मुख्य सामग्री पर जाएँ

अध्याय 10 में से 22पृष्ठ 115–127

बिद्दत

हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू के कलाम में शिद्दत के साथ इत्तिबा सुन्नत और इजतिनाब अज़ बिद्दत का हुक्म मिलेगा बिद्दत ज़ाहिर है कि एक निहायत क़बीह और बुरी क्षे है जिस का सय्यद आलिम ﷺ ने खूब खूब रद्द फ़रमाया है आम तौर पर बुजुर्गों ने बिद्दत की तकसीम हसना और सीइआ की तरफ़ की है, हसना की आड़ ले कर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मुबारक दौर में ख़ाम सूफ़ियों ने बड़ी बड़ी गलत चीजें ईजाद कर रखी थीं जिन का अक़ाइद व आमाल पर बुरा असर पड़ रहा था। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की बालिग नज़र ने भांप लिया और यह चूर दरवाजा ही बंद कर दिया बाज़ मुक़ामात पर इस तकसीम ही का रद्द फ़रमा दिया एक जगह फ़रमाते हैं।

उलमा ने कहा है कि बिद्दत दो किस्म है हसना व सीइआ। हसना इस अमल नेक को कहते हैं कि सरकार अलैहि अस्सलाम और ख़ुलफ़ाए राशिदीन रज़ि अल्लाह अन्हुम के जमाने के बाद पैदा हुआ हो और सुन्नत का रफा न करे और सीइआ वह कि राफ़े सुन्नत हो यह फ़क़ीर उन बिद्दतों में से किसी भी बिद्दत में हसन व नूरानियत मुशाहिदा नहीं करता है और ज़ुल्मत व कदूरत के अलावा कुछ महसूस नहीं करता है। (मक्तूब: 186, दफ्तर अव्वल)

मक्तोबात शरीफ़ के हाशिया में इसी मक़ाम पर इस सिलसिले में बड़ी नफीस बहस

दर्ज है जिस से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की बिद्दत से सही मुराद मालूम हो जाती है कि किया है महशी फ़रमाते हैं। हज़रत इमाम रबानी क़ुद्दिस सिर्रहू ने बिद्दत में बड़ी तश्दीद से काम लिया, मक्तोबात में कितनी ही जगह (ऐसा किया) और उन को यह हक़ था, अगर यह न होता तो बिद्दत की तारीकियां तमाम बिलाद हिंद व मावरा अलनहर को घेर लेतें। हज़रत मुजद्दिद का कौल इस सिलसिले में उलमा-ए इस्लाफ़ के मुख़ालिफ़ नहीं जिन्हों ने बिद्दत की हसना व सीइआ तकसीम की है और हसना से उन की मुराद वह है जिस की असल सदर अव्वल में हो अगरचे इशारतन सही हो जैसे मीनार व मदारिस व खानक़ाहें बनाना और किताबों की तदवीन दलायल की तरतीब वगैरह और सीइआ वह है जिस की असल सदर अव्वल में बिलकुल न हो। पस इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू किस्म अव्वल पर बिद्दत का इतलाक़ नहीं कर्तेकियों कि इस की असल सदर अव्वल में मौजूद है लिहाज़ा वह मुबतदा व मुहद्दिस नहीं होगा बल्कि बिद्दत का इतलाक़ सिर्फ़ किस्म दोम के साथ ख़ास करते हैं क्यों कि वही दर हक़ीक़त मुबतदा व मुहद्दिस है और इस लिए कि सरकार अलैहि अस्सलाम ने फ़रमाया है: हर बिद्दत गुमराही है, पस निज़ाअ लफ़्ज़ी यानी अव्वल पर बिद्दत के इतलाक़ और अदम इतलाक़ में सीदी मुहम्मद मज़हर क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुक़ामात सईदा में फ़रमाया कि मेरे वालिद (ख़्वाजा अहमद सईद साहिब) रज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाते थे कि बिद्दत हसना इमाम रबानी क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक सुन्नत में दाखिल है उन के नज़दीक वह बिद्दत ही नहीं।

अहले बातिल यानी फ़िर्क़ा वहाबिय वगैरहा ने देखा कि हज़रत मुजद्दिद बिद्दत के जबरदस्त मुख़ालिफ़ हैं उन्हों ने इस से यह तासीर लिया कि हज़रत मुजद्दिद साहिब अक़ाइद व आमाल में हमारे साथ मुत्तफ़िक़ हैं चों कि यह लोग अपने मख़सूस नज़रियात जो कि सरासर कुरआन व अहादीस के मुख़ालिफ़ हैं, के मुख़ालिफ़ को बिद्दती समझते हैं मेरी समझ में आज तक नहीं आस्का कि बदमजहब लोग अहले हक़ को किस बुनियाद पर बिद्दती तसोर करते हैं अगर बिद्दत

के मानी यह लेते हैं कि हर नयी चीज़ जो सरकार अलैहि अस्सलाम के बाद ईजाद हुई हो तो इस मानी कर वह ख़ुद बहुत बड़े बिद्दती हैं इस मानी के ऐतबार से तो उम्मत की अक्सरीयत बिद्दती करार पायेगी।

बड़े बड़े इलीए कराम और उलमा-ए अजाम भी पके बिद्दती करार पाएं गे ख़ुद हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू जो बिद्दत के बहुत बड़े मुख़ालिफ़ हैं वह भी बिद्दत से पाक नहीं रह सकें गे पहले सफ़हात में आप पढ़ चुके फ़ातिहा व उर्स वगैरह हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू किया करते थे, बड़े फ़रज़न्द हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद सादिकरहमत अल्लाह अलैहि के मजार मुक़द्दस पर आप ने कबा बनाया ग़रज़कि उमूर बिद्दत की एक तवील फिहरिस्त होगी जो हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू पर चस्पां हो सके गी। किया यह हज़रात हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को बिद्दती कहने के लिए आमादा व तैयार हूँ गे। एक मर्तबा कह कर तो देखें मालूम हो जाएगा ख़ल्क़ व ख़ालिक़ की तरफ़ से कितनी लानतों की बौछार होती है। हक़ीक़त यह है कि बिद्दत की कोई ऐसी तारीफ़ इस फ़िर्क़ा का बड़ा से बड़ा मौलवी भी नहीं कर सकता है जिस की बुनियाद पर हज़रत मुजद्दिद को बिद्दती होने से बचा लिया जाए और तमाम सुनियों बरेलवियों को इस गड्ढे में ढकेल दिया जाए। में बिद्दत के सिलसिले में अल्लामा सय्यद मुहम्मद फ़ारूक़ उलक़ादरी की एक तहरीर नकल कर रहा हूँ जिस से बिद्दत की सही तारीफ़ और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की मुराद अच्छी तरह जेहन नशीन हो जायेगी। मौलाना मौसूफ़ बिद्दत पर एक नफीस कलाम के बाद तहरीर फ़रमाते हैं:

बिद्दत के बारे में इमाम रबानी मुजद्दिद अल्फ़ सानीरज़ि अल्लाह अन्हु के मसलक हुक्का को उमूमन गलत रंग देने की कोशिश की जाती है इस की वज़ाहत के लिए हम आप के ख़ानवादा आलीया के एक जलील अलक़द्र आलम दीन और नामवर बुजुर्ग शैख़ उलशयूख़ हज़रत मुहम्मद हसन ख़ाँ मुजद्दिदीरहमत अल्लाह अलैहि की तहरीर से इक़तिबास नकल करते हैं जिस से बिद्दत के

बारे में हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी अलैहि अर्रहमा के मसलक की पूरी वज़ाहत हो जाती है, आप लिखते हैं:

जानना चाहिए कि बिद्दत लुग़त में हर इस नौपीद चीज़ को कहते हैं जिस की कोई नज़ीर पहले न हो इस को बारी तआला ने यों फ़रमाया है बदी अलसमावात व उलअर्ज़ और शरा में बिद्दत इस चीज़ को कहते हैं कि जो उमूर दीन में नोपैदा करदा हो यानी जिस का वजूद हुज़ूर ﷺ के ज़माना मुबारक में न हो और वह सुन्नत के मुख़ालिफ़ और मआरिज़ हो, सुन्नत के मुख़ालिफ़ या मआरिज़ होने की कैद हम ने इस लिए लगायी कि आंहुज़ूर ﷺ के बाद इतने नये उमूर पैदा हुए हैं और वह इस जमाने में भी और इस से पहले भी इस क़द्र आम और शाय हो गए हैं कि उन से न मुक़ल्लिद न बच सकता है न गैर मुक़ल्लिद यहाँ तक कि खैर उलक़ुरून का आखिरी हिस्सा भी उन उमूर की ज़िद से न बच सिक्का जिस पर तारीख की किताबें शाहिद हैं।

हासिल कलाम यह कि मुराद बिद्दत से हदीस में वह बिद्दत है जिस को सीइआ (बुरी) कहा जाता है और जो सुन्नत के मुख़ालिफ़ और मुक़ाबिल है लेकिन वह नौपीद उमूर जो सुन्नत के मआरिज़ और मुक़ाबिल नहीं वह मुबाहात शरएहि में दाखिल हैं।

इस लिए कि हमारे मजहब में सब अश्या दर असल मुबाह हैं (हुरमत नस शारा से साबित होती है) यहाँ सवाल यह पैदा होता है कि हदीस में कल बद ज़लाल का लफ़्ज़ आया है यानी हर बिद्दत गुमराही है मगर हम ने बाज़ बिदआत को मुबाहात करार दिया इस का जवाब यह है कि शारा अलैहि अस्सलाम की मुराद लफ़्ज़ कल फरमाने से यह नहीं कि सब इक़साम बिद्दत के मुतल्लिक़न हसना हूँ या सीइआ सब ज़लालत और गुमराही हैं बल्कि लफ़्ज़ कल से मुराद है कि बिद्दत सीइआ के सारे इक़साम जो सुन्नत से टक्कर खायें और मुख़ालिफ़ हूँ गुमराही हैं इस बात पर हुज़ूर ﷺ ही का वह कौल दलील है जो सहाह में वारद

हो चुका है कि ‘‘मेरी सुन्नत को और मेरे ख़ुलफ़ाए राशिदीन की सुन्नत को जो मेरे बाद हैं अपने उपर लाज़िम पकड़ो।’’

ख़ुलफ़ाए राशिदीन की सुन्नत उएन सुन्नत नबी ﷺ तो हो ही नहीं सकती इस लिए कि अतफ़ मुग़ायरत चाहता है तो अगर कल का लफ़्ज़ अली अलातलाक़ लिया जाए तो सुन्नत ख़ुलफ़ाए राशिदीन की इत्तिबा का कोई मौका ही नहीं रहता और हज़रत सय्यदना फ़ारूक़रज़ि अल्लाह अन्हु के इस कौल का कि बेस त्रावीह बड़ी अच्छी बिद्दत है कोई महल नहीं निकलता। उलमा-ए कराम कहते हैं कि बिद्दत की बहुत सी किस्में हैं।

बाज़ उन में से तो इस जमाने में वाजिब हैं मसलन उलूम की इशाअत करना मदरसे और मुसाफिर ख़ाने बनाना वगैरह, और बाज़ सुन्नत हसना हैं जैसे बेस रकात त्रावीह पढ़ना और हुकूमत के लिए दफ्तर और कचहरियां बनाना और मसाजिद को मुनक़श पत्थरों और सागवान की लकड़ी से तामीर करना और कुरआन मजीद को मुसहफ़ में जमा करना और बाग़ीयों से जिंग करना वगैरह और बाज़ बिद्दतें मुस्तहब या मुबाह हैं जिसे आज कल के जमाने के अक्सर औज़ा और रसूम पस मशाइख़ के अत्वार व अज़कार मर्तबा और मुराक़बात मौक़िता इस बिद्दत हसना में दाखिल हैं जिन को नामवर और जीद उलमा-ए कराम ने कबूल किया है और उन को अच्छा समझा है।

और लोगों को उन बातों की तरफ़ तरग़ीब दी है और उन कामों में ख़ुद मसरूफ़ रहे हैं और न सिर्फ़ यह कि वह उन उमूर को बिद्दत नहीं समझते बल्कि इस बात पर रजामंद ही नहीं कि उन उमूर पर बिद्दत का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया जाए जैसा कि हमारे मुर्शद आज़म इमाम रबानी मुजद्दिद अल्फ़ सानीरहमत अल्लाह अलैहि का मशरब है। (फ़ाज़िल बरेलवी और उमूर बिद्दत)

में हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू के अकीदत मंदों से मुख़लिसाना अपील करूँ गा कि अपने इस रहबर आज़म के कलाम को समझने की कोशिश करें और हर इस

शख्स के बहकावे में आकर अपने ईमान और अक़ाइद हुक्का से हाथ न धो बैठें जो बजाहिर तो हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का नाम लेता है मगर दर हक़ीक़त आप और जुमला औलीए कराम की अज़मत व रफात का सख्त मुनकर है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का सही मसलक वही है जिस की निशान दही हमारे इस्लाफ़ ने और इस जमाने में बिलख़सूस इमाम अहले सुन्नत आला हज़रत क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाई है।

दूसरा बाब

असबाब क़ुर्ब इलाही:

मालूम होना चाहिए कि ख़ुदावंद क़ुद्दूस के क़ुर्ब और इस की नज़दीकी की असल इल्लत जज़्ब है यानी ख़ुदाए तआला का बंदे को अपनी तरफ़ खींचना। यह जज़्ब कभी बुला वास्ता होता है, इस को इज्तबा कहते हैं। ख़ुदाए तआला का इरशाद है:

अल्ला यज्तबीۡۤ अलीۡह मनۡ यषा (और अल्लाह अपने क़रीब के लिए चुन लेता है जिसे चाहे)

और अक्सर किसी अम्र के वास्ते से होता है। ततब्बो व तलाश के ऐतबार से वास्ता दो चीजों का होता है;एक इबादत सहीहा, दोम इंसान कामिल मुकम्मल की सोहबत। पस वह जज़्ब जो इबादत के वास्ते से होता है उसे बरकात इबादत कहते हैं और जो सोहबत के तवस्सुत से होता है इस का नाम तासीर शैख़ है। यह गुफ़्तगू उन उमूर में है जो क़ुर्ब इलाही के लिए इल्लत फ़ाइली की हैसियत रखते हैं।

क़ुर्ब इलाही में इंसानी इस्तिदाद को भी दखल होता है, हर इंसान की इस्तिदाद और सलाहीयत जुदा जुदा होती है। सय्यद आलिम ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं: एलिनास मुआदन कमादन अलज़हब वालफ़ज़्त यानी इंसान कानें हैं जिस तरह सोने चांदी की कानें होती हैं, कहीं से सोना बरामद होता है और किसी जमीन से चांदी, कहीं से लोहा तो कहीं से पीतल वगैरह। इंसानी इस्तिदाद इल्लत काबिली की हैसियत रखती है।

मवाने क़ुर्ब:

क़ुर्ब इलाही से रोकने वाले उमूर नफ़्स के रिज़ाइल और अनासिर का ख़बस और आलम अम्र

के लताइफ़ की गफलत हैं यही वह चीजें हैं जो क़ुर्ब से माने होती हैं। इंसान जब सही तरीके से इबादत करता है और शैख़ कामिल मुकम्मल की सोहबत व ख़िदमत इख्तियार करता है तो जिस तरह उन चीजों से क़ुर्ब इलाही के मदारिज आलीया तै करता है इसी तरह उन चीजों से क़ुर्ब इलाही के मवाने को भी दफा करता है।

इस बयान से आप ने समझ लिया होगा कि नाक़िस के लिए ज़रूरी है कि वह उन दो चीजों को इख्तियार करे एक तो कसब यानी शैख़ की तजवीज़ के माफ़िक़ इबादात व रियाज़ात अपनाए जिस की वजह से मवाने क़ुर्ब दफा हूँ नफ़्स का तज़किया हासिल हो अनासिर को रिज़ाइल और बुरी ख़सलतों से पाकी व तहारत मयस्सर आये और आलम अम्र के लताइफ़ का तसफ़ीया हो। दूसरी चीज़ शैख़ कामिल मुकम्मल का जज़्ब है जो कि निस्बत अता करे और क़ुर्ब हक़ की मंजिलों से हमकनार करे और खाक की पस्तियों से निकाल कर अफ़्लाक की बुलंदियों से हम आगोश करे।

अक्सर सलासल के मशाइख़ ने सुलूक को जज़्ब पर मुक़द्दम रखा है उन्हों ने यह देखा कि पहले उन चीजों का रफा और अज़ाला ज़रूरी है जो क़ुर्ब से माने होती हैं फिर मक़ासिद की तहसील हो इस लिए यह हज़रात मुरीदैन को अज़कार व रियाज़ात का हुक्म देते हैं और अपनी हिम्मत व तवज्जो उन की तरफ़ मबज़ूल रखते हैं ताकि आलम अम्र व आलम ख़ल्क़ के लताइफ़ को मज़क्की व मुतहर किया जा सके और मुरीदैन के नफ़ूस अख़लाक़ हसना और पसंदीदा औसाफ़ मसलन तौबा व अनाबत, ज़हद व तोकल, सब्र व रज़ा और दीगर औसाफ़ सिदक़ व सफ़ा और मुक़ामात अशरा मशहूरा से मुत्तसिफ़ हो सकें और उन के अंदर क़ुर्ब हक़ की इस्तिदाद और काबिलियत पैदा हो ताकि बारगाह इलाही की तरफ़ उसे जज़्ब करें और क़ुर्ब इलाही अता करें। चों कि यह राह बहुत दौर और तवील है और इस में बड़ी परख़ार वादियों से गुज़रना पड़ता है इस लिए

हज़रत ख़्वाजा ख़्वाजगां मुहम्मद बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू को ऐसा रास्ता इलहाम फ़रमाया जिस में जज़्ब सुलूक पर मुक़द्दम है।

नक़्शबंदी हज़रात पहले लताइफ़ आलम अम्र में अलक़ा ज़िक्र की तरफ़ तवज्जो फ़रमाते हैं और अपनी आली हिम्मतों से उन लताइफ़ को जाकिर करते हैं गुनाहों में मलूस होने और दुनिया और अहले दुनिया की सोहबत बद की वजह से लताइफ़ चों कि अपनी असल भूल चुके होते हैं और ख़ुदावंद क़ुद्दूस की याद से गाफिल होते हैं शैख़ कामिल अपनी तवज्जो से नूर का अल्का कर के उन ख़बास्तों और गंदगियों से लताइफ़ को पाक करता है और लताइफ़ को उन के उसूल याद दिलाता है हक़ तआला के ज़िक्र से मामूर व आबाद करता है ताकि अपने उसूल में फ़ानी और मस्तहलक हूँ।

ख़याल रहे कि तसफ़ीया व तज़किया में ज़्यादा दखल शैख़ की तवज्जो को है क्यों कि बरकात इबादत का मामला यह है कि जो इंसान कामिल है इस की इबादत जो भी क़ुर्ब बख़्शेगी मोतबर होगा लेकिन नाक़िस की इबादत से जो क़ुर्ब हासिल होता है वह काबिल शुमार नहीं क्यों कि इबादत का सवाब भी मदारिज के लिहाज से मिलता है जो तरक्की और ज्यादती क़ुर्ब कामिल इंसान को इबादत बख़्शेगी वह नाक़िस को नहीं हत्ताई कि कहा जाता है कि तमाम आलम की इबादत वली की इबादत के मुक़ाबिल ज़ुल की हैसियत रखती है। पस मुरीद को सिर्फ़ वही चीजें इख्तियार करनी चाहिए जिन का शैख़ हुक्म दे शयूख़ मुरीदैन को रियाज़त व मुजाहिदा का हुक्म भी सिर्फ़ इसी लिए करते हैं ताकि अनासिर को तसफ़ीया और नफ़्स को तज़किया हासिल हो हुसूल क़ुर्ब मकसूद नहीं होता है बल्कि इबादत व रियाज़त से तन्हा तज़किया व तसफ़ीया हासिल नहीं होता है जब तक तासीर शैख़ हासिल न हो।

एक वहम का अज़ाला:

बहुत से लोग यह समझते हैं कि विलायत इसी वक़्त हासिल हो सकती है जब कि बड़े चिल्ले किए जाएँ, रोज़े पर रोज़े रखे जाएँ, इंसान हर इस चीज़ से दस्त बरदार हो जाए जिस का ताल्लुक दुनिया से है इस लिए लोगों की नज़र में ऐसे लोगों की बहुत अहमियत होती है जो हर एक से तर्क ताल्लुक कर के गोशा तन्हाई में तस्बीह व तहलील में मशगूल रहते हैं और बड़ी बड़ी रियाज़तीं और मुजाहिदात इख्तियार करते हैं।

इस के बुर खिलाफ़ जो अश्ख़ास उन चीजों को बजाहिर नहीं अपनाते हैं बल्कि कोशिश करते हैं कि हमारा हर कौल व फेअल सुन्नत के मुताबिक हो, यह हज़रात लाख बुलंदियों पर फ़ाइज़ हूँ मगर उन की कोई अहमियत नहीं। यह चीज़ बहुत बड़ी जहालत और नादानी पर मुश्तमिल है, इस की वजह से नामालूम कितने वलियों की विलायत से इंकार और कितने गैर वली हज़रात को विलायत का ताजदार समझ लिया जाता है और ज़ाहिर है उन दोनों ही चीजों से महरूमियों और बुराइयों के दरवाजे खिलते हैं। असल रियाज़त और सब से बड़ा मुजाहिद इत्तिबा सुन्नत और शैख़ कामिल की सोहबत है, नक़्शबंदी बुजुर्गों के बुलंद मदारिज से आम तौर पर लोग इस लिए नावाकिफ़ रहे इस लिए कि उन के यहाँ इत्तिबा सुन्नत और सोहबत शैख़ यही दो चीजें हुसूल तरक़्क़ीयात के लिए लाज़िम हैं जो अवाम की नज़र में इस लायक नहीं कि उन से बुलंद दर्जात हासिल हो सकें।

आप जरा सोचें कि इस्लाम एक कामिल मुकम्मल दीन है और सारे दर्जात का जामा सय्यद कायनात ﷺ की इत्तिबा से अगर वह सारे कमालात नहीं हासिल हो सकते हैं जो आम बशर के लिए मुमकिन हैं तो ऐसा शख्स बालफ़ाज़ दीगर यह समझता है कि आप की शरीअत मुक़ामात क़ुर्ब इलाही की तहसील के लिए काफ़ी नहीं है। नऊज़ बिल्लाह मिन ज़ालिक

ख़ुदावंद क़ुद्दूस ऐसे बुरे तस्वरात से हर एक को महफूज़ रखे, आमीन। हुसूल

तरक़्क़ीयात को कभी भी बड़े बड़े मुजाहिदात और ऐसी अज़ीम रियाज़तों पर मौक़ूफ़ नहीं समझना चाहिए जिन का सबूत सुन्नत से नहीं है।

नीज़ इस का भी ध्यान रखना चाहिए कि मशाइख़ ने वक़्ती मस्लहतों की वजह से जो रियाज़ात व मुजाहिदात मुक़रर फ़रमाए उसे हम बिद्दत कह कर रद्द करें उन बुजुर्गों की तरह जिन के यहाँ तन्क़ीस ओलिया ही इबादत है (रियाज़ात व मुजाहिदात मुक़रर करने में) उन लोगों के मक़ासिद नेक थे हरगिज़ हरगिज़ ज़बान से ऐसी बात न निकालें जिस से उन बुजुर्गों की तन्क़ीस लाज़िम आये।

अक़्रब तरक:

ख़्वाजा खोजगां मुहम्मद बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू ने अल्लाह तआला की बारगाह में अर्ज़ किया था कि ऐसा तरीका अता फ़रमा जो क़रीब तर और हर हाल में मूसिल हो आप की दुआ शरफ़ कबूल से मुशर्रफ़ हुई और हुक्म हुआ कि तुम्हारे तरीक़ में जज़्ब सुलूक पर मुक़द्दम रहेगा, दूसरे तरीकों में सुलूक को जज़्ब पर मुक़द्दम करते हैं, यानी पीर कामिल अपने मुरीद को पहले रियाज़ात (अर्बईन, बेदारी व ग्रसंगी वगैरह) का हुक्म देता है और उन रियाज़तों से मुरीद के अनासिर व नफ़्स को मुसफ़ा करता है जब मुरीद अपने नफ़्स व अनासिर की तहारत अपने से बाहर आलम मिसाल में देखता है मसलन सितारा या हलाल या माह नाक़िस या बदर कामिल या आफताब तो इसी वक़्त शैख़ इस मुरीद को फना व तसफ़ीया नफ़्स व अनासिर्की बशारत देता है उसे सुलूक कहते हैं और इस सैर को सैर आफ़ाक़ी कहते हैं।

इस के बाद शैख़ महज़ अपनी तवज्जो से मुरीद के लताइफ़ आलम अम्र के तज़किया में मशगूल होता है यहाँ तक कि वह फना व बका हासिल करते हैं उसे जज़्ब कहते हैं और इस सैर को सैर इंफ्सी कहते हैं क्यों कि इस सैर में तालिब जो कुछ (इस्तिनारत व तरक्की व

वसूल बासल व फना) देखता अपने अंदर देखता है बना बुर तवज्जीया हज़रत मुजद्दिदरज़ि अल्लाह अन्हु इस सैर को सैर इंफ्सी इस वास्ते कहते हैं कि इनफ्स, असमा व सिफ़ात बारी तआला के ज़लाल व अकूस के आईने हो जाते हैं न यह कि सालिक की सैर नफ़्स में होती है यहाँ हक़ीक़त में ज़लाल असमा की सैर है इनफ्स के आईनों में, तरीका नक़्शबंदिया में जज्बा को सुलूक पर मुक़द्दम करते हैं और इबतिदा लताइफ़ आलम अम्र से करते हैं सुलूक, जज्बा के ज़िमन में और सैर आफ़ाक़ी, सैर इंफ्सी के ज़िमन में तै हो जाती है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इस की तौज़ीह व तशरीह यों फ़रमाते हैं कि सैर व सुलूक और जज्बा व तसफ़ीया से मकसूद नफ़्स को अख़लाक़ रदीय और औसाफ़ रज़ीला से पाक करना है, इनफ्स की गिरफ्तारी और मुरादात नफ़्स का हुसूल सब से बड़ी बुराई है आफ़ाक़ की गिरफ्तारी इनफ्स की गिरफ्तारी के सबब से है क्यों कि जिस चीज़ को कोई शख्स दोस्त रखता है अपनी दोस्ती के सबब से दोस्त रखता है मसलन अगर फ़रज़न्द व माल को दोस्त रखता है तो अपने फायदे के लिए दोस्त रखता है चों कि सैर इंफ्सी में मुहब्बत ख़ुदा तआला के ग़लबा के सबब से अपनी दोस्ती ज़ाइल हो जाती है इस लिए इस के ज़िमन में फ़रज़न्द व माल की दोस्ती भी ज़ाइल हो जाती है इस तरह सैर इंफ्सी के ज़िमन में सैर आफ़ाक़ी भी क़ता (तै) हो जाती है इस सूरत में सैर आफ़ाक़ी व सैर इंफ्सी के मानी भी बलातकल्लुफ़ दुरुस्त रहते हैं क्यों कि हक़ीक़त में सैर इनफ्स में भी है और आफ़ाक़ में भी इनफ्स के ताल्लुकात का क़ता बतदरीज इनफ्स में सैर है और आफ़ाक़ के ताल्लुकात का क़ता जो सैर इंफ्सी के ज़िमन में होता है आफ़ाक़ में सैर है दीगर मशाइख़ ने उन दोनों के जो मानी बयान किए हैं उन में तकल्लुफ़ है पस तरीका नक़्शबंदिया में राह अक़्रब हुई।

तरीका नक़्शबंदिया के अक़्रब तरक होने की एक वजह और भी है वह यह है कि

हज़रात नक़्शबंदिया का वसीला हुज़ूर सर्वर अंबिया अलैहि व अला आला अस्सलवात व इलतसलीमात की जनाब में हज़रत अबू बुकर सिद्दीक़रज़ि अल्लाह अन्हु हैं, ज़ाहिर है कि वसीला जिस क़द्र ज़्यादा कवी होगा राह वसूल अक़्रब होगी और क़ता मनाज़िल बहुत जल्दी हो जाए गा वह जो इस सिलसिला आलीया के अकाबिर की इबारत में वाक़्य है कि हमारी निस्बत (यानी दवाम हुज़ूर या दवाम आगाही) हज़रत सिद्दीक़ अकबररज़ि अल्लाह अन्हु की सुन्नत है जो पैगम्बर के बाद अफ़ज़ल अलबशर हैं और हज़रत सिद्दीक़ अकबररज़ि अल्लाह अन्हु की आगाही यक़ीनन सब आगाहियों से अर्फ़ा व आला है।(तज़किरा मशाइख़ नक़्शबंदिया)

यह तरीक़ अलबत्ता मूसिल है:

तरीका नक़्शबंदिया बह्र हाल मूसिल है, अदम वसूल का यहाँ एहतिमाल नहीं पाया जाता है क्यों कि इस राह का पहला क़दम जज्बा है जो वसूल की दहलीज़ है। सालिक के वसूल का माने या जज़्ब महज़ है जिस में सुलूक न हो या सुलूक महज़ बग़ैर जज्बा के और यहाँ यह दोनों माने नहीं पाए जाते क्यों इस तरीक़ में न सुलूक खालिस है न जज्बा महज़ बल्कि जज्बा है मुतज़िमन सुलूक लिहाज़ा इस सिलसिला आलीया में वसूल से माने ख़ुद तालिब की सस्ती हो सकती है और कोई चीज़ माने नहीं। तालिब सादिक अगर पीर कामिल की सोहबत में रहे और तलब के शराइत बजा लाये तो उम्मीद है कि अलबत्ता वासल होगा। अगर पीर नाक़िस से किसी का पाला पड़ जाए तो चों कि वह ख़ुद वासल नहीं लिहाज़ा दूसरे को कैसे वासल बना सकता है इस सूरत में कसूर तरीका का नहीं। (मक्तूब 221 व तज़किरा)