अध्याय 6 में से 22पृष्ठ 67–78
मुहब्बत औलीए कराम
हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: महबान एं ताइफा रा बशारत उलमर मा मिन अहब काफ़ी अस्त व जलेसान एं ताइफा रा नवेद हम कौम ला यशक़ा जलेसहम मक्ली आखिरा (मक्तूब: 78, दफ्तर दोम)
यानी दरवेशों से मुहब्बत करने वालों को उलमर मा मिन अहब (आदमी इस के साथ होगा जिस से मुहब्बत करता है) की खुश खबरी काफ़ी है और इस तबका के हम नशीनों को हम कौम ला यशक़ा जलेसहम (वह कौम है कि इस का हम नशीं बद बख़्त नहीं होता) की नवेद बहुत है। (आगे फ़रमाते हैं)
जब अल्लाह सुब्हानहू की इनायत से यह मुहब्बत ग़लबा पैदा कर लेती है इस तौर पर कि इस मुहब्बत के गैर को दिल में नहीं छोड़ती है और दूसरी गिरफ्तारियां (दिल के
ताल्लुकात) बिलकुल्लिया दिल से कोच कर जाती हैं और मुहब्बत के लवाज़म कि महबूब की इताअत है और इस की मुराद पर क़ायम रहना है और मतलूब के अख़लाक़ व औसाफ़ के साथ आरास्ता होना ज़ाहिर होता है कि इस वक़्त महबूब में फना हासिल हो जाती है, फना फ़ी उलशेख़ के मुशाबेह कि इस राह में पहला ज़ीना है और यह फना फ़ी उलशेख़ सानिय्न फना फ़ी अल्लाह का वसीला होती है कि बका बिल्लाह इसी पर मुरत्तिब होती है जो विलायत की मुहसिल है।
मुहब्बत फ़िक़रा और औलीए कराम के बारे में मक्तूब: 235, दफ्तर अव्वल में तहरीर फ़रमाते हैं:
इस मुहब्बत को दुनयवी और उखरवी सआदात का सरमाया जानते हुए हक़ तआला से इस पर सबात व इस्तिक़ामत माँगना चाहिए। अहकाम शरएहि को बजा लाना इसी मुहब्बत का नतीजा है और जमईयत बातिन की तहसील इसी उलफ़त का समरा है। अगर आलम आलम (यानी बहुत) ज़ुल्मतें और कदूरतें बातिन में डाल दी जाएँ और इस मुहब्बत को क़ायम रखें तो ग़म नहीं करना चाहिए बल्कि उम्मीदवार रहना चाहिए और अगर कोह कोह (बहुत) अनिवार व अहवाल को बातिन में अफ़ाज़ा करें और एक बाल बराबर भी यह मुहब्बत कम है तो अलावा खराबी के कुछ नहीं जानना चाहिए और इस्तिदराज शुमार करना चाहिए।
अख़ीर के अलफ़ाज़ यह हैं: व अगर कोह कोह अनिवार व अहवाल दर बातिन अफ़ाज़ा कनंद व सर मोए अज़ीं मुहब्बत बर्दारिन्द जुज़ खराबी हेच नबायद दानिस्त व इस्तिदराज बायद शमरद।
कितना इबरत का मक़ाम है, जिन के दलों में अनिवार व अहवाल का सावन बरस रहा हो हज़रत मुजद्दिद साहिब उन को आगाह फ़रमा रहे हैं कि अगर मुहब्बत ओलिया में कमी है तो यह अनिवार व अहवाल मक़बूलियत की अलामत नहीं बल्कि इस्तिदराज हैं । अब उन लोगों के बारे किया कहा जाए जिन के पास न अनिवार हैं न अहवाल बल्कि चंद चिल्ले हैं जो बजाए चेहरे पर ताबानी के स्याही बढ़ाते हैं और कुछ सजदों के दाग हैं जिन के गुरूर ने उन्हें यह
एहसास दिला दिया है कि तुम भी किसी वली से कम मर्तबा नहीं हो जिन के यहाँ मज़ारात औलीए कराम मिट्टी का ढेर हैं वहाँ की हाजिरी ख़ुदावंद क़ुद्दूस की तौहीद में मुख़ल है जिन के यहाँ बुजुर्गों के यहाँ हाजिरी देने वाले कब्र पज्जे हैं।
काश कभी राह हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ माँगी होती, कभी इंसाफ की नज़र से औलीए कराम की अज़्मतों के सहीफ़े मुताला किए होते तो उन नफ़ूस क़ुदसिया को बुतों के मक़ाम पर रख कर अब्दी सआदतों से इस क़द्र महरूमी न होती। जिस बारगाह में कामयाबी के लिए यह शब् व रोज़ सजदे हो रहे हैं उन मुक़द्दस व पाकीज़ा बंदों के नक़्श क़दम पर न चल कर यही सजदे नाकामयाबी का सबब बनें गे।
काबा औलीए कराम की ज़ियारत के लिए आता है:
हज़रात अलक़ुद्स में हज़रत मौलाना बदर उद्दीन सरहंदी फ़रमाते हैं कि आप का यह दस्तूर था कि फ़ज्र की नमाज़ के बाद जमात की तरफ़ मुतवज्जा हो कर बैठते थे और दुआ के बाद मुराक़बे में मशगूल हो जाते थे। एक मर्तबा उर्फा की सुबह को फ़ज्र की नमाज़ का सलाम फेरने के बाद आप क़िबला रो ही बैठे रहे यहाँ तक कि आफताब बुलंद हो गया। इस के बाद आप ने मुराक़बा से सर उठाया और (अपने मुहर्रमान इसरार से) फ़रमाया कि आज मुझे ज़ियारत काबा का शौक पैदा हुआ और हरम पाक का इश्तियाक़ हुआ तो में ने देखा कि एकाएक ख़ुद काबा मेरे तवाफ़ के लिए आया और मेरे गिर्द घूमने लगा, ताजब है कि अर्बाब कश्फ़ इस वाक़े से गाफिल रहे वर्ना वह ख़ुद मेरे गिर्द घूमते और मेरा तवाफ़ करते। (हज़रात अलक़ुद्स, स: 116)
सोहबत ओलिया की अहमियत:
सोहबत ओलिया ए कराम कितनी अहम चीज़ है , इस का अंदाज़ाह आप इस वाक़े से
लगालें गे ,जिस को हज़रत मुजद्दिद साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू ने मक्तूब: 70, दफ्तर सोम में दर्ज फ़रमाया ,इरशाद फरमातेहैं कि हज़रत ख़्वाजा उबीद अल्लाह एहरार क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि दरवेशों की एक जमात के दरमियान इस मसले पर गुफ़्तगू हो रही थी जुमा की वह घड़ी जिस के बारे में हदीस शरीफ़ में आया है कि इस साअत में जो भी जायज़ चीज़ माँगी जाती है ,ख़ुदा विंद क़ुद्दूस अता फरमाता है ,अगर वह साअत मयस्सर आजाए तो ख़ुदावंद तआला से किया चीज़ तलब की जाए ? जो दरवेश वहाँ थे ,सब ने कुछ न कुछ अपनी फ़हम व ज़ौक़ केमुताबिक कहा जब मेरी बारी आई तो में ने कहा : अर्बाब जमईयत की सोहबत तलब करना चाहिए ;कि इस के ज़िमन में तमाम सआदतें मयस्सर हैं।मुबदाव मुआद में क़ल्ब के मुरातिब बयान करने के लिए फ़रमाते हैं ,वह आरिफ जो मार्फत में उत्तम और शहूद में अकमल है,जब इस मक़ाम पर पहुँचता है जिस कावजूद अज़ीज़ावर रुतबा शरीफ़ है ,तमाम आलिमों और जुमला ज़हूरात के लिए क़ल्ब बिन जाता है , यही वह आरिफ है जो विलायत मुहम्मदिया से मुतहक़्क़ और दावात मुस्तफ़व्य से मुशर्रफ़ है ।
औलीए कराम की वसात नज़र:
शब् बरात की सुबह तड़के आप पर यह मुनकशिफ़ हुआ कि शैख़ ताहिर लाहौरी जो आप के ख़ास मुरीदों में से थे ,वह नेकों की फिहरिस्त से खारिज कर दिए गए , और बदबख़तों की फिहरिस्त में डाल दिए गए । हज़रत मुजद्दिद बारगाह इलाही में मुतवज्जा हुए और इस वाक़े की दफ़ाय के ये कोशिश फ़रमाई , मालूम हुआ कि इस मामले को लौह महफूज़ में क़ज़ाए मुबरम करार दिया गयाहै ,आप हैरान हुए इसी अस्ना में आप को ग़ौस अलसकलेन शैख़ अब्द उलक़ादिर जैलानी क़ुद्दिस सिर्रहू‘ का यह कौल याद आया कि क़ज़ाए मुबरम में मेरे स्वाए मेरे किसी को दस्त तसर्फ़ हासिल नहीं ,पस आप ने बारगाह इलाही में इल्तिजा ,तज़रा और मुनाजात अर्ज़ की कि इलाही जब तो ने एक बर्गुज़ीदा बंदे को वह दस्त
तसर्फ़ वाली दौलत अता फ़रमाई है,तो इस फ़क़ीर को भी इस दौलत से सरफ़राज़ फ़रमा देतो तेरे कर्म से दौर नहीं ।आप की यह दुआ कबूल हुई और आप को मालूम हुआ कि लौह महफूज़ में क़ज़ा की एक किस्म मुबरम है और अल्लाह के नज़दीक वह मुअल्लक़ है किसी शफ़ाअत या दीगर अम्र के साथ ,और इस क़ज़ाए मुबरम में ख़ास अलख़ास बुजुर्गों को दस्त तसर्फ़ अता किया जाता है , और जो अल्लाह के नज़दीक मुबरम है इस में किसी तरह का तग़ैर व तब्दिल नहीं है व मा यबद्घिल अलक़ूल लदी (अज़ हज़रात अलक़ुद्स मुतर्जिम )
यह वाक़ा इस बात की बड़ी शहादत दे रहा है कि ओलिया ए कराम की नज़रें भी लौह महफूज़ देख लेती हैं ,लेकिन बाज़ वह उमूर जो इल्म इलाही में साबित हैं वली उन को जान लेता है ,नीज़ मालूम हुआ कि औलीए कराम की वजह सेशिक़ावत ,सआदत से बदल जाती है ।
दफा अज़ाब:
अल्लाह तआला के नेक और सालिह बंदों की वजह से अज़ाब डल जाता है , इस सिलसिले में अगर वाक़ियात को तफ़सील से जमा किया जाए तो कलाम तवील होजाए गा ,में यहाँ सिर्फ़ दो वाक़े हद यह नाज़रीन करता हूँ ।
एक रात ख़ुद हज़रत मुजद्दिद अपने आली दर्जात अस्हाब और बुलंद मुक़ामात मुरीदों के साथ हज़रत इमाम राफ़े उद्दीन के मजार पर अनिवार की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ ले गए , इमाम साहिब आप के अज्दाद अकबार में से थे , और हज़रत सय्यद जलाल उद्दीन मख़दूम जहां गीर के ख़ुलफ़ा में से थे । आप बहुत देर तक इमाम साहिब की कब्र के क़रीब ठहरे रहे और मुराक़बे में रहे ,इस मजार से रुजू के बाद आप ने अस्हाब इसरार से फ़रमाया कि जब में इमाम साहिब के मजार के मुक़ाबिल खड़ा हुआ तो में ने बारगाह इलाही जिल्लत अज़मता में तवज्जो की और अर्ज़ किया कि उन मज़ारत वालों पर
रहम फ़रमा और उन कब्रों से अज़ाब दौर फ़रमा, हुक्म हुआ तुम्हारी इलतिमास की वजह से एक हफ़्ते के लिए इस कब्रिस्तान वालों से अज़ाब उठा लिया गया, में ने अर्ज़ किया ख़ुदाया तेरी रहमत की इन्तहा नहीं है ,उन की मग़फ़िरत में इजाफा फ़रमादे तो हुक्म हुआ कि तुम्हारी इलतिमास प्राब एक माह के लिए उन कब्रों परसे हम ने अज़ाब दौर कर दिया ,फिर में ने बेश अज़ बेश इल्तिजा की तो जवाब मिला कि चों कि तुम ने इस जमात से रफा अज़ाब के लिए हमारी बारगाह में मुकरर इलतिमास की है ;इस लिए हम ने उन को बख्श दिया।
एक रोज़ आप अपने वालिद ख़्वाजा अब्द अलाहद की कब्र की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ ले गए ,वहाँ ख़याल आया कि हदीस नबवी (अली मुसद्दिरा अलसलो व अस्सलाम) में आया है कि जब को ई आलम किसी मकबरे से गुज़रता है तो अहले मकबरा से चालीस रोज़ के लिए अज़ाब उठा लिया जाताहै ,इसी वक़्त इलहाम हुआ कि तुम्हारे आने से कयामत तक के लिए इस मकबरे वालों से हम ने अज़ाब उठा लिया। (हज़रात अलक़ुद्स ,स:101 )
अहले कब्र से अज़ाब का दफा हो जाना कितना बड़ा दफा बुला है , मगर उन जेहन क्यों इस बात को कबूल करें गे , जिन के यहाँ अनबीए कराम बल्कि सय्यद अलांबिया अलैहिम अस्सलवात व इलतसलैम भी दाफ़े बुला नहीं हैं ,दुरूद ताज इस लिए पढ़ना गलत है कि इस में आप ﷺ को दाफ़े अलबिला व अलोबा कहा गया है ।
इस मौज़ू पर आप सैर हासिल गुफ़्तगू देखना चाहें तो मुजद्दिद दीन व मिलित सय्यदना इमाम अहमद रज़ा क़ुद्दिस सिर्रहू‘ का रिसाला मुबारका अलामन व अलाला देखिए , हक़ के दरिया लहराते नज़र आएं गे । अगर शिक़ावत की मुहर नहीं लगी है तो उन शा अल्लाह हिदायत के नूर से क़ल्ब पर नूर हो जाएगा और अगर सिफ़त यक़न है तो कामिल यकीन हासिल हो गा ।
बुजुर्गों से मदद माँगना:
यह बड़ा अहम मसला है किसी जमाने में बुला इख़तिलाफ़ सब का मामूल था औलीए कराम से मदद तलब करना और माँगना और उन की हिम्मत व तवज्जो का तालिब होना और अपनी मुश्किलात को हल कर ना ,एक ऐसी चीज़ है जिस पर अहले हक़ हमेशा से मुत्तफ़िक़ रहे ,मगर कुछ अर्से से चंद सरफिरों ने शिर्क व बिद्दत की आंधी चलाई तो यह मारूफ़ व मशहूर मुसलमा भी ज़िद से महफूज़ न रह सिक्का इमाम अहले सुन्नत क़ुद्दिस सिर्रहू ‘ कितनी उम्दा और मजबूत बात फ़रमा ते हैं؎
हाकिम,हकीम ,दाद व दो अ दें यह कुछ न दें
मर्दूद यह मुराद किस आयत खबर की है
इस सिलसिले में हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी के यह चंद फ़िक़रे ईमान को रोशन करने के लिए बहुत काफ़ी हैं:
दरवेशाने कि क़दम रासिख़ दर शरीअत दारणद व अज़ आलम हक़ीक़त नेक शनासा अंदाज़ ईशां हिम्मते बायद तलब नमूद व मुददे बायद जस्त ता इनायत हक़ सुब्हानहू अज़ दरीचा ईशां ज़ाहिर शुदा तमाम बजानिब जनाब क़ुद्दिस ख़ुद तआला जज़्ब नुमायद व मुखालफत रा दर वे गुंजाइश निमांद ता सर मोते रां मुखालफत शरीअत कुशादा अस्त महल नज़र सत तमाम सबल मुखालफत रा बायद मस्दूद साख़त ।
मुहाल अस्त सादी कि राह सफ़ा
तवाँ रफ्त जुज़ दरपे मुस्तफ़ा
यानी वह दरवेश जो शरीअत में मजबूत क़दम रखते हैं और आलम हक़ीक़त से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं ,उन से हिम्मत (मदद) तलब करना चाहिए ; ताकि हक़ सुब्हानहू की इनायत उन दरवेशों के दरीचे से ज़ाहिर हो कर अल्लाह तआला की बारगाह की तरफ़ खींच ले और इस में किसी मुखालफत की गुंजाइश न रहे ,जब तक शरीअत की मुखालफत का रास्ता बाल बराबर खुला रहे इस वक़्त तक खतरा का मक़ाम है , मुखालफत के तमाम रास्तों को बंद करना चाहिए । ए सादी ! मुस्तफ़ा ﷺ के बग़ैर , राह सफ़ा तै करना मुहाल है ।(मक्तूब
78 दफ्तर अव्वल )औलीए कराम से हिम्मत व मदद तलब करने के जवाज़ में हज़रत मुजद्दिदका कलाम इतना सरीह है कि इस में किसी वज़ाहत की ज़रूरत नहीं , यही नहीं बल्कि हज़रत का कलाम एक तवज्जो दिला रहा है कि अगर कोई शख्स चाहता है कि सर्वर कायनात ﷺ की इत्तिबा व पैरवी औरिताअत शरीअत की दौलत से माला माल हो तो वह औलीए कराम को वसीला बनाए , उन की रूहानियत से मिलतजी हो ।इनायत हक़ उन्ही की तवज्ज्हात आलीया से नसीब होती है, सही तौर पर ख़ुदा तक पहुँचना है तो उन्ही की इनायत से होगा।
औलीए कराम के तबरकात:
एक दिन अजमेर शरीफ़ में आप कुतुब इलाक़ताब हज़रत मुईन उद्दीन चिश्ती क़ुद्दिस सिर्रहू‘ के मजार अक़्दस की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ ले गए , और बहुत देर तक इस बदर उलावलिया की ख़िदमत में मुराक़ब रहे , जब बाहर निकले तो अपने क़रीब वालों से फ़रमाया कि हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने बहुत लुत्फ़ व कर्म फ़रमाया और अपनी ख़ास बरकात से ज़याफ़त फ़रमाई ,और रमूज़ व इसरार भी बयान फ़रमाए फिर लश्कर की रिफ़ाक़त से खुलासी के लिए जोलोग मेरे लिए कोशिश कर रहे थे ,इस से मना फ़रमाया और उसे अल्लाह तआला की रज़ा पर छोड़ देने का हुक्म फ़रमाया।
इसी अस्नामें यह हुआ कि हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू‘ के मजार की चादर जो हर साल ताजे डाली जाती है और प्रानी चादर किसी बड़े बुजुर्ग को भेजी जाती है ,बादशाह वक़्त को पेश की जाती है और बाद शाह इस को लाल की तरह संदूक में अदब व ताज़ीम के साथ रखते हैं हज़रत मुजद्दिद की ख़िदमत में बतौर तोहफा पेश की गई औरमजावरों ने कहा आप से ज़्यादा इस तबरक का मुस्तहिक़ कौन हो सकता है ,आप ने पूरे अदब व ताज़ीम के साथ उसे कबूल किया और फ़रमाया कि हज़रत ख़्वाजा के इस मुतबर्रिक कपड़ेको मेरे कफन के लिए महफूज़ रखा जाए कि इस वक़्त हज़रत ख़्वाजा ने लिबास की बजाए यही चादर
इनायत फ़रमा दी है।(हज़रात अलक़ुद्स, स: 114) तबरकात के अदब व एहतिराम अव र ताज़ीम व तकरीम के सिलसिले में यह वाक़ा जबरदस्त दलील है ,आज कल जहला जिसे हराम व नाजायज़ कहना तौहीद समझ रहे हैं ,हज़रत मुजद्दिद इस के बारे में ताकीद फ़रमा रहे हैं कि उसे मेरे कफन के लिए महफूज़ रखा जाए।
आज कल के सुनियों के इस तरह के अक़्वाल पर चाहे हराम होने का हुक्म जुड़िये या शिर्क तोप चलाइये , हज़रत मुजद्दिद जैसे बुजुर्गों पर कोई हुक्म लगा कर देखिए तो मालूम हो जाए गा कि उन जहालतों की वजह से दुनिया में जिल्लत व रुसवाई और आख़िरत में हब्त आमाल (आमाल बर्बाद होना) के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता ।इस से यह मालूम हुआ कि चादर पोशी का रवा ज बहुत प्रान्ह है , अगर अदनी सी भी क़बाहत कि इस के अंदर होती तो हज़रत मुजद्दिद जैसा हक़ गो इंसान कभी भी इस फेअल पर खामोश नहीं रहता ।
ख़याल रहे कि मज़कूरा बाला तमाम वाक़ियात इस बात की दलील हैं कि हज़रत ज़ियारत क़ुबूर के लिए तशरीफ़ ले जाया करते थे। यह तो बड़ी वाज़िह और रोशन बात है इस लिए इस के लिए हम ने कोई मुस्तक़िल अनवान क़ायम नहीं किया। कितना अजीब मक़ाम है कि जो सुन्नत रसूल अल्ला ﷺ हो, मुतअद्दिद अहादीस से साबित हो अब इस पर भी अमल करना यह कब्र को पूजना है। तौहीद के नाम पर किसी ने इस तरह ईमान नहीं लौटा जिस तरह कि मुहम्मद इब्न अब्द अलोहाब के पस ख़ूर्दा इस्तेमाल करने वालों (वहाबियों और देवबंदियों) ने लौटा है। आज अगर सब से ज़्यादा गुलशन इस्लाम को नुकसान पहुँच रहा है तो इसी वहाबी फ़िरक़े की बाद समोम से।
एक वाक़ा ख़ुद हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के पैराहन से मुताल्लिक़ और समाअत फ़रमा लें जिस को आप के ख़लीफ़ा ख़ास हज़रत मौलाना मुहम्मद हाशिम साहिबरहमत अल्लाह अलैहि ने बरकात अहमदिया में बयान फ़रमाया। इस से क़ारईन अच्छी तरह समझ लें गे कि हज़रत मुजद्दिद
क़ुद्दिस सिर्रहू की नज़र में उन कपड़ों की किया अहमियत थी जो हज़रात औलीए कराम के बदन से मस हो जाएँ इस से अच्छी तरह समझा जा सकता है कि जब औलीए कराम के बरकात का यह आलम है तो अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात के तबरकात का किया दर्जा होगा, फ़रमाते हैं:
मौलाना मुहम्मद अमीन नामी एक बुजुर्ग ख़्वाजा दीवाना सूरतीरहमत अल्लाह अलैहि के मुरीदों में से थे। एक सख्त बीमारी का शिकार हो गए और तवील अरसा गुज़र गया, फ़िक़रा से दुआ भी कराई और और अत्बा का इलाज भी मगर कोई सूद मंद नहीं हुआ जब हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की अज़मत व रफात की सदा उन के कानों तक पहुँची तो नयाज़ मंदी तमाम के साथ एक अरीज़ा उन्हों ने हज़रत क़ुद्दिस सिर्रहू की बारगाह में इरसाल की जिस में ऐसी तवज्जो तलब की जो शिफा बख्श हो नीज़ यह भी कि कोई तबरक भी इनायत फ़रमा दिया जाए।
हज़रत क़ुद्दिस सिर्रहू को बहुत रहम आया, आप ने एक इनायत नामा (ख़त) एक पैराहन मुबारक के साथ इरसाल फ़रमाया। यह ख़त चंद नसाइह पर मुश्तमिल है और पैराहन के बारे में फ़रमाते हैं : ज़ाहिर की कमज़ोरी की फ़िक्र न करें, कवी उम्मीद है कि सेहत आफ़ियत से बदल जायेगी, जामा फ़िक़रा तलब किया था भेजा जा रहा है, आप पहनें और इस के नताइज व समरात के मुंतज़िर रहीं कि बहुत बरकत वाला है।
जो शख्स उसे अफसाना तसोर करे इस के लिए अफसाना है और जिस ने उसे नकद देखा वही मर्दाना है। हज़रत मौलाना ने इस पैराहन शरीफ़ को पहना तो इस लंबे मर्ज से छुटकारा मिल गया। आप आये और हज़रत के मुरीद हो गए, असल अलफ़ाज़ यह हैं:
दीगर अज़ मुमर ज़ोफ़ ज़ाहिर अंदेशा निकंद, उन शा अल्लाह तआला बसेहत व आफ़ियत तब्दिल ख़्वाहिद याफत खातिर एं जानिब अज़ीं रह गुज़र जमा अस्त जामा फ़िक़रा कि तलब दाश्ता बोदनद पैराहन फ़ुर्सतादा शद बपोशंद व मुत्रसद नताइज व समरात आं बाशिंद कि कसीर अलबरकत सत؎
हर किस अफसाना बख़वानद अफसाना अस्त
व आंका देदश नकद ख़ुद मर्दाना अस्त
वस्सलाम अली मिन अतबा अलहदी व इल्तज़म मुताबेत अलमुस्तफ़ा अलैहि व अला आला मिन अस्सलवात अकमल्हा व आं पैराहन रा दर पोशीद व अज़ां मर्ज चंदें साला रहीद व आमदा अज़ मरीदां गश्त। (बरकात अहमदिया, स: 272।273)
सादाद कराम की अज़मत व मुहब्बत:
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: सादाद कसीर अलबरकात बवास्ता जज़ीएत आं सर्वर दीन व दुनिया अलैहि व अला आला अस्सलवात व इलतहयात अज़ां बरतर अस्त कि बज़बान क़ासिर बयान मनक़बत व मुहम्मदित आं तवाँ कुर्द मगर आंरा वसीला सआदत ख़ुद दानिस्ता दरें बाब जुरात नुमायद बल्कि ख़ुद रा बतूसल आं मि सत्तायद व इज़हार मोद्दत ईशां कि बाँ मामूर अस्त मि नुमायद अललहम् अजालना मिन मुहबेहम बहरमत सय्यद एल्मरसिलीन अलैहि व अला आला व अलैहम अस्सलात व अस्सलाम
कसीर बरकतों वाले सादाद सर्वर दीन व दुनिया ﷺ से जज़ीएत (नसबी ताल्लुक) की बना पर इस से बुलंद तर हैं कि यह फ़क़ीर ज़बान क़ासिर से उन की फ़ज़ीलत और सिफ़त व सना करे मगरअपनी सआदत का ज़रिया जानते हुए इस मामले में जुरात करता है बल्कि इस वसीले से अपनी सताइश करता है और उन के साथ दोस्ती का इज़हार करता है जिस का मामूर है। ए अल्लाह! हमें बतफ़ेल सय्यद आलम सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अला आला व सल्लम सादाद कराम से मुहब्बत करने वालों में कर। (मक्तूब: 56)
मुहब्बत के सिलसिले में फ़रमाते हैं: व बायं मुहब्बत कि निस्बत बक़रबा आँहज़रत अलैहि अस्सलात व अस्सलाम व इलतहीत पैदा शुदा अस्त रिश्ता उम्मीदवारी तमाम बदस्त आवर्दा अस्त हक़ सुब्हानहू व तआला बुर मुहब्बत ईशां इस्तिक़ामत अर्ज़ानी फ़रमायद बहरमत सय्यद अलबशर अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम। (मक्तूब: 55, दफ्तर अव्वल)
इस मुहब्बत के सबब जो हुज़ूर ﷺ के अक़्रबा (सादाद) से पैदा हो चुकी है उम्मीदवारी का रिश्ता पूरे तौर पर हाथ में ला चुका है। हक़ तआला उन हज़रात की मुहब्बत पर इस्तिक़ामत अता फ़रमाए सय्यद अलबशर अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम के तुफ़ैल में।’’
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की नज़र में सादाद की मुहब्बत व अज़मत किया थी इस से बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है। मक्तूब 55, दफ्तर अव्वल में फ़रमाते हैं:
व अहले बीत अलरसोल मसला कमसल सफ़ेन नूह मिन रकभा निजा व मिन तख़ल्लुफ़ अनहा छलक, क़ाल बाज़ उलारफ़ैन उन रसूल अल्लाह सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अला आला व असहाबह व सल्लम जाल असहाबह कालिंजूम व बालंजूम हम यहतदून व शब्बा अहल बीता बसफ़ेन नूह इशारतन अला उन्न राकब अलसफ़ेन लाबद ला मिन रियाय अलंजूम लियामन मिन अलहलाक व बुदून रियाय अलंजूम इलिंजा मुम्तना क़तअन
और रसूल अलैहि अस्सलाम के अहले बीत का हाल हज़रत नूह की किश्ती की तरह है जो इस पर सवार हुआ निजात पागया और जो इस से दौर रहा हलाक हो गया। बाज़ आरिफ़ैन का कौल है कि रसूल अलैहि व अला आला व असहाबह अस्सलात व अस्सलाम ने अपने इरशाद में सहाबा कराम को सितारे करार दिया और सितारों ही से लोग राह पाते हैं और अपने अहले बीत को सफ़ीना नूह अलैहि अस्सलाम से तशबीया दी इस तरफ़ इशारा करने के लिए कि किश्ती पर सवार होने वाले के लिए सितारों की रियायत ज़रूरी है ताकि हलाकत से बचा रहे, सितारों की रियायत के बग़ैर इस के लिए निजात नामुमकिन है।