अध्याय 4 में से 22पृष्ठ 45–56
जिसम अक़्दस का साया नहीं था
अहले सुन्नत के नज़दीक सरकार अलैहि अस्सलात व अस्सलाम के फ़ज़ाइल में से यह बात भी है कि आप का साया नहीं था इस का ताल्लुक दर असल इस बात से है कि अहले सुन्नत व जमात के नज़दीक सरकार अलैहि अस्सलाम महज़ बशर नहीं बल्कि नूर भी हैं मुनकरीन जो कि
अपनी तरह बशरियत उएन ईमान समझते हैं उन के नज़दीक हर बशर का साया होता है लिहाज़ा आप का भी साया था हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का मुबारक कलाम पढ़िए सिर्फ़ यही सराहत नहीं कि आप का साया नहीं था बल्कि साया क्यों नहीं था इस की वजह भी बयान फ़रमा दी, इरशाद है:
व बक्शफ़ सरीह मालूम गश्ता अस्त कि ख़लक़त आं सर्वर अलैहि व अला आला अस्सलवात व इलतसलीमात नाशी अज़ीं इमकान अस्त कि बसिफ़ात इज़ाफिया ताल्लुक दारद न इमकानेकि दर सायर मुम्किनात आलम काइन अस्त व हर चंद बदक्कत नज़र सहीफ़ा मुम्किनात आलम रा मुताला नमूदा मि आयेद वजूद आं सर्वर आंजा मशहूद निमी गर्दद बल्कि मंशाए ख़लक़त व इमकान अव अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम वजूद सिफ़ात इज़ाफिया व इमकान शान महसूस मेगरदद व चों वजूद आं सर्वर अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम दर आलम मुम्किनात नबाशद बल्कि फ़ौक़ एं आलम बाशद नाचार अव रा साया नबूद व नीज़ दर आलम शहादत साया शख्स अज़ शख्स लतीफ़ तर सत व चों लतीफ़ तर अज़वे दर आलम नबाशद अव रा साया चह सूरत दारद अलैहि व अला आला अस्सलवात व इलतसलीमात।(मक्तूब: 100, दफ्तर सोम)
यानी कश्फ़ सरीह से मालूम हो गया है कि सरकार अलैहि अस्सलात व अस्सलाम की पैदाइश इस इमकान से नाशी (पैदा) है जो सिफ़ात इज़ाफिया से ताल्लुक रखता है न कि इस इमकान से जो कि आलम तमाम मुम्किनात में साबित है कितनी ही दकीक़ नज़र से मुम्किनात आलम की किताब का मुताला किया जाए सरकार अलैहि अस्सलात व अस्सलाम का वजूद इस जगह दिखाई नहीं देता है बल्कि आप ﷺ की पैदाइश का मंशा और इमकान सिफ़ात इज़ाफिया का वजूद और शान का इमकान महसूस होता है और जब सरकार अलैहि अस्सलात व अस्सलाम का वजूद आलम मुम्किनात में नहीं होगा बल्कि इस आलम के उपर होगा इस लिए लामुहाला इस का साया नहीं होगा। नीज़ आलम शहादत में शख्स का साया शख्स से लतीफ़ तर होता है और जब आप ﷺ से लतीफ़ तर आलम में नहीं होगा तो आप का साया किया सूरत रखता है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का कलाम बिलकुल वाज़िह है समझाने की ज़रूरत नहीं है। आप जरा सोचें तो सही कि वह लोग जुर्म की किस मंज़िल पर फ़ाइज़ हैं जो अपनी बशरियत की तरह आप की बशरियत और अपने इमकान की तरह आप ﷺ का इमकान साबित कर के वह तमाम उमूर साबित कर बैठे जो आप की बुलंदी और आला शान के लायक नहीं थे।
हज़रत मुजद्दिद का कलाम फैसला कण कलाम है। जब आप का वजूद आलम मुम्किनात से अलग अलग है। लिहाज़ा जो आलम मुम्किनात के लिए साबित होगा वही सब कुछ आप ﷺ के लिए कैसे साबित हो सकेगा सरकार अलैहि अस्सलाम के फ़ज़ाइल में यह एक ज़बर दस्त कलाम है अगर ग़ायर नज़र से देखा जाए तो इसी से ईमान की वह नूरी राहें खुलती हैं जिन पर चल कर इंसान ख़ुदा तक पहुँच सकता है और सय्यद आलिम ﷺ के सिलसिले में हर मक़ाम पर अदब व एहतिराम का दामन हाथ में रह सकता है वर्ना हलाकत ख़ेज़ वादियों के सिवा और कुछ नहीं है।
तक़लीद का वजूब:
मुसलमान कहलाने वालों में एक ऐसा फ़िर्क़ा पैदा हो गया है जिन के यहाँ किसी मजहब मुईन की तक़लीद भी शिर्क व बिद्दत की आंधियों से न बच सकी। यह फ़िर्क़ा इतना दरीदा दहन और गुस्ताख है कि जिन अइम्मा कराम की जलालत शान और इमामत व इजतिहाद पर अहले इस्लाम का इत्तफाक़ हो चुका है उन की तन्क़ीस व तौहीन कार सवाब समझ रखा है ख़ास कर इमाम आज़म अबू हनीफा क़ुद्दिस सिर्रहू की ज़ात अक़्दस के बारे में तो हम ने देखा है उन में जितना ज़्यादा जाहिल है इतना ही गुस्ताख है।
मुझे तक़लीद के सिलसिले में सर दस्त कोई बहस व तहक़ीक़ नहीं करनी है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मुबारक कलाम से चंद उमूर अपने उन इस्लामी भाइयों के गोश् गुजार करना चाहता हूँ जिन में तलाश व जुस्तजू का और कबूल हक़ का माद्दा बाक़ी है उन में
से एक यह कि तमाम किस्म के अहकाम हर शख्स नहीं समझ सकता है बल्कि अहकाम की एक किस्म ऐसी है जिस की फ़हम मुज्तहिदयन के साथ ख़ास है। दोम इमाम आज़म क़ुद्दिस सिर्रहू की शान इजतिहाद की बुलंदी। सोम मजहब हनफ़ी की नूरानियत।
हज़रत मुजद्दिद कद सिर्रहू ने अहकाम क़ुरआनी की तीन किस्में बयान फरमाएं; पहली किस्म में वह अहकाम हैं जो इबारत अलंस व इशारत अलंस, दलाल अलंस, इक़तिज़ा अलंस से मफ़हूम होते हैं उन के बारे में फ़रमाया कि अहले लुग़त के अवाम व ख़वास बराबर हैं।
दूसरी किस्म में वह अहकाम हैं जो कि इस्तिंबात व इजतिहाद के तवस्सुत से मफ़हूम होते हैं। यह फ़हम और समझ अइम्मा मुज्तहिदयन के साथ मख़सूस है। आप के अलफ़ाज़ यह हैं:
किस्म दीगर अज़ अहकाम अज़ां क़बील इंद कि बतवस्सुत इजतिहाद व इस्तिंबात मफ़हूम मैगर्द न एं फ़हम मख़सूस बाइमा मुज्तहिदयन अस्त।
तीसरी किस्म में वह अहकाम हैं कि उन की समझ से ताकत बश्री आजिज़ है अहकाम समझे नहीं जा सकते हैं। यह मख़सूस इत्तिला नबी अलैहि अस्सलाम के साथ ख़ास है। यह वह अहकाम हैं जिन का नाम सुन्नत है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की इस तकसीम से साफ ज़ाहिर है कुरआन शरीफ़ के दूसरी किस्म के अहकाम स्वाए मुज्तहिदयन और कोई नहीं समझ सकता है हत्ता कि किस्म अव्वल के अहकाम में भी ख़ास व आम इस वक़्त बराबर हैं जब कि अहले लुग़त से हूँ वर्ना सिर्फ़ कुरआन का तर्जुमा देख कर अहकाम कुरआन समझे नहीं जा सकते हैं। गैर मुक़लदहज़रात में हर जाहिल से जाहिल इंसान भी अहकाम की समझ रखता है, तमाम जाहिलों को दावा है कि हम बुला वास्ता अहकाम की समझ रखते हैं हम आज तक समझ ही न पाए कि यह किया समझ रखते हैं। इस फ़िर्क़ा का ज़ुहूर भी ख़ुरूज दजाल के क़ुर्ब की अलामत है, यह अपने मजहब की कामयाबी अइम्मा मुज्तहिदयन को बुरा कहने में और उन की शान घटाने में समझते हैं। ज़ाहिर है जब तक अपनी तरह उन को बे इल्म नहीं साबित
करें गे तो अपने इजतिहाद व इस्तिंबात की अहमियत व क़द्र उन मुज्तहिदयन के इजतिहाद व इस्तिंबात की तरह कैसे हो पायेगी उन का मक़सद यही है कि जैसे हम बे इल्म हैं ऐसे ही वह भी थे जब उन का इजतिहाद मकबूल है तो हमारा भी होना चाहिए।’’
यह खयाली पुलाव खयाली ही रहेगा, ऐसा ख्वाब कभी भी शर्मिंदा ताबीर न हो सके गा।
इमाम आज़म की शान इजतिहाद की बुलंदी:
इसी मक्तूब में इजतिहाद की बहस करते हुए फ़रमाते हैं कि हमारे सरकार अलैहि अस्सलाम की सुन्नत लाहक़ सुन्नत साबिक़ की नासिख़ हो सकती है और हज़रत ईसा अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम कि नुज़ूल के बाद इसी शरीअत की मुताबेत फरमाएं गे हुज़ूर सर्वर कायनात ﷺ की सुन्नत की भी इत्तिबा फरमाएं गे क्यों कि इस शरीअत का मंसूख़ होना जायज़ नहीं है नज़दीक है कि उलमा-ए ज़वाहर हज़रत ईसा अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम के मुज्तहिदात (इजतिहादी मिसाइल) के माख़ज़ का कमाल दिक्कत (बारीकी) और पोशीदगी की वजह से इंकार करें और किताब व सुन्नत के मुख़ालिफ़ जानें।
हज़रत रूह अल्लाह (अलैहि अस्सलाम) का हाल इमाम आज़म कूफ़ी के हाल की तरह है रहमत अल्लाह अलैहि कि वरा व तक़्वा की बरकत और मुताबेत सुन्नत की दौलत से इजतिहाद व इस्तिंबात में बुलंद दर्जा पाया है कि दूसरे इस के समझने में आजिज़ व क़ासिर हैं और आप के मुज्तहिदात को मआनी की बारीकी की वजह से किताब व सुन्नत का मुख़ालिफ़ जानते हैं और आप के अस्हाब राए समझते हैं यह सब कुछ आप के इल्म व इदराक की तह तक न पहुँचने और आप की फ़हम पर इत्तिला न होने के सबब से है।
इमाम शाफ़ई की दानाई ने इमाम आज़म की फ़क़ाहित की बारीकी अदना सी मालूम कर ली तो कहा तमाम फ़िक़हा अबू हनीफा की औलाद हैं। अफसोस है उन कोताह नजरों की जुरात से कि अपने कसूर को दूसरों की तरफ़ मंसूब करते हैं। आप के अलफ़ाज़ यह हैं:
मसल रूह अल्लाह इमाम आज़म कूफ़ी अस्त रहमत अल्लाह अलैहि कि बबरकत वरा व तक़्वा व बदौलत मुताबेत सुन्नत दर्जा इलिया दर इजतिहाद व इस्तिंबात याफताह अस्त कि दीगरां दर फ़हम आं आजिज़ व क़ासिर इंद व मुज्तहिदात अव रा बवास्ता दिक्कत मआनी मुख़ालिफ़ किताब व सुन्नत दानंद व अव रा व अस्हाब अव रा अस्हाब राए पंदारिन्द कल ज़लक़ बादम अलूसूल अली हकीकत अलमा व दरायता व अदम अलात्तिला अला फहमा व फ़िरासत इमाम शाफ़ई बकरश्मा अज़ दिक्कत फ़क़ाहित अव अलैहि इलरिज़्वान दरयाफ्त कि गुफ़्त अल्फुक़हा कुलहम अयाल अबी हनीफ वाय अज़ जरातिहाए क़ासिर नज़रां कि कसूर ख़ुद रा बदीग्रे निस्बत नमाईंद।
मजहब हनफ़ी की नूरानियत:
हज़रत मुजद्दिद साहिब की बुलंद नज़र में मजहब हनफ़ी को सुनिये बे शाइबा तकल्लुफ़ व तास्सुब गुफ़्ता मेशोद कि नूरानियत एं मजहब हनफ़ी बंज़र कशफ़ी दर रंग दरयाय अज़ीम मिनेमायद व सायर मज़ाहिब दर रंग हयाज़ व जदावल बंज़र मि आइंद व बजाहिर हम कि मुलाहिजा नमूदा मि आयेद स्वाद आज़म अज़ अहले इस्लाम मुताबआन अबी हनीफा इंद अलैहिम इलरिज़्वान व एं मजहब बावजूद कसरत मुताबआन दर उसूल व फ़ुरू अज़ सायर मज़ाहिब मुतमीज अस्त व दर इस्तिंबात तरीक़ अलाहदा दारद व एं मानी मबनी अज़ हक़ीक़त अस्त।
तकल्लुफ़ व तास्सुब के शाइबा के बग़ैर कहा जा सकता है कि इस मजहब हनफ़ी की नूरानियत नज़र कशफ़ी में अज़ीम दरिया की तरह दिखाई देती है और बाक़ी मज़ाहिब हौज़ों और छोटी छोटी नहरों की तरह नज़र आते हैं और ज़ाहिरन भी मुलाहिजा किया जाता है कि अहले इस्लाम का बड़ा गिरोह अबू हनीफा का मुतबा है कसरत मुतबईन के बावजूद यह मजहब उसूल व फ़ुरू में दीगर मज़ाहिब से मुमताज़ है और इस्तिंबात में अपना जुदा रास्ता रखता है यह चीज़ हक़ीक़त की खबर देती है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की उलूम ज़ाहिरी व बातिनी में कामिल दस्तरस से कौन इंकार
कर सकता है, आप के मक्शफ़ात व मशहूदात की सेहत से किसे इंकार हो सकता है, मआरिफ़ कोनीय व हक़ायक़ इलाहीह में आप की बुलंद पहुँच का कौन मोतरिफ़ नहीं, आप की ज़बान मुबारक फ़रमा रही है कि इमाम आज़म के इस्तिंबात व इजतिहाद का माख़ज़ बहुत दकीक़ और ग़ामज़ है, आप के मिसाइल इजतिहाद्य बहुत दकीक़ हैं जहां तक अक्सर लोगों की पहुँच नहीं। मजहब हनफ़ी का नूर, अज़ीम दरिया है बाक़ी मज़ाहिब छोटी छोटी नहरें और हौज़ हैं इस के उसूल व फ़ुरू सब से बुलंद और मुमताज़ हैं, ख़ुदा हजारों रहमतें नाज़िल फ़रमाए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तुर्बत अतहर पर कि हम क़ासिरों और ज़ाहिर बीनों को हक़ीक़त का पता बता दिया, हमारे दलों को इतमीनान अता फ़रमा दिया। कितने मुबारक हैं वह इंसान जिन्हें ऐसे मजहब और अज़ीम पेशवा की दौलत तक़लीद मयस्सर आई। ख़ुदावंद क़ुद्दूस की इस नेमत उज़्मा पर जितना भी शकर किया जाए कम है। अब आइए अहले ज़माना का वह सितम आप को दिखाएं जो इस उम्मत मरहूमा के अज़ीम रहनुमा व मुक़तदा के साथ किया गया। हज़रत मुजद्दिद फ़रमाते हैं: अजीब मामला है इमाम अबू हनीफा सुन्नत की पैरवी में सब से आगे हैं और मुर्सल अहादीस को मसंद की तरह लायक मुताबेत जानते हैं और अपनी राए पर मुक़द्दम रखते हैं और इसी तरह कौल सहाबी को खैर अलबशर अलैहि व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात के शरफ़ सोहबत की वजह से अपनी राय पर मुक़द्दम रखते हैं और दीगर (अइम्मा मुज्तहिदयन) ऐसे नहीं हैं इस के बावजूद मुख़ालिफ़ीन इमाम आज़म को साहिब राय जानते हैं और जो अलफ़ाज़ बे अदबी के मशार हैं उन की तरफ़ मंसूब करते हैं। हालां कि तमाम लोग उन के कमाल इल्म, वफ़ूर वरा व तक़्वा के मोतरिफ़ हैं अल्लाह तआला उन को तौफ़ीक़ दे कि असल दीन और अहले इस्लाम के सरदार को आजार न दें और अहले इस्लाम के बड़े गिरोह को अज़ीयत न दें।
یُرِیۡدُوۡنَ اَنۡ یُّطْفِـُٔوۡا نُوۡرَ اللہِ بِاَفْوَاہِہِمْ (التوبۃ: ۸؍۳۲)
तर्जुमा: चाहते हैं कि अल्लाह का नूरअपने मुँह से बुझा दें।
जो लोग कि उन अकाबिर दीन को अस्हाब राय समझते हैं अगर यह अक़ीदा रखते हैं कि यह लोग अपनी राए से हुक्म करते हैं और किताब व सुन्नत की मुताबेत नहीं करते हैं तो अहले इस्लाम का स्वाद आज़म उन के फ़ासद गुमान के ऐतबार से गुमराह और बिद्दती होगा बल्कि अहले इस्लाम के गिरोह से बाहर हूँ गे। यह अक़ीदा नहीं रखेगा मगर जाहिल जो कि अपने जहल से बे खबर है या ज़िंदीक़ कि जिस का मक़सद शतर (नसफ़) दीन को बातिल करना है। चंद नाक़िस लोगों ने चंद हदीसें याद कर ली हैं और अहकाम शरीअत को उन में मुनहसिर कर दिया है और अपने मालूम के मावरा की नफ़ी करते हैं और जो उन के नज़दीक साबित नहीं हुआ उसे मुंतफ़ी करते हैं؎
चों आं करमे कि दर सिंग निहां अस्तजमीन व आसमां अव हमांसत
अफसोस हजार अफसोस उन नाक़िसों के बारद तास्सुबात और उन की फ़ासद नजरों से, फ़िक़्ह के बानी अबू हनीफा हैं और फ़िक़्ह का तीन चौथाई हिस्सा आप के लिए तसलीम किया गया है और बाक़ी चौथाई में आप के साथ तमाम लोग शिरकत रखते हैं ।
फ़िक़्ह में साहिब ख़ाना आप हैं और दूसरे तमाम आप की औलाद हैं इस मजहब हनफ़ी के इल्तिज़ाम के बावजूद मुझ को इमाम शाफ़ई से गोया ज़ाती मुहब्बत है और बुजुर्ग जानता हूँ इस लिए बाज़ आमाल नाफ़िला में उन के मजहब की तक़लीद कर लेता हूँ लेकिन किया करूँ कि दूसरों को वफ़ूर इल्म और कमाल तक़्वा के बावजूद इमाम अबू हनीफा के पहलू में बच्चों की तरह पाता हूँ व अलामर अली अल्लाह सुब्हानहू।’’
बात चों कि तवील थी इस लिए में ने तर्जुमा नकल कर दिया, असल इबारत जिसे देखना हो वह मक्तूब 55, दफ्तर दोम मुलाहिजा करे जिस में यह तमाम बहसें मौजूद हैं।
...........................
।पत्थरों के अंदर जो कपड़ा होता है इस की जमीन व आसमान सब वही पत्थर होता है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का कलाम बहुत साफ और वाज़िह है किसी तफ़सील व तौज़ीह का ख़ाहां नहीं।आप ने जो कुछ फ़रमाया अच्छी तरह से एक मामूली इंसान पढ़ कर या सन कर समझ सकता है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने आज से तक़रीबन चार सौ साल क़ब्ल जो कुछ फ़रमाया था आप देख लीजिए आज के गैर मुक़ल्लिदीन पर पूरा पूरा सादिक आरहा है बल्कि आज कल के गैर मुक़ल्लिद कोसों आगे हैं। हज़रत मुजद्दिद को जिन से शिकवा है उन का सितम हज़रत अबू हनीफा और उन के मुक़ल्लिदीन तक था मौजूदा लोगों का तो अहानत रसूल शआर हो गया है।
हर एक अपने मौलवी से हदीस के तर्जुमे सन कर उन्ही चंद रिवायतों का नाक़िस मफ़हूम याद कर लेता है जो इस की ख्वाहिश नफ़्स के मुताबिक हो जिन पर अमल करने में नफ़्स को अदना सी भी तकलीफ़ न हो बाक़ी इस की नज़र में सब ज़ईफ़ हैं। फिर बुखारी व मुस्लिम वगैरह के तर्जुमे हो ही गए हैं अगर उर्दू ख़वाँ है तो बस इतना ही इजतिहाद के लिए काफ़ी है अपने इस ख़बस बातिनी को मस्तूर रखने के लिए अपने आप को अहले हदीस और मौहद मशहूर कर रखा है।
लोगो, सच और हक़ रास्ता वही है जिस पर चल कर लोग वली हुए, ख़ुदा से वासल हुए उन का वसूल इस की दलील हक़्क़ानियत है। हज़रत मुजद्दिद जैसे ख़ुदा रसीदा बुजुर्ग और इमाम के इर्शादात के बाद फिर किसी दीगर के फर्मोदात की ज़रूरत नहीं रहती है मगर मज़ेद इतमीनान के लिए चंद बुजुर्गों के वाक़ियात नाज़रीन के नज़र हैं। यह लोग ऐसे बुजुर्ग हैं जिन का मानने वाला और नक़्श क़दम पर चलने वाला बहकता नहीं है इमाम अहले सुन्नत आला हज़रत क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
तरे गुलामों का नक़्श क़दम है राह ख़ुदा
वह किया बहक सके जो यह सुराग ले के चले
1। कुतुब अलारशाद हज़रत सय्यदना ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू जो हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू के मुर्शद ग्रामी हैं फ़रमाते हैं कि इमाम के पीछे सूरह फ़ातिहा पढ़ने का हुक्म ज़ाहिरन चंद रिवायतों से मालूम होता है तो यह सोच कर कि सुन्नत पर अमल का कोई पहलू छूट न जाए सोचा कि कुछ दिनों सूरह फ़ातिहा इमाम के पीछे पढ़ ली जाए। अभी चंद दिन हुए थे कि इमाम अलाइम्मा सिराज अल्लामा सय्यदना इमाम आज़म अबू हनीफा क़ुद्दिस सिर्रहू को वाक़ा में देखा कि अपनी मदह में एक क़सीदा पढ़ रहे हैं जिस से यह समझ में आरहा था कि मेरे मजहब में बकसरत औलीए कराम हुए हैं जो इमाम के पीछे सूरह फ़ातिहा न पढ़ते थे। इस वाक़ा के बाद इमाम के पीछे फिर कभी सूरह फ़ातिहा नहीं पढ़ी। (यह वाक़ा बरकात अहमदिया में तफ़सील से वाक़ा मौजूद है)
2। कुतुब ज़माँ हज़रत साईं तोकल शाह अंबालवी मुजद्दिदी क़ुद्दिस सिर्रहू (अलमतौफ़ी 1315ह) सिलसिला आलीया नक़्शबंदिया मुजद्दिदय के चौधवीं सदी के एक मशहूर व मारूफ़ बुजुर्ग हैं बुलंद दर्जा के ऐतबार से कश्फ़ व मुशाहिदा भी बहुत बुलंद पाया था उन के चंद मक्शफ़ात अर्ज़ हैं। जीर बहस मसला से मुताल्लिक़ अल्लामा नूर बख्श साहिब तोकली तज़किरा मशाइख़ नक़्शबंदिया में तहरीर फ़रमाते हैं कि किसी ज़माना में गैर मुक़ल्लिदीन अंबाला ने अहले सुन्नत मुक़ल्लिदीन से बहस व मुबाहिसा शुरू कर रखा था ना इत्तिफ़ाक़ी ज़्यादा हो गई थी हज़रत साईं साहिब रहमत अल्लाह अलैहि ने उन दिनों का क़िस्सा मुझ से इस तरह फ़रमाया कि मुझे यह ख़याल आया कि गैर मुक़ल्लिदीन जब हदीस रसूल अल्ला ﷺ पर अमल करते हैं तो उन की मुखालफत क्यों की जाती है और फ़िक्र में था कि इस के मुताल्लिक़ मुझे जो हक़ हो मालूम हो जाए।
आखिर अलामर एक शब् यह ख्वाब देखा कि एक अहाता में हुज़ूर रसूल अकर्म ﷺ रौनक अफ़्रोज़ हैं इस अहाता का सिर्फ़ एक दरवाजा है, गिर्द आलूद दीवार है, दीवार के बाहर
नसारा भी खडे हैं मगर हुज़ूर ﷺ की तरफ़ नसारा की पुश्त है और गैर मुक़ल्लिदीन भी दीवार अहाता के बाहर हैं उन का चेहरा तो हुज़ूर ﷺ की तरफ़ है मगर अंदर जाने का दरवाजा उन्हें नहीं मिलता दीवार अहाता के बाहर खडे हैं और अहले सुन्नत व अलजमाअत, मुक़ल्लिदीन हज़रत इमाम आज़मरहमत अल्लाह अलैहि बे तकल्लुफ़ दरवाजा से अंदर जाते हैं और हुज़ूर रसूल अकर्म ﷺ की ख़िदमत में हाजिर होते हैं। शाह साहिबरहमत अल्लाह अलैहि को यह ख्वाब देख कर इतमीनान हो गया कि मुक़ल्लिदीन इमाम आज़म व दीगर मुक़ल्लिदीन अइम्मा हक़ पर हैं और गैर मुक़ल्लिदीन गलती पर हैं।’’
वसात इल्म इमाम आज़म का हाल बयान करते हुए शाह साहिब ने फ़रमाया कि एक दफ़ा हम मुराक़बा में थे, हम ने देखा कि एक बहुत बड़ा हौज़ है जिस का पानी सब्ज़ रंग का है और बहुत ही गहरा है। हम ने बहुत ही गोते लगाये और बहुत ही जोर मारा मगर इस की तह का पता बिलकुल न लगा, फिर हम ने देखा कि इस हौज़ में से कुछ नहरें निकली हुई हैं और हौज़ के किनारों पर बहुत सी चर्डियाँ लगी हुई हैं, पानी नहर के ज़रिया से भी निकल रहा है और चर्डियों के ज़रिया से भी खिंचते हैं और उन के अलावा और भी हज़ारहा ख़लक़त पानी खिंच रही है मगर पानी ख़त्म होने में नहीं आता।
हम ने पूछा यह किस का हौज़ है? कहा गया कि यह हज़रत इमाम आज़मरहमत अल्लाह अलैहि के इल्म का हौज़ है, तमाम उम्र इसी तरह खिंचता रहे तो भी यह कभी ख़त्म न होगा बाक़ी हज़रत इमाम शाफ़ई और हज़रत इमाम अहमद इब्न हनबल और हज़रत इमाम मालिक रहमत अल्लाह अलैहिम के इल्म के हौज़ भी हम ने देखे हैं वह पास ही थे गो वह अपनी मिक़दार के लिहाज से बहुत बड़े हैं मगर इस हौज़ के मुकाबले में बहुत छोटे नज़र आते हैं इस रोज़ से हम को हज़रत इमाम आज़म अलैहि अलरहम से इस क़द्र मुहब्बत हो गई है कि कुछ कह नहीं सकते नहरों की बाबत जो हम ने पूछा तो जवाब मिला कि यह इमाम मुहम्मद की नहर है, यह इमाम अबू
यूसुफ की है, यह इमाम ज़फ़र की है वगैरह वगैरह चों कि हौज़ का पानी सब्ज़ रंग का था इस से हम ने समझ लिया कि रसूल अल्ला ﷺ की तमाम शरीअत का नूर उधर ही आज्ञा है।