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अध्याय 14 में से 22पृष्ठ 164–175

तरीका मुराक़बा

बाज़ बुजुर्गों ने फ़रमाया है कि मुराक़बा का तरीका यह है कि अव्वल नाफ़ के नीचे थोडी देर के लिए सांस रोके फिर अपने जमी हवास मुद्रका से इस मानी बसीत की तरफ़ मुतवज्जा हो जिस को हर शख्स अल्लाह का नाम बोलने के वक़्त तसोर करता है मगर ऐसे लोग कम हैं जो इस मानी बसीत को लफ़्ज़ से खाली कर सकें। बह्र हाल तालिब को चाहिए कि इस बात की कोशिश करे कि वह मानी बसीत लफ़्ज़ से खाली हो जाएँ और इस की तरफ़ ख़तरात की मुज़ाहमत और मासवा अल्लाह के इलतिफ़ात के बग़ैर मुतवज्जा हो मगर बाज़ लोग इस किस्म के इदराक पर कादर हो नहीं पाते हैं लिहाज़ा ऐसे अश्ख़ास के लिए बाज़ मशाइख़ इस किस्म के मफ़हूम के लिए दुआएं तजवीज़ फरमाएं हैं हुज़ूर सीदी व मुर्शदी दाम ज़ला अलाली जो बड़ा शिजरा इनायत फ़रमाते हैं इस में भी इसी किस्म की दुआएं तहरीर हैं जो आम मुरीदों को भी नमाज़ पुंज गाना के बाद पढ़ने की ताकीद फ़रमाते हैं।

बाज़ मशाइख़ ऐसे अश्ख़ास के बारे में यह भी फ़रमाते हैं कि वह ख़लए मुजर्रिद

और नूर बसीत की तरफ़ और जिहत का तसोर करे इस तख़ील से तालिब आहिस्ता आहिस्ता तवज्जो मज़कूरा तक पहुँच जाता है । ख़लए मुजर्रिद से मुराद यह है कि तमाम आलम की जगहों को जमी इक़साम से खाली तसोर करे और नूर बसीत से मुराद सादा रोशनी है।

फ़वाइद मुराक़बा:

ज़िक्र नफ़ी व इस्बात भी अफ़ज़ल व आला मुराक़बा है और वसूल अली अल्लाह का यह मुस्तक़िल तरीका है। यह जज्बा से क़रीब तर है दवाम मुराक़बा से मर्तबा वज़ारत तक पहुँचा जा सकता है, दलों के ख़तरात पर इत्तिला और मुल्क व मलकूत में तसर्फ़ मुराक़बा ही से हासिल होता है। ख़याल रहे कि मुराक़बा का मलिका कसरत ज़िक्र और अर्बाब जमईयत की सोहबत के बग़ैर दुश्वार है।

मालूम होना चाहिए कि यह इस मुराक़बा का बयान था जो वसूल का मुस्तक़िल तरीक़ है वर्ना मुक़ामात सुलूक में हर हर मक़ाम के मुराक़बा की कैफियत और तरीका जुदा जुदा है जिस का बयान सुलूक मुजद्दिदी में तफ़सील से आएगा।

सोहबत शैख़ कामिल:

अल्लामा नूर बख्श तोकली फ़रमाते हैं: सहाबा कराम रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम ने हुज़ूर सय्यद एल्मरसिलीन ﷺ की अव्वल सोहबत में वह कमाल हासिल किया जो औलीए उम्मत में से किसी को इन्तहा में भी हासिल नहीं हुआ। इस आफताब रिसालत बाबी हो व अम्मी के एक ही परतो से उन के लताइफ़ से कदूरतों के पर्दे दौर हो कर वस्ल बे चवन हासिल होगया इसी तरीक़ इनाकासी को हज़रात नक़्शबंदिया रहिमहुम अल्लाह तआला ने इख्तियार किया है। उन का तरीक़ उएन तरीक़ सहाबा कराम रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम का है इस में इफ़ादा व इस्तिफ़ादा अंसबागी व इनाकासी है यानी सालकेन के दिल सोहबत की बरकत से वासलेन के दलों के मआरिफ़ के अनिवार से रंगे जाते हैं और वासलेन के दलों के आईनों से

सूर अनिवार इलाहीह तालिबों के दलों के आईनों की तरफ़ मुनाकिस होती हैं मगर इस के साथ आदाब सोहबत की रियायत ज़रूरी है मसलन तमाम हरकात व सकनात और इबादात व आदात व मामलात में सुन्नत सनेह का कमाल इत्तिबा करना, पीर से निहायत मुहब्बत रखना ज़ाहिर व बातिन में इस की फ़रमां बरदारी करना, इस के किसी फेअल पर एतराज न करना और अपने तुईं इसी तरह इस के हवाले करना जैसा कि मुर्दा गुस्साल के हाथ में होता है। मेरे पीर दस्तगीर क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाया करते थे कि वसूल अली अल्लाह के लिए जलवा की निस्बत तवज्जो का रास्ता बहुत ही क़रीब है।

आंका ब तबरेज़ याफत यक नज़र शम्स दें

सखरा कंद बुर दह ताना ज़िंद बुर चिला

वासलेन की सोहबत की तासीर मुहताज बयान नहीं, आरिफ रोमी फ़रमाते हैं؎

यक ज़माना सोहबत बा ओलिया

बेहतर अज़ सद साला इबादत बे रिया

गर तो सखरा सिंग या मरमर्शवी

चों बसाहब दिल रसी गोहर शिवि

हज़रत ख़्वाजा एहरार क़ुद्दिस सिर्रहू इसी तरह फ़रमाते हैं؎

नमाज़ रा बहक़ीक़त क़ज़ा बूद लेकिन

नमाज़ सोहबत मारा क़ज़ा नख़्वाहिद बूद

हज़रत ख़्वाजा यूसुफ हमदानी क़ुद्दिस सिर्रहू का रशाद है कि अल्लाह तआला की सोहबत में रहो अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते तो इस बुजुर्ग की सोहबत में रहो जो अल्लाह तआला की सोहबत में रहता हैइंतहा (बात मुकम्मल हुई) क्यों कि इस की सोहबत की बरकत तुम को अल्लाह तआला की सोहबत तक पहुँचा देगी। हज़रत मौलाना रोम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं ؎

हर कि ख़्वाहिद हम नशीनी बाख़ुदा

गवंशीनद दर हुज़ूर ओलिया

इस ज़माना पर आशूब में पीर कामिल मुकम्मल का मिलना बहुत दुश्वार है अगर यही हाल रहा तो शायद वह वक़्त दौर नहीं कि नाम की पेरी मुरीदी रह जायेगी। (तज़किरा मशाइख़ नक़्शबंदिया)

सफर दर वतन:

उर्फ आम में एक शहर से दूसरे शहर की तरफ़ जाने का नाम सफर है और

वतन से मुराद वह नगर या शहर है जिस में वह शख्स रहता है और अहले सुलूक के नज़दीक सफर दर वतन से मुरादय है कि सालिक का सफर आलम ख़ल्क़ से जनाब हक़ तआला की तरफ़ चाहिए जैसा कि हज़रत इब्राहिम खलील अल्लाह अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम ने अपने कौल

अन्नीۡ ज़ाहिबٌ उला रब्बीۡ सेहۡदीۡन (अलसाफ़ात: 99, तर्जुमा: में अपने रब की तरफ़ जाने वाला हूँ अब वह मुझे राह दे गा)

में खबर दी है या मानी यह हैं कि एक हाल से दूसरे ऐसे हाल की तरफ़ जो अव्वल से बेहतर हो या एक मक़ाम से दूसरे आला मक़ाम की तरफ़ सफर हो। (अलबाज अस्सुन्निया)

सफर दर वतन के यह मानी भी बयान किए हैं कि सालिक को चाहिए कि रजील और घटिया बश्री सिफ़ात से मुल्की सिफ़ात फ़ाज़िला की तरफ़ इंतकाल करे। लिहाज़ा सालिक पर वाजिब है कि अपने अहवाल में गौर व फ़िक्र करे कि आया इस में कुछ मख़लूक़ की मुहब्बत बाक़ी है या नहीं, अगर है तो अज़ सर नो तौबा करे और यह समझे कि यह मेरा बुत है क्यों कि जो चीज़ ख़ुदा से दौर रखे दर असल वह तेरा बुत है फिर ला इलाह उला अल्लाह कहे और ला इलाह से इरादा करे कि में फलां की मुहब्बत को ख़त्म करता हूँ और इस की नफ़ी करता हूँ और उला अल्लाह से क़सद करे कि अल्लाह तआला की मुहब्बत इस मक़ाम पर साबित की इस की वजह यह है कि गैर अल्लाह की मुहब्बत की रगें दिल के अंदरूनी हिस्सा में बहुत छिपी हुई होती हैं जिन का निकालना बग़ैर तफ़्हस कामिल के बहुत मुश्किल है। इसी तरह और बुराइयां हसद वगैरह उन को मज़कूरा बाला तरीका से ज़ाइल करे। हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि सफर दर वतन से मुराद इनफ्स में सैर है जो निहायत में बदायत दर्ज होने का मंशा है और जो इस बुलंद तरीके के साथ मख़सूस है।

ख़लवत दर अंजुमन:

सूफ़िया कराम के यहाँ ख़लवत इस जगह को कहते हैं जिस में अहले सुलूक इबादत

के लिए तन्हाई इख्तियार करें और अंजुमन से मुराद लोगों का इजतिमा है।

मुरादी मानी यह हैं कि सालिक को चाहिए कि अपने तमाम हालात तालीम व तदरीस वाज़ व तकरीर खाने पीने बोलने चालने उठने बैठने चलने फिरने वगैरह तमाम कामों में दिल से ख़ुदा के साथ मशगूल रहे। लिहाज़ा ज़रूरी है कि ज़िक्र का मलिका हासिल करे इस तौर पर कि क़ल्ब सालिक अल्लाह तआला के साथ हाजिर रहे और लोगों के दरमियान रहते हुए भी लोगों से गायब रहे। हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं; आयत करीमा:

रिजालٌ ۙ ल्ला तलहीۡहम तजारٌ व ला बीۡअٌ अनۡ ज़िक्र अल्ला (उलनूर: 37, तर्जुमा: वह मर्द जिन्हें गाफिल नहीं करता कोई सौदा और न खरीद व फरोख्त अल्लाह की याद से)

में इसी की तरफ़ इशारा है, कलिमा मज़कूरा इस मानी की तक़दीर पर मुराक़बा के हम मानी हो जाएगा।

इस कलिमा के यह मानी भी हो सकते हैं कि क़ल्ब इस तरह हक़ के साथ गुफ़्तगू में मशगूल रहे कि लोगों के दरमियान होते हुए भी लोग मतला न हो पाएं और यह मानी भी बयान किए गए हैं कि सालिक जाकिर ज़िक्र कलबी में इसी तरह मुस्तग़र्क रहे कि अगर बाजार में भी दाखिल हो तो ग़लबा ज़िक्र की वजह से लोगों की आवाजें न सन पाए नीज़ कहा गया है कि यह कलिमा निस्बत नक़्शबंदिया से किनाया है क्यों कि ख़ल्क़ की मईयत इस के मुनाफ़ी नहीं और न लोगों से मामला इस के लिए नुकसान दह।

फायदा:

ख़लवत दो किस्म पर है;एक ज़ाहिरी, दोम बातिनी, अव्वल यह कि सालिक किसी ऐसी जगह जो लोगों से खाली हो तन्हाई इख्तियार करे ताकि आलम मलकूत में इत्तिला और आलम जबरोत में मुशाहिदा हासिल हो क्यों कि हवास ज़ाहिरा जब अपने अहकाम से मुअत्तल व बेकार हो

जाते हैं तो आयत मलकूत के मुशाहिदा में हवास बातिना के मुताबिक हो जाते हैं।

ख़लवत बातिनी यह है कि बातिन मुशाहिदा इसरार हक़ में हो और ज़ाहिर मामला ख़ल्क़ में इस तौर पर कि ज़ाहिर का मामला बातिन के मुशाहिदा से रोक न बने। यह दूसरी किस्म की ख़लवत तरीका नक़्शबंदिया के साथ ख़ास है। नक़्शबंदी बुजुर्ग ख़लवत ज़ाहिरी इख्तियार नहीं करते हैं, उन हज़रात ने यह चीज़ भी हुज़ूर ﷺ की इत्तिबा में इख्तियार की क्यों कि आप ने फ़रमाया है :

‘‘वह मोमिन जो लोगों से मिला जिला रहता है और उन की तकलीफ़ दह बातों पर सब्र इख्तियार करता है वह इस मोमिन से बेहतर है जो लोगों से नहीं मिलता जलता है।’’

याद कुर्द:

याद कुर्द में लफ़्ज़ याद के मानी ज़ाहिर हैं यानी ज़िक्र और कुर्द असल में करदिन मुसद्दिर है, नून बराए तख़फ़ीफ़ हज़फ़ हो गया। इस से मुराद या तो यह है कि मुराक़बा की मंज़िल पर पहुँचने के बाद भी सालिक को चाहिए कि ज़िक्र शरीफ़ में लगा रहे, ज़िक्र आम है असम ज़ात हो या नफ़ी इस्बात, कलबी हो या लिसानी किसी किस्म का हो हालत ख्वाब हो या बेदारी बातों में हो या खामोश हरकत में हो या सुकून में ग़रज किसी हाल में ज़िक्र बंद न होना चाहिए।

बाज़ हज़रात ने फ़रमाया है कि मुराद यह है कि ज़िक्र नफ़ी व इस्बात ज़बान से करते रहना चाहिए क्यों कि क़ल्ब का ताल्लुक अनासिर से है इस लिए अनासिर की जंग से जंग आलूद हो जाता है। पस ज़बान से ज़िक्र नफ़ी व इस्बात करेगा तो इस का सीना रोशन व मुतजली हो जाएगा और मुराक़बा में यहाँ तक तरक्की करेगा कि मर्तबा मुशाहिदा तक पहुँच जाएगा।

यह मानी भी हो सकते हैं कि जब ज़िक्र से निस्यान व गफलत वाक़्य हो जाए और ज़िक्र

करना भूल जाए तो जब याद आये ज़िक्र में मशगूल हो जाए अल्लाह तआला का इरशाद है:

वाज़िक्रۡ र्कब्लिक अज़ा निसीۡत (अलकहफ़: 24, तर्जुमा: और अपने रब की याद कर जब तो भूल जाए)

बाज़ गश्त:

जैसे वहाँ करदिन से कुर्द रह गया था वैसे यहाँ गश्तन से गश्त रह गया। इस से मुराद यह है कि सालिक को चाहिए कि नफ़ी व इस्बात के ज़िक्र के वक़्त जब सांस छोड़े तो इस कलिमा इलाही उन्नत मकसूदी व रज़ाक मतलूबी के ख़याल की तरफ़ रुजू करे यानी ए रब तोही मेरा मकसूद है दुनिया व आख़िरत को में ने तेरे वास्ते तर्क किया, हम पर अपनी नेमत पूरी फ़रमा और विसाल अता फ़रमा।’’

जब इस तरह का तख़ील होगा तो यह नफ़ी व इस्बात के मानी को मजबूत करेगा और क़ल्ब में तौहीद हक़ीक़ी का भेद पैदा करेगा यहाँ तक कि इस के क़ल्ब से तमाम मख़लूक़ का वजूद फना हो जाएगा और वाहिद मुतअल्लिक़ का वजूद मुज़ाहिर में ज़ाहिर होगा ख़्वाजगान नक़्शबंदिया इस लिए इस कलिमा का हुक्म फ़रमाते हैं ताकि मुरीदैन इस पर मदावमत कर के इस के मज़मून से मुत्तसिफ़ हो जाएँ ग़रज़कि इस कलिमा की तासीर व खासियत सर्र तौहीद का ज़ुहूर और तजरीद व तफ़रीद की हक़ीक़त का इन्किशाफ़ है।

बाज़ हज़रात ने फ़रमाया कि यह बाज़गश्त किनाया है इस बात से कि जाकिर बवक़्त ज़िक्र अल्लाह तआला की जानिब रुजू करे और ज़िक्र में अजुज़ व तक़सीर ज़ाहिर करे क्यों कि कोई शख्स कमा हुक्का ज़िक्र पर कादर नहीं हो सकता है मगर अल्लाह तआला की ख़ुसूसी इनायत और इआनत से।

सालिक को चाहिए कि ज़िक्र शुदा मफ़हूम को अच्छी तरह जेहन नशीन कर ले। हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि में ने वालिद माजिद (शाह अब्द

अलरहीम) क़ुद्दिस सिर्रहू को फ़रमाते सुना है कि में ने जो पाया है इसी कलिमा मुबारका की बरकत से पाया है।

निगाह दाश्त:

दाश्तन से दाश्त रह गया है। इस के मुरादी मानी या तो यह हैं कि ज़िक्र नफ़ी व इस्बात के वक़्त क़ल्ब की तरफ़ निगाह रखे और हिफाज़त करे कि कोई खतरा वस्वसा इस में दाखिल न होने पाए वर्ना ज़िक्र का नतीजा (मज़कूर के साथ हुज़ूर क़ल्ब) हासिल न हो सकेगा।

या यह मानी हैं कि ख़तरात व अहादीस नफ़्स को क़ल्ब से दूरकर्ता रहे। सालिक को चाहिए कि हमेशा बेदार और होशियार रहे किसी ख़याल व खतरा को दिल में जगह न दे। हज़रत ख़्वाजा नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि सालिक को चाहिए कि खतरा को आगाज़ ज़ुहूर में ही रोक दे क्यों कि जब ज़ाहिर हो जाएगा तो नफ़्स इस की तरफ़ माइल और इस से मुतास्सिर होगा ऐसी सूरत में दौर करना मुश्किल हो जाएगा।

ख़तरात के दख़ूल से क़ल्ब की हिफाज़त बड़ी अहम चीज़ है जो शख्स इस पर कादर हो गया दर हक़ीक़त उसे तसव्वुफ़ आज्ञा क्यों कि तसव्वुफ़ की रूह दर हक़ीक़त तमाम ख़तरात व खयालात और अफ़्क़ार से दिल को पाक व साफ रखना है जिस ने इस पर कुदरत पाई इस ने क़ल्ब की हक़ीक़त पहचान ली और बहकम मिन उर्फ नफिसा फ़क़द उर्फ रबा मार्फत क़ल्ब से मार्फत रब हासिल होगई। हज़रत शैख़ अबू बुकर कितानी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि में क़ल्ब के दरवाजा पर चालीस साल दरबान बिन कर रहा तो मेरा क़ल्ब ऐसा ही हो गया कि गैर अल्लाह को पहचानता ही नहीं है।

याददाश्त:

वाजिब उलवजूद की इस हक़ीक़त की तरफ़ कामिल और खालिस तवज्जो का होना जो अलफ़ाज़ और

तख़ीलात से खाली हो और दाइमी तौर पर अल्लाह तआला के साथ हर हाल में क़ल्ब को हुज़ूर हासिल हो जाने का नाम याददाश्त है।

बाज़ हज़रात ने यह मानी बयान फ़रमाए हैं कि तजल्ली ज़ात के शहूद पर क़ल्ब की हिफाज़त करना, ख़याल रहे कि जो हुज़ूर ज़िक्र व मुराक़बा और मुहब्बत व राबिता और कलिमा याददाश्त से हासिल होता है वह बाइतबार हक़ीक़त मुत्तहिद है क्यों कि ज़ात अहदेत के अनिवार के शहूद का नाम हुज़ूर है, हां कैफियत में मुख़तलिफ़ है इख़तिलाफ़ कैफियत को पहचाना यह ख़वास का काम है। यह भी ध्यान रहे कि वह हुज़ूर जो कलिमा मज़कूरा से मुराद है फ़नए ताम और बक़ाए कामिल के बाद ही मयस्सर आसकता है।

वक़ूफ़ ज़मानी:

यानी वक़ूफ़ व शहूद जो जमाने की तरफ़ मंसूब है इस से मुराद यह है कि सालिक को चाहिए कि अपनी साँसों का ध्यान रखे और इस बात का ख़याल रखे कि हमारी साँसें ज़िक्र में गुज़र रही हैं या गफलत में।

इस का मतलब यह भी हो सकता है कि सालिक को चाहिए कि हर वक़्त अपने अहवाल से वाकिफ़ रहे जब ताअत करे शकर अदा करे और अगर गुनाह सरज़द हो तो माज़रत करे ग़रज़कि सालिक को रोज़ व शब् के तमाम लम्हात की फ़िक्र रखना चाहिए और मुहासिबा करते रहना चाहिए ।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया है कि सोने से पहले चंद बार तस्बीह व तहमीद व तकबीर यानी सुबहान अल्लाह, अलहम्द लिल्लाह, अल्लाह अकबर कह लेना भी एक किस्म का मुहासिबा है गोया बंदा कलिमा तस्बीह की तकरार से गुनाहों से मग़फ़िरत तलब करता है और ख़ुदावंद क़ुद्दूस की बारगाह में जो कसूर सरज़द हुआ ख़ुदा की तस्बीह व तक़दीस करके गुनाहों का खातमा चाहता है और इस्तिग़फ़ार में गुनाह को छिपाने की तलब होती है।

इस से आप ने समझ लिया होगा कि तस्बीह में गुनाहों को जुड़ से अखेड़ा जाता है और उन का इस्तीसाल होता है, ज़ाहिर है दोनों में बड़ा फ़र्क़ है। इस से मालूम हुआ कि बेहतर मुहासिबा बजाए इस्तिग़फ़ार के तस्बीह से है और कलिमा तहमीद की तकरार से बंदा शकर करता है और कलिमा तकबीर की तकरार गोया यह जेहन देती है कि अल्लाह तआला की ज़ात बहुत बुलंद व बाला है लिहाज़ा शकर हो या माज़रत दोनों बुलंद बारगाह के लायक हूँ।

वक़ूफ़ अददी:

इस का या तो यह मतलब है कि जाकिर को चाहिए कि अदद ज़िक्र शुमार रखे यानी ज़िक्र नफ़ी व इस्बात बादद ताक हो, या यह मतलब है कि ज़िक्र ख़फ़ी रियायत अदद के साथ हो, महज़ ज़िक्र में अगरचे अदद मकसूद नहीं और न ही कसरत अदद बल्कि ज़िक्र अगरचे क़लील हो मगर हुज़ूर क़ल्ब के साथ ताकि ज़िक्र का फायदा (कलिमा नफ़ी के वक़्त वजूद बश्री की नफ़ी और इस्बात के साथ जज़्बात इलाहीह के आसार तलूअ हूँ) इस पर मुरत्तिब हो सके अगर ज़िक्र में रियायत अदद मलहूज़ होगी तो इस का फायदा यह होगा कि क़ल्ब ख़तरात और तफ़र्क़ा से महफूज़ रहेगा।

वक़ूफ़ कलबी:

यानी वह वक़ूफ़ व शऊर जो क़ल्ब की जानिब मंसूब है इस के मुतअद्दिद मानी हो सकते हैं; एक यह कि ज़िक्र के वक़्त हक़ सुब्हानहू के साथ आगाही और रब्त हो दिल इस से वाकिफ़ व आगाह हो, दोम यह कि जाकिर को चाहिए अस्नए ज़िक्र में क़ल्ब सनोबरी की तरफ़ मुतवज्जा रहे ताकि यह गोश्त का लोथड़ा ज़िक्र के मफ़हूम से गाफिल न रह जाए बल्कि अल्लाह तआला की याद में मशगूल रहे। हज़रत ख़्वाजा नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू वक़ूफ़ कलबी मज़कूरा बाला दोनों मआनी की रियायत के साथ वक़ूफ़ अददी से ज़्यादा अहम करार देते थे क्यों कि ज़िक्र से मकसूद दाइमी हुज़ूर व आगाही है जो इसी में मयस्सर है।

सोम यह कि जाकिर को चाहिए कि दिल का निगरां रहे ताकि तफ़र्क़ा और गैर अल्लाह के नुक़ूश का

दिल में गुज़र न हो सके। हज़रत सय्यदना व ग़ोस्ना शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि वक़ूफ़ कलबी दर असल क़ल्ब की तरफ़ ऐसी तवज्जो करने का नाम है कि इस की शक्ल सनोबरी असम ज़ात के साथ तसोर में न आये यह तवज्जो इस ज़रब के क़ायम मक़ाम है जो दीगर सलासल के ज़िक्र में मशहूर व मारूफ़ है नीज़ ज़ात इलाही के साथ तवज्जो रखने में उपर की तरफ़ निगरां रहे कि उधर से फ़ैज़ मिलने की उम्मीद है और जानिब फ़ौक़ की रियायत अदबन है कि हक़ सुब्हानहू हर क्षे से फ़ौक़ यानी बालातर है।

ग़रज़कि वक़ूफ़ कलबी ज़िक्र का रुकन है क्यों कि हुसूल निस्बत बग़ैर इस के मुहाल है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया है कि जिस को ज़िक्र कलबी असर न करे इस को ज़िक्र से रोक कर खालिस वक़ूफ़ कलबी का हुक्म दें और तवज्जो भी देते रहीं यहाँ तक कि ज़िक्र असरअंदाज़ हो जाए।

कलिमात नक़्शबंदिया:

नक़्शबंदी सुलूक के यह चंद अशग़ाल में ने यहाँ ज़िक्र कर दिए बाक़ी मुक़ामात क़ुर्ब का बयान मुजद्दिदी सुलूक के बयान के ज़िमन में आएगा। अब उन कलिमात को अर्ज़ करते हैं जिन पर नक़्शबंदी तरीक़ की बना क़ायम है, उन कलिमात में से बाज़ ऐसे हैं जो अशग़ाल मज़कूरा की तरफ़ इशारा करते हैं और बाज़ तासीर अशग़ाल पर दलालत करते हैं, यह कल ग्यारह कलिमे हैं जिन में आथ हज़रत ख़्वाजा अब्द अलख़ालिक़ ग़जदवानी से और तीन हज़रत ख़्वाजा बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस इसरारह्मा से मनक़ूल हैं:

1।होश दर दम, 2।नज़र बुर क़दम, 3।सफर दर वतन, 4।ख़लवत दर अंजुमन, 5।याद कुर्द, 6।बाज़गश्त, 7।निगहदाशत, 8।याददाश्त और हज़रत ख़्वाजा नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू से मनक़ूल कलिमात यह हैं; 1।वक़ूफ़ ज़मानी, 2।वक़ूफ़ कलबी, 3।वक़ूफ़ अददी।

ख़याल रहे कि तरीका नक़्शबंदिया का ज़ुहूर मावरा अलनहर के शहरों में हुआ और उन्ही

में मशहूर हुआ और ज़्यादा तर उन बिलाद में फ़ारसी ज़बान बोली जाती थी, लिहाज़ा अक्सर उन कलिमात में से फ़ारसी ज़बान में हैं, हम उन के लुगवी और इस्तिलाही मानी बालतफ़सील अर्ज़ करते हैं।