अध्याय 3 में से 22पृष्ठ 35–45
बशरियत
सितम की बात यह है कि क़ुल अन्माۤ अना बशरٌ मुम्सलकम हर चिल्ला दिए हुए (जमाती) को याद है मगर कद जाइकमۡ मन अल्ला नोۡरٌ विकिकताबٌ मुन्नबीۡनٌ किसी को याद नहीं क़ुल लादरी मा यफाल बी हर बोरिया बिस्तर बांधे तब्लीग़ी की ज़बान ज़िद है मगर असाۤई उन्नۡ यज्बासक रब्तक मुक़ामया मुतेहमोۡदर्रा से नामालूम क्यों। नजरों में हिजाबात हैं, इसी तरह आम मिसाइल में बज़ाम ख़वेश दानाओं का यह तर्ज़ सितम है, तारीख कभी भी ऐसी आंखों को माफ़ नहीं करेगी जिन्हों ने सिर्फ़ इस हसीन व जमील मुतअल्लिक़ के मुताल्लिक़ उन्ही नसोस को देखने की कोशिश की जिन से उन के ख़बस बातिनी का उन के गुमान में तसल्ली का सामान फ़राहम हो सकता था। ख़ुदावंद क्रीम किसी दुश्मन को भी ऐसी नज़र न दे जो उसे अब्दी सज़ाओं का मुस्तहिक़ बना दे।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का मसला बशरियत में मबनी बुर हक़ीक़त नज़र है अगर अब भी आंखें न खुलें तो उसे शिक़ावत मादरी के अलावा और किया कहा जा सकता है। आप आरिफ ताम उलमार्फत को बयान करते हुए इरशाद फ़रमाते हैं:
आरिफ कामिल ताम उलमार्फत को बक़ाए ज़ात के बाद जब सिफ़ात और अख़लाक़ कामला इनायत फ़रमाते हैं तो इस वक़्त हर सिफ़त से उन सिफ़ात में से मुत्तसिफ़ बउनवान कलियत ज़ात हो जाती है।
(बल्कि इस की ज़ात) मसलन बतमामा इल्म होगी और बतमामा बस्र और बतमामा समा जैसा कि मुहक़्क़ीन सूफ़िया ने सिफ़ात वाजिबी के बारे में कहा है कि अल्लाह की तमाम ज़ात इल्म है और तमाम कुदरत तमाम समा तमाम बस्र (कुछ आगे फ़रमाते हैं) इसी तरह आरिफ के लताइफ़ में से हर लतीफ़ा इस वक़्त में इस की कलियत के रंग में ज़ाहिर होता है और आरिफ बतमामा लतीफ़ा रूह हो जाता है और बतमामा लतीफ़ा क़ल्ब। इसी कयास पर बाक़ी लताइफ़ नफ़्स नातिक़ा, सर, ख़फ़ी, अख़फ़ा,इसी तरह इस के अजज़ा में से हर जुज़ और अनासिर में से हर अंसर कल का हुक्म पैदा कर लेता है मसलन आरिफ अपनेआप को बतमामा अंसर खाक पाता है इसी तरह बतमामा अंसर आब देखता है।
और जब लतीफ़ा क़ल्ब जो कि हक़ीक़त जामिआ है कल के रंग से रंगीन हो जाता है और इस का मुज़्ग़ा कलबेह के साथ ताल्लुक ज़ाइल हो जाता है, मुज़्ग़ा इस वक़्त खाली रहता और जिसम बे रूह की तरह दिखाई देता है और ऐसा मुतस्व्वर होता है कि इस आमद व रफ्त (फना व बका) में इस राह की गिर्द भी इस को नहीं लगी है और वह अपनी असल सराफ़त है। (मक्तूब: 65)
हज़रत इमाम रब्बानी की मज़कूरा बाला तारीफ़ से आप अंदाजा लगाइए कि आरिफ ताम उलमार्फत की जब बुलंदी शान का यह हाल है तो सय्यद उलारफ़ैन ﷺ की बस्र व समा व कुदरत व इल्म का किया आलम होगा।
मक्तूब: 64 में फ़नए उत्तम के बारे में तहरीर फ़रमाते हैं कि फ़नए उत्तम इसी वक़्त हासिल होती हैजब कि फ़ानी से उएन व असर का ज़वाल हो जाए और इस का कोई
नाम व निशान बाक़ी न रहे। एक तवील तकरीर फरमाने के बाद इरशाद फ़रमाते हैं:
मालूम होना चाहिए कि इस मक़ाम में एक शुबहा पैदा होता है वह यह कि सरकार पुरनूर ﷺ की शान में आया है क़ुल अन्माۤ अना बशरٌ मुम्सलकम यूۡहाۤई इलिया और हदीस शरीफ़ में है अन्माۤ अना बशरٌ मुम्सलकम अगज़ब कमा युगज़ब अलबशर अब ज़ाहिर है बशरियत व इंसानियत का असर बाक़ी रहने ही की वजह से यह फ़रमाया गया तो यह कहना कैसे सही हो सकता है कि आरिफ से उएन व असर ज़ाइल हो जाते हैं इस का जवाब यह है कि आयत व हदीस की दलालत बक़ाए असर पर नहीं है, हां इतना जरूर है कि फना व बका के बाद जब इंसान कामिल को आलम और दावत ख़ल्क़ की तरफ़ रुजू किया जाता है तो इस वक़्त सिफ़ात बश्रय और ख़साइस इंसानिय ज़ाइला की सूरत और तेजी तोड़ने के बाद उन सिफ़ात के साथ आरिफ की तरकीब कर दी जाती है ताकि इस आरिफ और आलम के दरमियान मुनासबत पैदा हो जाए जो कि ज़ाइल हो चुकी है और इस मुनासबत की वजह से अल्लाह तआला इफ़ादा व इस्तिफ़ादा का दरवाजा खोलता है नीज़ सिफ़ात बश्रय ज़ाइला के उलहाक़ और इतसाफ़ में यह हिक्मत भी होती है कि अल्लाह तआला बंदों को आजमाता है और ख़बीस को तैब से और मुकोअब को मुसद्दिक़ से मुमताज़ व जुदा कर देता है, उन सिफ़ात को लौटाने के बाद फिर आरिफ का मामला मस्तूर व मख़फ़ी हो जाता है लिहाज़ा जो लोग इस की तस्दीक करते हैं उन्हें ईमान बालग़ीब की दौलत मिलती है जिस पर कि आख़िरत की जुमला कामयाबियों का दार व मदार है, क़ुरआनी इरशाद है:
وَلَوْ جَعَلْنٰہُ مَلَکًا لَّجَعَلْنٰہُ رَجُلًا وَّلَلَبَسْنَا عَلَیۡہِمۡ مَّا یَلْبِسُوۡنَ (الانعام: ۶؍۹)
तर्जुमा: और अग्रहम नबी को फरिश्ता करते जब भी उसे मर्द ही बनाते और उन पर वही शुबहा रखते जिस में अब पड़े हैं।’’
क़ुल अन्माۤ अना बशरٌ मुम्सलकम के हाफ़िज़ इस मुक़तदायशरीअत व तरीक़त के यह इर्शादात देखें और अपने ईमान तौलें, सच फ़रमाया, लिबास बशरियत से लाखों ने धोका खा कर मता ईमान लिटादी, अक्ल व दानिश से कोरे और जहालत व नादानी के पतलों ने कभी भी इस रहमत ख़ुदावंदी की क़द्र नहीं की कि अगर लिबास बशरियत में सय्यद आलिम ﷺ तशरीफ़ न लाते तो इंसान को नूर ईमान की रोशनी कैसे मयस्सर आती।’’
ख़ुदा जो करता है अच्छा ही करता है अगर यही इस की हिक्मत न होती तो क़ल्ब का इख़लास व नफ़ाक़ कैसे ज़ाहिर होता , ख़बीस को तैब से कैसे छांटा जाता। दावत हक़ के कबूल का जज्बा रखने वालों के लिए मुजद्दिद अल्फ़ सानी का कौल बहुत काफ़ी है मगर शिक़ावत अज़ली को कौन सी ताकत मेट (मिटा) सकती है। अपनी तरह बशर कहने वालों के लिए हम हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का एक और इरशाद नकल किए देते हैं जिस से साफ तौर पर क़ारईन समझ लें गे कि वह आप की नज़र में किया हैं, फ़रमाते हैं:
महजूबाँ कि मुहम्मद रसूल अल्लाह सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अला आला व सल्लम रा बशर गुफ़्तनद व दर रंग सायर बशर तसोर नमोदनद नाचार मुनकर आमदनद व साहिब दौलतां कि अव रा अलैहि अस्सलात व अस्सलाम बउनवान रिसालत व रहमत आलमियां दानिस्तुंद व अज़ सायर नास मुमताज़ दीदनद बदौलत ईमान मुशर्रफ़ गश्तनद व अज़ अहले निजात आमदनद।(मक्तूब:64,दफ्तर सोम)
जिन अक्ल के अंधों ने हज़रत मुहम्मद रसूल अल्लाह सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अला आला व सल्लम को बशर कहा और दूसरे इंसानों की तरह तसोर कियावह बिलआख़िर मुनकर हो गए और जिन साहिब दौलत इंसानों ने आप अलैहि अस्सलात व अस्सलाम को रिसालत और आलिमों के लिए रहमत के तौर पर जाना और तमाम लोगों से मुमताज़ देखा वह ईमान की दौलत से मुशर्रफ़ होगए और निजात पाने वालों में से हो गए।’’
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का यह बड़ा साफ व सरीह और फैसला कण कलाम है कि जिन
लोगों ने अपनी तरह बशर कहा वह हक़ से दौर और महजूब हैं और मुनकर हैं , उन के पास ईमान नहीं, उन्हें निजात नहीं मिलेगी और जिन्हों ने अपनी तरह बशर नहीं देखा बल्कि सब से मुमताज़ जाना वह साहिब दौलत हैं, ईमान वाले हैं, फ़िर्क़ा नाज्य (निजात पाने वाले लोग) हैं। राह हक़ और ईमान के मुतलाशियों के लिए इतना बहुत कुछ है अब भी न समझ में आये तो इस का कोई इलाज नहीं। अज़ल में ही नूर की तजल्ली जिन रूहों पर पड़ गई थी दुनिया में ईमान उन्ही को मिलेगा जब इबलेस ने नार जहनम के भड़कते हुए शोले देख कर भी ख़ुदावंद क़ुद्दूस के हुक्म को ठुकरा दिया तो यह तो सय्यद अलांबिया सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अलैहिम व सल्लम के एक उम्मती का इज़हार हक़ीक़त है जिस चीज़ का क़ल्ब सलाहीयतें खो चुका तो उसे जबरदस्ती कैसे बुलाया जा सकता है। (मक्तूब: 44, दफ्तर अव्वल)
मुहम्मद अरबी आबर्वी हर दूसरा अस्तकिसीका खाक दर्श नेस्त खाक बुर सर अव
यानी मुहम्मद अरबी ﷺ दो जहां की आबरू हैं इस शख्स के सर पर खाक हो जो उन के दर की खाक नहीं है।
जुमला हक़ायक़ की असल:
सय्यद आलिम ﷺ की हक़ीक़त तमाम हक़ीक़त की असल है। हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू इरशाद फ़रमाते हैं: हक़ीक़त मुहम्मदी अलैहि मिन अस्सलवात अफ़ज़लहा व मिन इलतसलीमात अकमल्हा कि ज़ुहूर अव्वल अस्त व हक़ीक़त उलहक़ायक़ सत बाँ मानी कि हक़ायक़ दीगर चह हक़ायक़ अनबीई कराम व चह हक़ायक़ मलाइका अलैहि व अलैहिम अस्सलात व अस्सलाम कालज़लाल इंद मर अव रा, व अव असल हक़ायक़ अस्त।
क़ाल अलैहि अस्सलात व अस्सलाम: अव्वल मा ख़ल्क़ अल्लाह नूरी व क़ाल अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम: ख़लक़त मिन नूर अल्लाह व अलममनोन मिन नूरी।
पस नाचार एं हक़ीक़त वास्ता बूद दरमियान सायर हक़ायक़ व दरमियान हक़ जल व अला व
वसूल बमतलूब अहदे रा बी तवस्सुत अव अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम मुहाल बाशद फहू नबी अलानबया वाल्मरसिलीन व इरिसाला रहमत ललालमीन अलैहि व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात अज़ीं जा अस्त कि अनबीए ओलो अलाज़म बावजूद असालित तबईत अव मैख़्वाहिंद बारज़ू दाखिल अमितान अव मैगरदंद कमा विरुद अलैहि व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात व इलतहयात। (मक्तूब:122, दफ्तर सोम)
हक़ीक़त मुहम्मदी ﷺ जो कि ज़ुहूर अव्वल है और सारी हक़ीक़तों की हक़ीक़त बायं मानी कि दीगर हक़ायक़ ख़्वाह अनबीए कराम के हक़ायक़, ख़्वाह फरिश्तों के हक़ायक़ सब हक़ीक़त मुहम्मदी के लिए ज़लाल की तरह हैं और वह तमाम हक़ायक़ की असल है, आप ﷺ ने फ़रमाया है: पहली वह चीज़ जिस को अल्लाह तआला ने पैदा फ़रमाया मेरा नूर है और आप ﷺ ने फ़रमाया है: में अल्लाह तआला के नूर से पैदा किया गया और अहले ईमान मेरे नूर से।
पस ला मुहाला हक़ीक़त मुहम्मदी हक़ तआला और दीगर हक़ायक़ के माबैन वास्ता होगी और मतलूब (अल्लाह तआला) तक किसी का भी बग़ैर आप के वास्ते के पहुँचना मुहाल होगा। पस आप नबियों और रसूलों के नबी हैं और आप को भेजा जाना तमाम जहान के लिए रहमत होगा यही वजह है कि ओलो अलाज़म रसल असालित के बावजूद आप की इत्तिबा चाहते हैं और आप के उम्मती होने की आरज़ू करते हैं जैसा कि वारद हुआ है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस मुख़्तसर इबारत में बड़े वाज़िह अलफ़ाज़ में यह चंद चीजें बयान फ़रमा दें अव्वल यह कि आप तमाम की हक़ायक़ की असल हैं ख़्वाह अनबीए कराम हूँ या मलाइका अजाम जब उन की असल हैं तो दीगर का कहना ही किया है। दोम आप का नूर सब से पहले पैदा किया गया आप अल्लाह तआला के नूर से और मोमिनीन आप के नूर से। सोम आप सब के लिए वास्ता और वसीला हैं, आप के वसीले के बग़ैर कोई ख़ुदा तक
नहीं पहुँच सकता है लिहाज़ा आप नबियों के नबी, रसूलों के रसूल हैं नीज़ हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू के कलाम से साफ अयाँ है कि आप तमाम आलिमों के लिए रहमत हैं सिर्फ़ मुकुल्लिफ़ीन के लिए नहीं बल्कि आप का उम्मती और मुतबा होने के ओलो अलाज़म रसूल तमन्ना व आरज़ू करते हैं। यही हम अहले सुन्नत के अक़ाइद हैं।
नात नबी निजात उखरवी का ज़रिया है
सय्यद अलसकलेन सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अला आला वसल्लम की मदह व सना और नात निजात उखरवी का ज़रिया है। हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू शैख़ सय्यद फरीद को एक मक्तूब शरीफ़ तहरीर फ़रमाते हुए इरशाद फ़रमाते हैं। फ़िक़रा चंद बाबारत अरबी मासूर दर फ़ज़ाइल जिद बुज़ुर्गवार ईशां कि खैर अलारब अस्त बिनवीसद अलैहि व अला आला मिन अस्सलवात उतमहा व मिन इलतहयात अकमल्हा व आं सआदत नामा रा वसीला निजात उखरवी ख़ुद साज़द न आंका मदाही अव अलैहि अस्सलात व इलतहीत नुमायद बल्कि मक़ूला बाँ सत्तायद।
मा ग़ुन मिदहत मुहम्मदन बमुक़ालतीलाकन मिदहत मक़ालती बमुहम्मद
यानी चंद फ़िक़रे अरबी मासूर इबारत के साथ उन के जिद बुज़ुर्गवार जो कि सारे अरब से बेहतर हैं के फ़ज़ाइल में लिखते हैं और इस सआदत नामा को अपनी निजात उखरवी का ज़रिया बनाएं न यह कि आप अलैहि अस्सलात व अस्सलाम की मदह करें बल्कि अपने कौल की तारीफ़ करें।
में ने नबी अलैहि अस्सलाम की मदह नहीं की अपनी गुफ़्तगू से लेकिन अपनी गुफ़्तगू की मदह की आप अलैहि अस्सलाम के ज़रिया।
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।तर्जुमा: में ने अपनी बातों से मुहम्मद ﷺ की मदह नहीं की है बल्कि में ने ज़िक्र रसूल से अपनी बातों को सराहा है।
इल्म ग़ैब:
अहले सुन्नत का अक़ीदा है कि ख़ुदावंद क़ुद्दूस अपने बंदों को ख़्वाह वह अनबीए कराम अलैहिम अस्सलाम हूँ या औलीए कराम रिज़वान अल्लाह तआला अलैहिम अजमईन इल्म ग़ैब अता फरमाता है जो चीज़ भी हवास और बदाहित अक्ल से मालूम न होसके उसे जान लेना इल्म ग़ैब कहलाता है जैसा कि बैजई शरीफ़ में तशरीह है। लिहाज़ा इस के मुताबिक जो चीज़ भी वही व इलहाम व कश्फ़ वगैरह के ज़रिया मालूम होगी वह सब इल्म ग़ैब ही कहलायेगी। बाज़ लोग लफ़्ज़ इल्म ग़ैब के इतलाक़ से सख्त नालां रहते हैं। मेरा मौज़ू चों कि इस वक़्त सिर्फ़ मुजद्दिद और उन के मुख़लिसीन के अक़्वाल का नकल करना है इस लिए इस पर बहस करने के बजाए और दीगर दलायल देने के बजाए सिर्फ़ हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू के कलाम के नकल पर इकतिफ़ा करता हूँ जिस से नाज़रीन बखूबी समझ लें गे, मज़कूरा बाला सारी चीजें इल्म ग़ैब में दाखिल हैं नीज़ अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात के अलावा दीगर मुक़र्रब बंदों को भी इल्म ग़ैब हासिल होता है, आप इलहाम पर बहस करते हुए फ़रमाते हैं:
पस जायज़ है कि ख़वास अहले अल्लाह, अल्लाह तआला की ज़ात व सिफ़ात व अफ़आल में बाज़ इसरार व हक़ायक़ (ऐसे) जान लें कि ज़ाहिर शरीअत उन मआरिफ़ से खामोश है और हरकात व सकनात में अल्लाह तआला की इजाजत और अदम इजाजत पा लें और मर्जी व गैर मर्जी जान लें बहुत दफ़ा होता है कि बाज़ औकात में बाज़ इबादात नाफ़िला को गैर मर्जी पाएं गे और उन के छोड़ने पर माज़ून हूँ कभी नींद को बेदारी से बेहतरसमझें अहकाम शरएहि औकात से मौक़त हैं और अहकाम इल्हाम्य तमाम औकात में साबित हैं चों कि उन बुज़ुर्गवारों के हरकात व सकनात इजाजत से वाबस्ता हैं (इस लिए) लामुहाला दूसरों के नवाफ़िल भी उन के फ़राइज़ हूँ गे मिसाल के तौर पर एक फेअल एक
शख्स की तरफ़ निस्बत करते हुए बहकम शरीअत नकल है और वही फेअल दूसरे शख्स की तरफ़ निस्बत करते हुए बहकम इलहाम फर्ज़ है। पस दीगर लोग कभी नवाफ़िल अदा करते हैं और कभी मुबाह उमूर का इर्तिकाब करते हैं और यह बुज़ुर्गवार काम चों कि मौला तआला की इजाजत और हुक्म से करते हैं सब फ़राइज़ से अदा होता है दूसरों का फर्ज़ व मुस्तहब उन बुजुर्गों का फर्ज़ है इस जगह से उन बुज़ुर्गवारों की शान की बरतरी जानना चाहिए।
उलमा-ए ज़ाहिर उमूर दीनी में ग़ैबी खबरों को पैगंबरों की खबरों के साथ मख़सूस जानते हैं अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात और दूसरों को उन चीजों में शिरकत नहीं देते हैं। यह बात विरासत के मुनाफ़ी है और बहुत से उन उलूम व मआरिफ़ सहीहा की नफ़ी है जो दीन मतीन से ताल्लुक रखते हैं।
अख़ीर के अलफ़ाज़ यह हैं: उलमा-ए ज़वाहर दर उमूर दीन अखबार ग़ैबेह रा मख़सूस बाख़बार पैग़ंबरां मेदानंद अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात व दीगरां रा दरां अखबार शिरकत निमी दहिंद एं मानी मुनाफ़ी विरासत अस्त व नफ़ी अस्त मर बसयारी अज़ उलूम व फ़नून व मआरिफ़ सहीहा रा कि बद्दीन मतीन ताल्लुक दारणद। (मक्तूब: 55, दफ्तर सोम)
मक्तूब शरीफ़ की तवील इबारत का तर्जुमा में ने सिर्फ़ इस लिए नकल कर दिया ताकि क़ारईन अच्छी तरह गौर कर लें कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की नज़र में उलूम व मआरिफ़ सब अखबार ग़ैबेह हैं अब ज़ाहिर है इल्म ग़ैब और किस चीज़ का नाम है। मज़कूरा बाला बयान से ज़्यादा साफ व सरीह मसला जीर बहस वह इबारतें हैं जो आप के रिसाला इस्बात अलंबोत में मौजूद हैं जो मज़कूरा बाला मज़मून तहरीर करने के बाद नज़र में आएं अगर सब को नकल करूँ तो बात तवील हो जायेगी, चंद इबारतें सुपुर्द कलम हैं।
नबी के सिलसिले में फिलासफा का मजहब बयान करते हुए फ़रमाते हैं कि उन
के नज़दीक नबी के तीन खासे हैं जिन से नबी गैर नबी से मुमताज़ होता है। एक यह कि मौजूदा, गुज़शता, आइंदा के मुग़ीबात पर इत्तिला हो उन युकोन ला अलात्तिला अली अल्मग़ीबात लुकाइन् व अलमाज़ेत वालातीत फिर इस पर यों अतराज करते हैं: में कहता हूँ तमाम मुग़ीबात पर इत्तिला नबी के लिए वाजिब नहीं इस पर हमारा तुम्हारा इत्तफाक़ है और बाज़ पर इत्तिला नबी के साथ मुख़तस नहीं जैसा कि तुम ने जायज़ करार दिया है मृताज़ व मर्जी और नाइबेन के लिए (भी साबित है) पस इमतियाज़ कहां।
ख़याल रहे यह एतराज सिर्फ़ इस बात पर है कि इत्तिला अली अलग़्यूब के ज़रिया नबी गैर नबी से मुमताज़ हो जाता है कमा हो वाज़िह इस सवाल का जवाब गौर से सुनने के लायक है, फ़रमाते हैं:
में कहता हूँ शायद फिलासफा ने अक्सर ग़्यूब पर इत्तिला मुराद ली है जो (हद) माताद से खारिज आदत की ख़ारिक़ हो और वह मजहूल नहीं बल्कि वह इरफ़्न और आदतन मालूम है लेकिन ग़ैब पर इत्तिला और एक दो मर्तबा खबर दे देना इस तकरार के जो हद एजाज़ को पहुँचे तो वह ख़ारिक़ आदत नहीं। पस इस वक़्त नबी गैर नबी से मुमताज़ नहीं होगा।
खुलासा यह कि नबी को जो उलूम ग़ैब अता फ़रमाए जाते हैं वह इतने कसीर होते हैं जो मोजिज़ा की हद तक पहुँचे होते हैं और गैर नबी को इतने कसीर नहीं होते हैं जो ख़ारिक़ आदत की हद तक हूँ, आगे फ़रमाते हैं:
आलम उन्न अलमतकलमैन ईज़न मोतरफोन बाण अलानबया युइलमोन अलग़ीब बालाम अल्लाह सुब्हानहू ठुला उन अलाशतरात ब बातिलٌ
यानी तुम जान लो कि मुतकल्लिमैन भी मोतरिफ़ हैं इस बात के कि अनबीए कराम ग़ैब जानते हैं अल्लाह सुब्हानहू के मतला करने से मगर इस की शर्त बातिल है।
इतने वाज़िह इर्शादात पढ़ने के बाद भी अगर हिदायत नसीब न हो तो उसे शिक़ावत
अज़ली के अलावा और किया कहा जा सकता है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू और उन के हम मशरब बुजुर्गों के अक़्वाल अगर तफ़सील से नकल किए जाएँ तो यह मज़मून एक रिसाले की हैसियत इख्तियार करलेगा। हक़ की जुस्तजू रखने वालों के लिए इतना बहुत है।बड़ा अफसोस होता है इस इंसानियत पर कि रद्द बिद्दत में हज़रत मुजद्दिद हर जगह लोगों को नज़र आजाते हैं और ऐसे मिसाइल में हज़रत मुजद्दिद की तहरीरात और उन के मोतक़िदात की ज़ियाबारियां अगरचे आफताब नसफ़ अलनहार की तरह क्यों न जलवा गर हूँ उन में किसी को दिखाई नहीं देतीं। बात दर असल यह है कि हक़ की तलाश व जुस्तजू और इस की इत्तिबा मकसूद नहीं बल्कि ख़बीस नफ़्स ने जिसे चाहा मान लिया और जो फ़ित्री ख़बासत के खिलाफ़ नज़र आया इस से आंख बंद कर ली या बे जा तावेल का सहारा ले कर तसल्ली दे ली।
अख़ीर में एक इबारत और समाअत कर लीजिए, हो सकता है बिद्दत व ज़लालत की तारीकियों में यही मशाल हिदायत बिन जाए, इंसानी तख़लीक़ के अत्वार बयान करते हुए हवास ख़मसा ज़ाहिरा , फिर अक्ल को बयान करने के बाद फ़रमाते हैं:
व वरा उलएअक़ल तौरٌ आखिर युनिफ़तह फिया उएनٌ उख़्रा यबस्र भा अलग़ीब व मा सैकुण फ़ी अलमुस्तक़बिल व अमोरा उख़्रा उलएअक़ल माज़ूल अनहा
यानी अक्ल के बाद एक दूसरा तौर है जिस में दूसरी आंख खुलती है जिस के ज़रिया ग़ैब और जो अन्क़रीब आइंदा होने वाला है और दूसरे उमूर को देखा जाता है अक्ल उन से माज़ूल है।