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अध्याय 1 में से 22पृष्ठ 12–23

अर्ज़ मुरत्तिब

हामिदन व मुसलिय्न व मुसलमन

सिलसिला नक़्शबंदिया तरीक़त के चार अहम और मशहूर सलासल में से एक है जिस का चश्मे फ़ैज़ हज़रत अबू बुकर सिद्दीक़ रज़ि अल्लाह अन्हु की ज़ात है। बल्कि यह वाहिद सिलसिला है जो अमीर उलमोमिनीन हज़रत अबू बुकर सिद्दीक़ रज़ि अल्लाह अन्हु के वास्ते हुज़ूर ख़त्म एल्मरसिलीन ﷺ तक पहुँचता है। मगर ख़्वाजा बुजुर्ग हज़रत सय्यदना बहा उद्दीन नक़्श बंद बुखारी क़ुद्दिस सिर्रहू के बाद से यह सिलसिला आप से मंसूब हो कर नक़्शबंदिया कहलाया।

हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग और उन के मशाइख़ सिलसिला के दम क़दम से यह सिलसिला बहुत जिल्द दुनिया के बेशतर मुमालिक में फैल गया।और आज भी तुर्की , चेन हिंदूपाक और अफगानिस्तान वगैरह में एक बड़े सोफी सिलसिला की हैसियत से मुतआरिफ़ है।

इस सिलसिला के उरूज व इर्तिक़ा के बहुत से असबाब हैं । मगर दो सबब सब से अहम हैं : एक यह कि इस में सालकेन को बदन सोज़ मुजाहिदात व रियाज़ात से दो चार नहीं होना पड़ता है बल्कि शैख़ की सोहबत व मुहब्बत ही रियाज़तों और मुजाहिदों से कहीं ज़्यादा बातिनी तरबीयत करदेती है। दूसरे यह कि इत्तिबा सुन्नत ही इस सिलसिले का असल मुजाहिदा है।

इस सिलसिला नेवाम , उमरा , वुज़रा और अर्बाब सल्तनत को एकसां फायदा पहुँचाया। हिंदोस्तान केमुगल हुक्मरानों ने इस सिलसिला से खूब इर्तिबात पैदाकिया । चुनांचे मुग़्लिया सल्तनत का बानी ज़हीर उद्दीन मुहम्मद बाबर , हज़रत ख़्वाजा उबीद अल्लाह एहरार नक़्शबंदी क़ुद्दिस सिर्रहू का जबरदस्त अकीदत मंद रहा औरइस ने उन की सवानिह पर एक किताब भी कलम बंद किया ।

बाद में जब हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू ने सिलसिला नक़्शबंदिया को इस के ओज कमाल तक पहुँचाया फिर्तो जहांगीर सेले कर औरंग ज़ेब रहिमा अल्लाह और उन की औलाद इस दर की गदागरी को सरमाया इफ्तिख़ार समझती रही ।

यह ख़ुदा तआला का फजल रहा कि जब भी इस सिलसिला की ताबानी में कुछ भी कमी आई तो इस ने किसी शहबाज़ को भेज कर अफ़ाज़ा व इस्तिफ़ाज़ा कोमज़ीद दो चंद करदिया । इस वक़्त हिंदोस्तान में नक़्शबंदीत व मुजद्दिदेत के अहम अमीन शहर क़न्नौज की अज़ीम रूहानी शख्सियत बह्रुल-इरफ़ान हज़रत मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी की ज़ात है जो न सिर्फ़ सिलसिले की निसबतों के अमीन हैं बल्कि उन को तकसीम भी कर रहे हैं,आप की सोहबत के फ़ैज़ याफ़तगान विलायत सुग़रा विकिबरा वगैरह की मंजिलें तै करके अपने अपने हलकों में तसव्वुफ़ वरूहानियत काकाम बड़े इख़लास के साथ कर रहे हैं।

आप अपने मुरीदैन व मस्तर्षदीन की तरबीयत अपनी सोहबत से तो करते ही हैं मज़ेद उन की रूहानी तिश्नगी बुझाने के लिए वक़तन फ़वक़तन अहम अहम मौज़ूआत पर मआरिफ़ व हक़ायक़ से लबरेज़ कुतुब वर्साइल लिखते रहते हैं जिन में ज़्यादा तर हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू की तहरीरात ख़ास कर मक्तोबात शरीफ़ से माख़ूज़ हो ते हैं।

ख़साइस नक़्शबंदिया:

बह्र उल-इरफ़ान की यह किताब दो हिस्सों पर मुश्तमिल है जो सिलसिला नक़्शबंदिया के मआरिफ़ व हक़ायक़ और ख़ुसुसीआत का गुंजेना है,यह किताब 1411ह में यानी तक़रीबन 29/साल पहले लिखी गई थी,राक़िम को जब इस पर इत्तिला मिली तो दिल्ली मुसर्रत हुई और अपनी बे बज़ाअती और कम इल्मी के बा वजूद अल्लाह की ज़ात पर भरोसा करते हुए इस की एडीटिंग औरिशाअत में लग गयाजू बहमदा तआला अंजाम तक पहुँचा।हत्ता उलमक़दूर गलतियों से पाक करने की कोशिश की गई है मगर फिर भी क़ारईन कराम को जहां कहीं भी कोई गलती नज़र आये तो मतला करके ममनून फरमाएं!

सय्यद नूर आलम मिस्बाही

रिसर्च स्कालर शोबा फ़ारसी ,अली गढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी,अली गढ़

E-mail:nooralammisbahi@gmail.com

बिस्म अल्लाह अलरहमान अलरहीम

नहमदा व नसली व नस्लिम अला रसोलह उलक्रीम

पहला बाब

नक़्शबंदीत की बुनियाद दो चीजों पर है:

सिलसिला आलीया नक़्शबंदिया के बारे में किया कहा जा सकता है कि इस की असल बुनियाद दो चीजों पर है। अव्वल अहले सुन्नत व जमात की आरा के मुताबिक एतिक़ाद। दोम सुन्नत सनेह की इत्तिबा व पैरवी। नक़्शबंदी बुजुर्गों के तमाम अनिवार व तजल्लियात का हुसूल बुनियादी तौर प्रान्ही पर मौक़ूफ़ है। मिसाइल एतिक़ादिये में उलमा-ए अहले सुन्नत की राए के खिलाफ़ यकसर मो भी तजावुज़ को वह ज़हर कातिल समझते हैं। निजात अब्दी का दार व मदार उन्ही एतिक़ाद हुक्का पर मबनी करार देते हैं। अगर यह नहीं तो कुछ भी नहीं। इस सिलसिले में अगर उन बुजुर्गों के अक़्वाल और ताकीदात को जमा किया जाए तो बड़ी ज़ख़ीम किताब तैयार हो सकती है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के चंद इर्शादात ह्दय क़ारईन हैं, आप फ़रमाते हैं:

आदमी को तीन चीजों से चारा नहीं ताकि निजात अब्दी मयस्सर हो; इल्म, अमल, इख़लास। इल्म की दो किस्में हैं; एक वह जिस से मकसूद अमल है कि इस का मुतकल्लिल इल्म फ़िक़्ह है और दूसरे वह इल्म है जिस से मकसूद महज़ एतिक़ाद और यकीन कलबी है कि इल्म कलाम में बालतफ़सील ज़िक्र किया गया है। बमुकतज़ाए आरए साइबा अहले सुन्नत व जमात जो कि फ़िर्क़ा नाज्य हैं उन बुज़ुर्गवारों की इत्तिबा के बग़ैर निजात का तसोर नहीं किया जा सकता है। अगर एक बाल बराबर भी मुखालफत है तो ख़तर दर ख़तर है। यह बात कश्फ़ सही और इलहाम सरीह के ज़रिया भी यकीन से पैवस्ता हैकि तख़ल्लुफ़ का एहतिमाल नहीं रखती है। पस खुश खबरी है इस के लिए जिसे अहले सुन्नत व जमात की इत्तिबा की तौफ़ीक़ दी गई और उन की तक़लीद से मुशर्रफ़ किया गया। (मक्तूब:59, दफ्तर अव्वल)

एक दूसरे मक़ाम पर फ़रमाते हैं: फ़िर्क़ा नाज्य अहले सुन्नत व जमात रिज़वान अल्लाह तआला अलैहिम अजमईन जो कि स्वाद आज़म और जम ग़फ़ीर हैं की आरा के मुताबिक अक़ाइद सही करना हर हाल में ज़रूरी है ताकि फ़लाह और उखरवी निजात मकसूद हो सके और एतिक़ाद की गंदगी कि अहले सुन्नत व जमात के एतिक़ादात की मुखालफत है, ज़हर कातिल है जो कि अब्दी मुद्दत और दाइमी अज़ाब तक पहुँचाती है। अमल में सस्ती व काहिली करने से उम्मीद मग़फ़िरत है लेकिन एतिक़ाद की मदाहंत (सस्ती) मग़फ़िरत की गुंजाइश नहीं रखती है।

اِنَّ اللہَ لَا یَغْفِرُ اَنۡ یُّشْرَکَ بِہٖ وَیَغْفِرُ مَا دُوۡنَ ذٰلِکَ لِمَنۡ یَّشَآءُ (النساء: ۴؍۴۸)

तर्जुमा: बे शक अल्लाह उसे नहीं बख्शता कि इस के साथ कुफ्र किया जाए और कुफ्र से नीचे जो कुछ है जिसे चाहे माफ़ फ़रमादेता है।’’ (मक्तूब:67, दफ्तर अव्वल)

तरीक़ सालिक के लिए जो उमूर ज़रूरी हैं उन में एक एतिक़ाद सही है कि उलमा-ए अहले सुन्नत ने इस एतिक़ाद को किताब व सुन्नत के अक़्वाल से इस्तिंबात फ़रमायाहै। यह भी ज़रूरी है कि किताब व सुन्नत को उन्ही मआनी पर महमूल रखा जाए कि जमहूर उलमा-ए अहले हक़ यानी अहले सुन्नत व जमात ने जिन मआनी को इस किताब व सुन्नत से समझा है और अगर बिलफ़र्ज़ उन मआनी के खिलाफ़ जो कि कश्फ़ व इलहाम से समझे गए हैं, कोई अम्र ज़ाहिर होता है तो इस का ऐतबार नहीं करना चाहिए और इस से अल्लाह तआला की पनाह चाहनी चाहिए।(मक्तूब: 286, दफ्तर अव्वल)

रशद व हिदायत के मुतलाशी के लिए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जैसे बुरहान हक़ के यह इर्शादात बहुत काफ़ी हैं। अब देखना यह है कि हज़रत मुजद्दिद जिन को अहले सुन्नत और फ़िर्क़ा नाज्य करार दे रहे हैं इस के मिस्दाक़ वह लोग जो हयात अंबिया व तवस्सुल व इमदाद व इल्म

ग़ैब वगैरहा मिसाइल के जवाज़ का एतिक़ाद रखते हैं या उन के मुनकर हैं। हम इख़तिसार के साथ यह क़ारईन को दिखा दें गे कि हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू और उन के मुजद्दिदी सुलूक से ख़ुदा तक पहुँचने वालों के नज़दीक अहले सुन्नत व जमात या फ़िर्क़ा नाज्य के मिस्दाक़ इस जमाने में वही लोग हैं जिन्हें आज भी अहले सुन्नत या सन्नी या बरेलवी कहा जाता है। वह हरगिज़ इस के मिस्दाक़ नहीं जो वहाबी, देवबंदी, नीचरी व गैर मुक़ल्लिद वगैरह दीगर असमा के साथ मौसूम हैं।

बहुत से वह लोग जो हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के कमालात को तसलीम करते और उन को अपना मुक़तदा विरहनुमा मानते हैं मगर फिर भी अहले सुन्नत व जमात के बहुत से मिसाइल में इख़तिलाफ़ करते हैं यह लोग बज़ाम ख़वेश अपने आप को अहले सुन्नत में तसोर करते हैं जब कि तन्क़ीस अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात और तौहीन औलीए अजाम क़ुद्दिस इसरारहम ही को उन्हों ने अपना शेवा बना लिया है। आज मौजूदा फ़र्क़ बातिला से अहले सुन्नत व जमात जिन उमूर व मिसाइल के साथ मुमताज़ हैं उन के मुनकर हैं।’’

मौजूदा दौर में अहले हक़ यानी अहले सुन्नत व जमात जो लोग हैं उन के मारूफ़ अक़ाइद में यह है कि ज़ात ख़ुदावंदी पर इमकान किज़्ब को जायज़ नहीं समझते हैं, अल्लाह तआला के मुक़र्रब बंदों अनबीए कराम व औलीए अजाम के लिए इल्म ग़ैब और तवस्सुल व इमदाद वग़ैरहम उमूर को जायज़ मानते हैं। जो लोग उन उमूर के इंकार ही को असास दीन और फ़लाह दारेन समझते हैं फिर भी अहले सुन्नत व जमात में से अपने आप को गिनते हैं बल्कि दर असल इस का मुस्तहिक़ अपने आप को ही तसोर करते हैं जब उन से कहा जाता है कि आप तो वहाबी गैर मुक़ल्लिद देवबंदी वगैरह अलक़ाब से मारूफ़ हैं, अहले सुन्नत से नहीं, ऐसे मौका के लिए शैतान ने उन के जेहन में एक अजीब तावेल बिठाल दी है जिस

से वह अपने क़ुलूब को भी मुतमइन किए रहते हैं और दूसरों को भी तस्कीन देने की कोशिश करते हैं, कहते हैं कि अहले सुन्नत व जमात की इस्तिलाह दर असल एतिज़ाल और रफ़्ज़ व ख़ुरूज के मुक़ाबिल में वज़ा हुई है लिहाज़ा जो मोतज़िला रवाफ़िज़ व ख़वारिज में से नहीं है वह अहले सुन्नत है। इस लिहाज से हम भी अहले सुन्नत से हैं। में उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि अगर अहले सुन्नत का यही मतलब है तो मिरज़ाई, नीचरी, चकड़ालवी वगैरह सभी अहले सुन्नत हुए फिर उन पर गुमराह और काफ़िर होने के फतवे क्यों जुड़ते हैं? यह भी मोतज़िला व रवाफ़िज़ व ख़वारिज से नहीं हैं।

हम चाहते हैं कि क़दरे तफ़सील से हज़रत मुजद्दिद और उन के मुतवस्सिलीन व मुंतस्बीन के अक़्वाल नकल करदें ताकि अहले ज़माना देख लें कि यह हज़रात जिन्हें अहले सुन्नत करार देते हैं इस के मिस्दाक़ दर असल वही अहले हक़ हैं जो आज भी अहले सुन्नत या सन्नी या बरेलवी के नाम से मारूफ़ व मशहूर हैं। ख़ुदावंद क़ुद्दूस इत्तिबा हक़ की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, आमीन।

हयात अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू बर्ज़ख़ सुग़रा यानी कब्र में अनबीए कराम की तरक्की बयान करते हुए इरशाद फ़रमाते हैं:

बर्ज़ख़ सुग़रा चों अज़ यक वजह मुवातिन दुनयवी अस्त गुंजाइश तरक्की दारद व अहवाल एं मवतन नज़र बाशख़ास मुत्तफ़ावता तफ़ावुत फ़ाहश दारद अलानबया यसल्लून फ़ी अलक़ुबूर शनैदा बाशिंद व हज़रत पैगम्बर मा अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम शब् मेराज चों बुर कब्र हज़रत क्लेम अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम गुज़श्तनद, दीदनद कि दर कब्र नमाज़ मैग्जारन्द व हमां लहज़ा चों बासमान रसीदनद हज़रत क्लेम रा आंजा याफ़्तुंद। कब्र चों कि एक जिहत से दुनयवी मुवातिन से है (इस लिए) तरक्की की गुंजाइश रखती है इस महल के अहवाल मुख़तलिफ़ अश्ख़ास की तरफ़ नज़र करते हुए बहुत तफ़ावुत रखते हैं, आप ने सुना होगा अनबीए कराम अलैहिम अस्सलात व अस्सलाम कब्रों में नमाज़ पढ़ते हैं और हमारे नबी अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम मेराज की रात जब हज़रत क्लेम अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम की कब्र पर गुज़रे देखा कि हज़रत क्लेम कब्र में नमाज़ पढ़ रहे हैं और इसी लहज़ा जब आसमान पर पहुँचे हज़रत क्लेम को इस जगह पाया।

बर्ज़ख़ सुग़रा चों अज़ यक वजह मुवातिन दुनयवी अस्त गुंजाइश तरक्की दारद व अहवाल एं मवतन नज़र बाशख़ास मुत्तफ़ावता तफ़ावुत फ़ाहश दारद अलानबया यसल्लून फ़ी अलक़ुबूर शनैदा बाशिंद व हज़रत पैगम्बर मा अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम शब् मेराज चों बुर कब्र हज़रत क्लेम अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम गुज़श्तनद, दीदनद कि दर कब्र नमाज़ मैग्जारन्द व हमां लहज़ा चों बासमान रसीदनद हज़रत क्लेम रा आंजा याफ़्तुंद। कब्र चों कि एक जिहत से दुनयवी मुवातिन से है (इस लिए) तरक्की की गुंजाइश रखती है इस महल के अहवाल मुख़तलिफ़ अश्ख़ास की तरफ़ नज़र करते हुए बहुत तफ़ावुत रखते हैं, आप ने सुना होगा अनबीए कराम अलैहिम अस्सलात व अस्सलाम कब्रों में नमाज़ पढ़ते हैं और हमारे नबी अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम मेराज की रात जब हज़रत क्लेम अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम की कब्र पर गुज़रे देखा कि हज़रत क्लेम कब्र में नमाज़ पढ़ रहे हैं और इसी लहज़ा जब आसमान पर पहुँचे हज़रत क्लेम को इस जगह पाया।

(आगे फ़रमाते हैं) इस जगह का मामला अजायब व ग़राइब रखता है। आज कल फ़रज़न्द आज़म मरहूम (ख़्वाजा मुहम्मद सादिक क़ुद्दिस सिर्रहू) की तक़रीब पर इस मक़ाम की तरफ़ बहुत नज़र की जाती है इस लिए इसरार गरीबा ज़ाहिर होते हैं अगर उन का थोडा सा भी हाल बयान किया जाए तो फ़ित्नों का सबब होगा हर चंद जन्नत की छत अर्श मजीद है लेकिन कब्र भी जन्नत के बगीचों में से एक बगीचे है। अगरचे अक्ल कोताह अंदेश उन बातों के तसोर से आजिज़ है वह और ही आंख है जो इस किस्म के अजायब को देखती है। (मक्तूब:16, हिस्सा शुशम, दफ्तर दोम)

हामिल लोए मुजद्दिदी मज़हर कमालात अहमदी हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम सरहंदी इब्न मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस अल्लाह इसरारह्मा से सवाल किया गया कि अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात कब्रों में हयात रखते हैं या नहीं और अगर रखते हैं तो इस जैसी हयात कि दुनिया में रखते थे या दीगर तौर पर आप फ़रमाते हैं।

हयात दारणद उलाۤ अन् औलीआ अल्ला ला यमवतून व लाकन यंत्कलोन मन दार हुला दार लेकिन न मसल हयात दुनयवी कि अज़ दुनिया इंतकाल करदा बाख़िरत पैवस्ता इंद व दर दर्जात क़ुर्ब मिलतज़ व खरसनद अलानबया यसल्लून फ़ी कबूरहम शनोदा बाशिन्दो हर जा कि इतलाक़ मौत बरें बुज़ुर्गवारां आमदा अस्त बाइतबार इंतकाल शां अज़ीं दार फ़ानी।

(मक्तूब:36, अज़ मक्तोबात मासूमय) हयात रखते हैं, खबरदार, अल्लाह तआला के ओलिया मरते नहीं हैं लेकिन एक घर से दूसरे घर की तरफ़ मुंतक़िल हो जाते हैं लेकिन दुनयवी हयात के मसल नहीं कि दुनिया से मुंतक़िल हो कर आख़िरत से मिल गए हैं और क़ुर्ब के दर्जात में लज़्ज़तें हासिल कर रहे हैं और खुश हैं, आप ने सुना होगा कि अनबीए कराम अपनी कब्रों में नमाज़ पढ़ते हैं और जिस जगह कि लफ़्ज़ मौत का इतलाक़ उन बुज़ुर्गवारों पर आया है वह इस दार फ़ानी से इंतकाल करने के ऐतबार से है।

अदना सा भी शऊर रखने वाला समझ सकता है कि अंबिया तो अंबिया आप जुमला औलीए कराम के लिए हयात का इस्बात फ़रमा रहे हैं। उन हज़रात की मौत मौत नहीं होती बल्कि दार फना से दार बका की तरफ़ कोच होता है बल्कि और तरक्की दर तरक्की है। ख़याल रहे कि आप के कौल ‘‘लेकिन न मसल हयात दुनयवी’’ का मतलब यह नहीं है कि वह हयात इस से कमजोर होती है बल्कि बाज़ वह हवाइज बश्री जो दुनिया में रहने वालों को आरिज़ होते हैं जैसे खाना पीना, बोल व ब्राज़, रंज व अलम, हज़न व ग़म व बीमारी वगैरह उन उमूर की वहाँ कोई हाजित नहीं रहती है। बस इतना ही फ़र्क़ होता है। गौर किया जाए तो मालूम होगा कि यह तो एक किस्म की तरक्की है।

एक वक़्त में मुतअद्दिद मुक़ामात पर जलवा गर होना:

अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात और औलीए कराम क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहम का एक वक़्त में मुतअद्दिद मुक़ामात पर ज़ाहिर होना और तशरीफ़ ले जाना दुनयवी हयात में या बाद विसाल बल्कि दुनिया में आने से पहले भी हक़ और साबित है अहले हक़ का अक़ीदा यही है। चनां चह फ़ुतूहात मुक्य में हज़रत शैख़ इब्न अरबी क़ुद्दिस सिर्रहू की एक नकल से

मुताल्लिक़ हज़रत मुजद्दिद से सवाल किया गया इसी का जवाब देते हुए और तनासुख़ का रद्द करते हुए ख़ुद ही एक सवाल फ़रमाते हैं:

सवाल: हज़रत अमीर कर्म अल्लाह तआला वजहा और बाज़ दूसरे औलिया अल्लाह से भी मनक़ूल है कि बाज़ आमाल गरीबा और अफ़आल अजीबा वजूद अंसरी (यानी इस बदन से जो अनासिर से मुरक्कब है) से तवील जमाने पहले उन से आलम शहादत में वाक़्य हुए इस नकल का सही होना तनासुख़ को जायज़ करार दिए बग़ैर हो सकता है?

जवाब: उन आमाल व अफ़आल का सदूर उन बुज़ुर्गवारों की रूहों से है कि अल्लाह तआला की मशीयत से अपने आप अजसाम से मुतजस्सिम होकर रूहें अफ़आल अजीबा से मुबाशर हुईं (यानी यह काम किए) कोई दूसरा जिसम नहीं था कि जिस से ताल्लुक पकड़ा हो। तनासुख़ यह है कि रूह इस जिसम के साथ ताल्लुक से पहले किसी ऐसे दूसरे जिसम के साथ मुताल्लिक़ हो जो कि इस जिसम के मुग़ायर व मुबाइन हो और चों कि ख़ुद जिसम से मुतजस्सिम होती हैं तो तनासुख़ किया होगा। जिन्नात जो कि मुख़तलिफ़ शक्लों से मुतष्कल और मुख़तलिफ़ अजसाद से मुतजस्सिद होते हैं इस हाल में आमाल अजीबा जो कि उन शक्लों और जिस्मों के मुनासिब हैं उन से वाक़्य होते हैं। इस में न कोई तनासुख़ है और न हलूल जब कि जिन्नात को अल्लाह सुब्हानहू के कुदरत देने से यह कुदरत हासिल है कि मुख़तलिफ़ शक्लों से मुतष्कल हो कर आमाल गरीबा वक़ूअ में लाएं तो कामलियन की अर्वाह को यह कुदरत अता फरमाएं किया महल ताजब है और दूसरे बदन की किया हाजित इस के बाद आप के अलफ़ाज़ यह हैं।

अज़ीं क़बील अस्त आँचा अज़ बाज़े औलिया अल्लाह नकल मेकनंद कि दर यक आन दर अमकना मुतअद्दिदा हाजिर मैगरदंद व अफ़आल मुतबाइना बौक़ूअ मि आरंद एंजा नीज़ लताइफ़ ईशां मुतजस्सिद बाजसाद मुख़तलिफ़ा इंद व मुतष्कल बाशकाल मुतबाइना व हम चुनें अज़ीज़ीका मसलन दर हिंदोस्तान त्वतन दारद व अज़ां दयार न बरामदा अस्त जुमे अज़ हज़रत मक्का मुअज़्ज़मा मि आइंद व मेगवेंद कि आं अजीज़ रा दर हरम काबा दीदा उम व चनां व चुनें दरमियान मा व आं अजीज़ गुज़शता अस्त व जुमे दीगर नकल मेकनंद कि मा औरा दर रोम दीदा एम व हम जुमे दीगर दर बगदाद दीदा इंद एं हिम्मा तष्कल लताइफ़ आन अजीज़ अस्त बाशकाल मुख़तलिफ़ा।

(मक्तूब:58, दफ्तर दोम) इसी क़बील से वह वाक़ियात हैं जो बाज़ औलिया अल्लाह से नकल करते हैं कि एक वक़्त में वह कई जगहों परहाजिर होते हैं और उन से मुख़तलिफ़ अफ़आल वक़ूअ में आते हैं, इस जगह में उन के लताइफ़ मुख़तलिफ़ अजसाम और मुख़तलिफ़ इशकाल इख्तियार कर लेते हैं और इसी तरह के वह वाक़ियात हैं कि मसलन कोई अजीज़ हिंदोस्तान में अपनी रिहायश रखता है और इस जगह से कभी बाहर नहीं गया एक जमात मक्का मुअज़्ज़मा से आती है कहती है कि इस अजीज़ को हम ने हरम काबा में देखा है और इस तरह के वाक़ियात हमारे और इस अजीज़ के दरमियान गुज़रे हैं और कुछ लोग बयान करते हैं कि हम ने इस को रोम में देखा है दूसरी जमात ने बगदाद में देखा है, यह सब कुछ इस अजीज़ के लताइफ़ की शक्लें हैं जो मुख़तलिफ़ शक्लों में ज़ाहिर हुई हैं।

हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम क़ुद्दिस सिर्रहू से एक साइल ने सवाल किया कि सय्यद कायनात ﷺ की सोहबत आप के दुनिया से तशरीफ़ ले जाने के बाद बेदारी में वाक़्य है या नहीं, अगर वाक़्य है तो लाज़िम आएगा कि आप की कब्र शरीफ़ आप के जसद मुबारक से खाली हो और यह मुहाल है। जवाब में आप इरशाद फ़रमाते हैं:

जवाब अव्वलन आंका ख़ुलू ममनू अस्त चह मशाइख़ उम्मत दर यक आन दर अमकना मुतअद्दिदा हाजिर शुदा इंद। चुनांचे अज़ हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग मनक़ूल अस्त कि वक़्त इफ्तार हफ़्त जा हाजिर शद व हिम्मा जा इफ्तार नमोदनद व अज़ शाह कमाल नीज़ नकल कनंद कि वक़्त नमाज़ जाए कि नश्श्ता बोदनद हिमांजा नश्श्ता मानदनद ता आंका वक़्त नमाज़ गुज़शत मर्दुम ख़याल करदनद कि नमाज़ नख़वानदनद व हमां वक़्त जाए दीगर मर्दुम दीदनद कि नमाज़ ख़वानदनद। सानिय्न आंका इस्तिहालत मज़कूर ममनू अस्त चह बुर तक़दीर ख़ुलू अज़ जसद मुबारक हुज़ूर रूही दर रोज़ा मुनव्वरा काइन अस्त व तहक़ीक़ मक़ाम आँसुत कि ख़ुलू मज़कूर वक़्ती लाज़िम आयेद कि जसद मुबारक दर इंतकाल वाक़्य शव्द व आँचा वाक़्य अस्त वाल्लाह सुब्हानहू आलम बहक़ीक़त अलहाल मुलाक़ात रूहानी अस्त हर चंद बसूरत जसद नुमायद व रूह मुतजस्सिद गर्दद।’’ (मक्तूब:36)

पहला जवाब यह है कि कब्र का खाली होना ममनू है क्यों कि उम्मत के मशाइख़ एक वक़्त में मुतअद्दिद जगहों में हाजिर होते हैं। चनां चह जैसा कि हज़रत ख़्वाजा बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू इफ्तार के वक़्त में सात जगह हाजिर हुए और सब जगह इफ्तार फ़रमाया और हज़रत शाह कमाल कैथली क़ुद्दिस सिर्रहू से भी नकल करते हैं कि नमाज़ के वक़्त जिस जगह बैठे थे इसी जगह बैठे रहे यहाँ तक कि नमाज़ का वक़्त गुज़र गया लोगों ने ख़याल किया कि आप ने नमाज़ नहीं पढ़ी और इसी वक़्त दूसरी जगह लोगों ने देखा कि नमाज़ पढ़ी। दूसरा जवाब यह है इस्तहाला मज़कूरा ममनू है क्यों कि जसद मुबारक से खाली होने की तक़दीर पर रूह मुबारक का रोज़ा मुनव्वरा में हुज़ूर साबित है और मक़ाम की तहक़ीक़ यह है कि ख़ुलू मज़कूर इसी वक़्त लाज़िम आये गा जब कि जसद मुबारक का इंतकाल वाक़्य हो और जो वाक़्य है हक़ीक़त हाल अल्लाह तआला ज़्यादा जानता है, वह रूहानी मुलाक़ात है हर चंद जिसम की सूरत में दिखाई देती है और रूह मुतजस्सिद होती है।

इस सिलसिले में ख़ानवादा अहमदिया की करामात नकल की जाएँ तो बहस काफ़ी तवील हो

जायेगी। ख़ुद हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम का एक तसर्फ़ समाअत फरमाएं। एक रोज़ आप वुज़ू फ़रमा रहे थे कि नागाह ख़ादिम से लौटा ले कर दीवार पो मारा और वह लौटा टूट गया। आप ने दूसरे लौटे से वुज़ू फ़रमाया, हाज़िरीन ने इस अम्र को जेहन में रखा, मुद्दत के बाद एक सौदागर आया इस ने बयान किया कि एक दफ़ा में बंगाला की तरफ़ एक सहरा में था किया देखता हूँ कि एक शेर मेरी तरफ़ गुर्राता चला आता है, में निहायत ख़ौफ़ ज़दा हुआ, अचानक हज़रत को देखा कि लौटा लिए आते हैं, आप ने वह लौटा इस शेर की तरफ़ जोर से फेंका इस के ख़ौफ़ से शेर भाग गया और में महफूज़ रहा। (तज़किरा मशाइख़ नक़्शबंदिया)

वाक़ा सरीह है इस बात में कि ख़ादिम के सामने आप वुज़ू भी फ़रमाते रहे और सहरए बंगाला में अपने मुतवस्सिल के सामने जलवा फ़रमा होकर इस की शेर से जान भी बचाई।