अध्याय 18 में से 22पृष्ठ 206–217
लताइफ़ आलम ख़ल्क़ के हालात
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:‘‘अक्ल मुआद पर एक ज़माना ऐसा आता है कि नफ़्स मुतमइना के साथ मुजावृत और इत्तिसाल का शौक इस पर ग़ालिब आता है और इस हद तक कि यह शौक अक्ल मुआद को नफ़्स मुतमइना के मक़ाम तक पहुँचा देता है इस वक़्त ताकिल व तज़किर भी मुज़्ग़ा क़ल्ब के साथ मुताल्लिक़ होजाता है इस वक़्त क़ल्ब ख़ुद अपना तर्जुमान होता है और आरिफ का मामला क़ालिब के साथ मुताल्लिक़ होजाता है और वह अंसर नार जिस की फितरत से ‘‘अना खैर’’ की आवाज़ निकली थी इस का रुख भी इताअत की तरफ़ होजाता है और
आहिस्ता आहिस्ता इस्लाम हक़ीक़ी के शरफ़ से मुशर्रफ़ होजाता है और नफ़्स मुतमइना केआसली मक़ाम तक पहुँचा कर इस का क़ायम मक़ाम करदिया जाता है।
खुलासा यह कि क़ालिब में क़ल्ब हक़ीक़ी का नायब मुज़्ग़ा हुआ और नफ़्स मुतमइना का क़ायम मक़ाम जुज़ु नारी,और हवाई जुज़ु रूह के साथ मुनासबत रखता है लिहाज़ा सालिक उरूज व वसूल के मक़ाम में कभी इस जुज़ को बउनवान हक़्क़ानियत जानता है और इस का गिरफ्तार होजाता है,चुनांचे मक़ाम रूह में यही शहूद हासिल होता है और सालिक गिरफ्तार रहता है ।
बाज़ मशाइख़ ने फ़रमाया है कि तीस साल तक रूह को खुदाई के साथ में पूजा है और जब इस मक़ाम से गुज़ारा और हक़ बातिल से जुदा हुआ,यह हवाई जुज़ इस क़ालिब में मक़ाम रूही के साथ मुनासबत की वजह से रूह के क़ायम मक़ाम हो जाता है और बाज़ उमूर में रूह का हुक्म इख्तियार कर लेता है।
और जज़ आबी जामिआ कलबेह की हक़ीक़त से मुनासबत रखता है इसी लिए इस का फ़ैज़ तमाम इश्याय को पहुँचता है,इरशाद रब्बानी है: वजालना मन उलमा कुल शीۡ है’’इस का भी बाज़ गश्त मुज़्ग़ा कलबेह है।
और जज़ अर्ज़ी(खाकी)जो कि क़ालिब का जुज़ु आज़म है दिनायत व ख़स्त जो कि इस के ज़ाती सिफ़ात से है की तलवीस से पाक होने के बाद इसी क़ालिब में इस का ग़ालिब व हाकिम हो जाता है और जो कुछ क़ालिब में है इस का हुक्म पैदा कर लेता है इसी के रंग से रंगीन हो जाता है यह इस की जामईयत ताम्ह की वजह से है,क़ालिब के जमी अजज़ा दरअसल इस के अजज़ा हैं इसी लिए करा अर्ज अनासिर व अफ़्लाक का मरकज़ हुआ और इस का मरकज़ मरकज़ आलम,इसी वक़्त क़ालिब का मामला भी अंजाम को पहुँचता है और उरूज व नुज़ूल की इन्तहा मुतहक़्क़ हो जाती है और कमाल व तकमील हासिल हो जाती है यह है वह निहायत जो बदायत के साथ रुजू र खती है।
ख़याल रहे कि रूह अपने मुरातिब व तवाबा के साथ अगर चह हमल करार में बितरीक़ उरूज पहुँच गई हो लेकिन चूंकि क़ालिब की तरबीयत अभी दर पेश होती है लिहाज़ा इस आलम की तरफ़ तवज्जो ज़रूरी है और जब क़ालिब का मामला अंजाम को पहुँच गया तो रूह,सर,ख़फ़ी,अख़फ़ा,क़ल्ब और नफ़्स अक्ल के साथ बारगाह क़ुद्दिस की तरफ़ मुतवज्जा हो गई और अ स क़ालिब से बिलकुल्लिया आराज़ हासिल हो गया और क़ालिब भी मुकम्मल तौर पर मक़ाम उबूदीयत की तरफ़ मुतवज्जा ह हो गया ।
ऐसी सूरत में रूह अपने मुरातिब के साथ मक़ाम शहूद वहज़ूर में मुतमकन हो जाती है और मासवा की दीद विदानिश से बिलकुल्लिया आराज़ करती है और तमाम क़ालिब मक़ाम ताअत व बंदगी के साथ रासिख़ हो जाता है,फ़र्क़ बाद अलजमा का मक़ाम यही है,ख़याल रहे कि लताइफ़ के सिलसिले में ज़्यादा तर मालूमात में ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की किताब‘‘मुबदा व मुआद’’से फ़राहम की हैं।
तरीका अहमदिया की दूसरी ख़ुसूसीयत:
मुजद्दिदी तरीक़ के सालकेन पर तीन विलायात मुनकशिफ़ होती हैं (1)विलायत सुग़रा (2)विलायत कुबरा (3)विलायत इलिया, अव्वल को विलायत औलिया दोम को विलायत अनबया और सोम को विलायत मिला आला भी कहते हैं।
विलायत सुग़रा:
मालूम होना चाहिए कि सालिक जब दायरा इमकान क़ता(तै)कर लेता है तो उसे असमा व सिफ़ात के ज़लाल का दायरा मशहूद होता है यह विलायत सुग़रा का दायरा है तमाम मुम्किनात के मुबादी तैनात का दायरा यही है,अंबियाए कराम और मलाइका कराम के अलावा क्योंकि उन बुज़ुर्गवारों के मुबादी तैनात अस्मा वस्फ़ात हैं जैसा कि अन्क़रीब आये गा।
ज़लाल:
ज़लाल ज़ुल की जमा है जिस के माना साया के हैं लेकिन यहाँ ज़लाल से मुराद मख़लूक़ के लताइफ़ हैं जिन को हक़ सुब्हानहू के असमा व सिफ़ात से मुनासबत ताम्ह हासिल है,इसी मुनासबत की वजह से यह ज़लाल वजूद और तवाबा वजूद की फ़ैज़ रसानी का वास्ता बिन गए।
अल्लाह तआला ग़नी मुतअल्लिक़ है उसे मख़लूक़ से किसी तरह की कोई मुनासबत नहीं है मख़लूकात को फ़ैज़ उन्हें असमा व सिफ़ात और उन के ज़लाल के वास्ते से पहुँचता है,फ़ैज़ ख़्वाह वजूद का हो या तवाबा वजूद का ,पस हर शख्स का तईन या तो इस के वजूद की फरे है या उएन वजूद ग़रज़कि हर शख्स का मुबदा तईन या उएन साबिता या इस की हक़ीक़त वही ज़ुल है जिस के ज़रिया उसे फ़ैज़ पहुँचता है।
मालूम रहे कि जिस तरह हक़ सुब्हानहू की सिफ़ात गैर मुतनाही हैं इसी तरह उन सिफ़ात के ज़लाल भी गैर मुतनाही हैं लिहाज़ा अगर विलायत सुग़रा में कोई सालिक मुरातिब ज़लाल में सैर करता है तो कभी भी यह सैर मुनक़ते नहीं हो गी लेकिन हर शख्स मुरातिब ज़लाल में इसी क़द्र सैर करता है जितनी कि इस के हक़ में मुक़द्दर है।
यह भी ध्यान रहे कि ज़ुल का भी ज़ुल होता है फिर ज़ुल ज़ुल का भी ज़ुल होता है मर्तबा सानिया,सालसा या राबिया में अला माशा अल्लाह तआला,पस सालिक मुरातिब तरक्की में उरूज करता है यहाँ तक कि अपनी असल के साथ वासल होजाता है और इसी में फ़ानी फिर वहाँ से तरक्की करके इसी असल मज़कूर के असल से वासल होता है इसी तरह मुरातिब ज़लाल को यके बाद दीगरे तै करता है यहाँ तक कि इस दायरा ज़लाल को तै कर लेता है फिर अगर इनायत इलाही सालिक के शामिल हाल है तो असमा व सिफ़ात के दायरा में दख़ूल मयस्सर आजाता है जो कि दायरा ज़लाल यानी दायरा विलायत सुग़रा की असल है।
बहुत से औलीए कराम हैं कि जब उन की सैर इस दायरा ज़लाल में वाक़्य होती
है तो वह उन ज़लाल को सिफ़ात तसोर कर बैठते हैं और सिफ़ात को उएन हक़ समझ लेते हैं और बहालत सकर तरह तरह के कलिमात उन की ज़बान से निकलते हैं और जब अपने मुबदा तईन से तरक्की करके असल ज़ुल तक पहुँचते हैं तब हक़ीक़त मुनकशिफ़ होती है।
मालूम होना चाहिए कि अवाम और औलिया कराम व अनबीए अजाम व मलाइका कराम के मुबादई तैनात और उन बुज़ुर्गवारों में बाहमी तफ़ावुत और इस से मुताल्लिक़ बातें में ने अपनी जीर तरतीब किताब‘‘कंज़ालारफान’’में तफ़सील से बयान की हैं मिन शा फ्लेरिजा इलिया।
कमालात विलायत सुग़रा:
मज़हर कमालात अहमदी सय्यदना शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इस विलायत में सैर अस्मा इलाही के ज़लाल में होती है यह जज्बा के हुसूल का मक़ाम है इसी जगह निस्बत के जज़्बात व ग़लबात,तपिश विश्वक,नारे व आह,रक्त व गर्ये,ज़ौक़ व वसूल,मकसूद की याफत,बंदों से अफ़आल की निस्बत का सल्ब होना,तौहीद फ़ाली,तजल्ली बर्क़ी,कसरत में वहदत का शहूद और दीगर हालात इंस व वहशत और हैजान व हैरत नकद वक़्त होते हैं (हासिल होते हैं)।
अगर दिल बीना है तो मईयत व अहाता का भेद भी ज़ाहिर होता है वर्ना अपने वजदान से हक़ सुब्हानहू की मईयत का इदराक होता है,इस्तिग़राक़ सकर व मस्ती,इल्मी व हबी क़ता ताल्लुक,मासवाए हक़ से जहल व निस्यान ,ख़तरात सेक़लब की सलामती इस हद तक कि कोई भी खतरा दिल में नफ़ुज़ न करे यह सब इसी मक़ाम में हासिल होता है,फ़नए कलबी जिस के माना हैं मा सिवा ए हक़ से दाइमी तौर पर बे शऊरी हासिल होजाना इसी जगह मयस्सर आती है।
इक़साम फना:
फना की चार किस्में हैं (1)फ़नए ख़ल्क़ कि मा सिवा अल्लाह से उम्मीद व बेम मुंतफ़ी हो जाए (2)फ़नए हुआ कि दिल में अल्लाह तआला की आरज़ू के सिवा कुछ बाक़ी न रहे (3)फिनाए इरादा कि बायस्त व ख़्वास्त की सिफ़त सालिक से ज़ाइल हो जाए जिस तरह मुर्दों से ज़ाइल हो जाती है (4)फिनाए फेअल कि बी यबस्र, बी यसमा,बी युंतिक़,बी यबतिश,बी यमशी,बी याक़िल नकद वक़्त होजाए।
मालूम होना चाहिए कि मक़ाम विलायत तक वसूल इसी वक़्त मुतस्व्वर हो सकता है जबकि मुक़ामात अशरा मशहूरा यानी तौबा,अनाबत,ज़हद,क़नाअत,वरा,शकर,सब्र,तोकल,तसलीम और रज़ा का हुसूल होजाए हां! इतना जरूर है कि अगरचे उन मुक़ामात में सालिक को क़दम रासिख़ न हासिल हो पाए मगर एक बार उन मुक़ामात से गुज़रना ज़रूरी है,इतनी आसानी भी इसी सिलसिला आलीया में है क्योंकि इस की निस्बत जज्बी और इजमाली है इस के बरख़िलाफ़ दीगर सलासल में उन मुक़ामात की तफ़सीली तहसील ज़रूरी है क्योंकि उन में सैर तफ़सीली और सलूकी है।
इजाजत की लिया कत्:
मालूम होना चाहिए कि इस सिलसिला शरीफा के अकाबिर मुतक़द्दिमीन के कलाम से यह मालूम होता है कि कमाल यह है कि मलिका हुज़ूर रासिख़ हो जाए और फना व बका हासिल हो जाएँ ,फ़रमाते हैं आखिर कार इंतजार है पस अगर तालिब दवाम हुज़ूर और निस्बत कलबी की वसात से मुशर्रफ़ हो जाए और हुज़ूर जहात सता का अहाता कर ले और बे कैफ़ तवज्जो हो जाए और इसी पर इकतिफ़ा कर के इस की मश्क़ करता रहे तो जिन दर्जात हुज़ूर का बयान हुआ उन तक जरूर पहुँच जाए गा और ख़ुदा के दोस्तों में शुमार होगा,दरयाय वहदत में मुस्तग़र्क होगा और इजाजत तरीका के लायक हो जाए गा।
मगर तरीका आलीया मुजद्दिदय में जब तक सालिक फिना नफ़्स और विलायत कुबरा के
कमालात तक न पहुँच जाए इस वक़्त तक वह इजाजत मुतल्लक़ा के लायक नहीं होता है,ख़याल रहे कि फिना कलबी में वह खतरा बंद होजाता है जिस का ताल्लुक दिल से है लेकिन वह ख़तरात जिन का ताल्लुक दिमाग से है वह फिनाए नफ़्स के बाद ख़त्म हो ते हैं,कलबी व नफ़सी फना के बाद ख़तरात कहां से पैदा हो ते हैं यह महल हैरत है,यह भी ध्यान रहे कि दिल व दिमाग से ख़तरात का दौर होजाना अर्बाब अक्ल के इदराक से बाहर है इस के लिए कोई दूसरी अक्ल चाहिए ख़ुदा के दोस्तों ओलिया का तरीका अक्ल व नज़र से मावरा है।
फायदा:
मक़ाम क़ल्ब का मुकम्मल तौर पर इल्म कश्फ़ व मार्फत वालों के लिए आसान है,हां! जिन को सिर्फ़ वजदान व ज़ौक़ हासिल है उन के लिए जरा मुश्किल है उन्हें या तो बारगाह इलाही से इलहाम व अल्का हो या मशाइख़ क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहम बतादें तो मालूम होगा और कोई रास्ता नहीं।
हां! यह हो सकता है कि इस के आसार ज़ाहिर हो जाएँ जिस से मालूम हो जाए मसला अनिवार निस्बत में वसात व कुशादगी हासिल हो और ऐसा महसूस हो कि गोया सीना अनिवार से इस तरह पर है जैसा प्याला पानी से लबरेज़ हो और जिहत फ़ौक़ कि तवज्जो निगरानी में मुतवहम होती है मख़फ़ी हो जाए और हुज़ूर में बिसातत पैदा हो जाए।
लताइफ़ की फना बका:
अल्लामा नूर बख्श तोकली फ़रमाते हैं‘‘लताइफ़ आलम अम्र को दस दायरा ज़लाल में फना व बका हासिल हो ती है चनां चह सालिक जब इस सैर में इस ज़ुल पर पहुँचे गा जो इस का मुबदा
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।क़ल्ब, रूह, सर, ख़फ़ी और अख़फ़ा।
तईन है तो इस को तजल्ली फेअल हक़(यानी तक्वीन जो कि हज़रत आदिम अलैहि अस्सलाम का मुबदा तईन है)के ज़ुहूर से फना हासिल हो जाए गी फिर इसी तजल्ली से बका हासिल हो गी जो कि बर्ज़ख़ और हक़ीक़त जामिआ है हक़ सुब्हानहू की सिफ़ात इज़ाफिया(फेअल व तक्वीन) से जो कि वजूब व इमकान के दरमियान मसल बर्ज़ख़ के हैं,उन में मुनासबत ताम्ह है इसी वास्ते जब क़ल्ब पर फेअल हक़ की तजल्ली का ज़ुहूर होगा तो क़ल्ब को फना हासिल होगी इसी फना में सालिक का फेअल मनफ़ी हो गा और वह अपने तुईं मस्लूब अलफाल पाए गा बाद अज़ां फेअल हक़ ही से बाक़ी होगा और वह अपने फेअल को फेअल हक़ पा ए गा ।
फिनाए क़ल्ब की अला मत यह है कि गैर हक़ से ताल्लुक इल्मी व हबी न रहे यानी क़ल्ब मा सिवा को ऐसा फ़रामोश कर दे कि अगर सालों बतकल्लुफ़ गैर को याद करे तो न कर सके,इस वक़्त जब इल्म इश्याय इस से ज़ाइल हो जाता है तो मुहब्बत इश्याय बितरीक़ औला जा ती रहती है,जब सालिक फ़नए क़ल्ब से मुशर्रफ़ हो जाता है तो जमात ओलिया में दाखिल हो जा ता है,विलायत के तमाम कमालात फ़नए क़ल्ब पर मुतफ़रा हैं।
फ़नए क़ल्ब के बाद लतीफ़ा रूह की फना है लतीफ़ा रूह क़ल्ब की निस्बत ज़्यादा लतीफ़ है इस की फना हक़ सुब्हानहू व तआला की सिफ़ात सबूतीय(जो फेअल की निस्बत एक क़दम हज़रत ज़ात सुब्हानहू के नज़दीक तर हैं)की तजल्ली के ज़ुहूर से हो ती है फिर उन ही सिफ़ात से बका हो ती है इस मक़ाम पर सालिक अपनी सिफ़ात को अपने आप से और सारी मख़लूकात की सिफ़ात को उन से मस्लूब पाए गा बल्कि जनाब क़ुद्दिस से मंसूब जा ने गा।
इस लतीफ़ा के बाद लतीफ़ा सर की फना है जो कि लतीफ़ा रूह से ज़्यादा लतीफ़ है इस की फना हक़ सुब्हानहू व तआला की शिवनात ज़ातीय(जो सिफ़ात सबूतीय की निस्बत एक क़दम हज़रत ज़ात सुब्हानहू के नज़दीक तर हैं) की तजल्ली के ज़ुहूर से होती है फिर उन्हें शिवनात से बका हो ती है इसी मक़ाम पर सालिक अपनी ज़ात को हक़ सुब्हानहू की ज़ात में मुज़्महिल पाता
इस के बाद लतीफ़ा ख़फ़ी की फना है जो लतीफ़ा सर की ब निस्बत ज़्यादा लतीफ़ है,इस की फना हक़ सुब्हानहू की सिफ़ात तंजेह्य(जो शिवनात ज़ातीय के फ़ौक़ हैं)की तजल्ली के ज़ुहूर से हो ती है फिर उन ही सिफ़ात से इस की बका हो ती है,इस मक़ाम पर सालिक ज़ात हक़ की तजरीद तमाम मुज़ाहिर से पाता है।
इस के बाद लतीफ़ा अख़फ़ा की फना है जो लताइफ़ आलम अम्र में सब से अल्तिफ़,अहसन,अजमल और हज़रत इतलाक़ से अक़्रब है इस लतीफ़ा का मुफ़नी एक मर्तबा मुक़द्दसा है जो मर्तबा तंजेह्य और अहदेत मुजर्दा ज़ात हक़ तआला के दरमियान मसल बर्ज़ख़ के है और इसी मर्तबा मुक़द्दसा से इस की बका होती है,इस मक़ाम पर सालिक मुतख़लक़ बाख़लाक़ अल्लाह हो ता है’’(तज़किरा मा इख़तिसार) जब सालिक इस मक़ाम पर पहुँच जा ता है तो दायरा विलायत सुग़रा तमाम हो जाता है।
विलायत कुबरा:
सालिक जब विलायत सुग़रा का दायरा तमाम कर लेता हैतो उसे विलायत कुबरा का दायरा मशहूद होता है,यह तीसरा दायरा है इस दायरा में सालिक को तीन दायरे और एक क़ौस मशहूद हो ती है तीनों दायरों में से पहले का नसफ़ साफिल असमा व सिफ़ात ज़ायदा को मुतज़िमन है और नसफ़ आली शिवनात ज़ातीय को,आलम अम्र के लताइफ़ के उरूज की इन्तहा इसी दायरा असमा व शिवनात की इन्तहा तक है।
दायरा असमा व शिवनात के उपर दासरा दायरा है जो कि असमा व शिवनात के उसूल पर मुश्तमिल है और तीसरा दायरा उन उसूल के उसूल पर और क़ौस उसूल उसूल के उसूल पर मुश्तमिल है,यह दायरा अनबया कराम व मलाइका अजाम के मुबादी तैनात का दायरा है,असमा वस्फ़ात में दो ऐतबार हैं एक उन के वजूद बज़ात ख़ुद की जिहत जिसे ज़ुहूर कहते हैं
दूसरे हक़ तआला की ज़ात के साथ उन के क़याम की जिहत जिसे बतून कहते हैं।
पस असमा वस्फ़ात बहसब ज़ुहूर अनबया कराम के मुबादी तैनात और मुरब्बी हैं, इसी मक़ाम तक वसूल विलायत कुबरा और विलायत अनबया कहलाता है और यही असमा वस्फ़ात बहसब बतून मलाइका के मुरब्बी व मुबादी तैनात हैं इस मक़ाम तक वसूल विलायत इलिया व विलायत मिला आला कहलाता है,इस तसरीह से मालूम हुआ कि मलाइका की विलायत अनबीए कराम की विलायत के मुकाबले में आला और ख़ुदा के क़रीब तर है,लेकिन मलाइका के मुक़ामात मुतय्यन हैं उन से आगे उन्हें तरक्की व उरूज मयस्सर नहीं हो सकता है,कुरआन अज़ीम फ़रमा रहा है:विमा मुन्ना उला ला मक़ाम मालूम’’
इस के बुर खिलाफ़ अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात के लिए तरक़्क़ीयात हैं मलाइका के मुकाबला में भी और इस से उपर भी जो कमालात नुबुव्वत व कमालात रिसालत व कमालात ओलवालाज़म वगैरह हैं,इसी जिहत से अनबीए कराम मलाइका अजाम से अफ़ज़ल हो गए जैसा कि अहले सुन्नत का अक़ीदा है,ग़रज़कि विलायत कुबरा की सैर असम अलजाहिर की सैर है।
कमालात विलायत कुबरा:
वाकिफ़ इसरार जली व ख़फ़ी सय्यदना शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:‘‘हुज़ूर व निगरानी और उरूज व नुज़ूल व जज़्बात जिस तरह मक़ाम क़ल्ब में थे इस जगह भी नकद होते हैं बल्कि तदरीजा इंजज़ाब पूरे बदन को घेर लेता है और बदन को अनिवार निस्बत शामिल हो जाते हैं,मक़ाम क़ल्ब की बनिस्बत कैफियात व हालात यहाँ बे मजा और कम चाशनी रखते हैं लेकिन जब इस निस्बत में कुव्वत पैदा हो जाती है तो हालात साबिक़ा फ़रामोश हो जाते हैं।
मौरिद फ़ैज़ बालासालित इस जगह लतीफ़ा नफ़्स है यही वह मक़ाम है जहां फिनाए हक़ीक़ी
और हक़ीक़त इस्लाम व शरह सदर हासिल होता है,दवाम शकर और रज़ा की दौलत भी यहीं मयस्सर आती है बायं तौर कि अहकाम क़ज़ा वक़दर में चवन व चुरा बिलकुल ख़त्म होजाति है,तक़लीफ़ात शरएहि के कबूल में दलील की ज़रूरत बिलकुल भी नहीं रहती है,यहाँ इस्तिदलाली बदेही होजाता है,मक़ाम जज्बा की शोर्षों से इतमीनान हासिल होजाता है,अल्लाह तआला के वादों के साथ कुव्वत यकीन बढ़ जाती है और इस्तिहलाक व अज़महलाल इस तरह होता है जैसे सूरज के सामने बर्फ़ पिघलता है,वजूद वितवाबा वजूद को हक़ सुब्हानहू के साथ मंसूब करता है और लफ़्ज़ अना का इतलाक़ अपने उपर बहुत मुश्किल से होता है।
इस मक़ाम पर सालिक पर देदकसूर (अपने आमाल को कम देखना) का इस क़द्र ग़लबा होता है कि अपने अंदर शर वएब के अलावा कुछ नज़र नहीं आता है,अपनी नियत में उसे ख़ुलूस दिखाई नहीं देता है,तहजीब अख़लाक़ जो कि हासिल सुलूक है और रिज़ाइल जैसे हिर्स वबख़िल व हसद व हकद (कीना) विकिबर वहब जाह व अजब वगैरह से तज़किया इस बुलंद मक़ाम में मयस्सर आताहै।’’
ख़याल रहेकि दायरा विलायत कुबरा के तमाम होने की अलामत यह है कि बातिन के फ़ैज़ के मामलेका ताल्लुक जो अब तक दिमाग से था अब सीना से मुताल्लिक़ हो जाता है फिर इस वक़्त शरह सदर हासिल होता है जिस की अलामत बितरीक़ वजदान यह है कि क़ज़ा वक़दर के अहकाम में चवन विचरा बिलकुल उठ जाती है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: असमा वस्फ़ात के यह उसूल सह गाना कि मज़कूर हुए हज़रत हक़ सुब्हानहू में महज़ एतबारात हैं कि सिफ़ात व शिवनात के मुबादी हो गए,उन उसूल सह गाना के कमालात का हुसूल नफ़्स मुतमइना के साथ मख़सूस है,नफ़्स को इतमीनान इसी मक़ाम में मयस्सर आता है और इसी मक़ाम में शरह सदर
हासिल होता है और सालिक इस्लाम हक़ीक़ी से मुशर्रफ़ होता है और यही जगह है कि मुतमइना तख़्त सदर पर जुलूस फरमाता है और मक़ाम रज़ा तक तरक्की करता है यह महल विलायत कुबरा के मन्तहा का है जो कि विलायत अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात है,जब सैर को इस जगह तक पहुँचाया तो वहम हुआ कि शायद काम तमाम होगया होगा!निदा आई कि यह सब असम अलजाहिर कि तफ़सील थी जो कि परवाज़ का एक बाजू है और असम अलबातिन अभी दर पेश है जो कि आलम क़ुद्दिस में परवाज़ का दूसरा बाजू है।