अध्याय 7 में से 22पृष्ठ 78–88
सलासल अर्बा की हक़्क़ानियत
अब ऐसे भी निरे अक्ल व खुर्द के दीवाने बल्कि अक्ल व खुर्द से बेगाने पैदा हो गए जिन की नज़र में इस्लाम सिर्फ़ और सिर्फ़ ज़ाहिरी अहकाम व मिसाइल का नाम है,मुरव्वजा सलासल पेरी मुरीदी, इकतिसाब फ़ैज़ और ज़िक्र व मुराक़बा वगैरह औलीए कराम व उलमा-ए
हक़ के मामूलात इस्लाम से खारिज उन के मुजाहिदात व रियाज़ात ऐसी रहबानीयत पर मुश्तमिल जिस का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं बल्कि यह सब कुछ जाहिलियत औला में दाखिल है। उन होशमंदों को अपनी इस समझ पर कितना घमंड है। इबलेस लिएन ने उन को ऐसी जहालत में मुबतला कर दिया जिस की वजह से वह उन असफ़िया व उत्तक़्या वगैरह सब को इस्लाम से नाआशना समझ बैठे और वह अफराद जिन पर दीन का मदार है उन को जाहिल तसोर कर बैठे। में चंद नक़्शबंदी बुजुर्ग ख़ास कर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के चंद अक़्वाल जो इस बहस के मुख़तलिफ़ गोशों से मुताल्लिक़ है अर्ज़ करता हूँ उन हक़ प्रस्तों की तसल्ली खातिर के लिए जवाब भी इस्लाफ़ का दामन थामे हुए हैं।
साहिब तज़किरा मशाइख़ नक़्शबंदिया सलासल अर्बा की हक़्क़ानियत के बारे में हज़रत तोकल शाह साहिब अंबालवी क़ुद्दिस सिर्रहू का एक कश्फ़ बयान फ़रमाते हुए इरशाद फ़रमाते हैं: ‘‘एक दफ़ा ज़ियारत सय्यद एल्मरसिलीन ﷺ की हुई, देखा कि में आप के हुज़ूर में बैठा हूँ और आप के सीना मुबारक से चार नहरें निकली हैं और तमाम आलम में जारी हैं।’’
सलासल की अज़मत व नूरानियत:
परवर्दा नेमत ख़वान अहमदी हज़रत ख़्वाजा बदर उद्दीन सरहंदी क़ुद्दिस सिर्रहू हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के बारे में मकाशफा 5 में फ़रमाते हैं:
एक रोज़ आप सुबह के हलक़े में बैठे थे और इस्तिग़राक़, तवज्जो और मुराक़बे में थे कि एकाएक शाह सिकंदर (कादरी क़ुद्दिस सिर्रहू) तशरीफ़ ले आये और हज़रत शाह कमाल कैथली क़ुद्दिस सिर्रहू का ख़िरक़ा मुबारक आप के कंधे पर डाल दिया। आप ने आंख खोली और शाह सिकंदर को देख कर खडे हो गए और निहायत तवाज़ा के साथ मुअनिक़ा किया, शाह सिकंदर ने फ़रमाया कि मेरे दादा हज़रत शाह कमाल कैथलीरहमत अल्लाह अलैहि ने अपने विसाल के
वक़्त यह जबह मेरे सुपुर्द किया था कि बतौर अमानत तुम को देता हूँ और जिस किसी को में कहूँ तुम उसे पहुँचा देना। अब चंद मर्तबा हज़रत ने वाक़े में मुझे हुक्म दिया कि में यह जबह आप को पहुँचा दों मुझ पर बहुत शाक़ गुज़रा कि अपने दादा का ख़िरक़ा मुबारका और अपने घर की नेमत बाहर क्यों दे दों, लेकिन चों कि सख्त ताकीद और तहदीद से हुक्म दिया गया है इस लिए नाचार ले कर आया हूँ।
आप ने वह जबह मुबारका ज़ेब तन किया, खडे हो गए और तन्हाई में तशरीफ़ ले गए, फ़रमाते थे कि इस वक़्त मुझे यह ख़याल गुज़रा कि मशाइख़ का एक तरीका है कि किसी को जामा पहना कर अपना ख़लीफ़ा बनाते हैं इस लिए चाहिए तो यह था कि पहले ख़िलअत माअनवी पहनाते और अहवाल व कमाल का आब ज़लाल पिलाते फिर अपना ख़लीफ़ा बनाते।
इसी अस्ना हज़रत ग़ौस अलसकलेन क़ुद्दिस सिर्रहू को देखा कि अपने ख़ुलफ़ाए सिलसिला (ता शाह कमाल) के साथ तशरीफ़ ले आये और मेरे मामले में तसर्फ़ फ़रमाया और मेरे दिल को अपने तसर्फ़ में ले लिया और अपनी ख़ास निसबतों के इसरार व अनिवार अता फ़रमाए और में दरियाए अनिवार में गर्क हो कर इस समंदर में गौवासी करने लगा। जब इस तरह एक साअत गुज़र गई तो ठीक उन्ही ग़लबात अहवाल में मुझे ख़याल आया कि तुम तो अकाबिर नक़्शबंदिया के तरबीयत याफताह हो ऐसी सूरत अब क्यों पैदा हुई है?
इस ख़याल के आते ही में ने देखा कि सिलसिला नक़्शबंदिया के मशाइख़ हज़रत ख़्वाजा अब्द अलख़ालिक़ ग़जदवानी से ले कर हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह (क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहम) तक सब के सब तशरीफ़ ले आये और हज़रत ख़्वाजा बहा उद्दीन नक़्शबंद बुखारी क़ुद्दिस सिर्रहू तो हज़रत अब्द उलक़ादिर जैलानी क़ुद्दिस सिर्रहू के पहलू में बैठ गए, बैठने के बाद अकाबिर नक़्शबंदिया ने फ़रमाया कि यह तो हमारे तरबीयत याफताह हैं और हमारी तरबीयत से कमाल व इकमाल के मक़ाम को पहुँचे हैं। आप हज़रात को उन से किया वास्ता? अकाबिर कादरिया
ने फ़रमाया कि उन के बचपन ही से उन पर हमारी नज़र रही है और उन्हों ने हमारे ख़वान नेमत से चाशनी हासिल की है और अभी हमारा ख़िरक़ा भी पहना है। अभी यह बहस हो रही थी कि कब्रव्य और चिश्तिया की एक जमात और बहुत से मशाइख़ भी आगये और ऐसा इजतिमा हो गया कि इस शहर के जंगल व बियाबान भी उन से भर गए, फिर तो दिन के आखिर में यह फैसला हुआ कि चों कि यह तरबीयत तक़्शबंद से दर्जा कमाल व तकमील को पहुँचे हैं और ऐतबार तकमील का हुआ करता है इस लिए उन को इसी तरीके पर शरफ़ हासिल होगा और इसी तरीके में वह रशद व हिदायत फरमाएं गे ताहम तरीका कादरिया में भी हिदायत और तकमील फरमाएं गे। (हज़रात अलक़ुद्स, स: 103)
मशाइख़ सलासल की बुलंदी शान:
यही हज़रत ख़्वाजा बदर उद्दीनरहमत अल्लाह अलैहि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के दर्जात के बयान में दर्जा 7 के तहत हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का यह इरशाद नकल फ़रमाते हैं ‘‘फिर इस फ़क़ीर को नुज़ूल के वक़्त जिसे सैर अन अल्लाह बिल्लाह से ताबीर किया जाता है दूसरे सिलसिलों के मशाइख़ के मुक़ामात पर भी उबूर हासिल हुआ और हर मक़ाम से कामिल हिस्सा पाया और वह मशाइख़ मेरे काम में मेरे मददगार साबित हुए और अपनी अपनी निसबतों के चीदह चीदह हिस्से अता फ़रमाए।
सब से पहले मुझे अकाबिर चिश्तिया (क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम) के मुक़ामात पर उबूर हुआ और उन मुक़ामात से वाफ़र हिस्सा मुझे मिला और उन मशाइख़ अजाम में से हज़रत ख़्वाजा कुतुब उद्दीन (बख्तियार काकी)रहमत अल्लाह अलैहि की रूहानियत ने दूसरे बुजुर्गों से कहीं ज़्यादा मेरी इमदाद फ़रमाई और सच तो यह है कि यह बुजुर्ग इस मक़ाम में बड़ी शान वाले हैं और इस मक़ाम के सरदार हैं इस के बाद मशाइख़ कब्रव्य (क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम) के मक़ाम पर गुज़र हुआ यह दोनों मक़ाम (यानी चिश्तिया और कब्रव्य) उरूज के
ऐतबार से मुसावी हैं लेकिन यह मक़ाम (कब्रव्य) फ़ौक़ से नुज़ूल करते वक़्त इस शाहराह की दायें जानिब होता है और वह मक़ाम (चिश्तिया) इस स्रात मुस्तक़ीम की बाएं जानिब है और यह शाहराह (स्रात मुस्तक़ीम) वह रास्ता है कि अक़ताब इरशाद में से बाज़ अकाबिर इसी रास्ते से फ़रदीयत के मक़ाम तक पहुँचे हैं और आखिरी इन्तहा तक रसाई हासिल कर लेते हैं। अफराद तन्हा (बुला कुतुबीयत) का रास्ता दूसरा है , बग़ैर कुतुबीयत के इस रास्ते से गुज़रना मुमकिन नहीं मक़ाम सिफ़ात और इस शाहराह के दरमियान यह मक़ाम वाक़्य हुआ है गोया उन दोनों मुक़ामों के दरमियान एक बर्ज़ख़ है जिसे दोनों तरफ़ से हिस्सा मिलता है और पहला मक़ाम तो इस शाहराह की दूसरी जानबुत वाक़्य है जो सिफ़ात से कम मुनासबत रखता है।
इस वली के बाद अकाबिर सुह्रवर्दीय के मक़ाम पर उबूर हासिल हुआ जो शैख़ शहाब उद्दीन क़ुद्दिस अल्लाह सिर्रहू की तरफ़ मंसूब हैं। यह मक़ाम इत्तिबा सुन्नत (अला मुसद्दिरहा अस्सलात व अस्सलाम) के नूर से रोशन है और मुशाहिदा फ़ौक़ उलफ़ौक़ की नूरानियत से जीनत हासिल किए हुए है और इबादतों की तौफ़ीक़ इस मक़ाम की रफ़ीक है (यानी इस मक़ाम वालों को हासिल है) बाज़ सालकों को जो अभी तक इस मक़ाम पर फ़ाइज़ नहीं हुए हैं लेकिन इबादात नाफ़ा में मशगूल हैं और इसी में आराम हासिल किए हुए हैं। इस मक़ाम की मुनासबत से इस मक़ाम का कुछ हिस्सा हासिल है क्यों कि इबादात नाफ़िला से बुला वास्ता इस मक़ाम को मुनासबत है और दूसरों को ख़्वाह वह मुबतदी या मनतही इसी वास्ते से इस मक़ाम के साथ मुनासबत है और यह मक़ाम बहुत अजीब है क्यों कि जो नूरानियत इस मक़ाम में ज़ाहिर होती है वह दूसरे मुक़ामात में कम है और इस मक़ाम के मशाइख़ कमाल इत्तिबा की वजह से अज़ीम उलशान और रफ़ी उलमकान हैं और अपने अबनए जिंस में इमतियाज़ी ख़ुसूसीयत रखते हैं। इस के बाद मुझे मक़ाम जज्बा में ले आये और यह मक़ाम बे शुमार जज़्बात को लिए हुए है, फिर इस मक़ाम के नीचे भी नुज़ूल हुआ मुरातिब नुज़ूल की इन्तहा
मक़ाम क़ल्ब पर होती है जो एक हक़ीक़त जामिआ है और इरशाद व तकमील का ताल्लुक इस मक़ाम तक नुज़ूल होने पर है। चनां चह मुझे इस मक़ाम पर नुज़ूल हासिल हुआ लेकिन क़ब्ल इस के कि मुझे इस मक़ाम में तमकीन हासिल हो फिर उरूज वाक़्य हुआ और इस मर्तबा में ज़ुल की तरह असल को भी पीछे छोड़ दिया और इसी उरूज में जो क़ल्ब के मक़ाम में वाक़्य हुआ मुझे तमकीन और पुख्तगी हासिल हुई। (हज़रात अलक़ुद्स, स: 79)
निस्बत माअनवी बिद्दत नहीं:
मज़हर कमालात अहमदी, हामिल लोए मुजद्दिदी हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम सरहंदी क़ुद्दिस सिर्रहू सलाल की निसबतों और मुराक़बात वगैरह की निस्बत साबित करने के बाद इरशाद फ़रमाते हैं:
: फालसलासिल कुल्हा मनसूब तुलीय मंथे लदीय, फालमशाइख़ व अहल अलसलासिल अख़ज़्वा बतवस्सुत शिवख़हम अलनसब उलमानवीय मुँह सिल्ली अल्लाह अलैहि व अली आला व सल्लम फ़िलेस नसबथम मिन मुख़तरआथम
इसी मक्तूब में कुछ आगे फ़रमाते हैं:
विला नस्लिम उन इलतवज्जा अली अलाहदे अलसर्फ़ व उलनफ़ी व अलवस्बात वाल्मराक़ब लिम तकण फ़ी ज़माना सिल्ली अल्लाह अलैहि व अली आला व सल्लम विला फ़ी ज़मान असहाबह बल अलजाहिर उन सुकूता अलैहि अस्सलात वस्सलाम लिम यकन खालिय्न अन हज़ा उलामूर व उन लिम तकण मिसमा भज़ा उलासामी अलख
यानी तमाम सलासल सरकार अलैहि अस्सलाम से मंसूब हैं और आप तक पहुँचते हैं। पस मशाइख़ और सिलसिले वालों ने अपने शयूख़ के वास्ते से सरकार अलैहि अस्सलात व अस्सलाम से निस्बत मानवीय हासिल की। पस उन की निस्बत गढ़ी हुई नहीं है और हम नहीं मानते कि अहदेत सर्फा और नफ़ी व इस्बात और मुराक़बा आप ﷺ के जमाने में नहीं थे और न आप के अस्हाब के जमाने में बल्कि ज़ाहिर यह कि आप ﷺ का सुकूत उन उमूर से खाली नहीं था।’’
मशाइख़ कराम के हाथों पर बीअत करना और नेमत बातिनी हासिल करना और उन की तवज्ज्हात आलीया से तज़किया नफ़्स व तसफ़ीया क़ल्ब करके क़ुर्ब हक़ के बुलंद तर दर्जात हासिल करना वगैरह ऐसे वाज़िह और मारूफ़ व रोशन उमूर हैं जिन के मुनकर स्वाए पागल व मजनूं के और कोई दूसरा लकब उम्मत नहीं दे गी इस लिए मज़ेद इस पर रोशनी डालने की हाजित नहीं है तो ऐसी चीज़ है कि जिस की फिहरिस्त हमारे सामने है। अहले हक़ का हमेशा इत्तफाक़ रहा , जुमला ओलिया क़रीब क़रीब इसी राह से ख़ुदा से वासल हुए। आज जितने भी औलीए कराम की फिहरिस्त हमारे सामने है ख़ास कर वह जिन की विलायत व बुज़ुर्गी तमाम लोगों के नज़दीक मुस्लिम हो चुकी है । यह सब के सब ऐसे हैं जिन की जुबैन अकीदत किसी न किसी के सामने ख़ुम है, उन की रूहानियत की ज़माम किसी के हाथों में है।
औलीए कराम की चश्म कर्म से तक़दीर बदल जाती है:
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
हज़रत क़िबला गाही उम क़ुद्दिस सिर्रहू फर्मोदनद कि हज़रत सय्यद मुही उद्दीन जैलानी क़ुद्दिस सिर्रहू दर बाज़े अज़ रसाइल ख़ुद नविश्ता इंद कि दर क़ज़ाए मुबरम हेच किस रा मजाल नेस्त कि तब्दील बदहद मगर मरा कि अगर ख़्वाहिम आंजा हम तसर्फ़ बुकिनम व अज़ीं सखुन ताजब बसयार मि करदनद व इस्तबआद मि फर्मोदनद व एं नकल मुद्दतहा दर ख़ज़ीना जेहन एं फ़क़ीर बूद ता आंका हक़ सुब्हानहू व तआला बायं दौलत उज़्मा मुशर्रफ़ साख़त । (मक्तूब: 217, दफ्तर अव्वल)
मेरे हज़रत क़िबला गाही क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाया करते थे कि हज़रत ग़ौस आज़म क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपने बाज़ रसाइल में तहरीर फ़रमाया है कि क़ज़ाए मुबरम में किसी को गुंजाइश नहीं कि बदल दे मगर मुझ को अगर चाहूँ तो इस में भी तसर्फ़ करूँ, में इस बात पर बहुत ताजब किया करता था और (फ़हम से) बईद समझता था। फ़क़ीर के जेहन में
हज़रत ग़ौस आज़म का यह कौल बहुत मुद्दत तक रहा यहाँ तक कि हज़रत हक़ तआला ने इस दौलत से मुशर्रफ़ फ़रमाया। इस मुबारक कलाम से सिर्फ़ यही नहीं मालूम हुआ कि मैदान हक़ीक़त के एक अज़ीम शहसवार सरकार ग़ौस आज़म क़ुद्दिस सिर्रहू ने चों कि फ़रमाया है कि में तक़दीर बदल देता हूँ इस लिए मान लिया गया कि बुजुर्गों की तवज्जो से क़ज़ा बदल जाती है बल्कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को ख़ुद भी उन के रब ने यह मक़ाम व मर्तबा अता फ़रमाया कि वह तक़दीर व क़ज़ा बदल सकते हैं बल्कि इस का ज़ुहूर भी हज़रत शैख़ मिला ताहिर लाहौरीरहमत अल्लाह अलैहि के सिलसिले में हुआ जिस की तफ़सील यह है।
इसी मक्तूब में फ़रमाते हैं: एक रोज़ में एक बुला के दफा के दरपे था जो कि बाज़ दोस्तों के नामज़द हो गई थी इस वक़्त में इल्तिजा व तज़रा और नयाज़ व ख़ुशू तमाम रखता था हक़ तआला की जानिब से ज़ाहिर हुआ कि लौह महफूज़ में इस अम्र की क़ज़ा किसी अम्र से मुताल्लिक़ और किसी शर्त से मशरूत नहीं है (इस लिए) एक किस्म की नाउम्मीदी लाहक़ हुई और हज़रत सय्यद मुही उद्दीन क़ुद्दिस सिर्रहू का कौल याद आया दुबारा फिर मिलतजी और मुतज़िरा हुआ और अजुज़ व नयाज़ का रास्ता पकड़ कर मुतवज्जा हुआ महज़ फजल व कर्म से ज़ाहिर किया कि क़ज़ाए मुअल्लक़ दो किस्म पर है एक क़ज़ा है कि इस की तालीक़ लौह महफूज़ में ज़ाहिर करदी गई है और फरिश्तों को इस पर इत्तिला दे दी है और दोम वह क़ज़ा है कि इस की तालीक़ ख़ुदावंद क़ुद्दूस के नज़दीक सिर्फ़ मुअल्लक़ है (और लौह महफूज़ में दर्ज नहीं) और लौह महफूज़ ही क़ज़ा मुबरम की सूरत रखती है और यह क़ज़ाए मुअल्लक़ की किस्म फिर भी तब्दीली का एहतिमाल रखती है किस्म अव्वल की तरह।
इस जगह से मालूम हुआ कि हज़रत ग़ौस आज़म क़ुद्दिस सिर्रहू का कलाम इसी किस्म अख़ीर की तरफ़ मसरूफ़ है जो कि क़ज़ाए मुबरम की सूरत रखता है न कि वह क़ज़ा कि हक़ीक़तन मुबरम है कि तसर्फ़ व तग़ैर इस में शरण व अक़लन मुहाल है जैसा कि मख़फ़ी नहीं और
हक़ यह कि कम किसी को इस क़ज़ा की हक़ीक़त पर इत्तिला है पस इस में तसर्फ़ किस तरह हो सकता है और वह बुला जो इस दोस्त की तरफ़ मुतवज्जा हो गई थी इस किस्म अख़ीर में पाई और मालूम हुआ कि हज़रत हक़ सुब्हानहू ने इस बुला को दफा कर दिया।
आप के असल अलफ़ाज़ शुरू के यह हैं: रोज़े दर सददे दफा बल्य बूदम कि ब बाज़ अज़ दोस्तां नामज़द शुदा बूद अलख।
इस मुबारक कलाम से चंद चीजें मालूम हुईं; एक यह कि औलीए कराम के तसर्फ़ से क़ज़ा बदल जाती है। दोम यह कि बुज़ुर्गान दीन दाफ़े बुला हैं। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के असल अलफ़ाज़ को देखिए कि दफा बुला को ख़ुद अपनी तरफ़ मंसूब फ़रमाया है। कितना हैरत का मक़ाम है कि औलीए कराम की तो यह शान है और कुछ लोगों ने बुर बनिए (जहालत) सय्यद अलांबिया तक के बारे में दाफ़े बुला होने का इंकार कर दिया और इसी बुनियाद प्रदरोद ताज को नाजायज़ कह दिया जिस के रद्द में इमाम उलमुस्लिमीन आला हज़रत फ़ाज़िल बरेलवी क़ुद्दिस सिर्रहू को अलामन व अलाला लंआअती अलमुस्तफ़ा बदाफ़े अलबिला तहरीर फरमाना पड़ी।
उन जहालत के पतलों और गुमराह गुरों को तारीख कभी माफ़ नहीं करेगी। जिस नबी का खायें इसी पर यह सितम और इसी का नाम तौहीद खालिस है؏
खुर्द का नाम जनों रख दिया जनों का खुर्द
लौह महफूज़ अस्त पेश ओलिया:
सोम, मालूम हुआ कि औलीए कराम की बुलंद नज़र लौह महफूज़ का भी मुताला कर लेती है। लौह महफूज़ किया इल्म इलाही तक पहुँच जाती है उसे वह लोग गौर से पढ़ें जिन के यहाँ फख्र मौजूदात ﷺ तक को पीठ पीछे की खबर नहीं, नऊज़ बिल्लाह।
इस से ज़्यादा साफ व सरीह इसी मक्तूब की वह इबारत है जो एक सवाल का जवाब देते हुए आप ने तहरीर फ़रमाई, सवाल यह पैदा हुआ कि मक्शफ़ात कोनीय जो
औलिया अल्लाह से सादर होते हैं कभी उन में बुर बनिए कश्फ़ खता वाक़्य हो जाती है, मसलन खबर दे दे कि फलां इंसान एक माह बाद मर जाएगा, वतन वापस आजाएगा मगर हुआ उन में से कुछ भी नहीं।
इस के दो जवाब दिए; अव्वल यह कि इस मक्षुफ़ और मुखबिर अन्हु (जिस के बारे में खबर दी है) का हुसूल चंद शराइत से मशरूत था और इस साहिब कश्फ़ को इस वक़्त उन शराइत की तफ़सील न हो सकी लिहाज़ा अपने मुतल्लिक़न इस चीज़ के हुसूल का हुक्म लगा दिया। अब चों कि शराइत नहीं पाए गए लिहाज़ा हुसूल नहीं हुआ और दूसरा जवाब ख़ुद आप के असल अलफ़ाज़ में सुनिये:
या आंका गोयम हुक्मे अज़ अहकाम लौह महफूज़ बुर आरिफ़े ज़ाहिर शुदा कि आं हुक्म फ़ी नफिसा काबिल महव व इस्बात अस्त व अज़ क़बील क़ज़ाए मुतअल्लिक़ अम्मा आं आरिफ रा अज़ तालीक़ व काबिलियत महव व बे खबर न।
यानी या कि में कहता हूँ कोई हुक्म लौह महफूज़ के अहकाम से आरिफ पर ज़ाहिर हुआ कि वह हुक्म बज़ात ख़ुद महव व इस्बात के काबिल है और क़ज़ा मुअल्लक़ के क़बील से लेकिन इस आरिफ को तालीक़ और इस के महव की काबिलियत की खबर है।
सभी हुज़ूर ﷺ के मुहताज हैं:
सरकार अलैहि अस्सलाम सब के मुहताज इलिया (हाजित रवा) हैं, सारी कायनात आप की मुहताज है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
नाचार हिम्मा मुहताज अव बाशिंद व बतवस्सुत अव फ़्यूज़ व बरकात अख़ज़ नमाईंद अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम व बायं मानी अगर हिम्मा रा आल अव गवेन्द गुंजाइश दारद अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम कि हिम्मा पस रो अव युंद व बे तवस्सुत अव कमाल अख़ज़ निमी नमाईंद चह हर गाह वजूद शान बे तवस्सुत वजूद अव सूरत न बंद व कमालात देर ख़ुद कि ताबे वजूद इंद बे तवस्सुत अव चह सूरत दारणद अलैहि व अला
आला अस्सलात व अस्सलाम बे महबूब रब अलालमीन चुनें बायद। (मक्तूब: 121 दफ्तर सोम)
यानी लामुहाला सब आप के मुहताज हूँ गे और आप के तुफ़ैल फ़्यूज़ व बरकात हासिल करें गे और इस मानी के ऐतबार से अगर सब को आप की आल कहा जाए तो गुंजाइश है क्यों कि सब उन के पीछे चलने वाले हैं और आप के वसीला के बग़ैर कमाल हासिल नहीं कर सकते क्यों कि जब उन का वजूद आप के वजूद के बग़ैर मुतस्व्वर नहीं हो सकता है तो उन के दीगर कमालात जो कि वजूद के ताबे हैं आप के वास्ते के बग़ैर कैसे मुतस्व्वर हूँ गे अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम, हां रब अलालमीन का महबूब ऐसा ही होना चाहिए।
सरदार महबूबाँ:
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: रास मर्दान व रईस महबूबाँ मुहम्मद रसूल अल्लाह अस्त सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अला आला व सल्लम कि मकसूद ज़ाती व मदऊ औली अज़ीं दावत ओस्त अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम व दीगरां रा तुफ़ैल अव तलबेदा इंद मुरादाँ बाशिंद या मरीदां लोलाह लिमा ख़ल्क़ अल्लाह अलख़लक व लिमा अजहर अलरबोबेत कमा विरुद
यानी मुरीदों और महबूबों के सरदार मुहम्मद रसूल अल्लाह सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अला आला व सल्लम हैं क्यों कि इस दावत से मकसूद ज़ाती और मदऊ औली वही हैं अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम और दूसरों को आप के तुफ़ैल तलब किया है ख़्वाह वह मुराद हूँ या मुरीद जैसा कि वारद हुआ है ‘‘अगर वह न होते तो अल्लाह तआला मख़लूक़ को पैदा न करता और अपनी रबूबियत का इज़हार न करता।