हाल इस क़ल्ब में है जो मर्तबा सालसा में है मगर इस में लतीफ़ा ख़फ़ी भी ज़ाहिर नहीं होता है और ऐसा ही हाल इस क़ल्ब में है जो मर्तबा राबिया में है मगर इस में लतीफ़ा सर भी ज़ाहिर नहीं होता है सिर्फ़ क़ल्ब व रूह का ज़ुहूर होता है और मर्तबा ख़ामसा में लतीफ़ा रूह भी ज़ाहिर नहीं होता है लिहाज़ा इस मर्तबा में स्वाए क़ल्ब के और कुछ बाक़ी नहीं रहा और खालिस बसीत कि जिस में किसी ऐतबार की गुंजाइश नहीं।

क़ल्ब के यह मुरातिब बयान करने के बाद वह उलूम इरशाद फ़रमाते हैं जिन को इस मक़ाम से मुनासबत है। आप के उन इसरार से हर ज़ी इल्म समझ सकता है कि हज़रत

मुजद्दिद कि ख़ुदावंद क़ुद्दूस ने कैसे बुलंद कमालात से नवाजा था, फ़रमाते हैं:

‘‘जो कुछ आलम कबीर में तफ़सीलन ज़ाहिर हुआ वह आलम सग़ीर में इजमालन, आलम सग़ीर से मेरी मुराद इंसान है। पस जब आलम सग़ीर को मांझ लिया जाए और चमक दार बना लिया जाए तो इस में आईना के तौर पर वह तमाम चीजें ज़ाहिर हो जाती हैं जो आलम कबीर में तफ़सील के साथ हैं क्यों कि मानझुने और साफ करने की वजह से इस का ज़र्फ़ वसीअ हो गया लिहाज़ा सुगर का हुक्म ज़ाइल हो गया ऐसा ही हाल इस क़ल्ब में है जिस की निस्बत आलम सग़ीर के साथ ऐसी है जैसे आलम सग़ीर की आलम कबीर के साथ इजमाल और तफ़सील के लिहाज से तो जब आलम असगर जो कि आलम क़ल्ब है को मांझ लिया जाए और इस ज़ुल्मत को दौर कर दिया जाए जो इस पर तारी है तो इस में भी मरआयत (आईना दारी) की वजह से वह सब कुछ ज़ाहिर हो जाएगा जो आलम सग़ीर में तफ़सीलन।

और इजमाल व तफ़सील का यही हाल क़ल्ब अलक़लब का है, क़ल्ब की तरफ़ निस्बत करते हुए और इजमाल के बाद तफ़सील का ज़ुहूर तसफ़ीया व नूरानियत के सबब से है और इसी कयास पर वह क़ल्ब है जो मर्तबा सालसा में है और वह क़ल्ब जो मर्तबा राबिया में है और मुरातिब साबिक़ा में तफ़सील का ज़ुहूर सक़ालित (मंझाई) व नूरानियत के सबब से है यही हाल इस क़ल्ब का है जो मर्तबा ख़ामसा में है बावजूदिके इस में बिसातत है और किसी क्षे का ऐतबार नहीं है।

इस मर्तबा ख़ामसा वाले क़ल्ब में कामिल की सफ़ाई के बाद वह सब कुछ ज़ाहिर हो जाता है जो तमाम आलिमों; आलम कबीर, सग़ीर, असगर और इस के बाद आलिमों में ज़ाहिर होता है। पस यह ज़ियाक़ ओसा और बसीत अलबसीत और अकिल अक्सर है, अश्या में से कोई क्षे इस सिफ़त पर पैदा नहीं की गई है और साने के साथ इस से ज़्यादा मुनासबत वाली चीज़ नहीं पाई गई।

तो लामुहाला इस क़ल्ब में इस के साने की आयात के वह अजायब ज़ाहिर हूँ गे जो इस की मख़लूक़ में किसी में ज़ाहिर नहीं होते इस लिए फ़रमाया गया ला यसानी अर्ज़ी विला समाई विलकण यसानी क़ल्ब अबदी उलमोमिन (मज़ेद तफ़सील मुबदा व मुआद में देखिए)

लतीफ़ा रूह:

यह एक लामकानी क्षे और ग़ैबी लतीफ़ा है जिस का ज़ुहूर दर असल अर्श के उपर लतीफ़ा क़ल्ब के फ़ौक़ है इंसान के बदन में इस का महल दायें स्तान से दो अंगुल नीचे पहलू की तरफ़ दबा हुआ है इस का नूर सुर्ख रंग का है।

लतीफ़ा सर:

लतीफ़ा सर का ज़ुहूर दर असल रूह के माफ़ौक़ है और रूह से ज़्यादा लतीफ़ है इस का महल बाएं स्तान से दो अंगुल उपर दायें जानिब को झुका हुआ है इस का नूर सफेद रंग का है। हज़रत ख़्वाजा ख़्वाजगां नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू की निस्बत की वसात इसी लतीफ़ा में ज़्यादा है।

लतीफ़ा ख़फ़ी:

यह भी एक ग़ैबी लतीफ़ा है जो सर से ज़्यादा लतीफ़ है इस का ज़ुहूर फ़ौक़ अलार्श सर के उपर है बदन इंसान में इस का महल दायें जानिब स्तान से दो अंगुल ऊँचा दरमियान की तरफ़ दबा हुआ है इस के नूर का रंग स्याह है।

लतीफ़ा अख़फ़ा:

इस का ज़ुहूर दर असल ख़फ़ी से भी उपर है सारे लताइफ़ में सब से ज़्यादा लतीफ़ है, बदन इंसानी में इस का महल दोनों स्तान के दरमियान है इस के नूर का रंग सब्ज़ है।

विलायत के पांच दर्जात:

मालूम रहे कि यह पांचों लताइफ़ दर असल विलायत के पांच दर्जात हैं और हर दर्जा अल्लाह तआला की मुक़द्दस ज़ात तक पहुँचने का एक रास्ता है। उन लताइफ़ का उरूज दायरा असमा व शिवनात तक है। ख़याल रहे कि लताइफ़ जिस तरतीब से मज़कूर हैं इसी तरतीब से उन का उरूज है। चों कि बंदों का रशद और हिदायत अनबीए कराम अलैहिम अस्सलाम पर मुनहसिर है लिहाज़ा जो रास्ता उन बुजुर्गों का इख्तियार करदा है वह हिदायत का है। यह लताइफ़ दर असल वह पांच रास्ते हैं जिन पर चल कर रसल ओलो अलाज़म मक़ाम विलायत और मकसूद को पहुँचे हैं चनां चह लतीफ़ा क़ल्ब हज़रत आदिम अलैहि अस्सलाम के जीर क़दम है क्यों कि हज़रत आदिम का वसूल इसी राह से हुआ। आप ही इस के पहले सालिक हैं।

इस राह से जो शख्स भी बारगाह रब अलालमीन तक वासल होगा वह आदमी अलमशरब कहलाता है, ऐसे शख्स को विलायत के पांच दर्जों में से एक दर्जा की सैर की लियाकत हो जाती है। ख़याल रहे कि इस लतीफ़ा का ताल्लुक व राबिता सिफ़त तक्वीन की तजल्ली से हैजो कि सिफ़ात इज़ाफिया से है, फेअल व ख़ल्क़ और ईजाद व इख़तिरा व अहदास का ताल्लुक इसी से है, तमाम मुम्किनात इसी से वजूद में आये, आलम अम्र के दीगर लताइफ़ की बनिस्बत क़ल्ब को असल करार दिया गया है, आलम ख़ल्क़ के लताइफ़ में लतीफ़ा नफ़्स का ताल्लुक व इर्तिबात असल क़ल्ब के साथ है लिहाज़ा लतीफ़ा नफ़्स, आलम ख़ल्क़ के लताइफ़ की बनिस्बत खुलासा और निचोड़ है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू तमाम लताइफ़ की तसलीक और तहजीब जुदा जुदा किया करते थे मगर आप के फ़र्रज़िंदों ने राहको मुख़्तसर करने के लिए तसफ़ीया क़ल्ब के बाद तज़किया नफ़्स पर इकतिफ़ा किया। उन हज़रात का कहना यह था कि उन दोनों लतीफ़ों की हैसियत असालित की है लिहाज़ा उन की तहजीब व तसफ़ीया से दूसरों की भी तहजीब व तसफ़ीया हो

जाएगा।’’

लतीफ़ा रूह क़ल्ब की बनिस्बत एक दर्जा हक़ सुब्हानहू से अक़्रब है। इस लतीफ़ा से हज़रत नूह और हज़रत इब्राहिम अला नबीना व अलेहमा अस्सलात व अस्सलाम का वसूल हुआ था लिहाज़ा जो सालिक इस राह से वासल होगा वह इब्राहीमी अलमशरब कहलाता है, ऐसे शख्स को दर्जात विलायत से दो दर्जे के हुसूल की सलाहीयत व इस्तिदाद हो जाती है। ख़याल रहे कि इस लतीफ़ा का ताल्लुक व इर्तिबात सिफ़ात सबूतीय की तजल्ली से है।

लतीफ़ा सर यह रूह की बनिस्बत जनाब हक़ सुब्हानहू से एक दर्जा क़रीब तर है, सब से पहले हज़रत मूसा अला नबीना व अलैहि अस्सलाम का वसूल इस राह से हुआ थालिहाजा जो शख्स इस राह से वासल होगा इस को मौसी अलमशरब कहते हैं। ऐसे सालिक को दर्जात विलायत से तीन दर्जों के हुसूल की सलाहीयत व लियाकत हो जाती है। इस लतीफ़ा का ताल्लुक व रब्त अल्लाह तआला के शिवनात ज़ातीय की तजल्लियात से होता है जो कि सिफ़ात सबूतीय के मुकाबले में हज़रत ज़ात से क़रीब तर हैं।

लतीफ़ा ख़फ़ी यह सर की बनिस्बत जनाब हक़ से एक दर्जा क़रीब तर है। इस राह के सालिक हज़रत ईसा रूह अल्लाह अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम हैं, यह उन्ही के जीर क़दम कहलाता है। इस राह से जो सालिक वासल होता है उसे दर्जात विलायत के चार दर्जों के हुसूल की लियाकत व सलाहीयत होती है। ऐसे शख्स को ईसवी अलमशरब कहते हैं। इस लतीफ़ा का ताल्लुक व इर्तिबात हक़ तआला की सिफ़ात सलबीह तंजेह्य की तजल्लियात से होता है जो कि शिवनात ज़ातीय की बनिस्बत क़रीब तर हैं।

लतीफ़ा अख़फ़ा यह तमाम लताइफ़ में हज़रत हक़ से क़रीब तर है। बाइस ईजाद आलम सय्यदना व संदना रसूल अल्ला ﷺ का वसूल इसी राह से हुआ है। जिस सालिक को इस राह से वसूल की तौफ़ीक़ मिलती है उसे मुहम्मदी अलमशरब कहते हैं। ऐसे सालिक को तमाम

दर्जात विलायत के हुसूल की सलाहीयत व लियाकत होती है। ख़याल रहे इस मुबारक लतीफ़ा का ताल्लुक व इर्तिबात शान जामा की तजल्ली से है जो कि मर्तबा तंजेह्य और अहदेत मुजर्दा के दरमियान बर्ज़ख़ की हैसियत रखता है, तमाम लताइफ़ में यह लतीफ़ा शरीफा अल्तिफ़ व अहसन व अजमल है। बहुत कम बंदे हैं जिन को इस दौलत लाज़वाल से हिस्सा मिलता है। ख़याल रहे अगर किसी नबी के जीर क़दम होने का मतलब समझना हो नीज़ इस सिलसिले में मज़ेद मालूमात हासिल करना हो तो हमारी किताब ‘‘कंज़ उल-इरफ़ान’’ का मुताला करें। मालूम रहे कि लोगों में चों कि सलाहीयतें और इस्तिदादें बराबर नहीं होती हैं इस लिए ख़ुदावंद क़ुद्दूस ने कमाल कर्म से यह मुख़तलिफ़ मशरब अता फ़रमाए ताकि कम सलाहीयत वाले भी काबा मकसूद और क़िबला मतलूब तक पहुँच सकें।

लताइफ़ की तसलीक:

मालूम होना चाहिए कि मुक़ामात और लताइफ़ का सुलूक दो किस्म पर है; एक यह कि हर लतीफ़ा के मक़ाम की सैर मुर्शद की तवज्जो से इबतिदा से ले कर इन्तहा तक पहुँचाए, इस के बाद फिर दूसरे लतीफ़ा की सैर शुरू करे, इस को भी इन्तहा तक पहुँचाए, इसी तरह हर एक को मुकम्मल करे, दोम यह कि मुर्शद जब चाहे कि सालिक का काम बहुत जिल्द अंजाम को पहुँचे तो यह करता है कि लतीफ़ा अव्वल में तवज्जो देता है और अभी लतीफ़ा अव्वल की सैर पूरी नहीं हो पाती है कि लतीफ़ा सानी के अनिवार इस में अल्का कर देता है। इसी तरह लतीफ़ा सानी की मुसाफ़त अभी पूरी नहीं हो पाती है कि लतीफ़ा सालस पर तवज्जो फरमाता है। इसी तरह बाक़ी लताइफ़ में करता है।

ग़रज़कि अपनी तवज्जो से हर मक़ाम से हिस्सा और हर जगह के अनिवार व फ़्यूज़ात व कैफियात सालिक के बातिन में मुर्शद अल्का करता है। सुलूक की दूसरी किस्म को सुलूक बतौर तिफ़रा कहते हैं, यह सालिक साहिब तिफ़रा गोया हर मक़ाम को बतौर इजमाल देखता है, इस के बाद

ख़ुदावंद क़ुद्दूस के फजल से तफ़सील भी हासिल हो जाती है।