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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiख़साइस नक़्शबंदियावसूल अली अल्लाह के चार तरीके

अध्याय 13 में से 22पृष्ठ 152–164

वसूल अली अल्लाह के चार तरीके

नक़्शबंदी बुजुर्गों के यहाँ वसूल अली अल्लाह के चार तरीके हैं; ज़िक्र, राबिता, मुराक़बा, सोहबत शैख़ कामिल।

ज़िक्र की अहमियत:

मज़हर कमालात अहमदी हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम सरहंदी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: ‘‘आदमी जब तक गैर हक़ के साथ गिरफ्तार है और इस का सीना गैर अल्लाह के नुक़ूश से पाक व साफ नहीं है इस वक़्त तक मर्ज बातिन में गिरफ्तार है और हक़ सुब्हानहू

के क़ुर्ब से दौर और महजूर है इस थोडी फुर्सत में इस मर्ज को ज़ाइल करना सब से अहम काम है और इस मोहलत क़लील में इस माअनवी बीमारी का इलाज सब से बड़ा मक़सद है इस मर्ज का अज़ाला ज़िक्र कसीर से मुताल्लिक़ करार दिया गया है और मासवा की गंदगी से बातिन की तहारत व पाकी अल्लाह तआला की याद से मरबूत है।

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا اذْکُرُوا اللہَ ذِکْرًا کَثِیۡرًاوَّ سَبِّحُوۡہُ بُکْرَۃً وَّ اَصِیۡلًا

ज़िक्र कसीर इस वक़्त मुतहक़्क़ होता है जब कि इस के बाद गफलत न हो जो कि इस राह में ज़हर कातिल है और मर्ज बातिन की मददगार , एक बुजुर्ग का कौल है:

लिम अक़बल मुक़बलٌ अली अल्लाह मुद्र्र उमरा सम आरज़ अन्हु लहज़्तन फ़िकान माफ़ाता अक्सर मुम्मा नाला

यानी अगर पूरी उम्र कोई ख़ुदाए तआला की तरफ़ मुतवज्जा रहा फिर एक लहज़ा के लिए गाफिल हो गया तो जो फ़ौत हो गया (एक लहज़ा गफलत में) इस से ज़्यादा होगा जो इस ने (पूरी उम्र ज़िक्र में बसर करने से) पाया।’’

इस ज़िक्र का कमाल इस वक़्त मयस्सर आता है जब कि मज़कूर का मासवा सीने से कोच कर जाए और तमाम ताल्लुकात से पाक व साफ हो जाए न दुनिया की खुशी से शादाँ हो और न इस के ग़म से ग़मगीन इस हद तक कि अगर मासवा को बतकल्लुफ़ भी हाजिर करे तो मयस्सर न आये इस निस्यान की वजह से जो कि बातिन को मासवाए हक़ से हासिल हो गई है जब तक इस तरह की फ़रामोशी और निस्यान नहीं इस वक़्त तक अल्लाह तआला का ज़िक्र मासवा की याद के साथ मख़लूत है और जिस याद में गैर हक़ शरीक है वह इस पाक बारगाह के लायक नहीं है।

اَلَا لِلہِ الدِّیۡنُ الْخَالِصُ

और अल्लाह तआला फरमाता है: वाज़िक्रۡ र्कब्लिक अज़ा निसीۡत

ज़िक्र की किस्में:

मालूम होना चाहिए कि ज़िक्र ज़बान से भी होता है और क़ल्ब से भी। अफ़ज़ल वह है जो बैक वक़्त ज़बान व क़ल्ब दोनों से हो और अगर एक पर इक़तिसार करे तो ज़िक्र क़ल्ब अफ़ज़ल है। ज़िक्र लिसानी और कलबी दोनों ही अहले तरीक़त में राइज हैं मगर मशाइख़ नक़्शबंदिया के यहाँ मोतबर ज़िक्र ख़फ़ी कलबी है इस का मतलब यह है कि मामूलात तरीका की हैसियत से यह ज़िक्र मोतबर है वर्ना मस्नून दुआएं वगैरह यह बुज़ुर्गवार भी ज़बान से ही पढ़ते हैं।

ज़िक्र ख़फ़ी कलबी व सुरी व जहरी:

बाज़ किताबों में में ने देखा है कि ज़िक्र ख़फ़ी कलबी वह है जिसे वह फरिश्ते भी न सन पाएं जो हमेशा साथ रहते हैं। हज़रत ख़्वाजा नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि ज़िक्र ख़फ़ी की हक़ीक़त वक़ूफ़ कलबी से मयस्सर हो सकती है और वह मक़ाम हासिल होता कि ख़ुद दिल भी नहीं जानता है कि वह ज़िक्र में मशगूल है, अकाबिर तरीक़त का इरशाद है कि क़ल्ब को अगर इस का इल्म बाक़ी रहे कि वह ज़िक्र कर रहा है (यानी महजूब न हो) तो जान ले कि वह अभी गाफिल है।

ख़याल रहे कि ज़िक्र कलबी हमेशा ख़फ़ी यानी गैर जहरी होगा और ज़िक्र आहिस्ता और पस्त आवाज़ में किया जाए तो ज़िक्र सर्री कहलाता है और अगर बुलंद आवाज़ से हो तो ज़िक्र जहरी है।

हज़रत ख़्वाजा अब्द अलख़ालिक़ ग़जददानी क़ुद्दिस सिर्रहू से क़ब्ल इस सिलसिले के मशाइख़ ज़िक्र जहरी करते थे। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू को हज़रत ख़िज़र अलैहि अस्सलाम ने ज़िक्र ख़फ़ी की तालीम दी। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के बाद इस सिलसिले में ज़िक्र ख़फ़ी ही रहा यहाँ तक कि हज़रत ख़्वाजा महमूद फ़ुग़नवी क़ुद्दिस सिर्रहू ने बाज़ मस्लहतों की रो से तालिबेन को ज़िक्र जहरी का हुक्म दिया।

हज़रत ख़्वाजा महमूद क़ुद्दिस सिर्रहू पर बाज़ लोगों ने एतराज भी किया कि आप अपने शैख़ के मुताबिक ज़िक्र नहीं करते हैं तो आप ने जवाबन फ़रमाया कि मेरे शैख़ मुहम्मद आरिफ देवगिरी क़ुद्दिस सिर्रहू ने अख़ीर वक़्त में ज़िक्र जहर की इजाजत अता फ़रमा दी थी। उलमा-ए वक़्त की एक जमात ने आप से पूछा कि आप ज़िक्र जहरी क्यों करते हैं? आप मने फ़रमाया कि सोया बेदार हो, गाफिल होशियार हो और रास्ता पर आजाए और शरीअत व तरीक़त की इस्तिक़ामत हासिल कर ले और तौबा व अनाबत की हक़ीक़त की तरफ़ जौहर एक नेकी और नेक बुख़ती की असल है, रगबत करे।’’

हज़रत ख़्वाजा महमूद क़ुद्दिस सिर्रहू के बाद मशाइख़ सिलसिला ज़िक्र ख़फ़ी के साथ साथ ज़िक्र जहरी भी करते थे यहाँ तक कि इमाम तरीक़त ख़्वाजा बुजुर्ग हज़रत बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारा आलम ज़ुहूर में जलवा गर हुए। आप चों कि मामलात में हज़रत ख़्वाजा अब्द अलख़ालिक़ ग़जददानी क़ुद्दिस सिर्रहू की तरफ़ से अज़ीमत पर अमल करने के मामूर थे लिहाज़ा आप ने ज़िक्र ख़फ़ी इख्तियार फ़रमाया और आज तक वही मामूल है।

ज़िक्र कलबी:

मुहक़्क़ अली अलातलाक़ हज़रत शैख़ अब्द उलहक़ मुहद्दिस देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू शरह सफर अलसआदत में फ़रमाते हैं ज़िक्र कलबी से मुराद हक़ जल जलाला की तरफ़ तवज्जो और हुज़ूर है ज़िक्र से तलफ़्ज़ के बग़ैर और इस का तख़ील इस तौर पर कि इस के सहीफ़ा से अग़यार के नुक़ूश यकसर मिट जाएँ और बातिन का क़िबला स्वाए अहदेत हक़ के और कुछ न रहे। सूफ़िया कराम ने जिस को ज़िक्र हक़ीक़ी और साफी कहा है वह यही है इसी को सिलसिला आलीया नक़्शबंदिया में ज़िक्र ख़फ़ी, वक़ूफ़ कलबी तवज्जो बोजह ख़ास और शहूद, वसूल, वजूद कहते हैं (आगे फ़रमाते हैं) जब यह निस्बत हासिल होती है पस अगर एक लम्हा और घड़ी भर के लिए हो जब

कि बंदा गैर हक़ से मुनक़ते है यानी इबतिदाई मरहलों में हो तो ऐसी सूरत में जब वह कैफियत हासिल होगी तो इस वक़्त में वह ख़ुदा से वासल है और जब यही निस्बत मलिका की सूरत इख्तियार कर लेती है और दवाम पज़ीर हो जाती है तो सालिक मंज़िल फना में पहुँच जाता है।

ज़िक्र की दो किस्में:

नक़्शबंदी सादाद में जो ज़िक्र मामूल है वह दो किस्म पर है; अव्वल ज़िक्र असम ज़ात, दोम ज़िक्र नफ़ी व इस्बात, सुलूक मुजद्दिदय में उन की तफ़सील आयेगी।

ज़िक्र कलबी से इबतिदा की वजह:

मालूम होना चाहिए कि अक्सर सूफ़िया कराम रहिमहुम अल्लाह तआला के नज़दीक सालिक जब तक इल्मी मुसाफ़त को सुलूक और जज्बा की दोनों राहों से तै न कर ले मर्तबा कमाल व तकमील को नहीं पहुँचता है। सुलूक के मानी हैं जाना और जज्बा के मानी खींचना और सुलूक सालिक का महल है और जज्बा शैख़ का सुलूक से क़ालिब का तसफ़ीया होता है और जज्बा से क़ल्ब और दीगर लताइफ़ की तनवीर होती है। नक़्शबंदिया तरीका में चों कि जज़्ब मुक़द्दम है सुलूक पर जैसा कि गुज़र चुका और दीगर तरीकों में जज्बा पर सुलूक मुक़द्दम है इसी लिए नक़्शबंदी सादाद ज़िक्र का आगाज़ क़ल्ब और दीगर लताइफ़ से करते हैं जो कि आलम अम्र से हैं और लिसान (ज़बान) चों कि अजज़ाए क़ालिब से है इस लिए जिन तरक में सुलूक मुक़द्दम है उन के यहाँ ज़िक्र लिसानी ज़िक्र कलबी पर मुक़द्दम है जज्बा का मंशा हज़रत अबू बुकर सिद्दीक़रज़ि अल्लाह अन्हु हैं और सुलूक का हज़रत अलीरज़ि अल्लाह अन्हु।

राबिता:

यानी शैख़ कामिल के साथ अपने क़ल्ब को मरबूत करना और कामिल एतिक़ाद होना। राबिता की शर्त यह है कि शैख़ ऐसा कामिल और बुलंद दर्जा वाला हो कि मक़ाम मुशाहिदा से वासल और तजल्लियात

ज़ातीय से नूरानी नीज़ निहायत कवी तवज्जो रखता हो और याददाश्त की दाइमी मश्क़ रखता हो जिस के देखने से ज़िक्र का फायदा हासिल हो। जब ऐसे शैख़ की सोहबत नसीब हो तो इस को बहुत गनीमत समझे और मुरीद को चाहिए कि अपनी ज़ात को हर चीज़ के तसोर व ख़याल से खाली कर डाले स्वाए सोहबत शैख़ के, और इस फ़ैज़ का मुंतज़िर रहे जो शैख़ की जानिब से आरहा है , आंखें ख़्वाह बंद रखे या न, फिर जब कुछ हासिल हो इस की हिफाज़त करे वसूल अली अल्लाह की यह राह सब राहों से क़रीब तर और मूसिल तर और ज़िक्र व मुराक़बा से बेहतर है क्यों कि मज़कूरा बाला औसाफ़ के हामिल शैख़ की सोहबत में मुरीद का बातिन मासवा के नुक़ूश से पाक व साफ और शैख़ की हिम्मत से दिल जनाब किबरिया की जानिब मुतवज्जा हो जाता है, हां तासीर का ज़ुहूर सई व इख़लास के मुताबिक होता है।

मुरीद को चाहिए कि इस सिलसिला में इतना मलिका पैदा करे कि जब चाहे और तवज्जो करे शैख़ की सूरत हाजिर हो जाए इसी तरह से जब राबिता का ग़लबा होता है तो मुरीद अपने आप को उएन शैख़ देखता है और इस के लिबास व सिफ़त से मौसूफ़ पाता है, जिधर देखता है शैख़ ही शैख़ नज़र आता है इसी का नाम फना फ़ी उलशेख़ है।

हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम सरहंदी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि शैख़ की सूरत जब जब इस तरह मुरीद के साथ रहे तो इस को निस्बत राबिता कहते हैं हमारे बुजुर्गों का कौल है:

साया रहबर ब अस्त अज़ ज़िक्र हक़

इस में इसी निस्बत की जानिब इशारा है यानी निस्बत राबिता की हिफाज़त मतलब यह है कि तालिब मुबतदी को चों कि हक़ सुब्हानहू के साथ मुनासबत ज़्यादा नहीं होती है

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।रहबर का साया ज़िक्र से बेहतर है।

इस लिए ज़िक्र से ज़्यादा मुफीद इस के लिए तसोर शैख़ है, मुरीद को तसोर शैख़ ज़िक्र वगैरह से ज़्यादा मुफीद नफा बख्श है और इस का दवाम मुरीद के लिए नेमत उज़्मा है गोया मुरीद हिम्मा वक़्त शैख़ के हुज़ूर में है निस्बत मज़कूरा से अख़ज़ फ़्यूज़ में बड़ी आसानी हो जाती है नीज़ इस का हुसूल शैख़ के साथ मुनासबत ताम्ह की निशान दही करता है।

तासीर (असर कबूल करने) का ज़ुहूर मुनासबत पर मबनी है जितनी मुनासबत शैख़ से ज़्यादा होगी इतनी ही तासीर ज़्यादा होगी। ख़याल रहे कि तासीर में जमईयत दिल का हुसूल मोतबर है और जनाब इलाही की जानिब तवज्जो और इंजज़ाब कलबी है, हां गर्मी और हरारत का ज़ुहूर अगरचे मुफीद और ज़ौक़ अफ़्ज़ा है मगर क़र्न अव्वल में नहीं था।

ख़याल रहे कि शैख़ मेज़ाब (प्रनाला) की मसल है जिस के बह्र मुहीत से क़ल्ब मुरीद पर फ़ैज़ नाज़िल होता है। लिहाज़ा अगर राबिता में कुछ कमी होगी तो वसूल बहुत मुश्किल है। हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम क़ुद्दिस सिर्रहू से पूछा गया कि फना फ़ी उलशेख़ के बग़ैर फना फ़ी अल्लाह हासिल हो सकती है? आप ने फ़रमाया: शैख़ फ़्यूज़ का वास्ता है जब तक वास्ता दुरुस्त न होगा मतलूब तक न पहुंचेगा। लिहाज़ा फना फ़ी उलशेख़ के बग़ैर फना फ़ी अल्लाह मुश्किल है।

मुरीद को चाहिए कि अपने इरादा को शैख़ के इरादों के ताबे रखे और अपनेआप को मुकम्मल तौर पर इस तरह शैख़ के हवाले कर दे जिस तरह मुर्दा गुस्साल के हवाले होता है और यह चीज़ तमाम तरक ख़ुसूसन नक़्शबंदिया में अशद ज़रूरी है क्यों कि इस में इफ़ादा और इस्तिफ़ादा इनाकासी और अंसबागी है और मदार कार सोहबत है। पस वजह मुनासबत शैख़ मुक़तदा के साथ जितनी ज़्यादा होगी इतनी ही सोहबत की तासीर ज़्यादा और अख़ज़ फ़्यूज़ की राह कुशादा तर होगी।

मालूम हो ना चाहिए कि सूरत शैख़ के अहजार (हाजिर करने) के वक़्त अगर सकर व ग़ीबत तारी हो तो सूरत की तरफ़ इलतिफ़ात छोड़ दे और इसी हाल की तरफ़ मुतवज्जा हो

जाए।

इस्तिहज़ार राबिता के इक़साम:

जानना चाहिए कि तरीका नक़्शबंदिया में अवैसियत ग़ालिब है इस लिए सालिक घर बैठे बुजुर्गों से इस्तिफ़ादा कर सकता है ख़्वाह शैख़ और वह बुजुर्ग जिन से फ़ैज़ ले रहा है दुनिया में मौजूद हूँ या विसाल कर चुके हूँ। राबिता की मुतअद्दिद सूरतों और इक़साम हैं; हर एक से फ़ैज़ लेने की तमाम सूरतों बराए नफा आम तफ़सील से दर्ज करते हैं:

पहली किस्म:

यह है कि मुरीद शैख़ कामिल की सूरत अपनी दोनों आंखों के दरमियान तसोर करे और इस सूरत में शैख़ की रूहानियत की जानिब मुतवज्जा हो, इसी हालत पर बराबर क़ायम रहे यहाँ तक कि ग़ीबत या जज्बा का असर हासिल हो जाए।

दूसरी किस्म:

यह है कि सूरत शैख़ का तसोर मुरीद अपने दायें या बाएं जानिब करे, फिर इस में इस की रूहानियत की तरफ़ मुतवज्जा हो यहाँ तक कि मज़कूरा बाला कैफियत हासिल हो।

राबिता की मज़कूरा दोनों किस्मों में ग़ीबत या असर जज्बा हासिल होने के बाद राबिता तर्क कर दे और इसी हाल की तरफ़ मुतवज्जा हो जाए जो हासिल हुआ है यानी ग़ीबत और असर जज्बा। और जब जब यह राबिता से हासिल शुदा अम्र ज़ाइल हो फिर राबिता में मशगूल हो जाए यहाँ तक कि वही हाल फिर वापस आजाए इसी तरह राबिता पर मदावमत करता रहे यहाँ तक कि अपनी ज़ात व सिफ़ात को सूरत शैख़ में फना कर दे जब यह दौलत हासिल हो जाए गी तो रूहानियत शैख़ को इस के कमालात के साथ इस सूरत में मुशाहिदा करेगा क्यों कि कमालात रूहानियत से जुदा नहीं होते हैं। पस रूहानियत शैख़ की तरबीयत इस को अल्लाह तआला से वासल कर देगी और यह वासलेन कामलियन से हो

जाएगा। राबिता से मुरीद शैख़ से तरबीयत पाता रहेगा अगरचे शैख़ मग़रिब में और यह मशरिक़ में हो।

तीसरी किस्म:

इस्तिहज़ार राबिता की तीसरी सूरत यह है कि सूरत शैख़ का तसोर अपनी पेशानी में ख़याल करे और सूरत को वस्त पेशानी में साबित करे, यह किस्म पहली दो किस्मों की बनिस्बत खयालात के वज़ा में ज़्यादा कवी और मुफीद है।

चौथी किस्म:

यह है कि शैख़ की सूरत वस्त क़ल्ब में तसोर करे। यह तरीका कलबी ख़तरात के दफा करने में ज़्यादा मुफीद है।

पाँचवीं किस्म:

चाहिए कि यही सूरत शैख़ को अपनी पेशानी में ख़याल करे, फिर सूरत के वस्त क़ल्ब में नुज़ूल करे और यह तसोर करे कि हमारा क़ल्ब एक वसीअ दहलीज़ है जहां तक हो सके ख़तरात यकसर ख़त्म करे। मज़कूरा बाला तमाम इक़साम से ज़्यादा मुफीद और नफा बख्श यह सूरत है और सख्त भी।

छुट्टी किस्म:

यह है कि मुरीद अपनी नफ़ी करे और शैख़ को साबित करे। यह किस्म बल्लियात के दफा के लिए बहुत मुफीद है।

विसाल याफताह बुजुर्गों के साथ राबिता की कैफियत:

हुज़ूर सीदी व संदी मुर्शदी मौलाई हज़रत मौलाना अहमद रज़ा ख़ाँ साहिब मता अल्लाह उलमुस्लिमीन बतूल बकाइआ का तरीका यह है कि जब किसी बुजुर्ग की रूहानियत से इस्तिफ़ादा करते

हैं तो पहले चंद मर्तबा सूरह इख़लास शरीफ़ मा अव्वल व आखिर दुरूद शरीफ़ पढ़ कर उन बुजुर्ग की बारगाह में ईसाल सवाब करते हैं, फिर मुतवज्जा होते हैं। इस का तरीका यह है कि सालिक को चाहिए कि अपने आप को तमाम तिब्बी और जिस्मानी इलायक से खाली करे और अपनेकलब को जमी ख़तरात और उलूम व नुक़ूश से पाक करे, फिर उन बुजुर्ग की रूहानियत का तसोर करे बायं तौर कि वह ऐसा नूर है जो कैफियात महसूसा से मुजर्रिद है, फिर इस नूर को क़ल्ब में महफूज़ कर ले यहाँ तक कि उन बुजुर्ग के फ़्यूज़ात से कोई फ़ैज़ हासिल हो या अहवाल में से कोई हाल क्यों कि कामलियन की रूहानियत मंबा फ़्यूज़ात है तो जो शख्स मंबा को क़ल्ब में दाखिल करेगा लामुहाला फ़ैज़ पाएगा।

ख़याल रहे यह तरीका इस वक़्त है जब कि उन बुजुर्ग की कब्र से दौर हो और अगर साहिब कब्र से राबिता कब्र के पास हो तो पहले साहिब कब्र को सलाम करे, फिर कदमों के पास या दायें तरफ़ बाअदब खड़ा हो कर फ़ातिहा पढ़ कर ईसाल सवाब करे, इस के बाद कब्र से थोड़े फासले पर बैठ जाए, हमारे हज़रत दाम ज़ला सीना के मुक़ाबिल उमूमन बैठते हैं, फिर साहिब कब्र की रूहानियत की तरफ़ बायं तौर मुतवज्जा हो कि साहिब कब्र से फ़ैज़ हमारे क़ल्ब में आरहा है मज़कूरा बाला तरीके के मुताबिक।

उलहासिल राबिता फ़्यूज़ात हासिल करने का इतना उम्दा तरीका है कि साहिब फ़ैज़ कहीं हो और यह कहीं हर जगह फ़ैज़ याब हो सकता है। पस कोई शख्स कहीं से भी अगर सर्वर कायनात ﷺ की तरफ़ बितरीक़ मज़कूर मुतवज्जा होगा फ़ैज़ पाएगा। इसी तरह औलीए कराम से भी। पस राबिता बग़ैर तवज्जो के भी इस्तिफ़ाज़ा में काफ़ी है और अगर तवज्जो भी हो तो नूरٌ अला नूर। हां मदार कुव्वत राबिता पर है, लिहाज़ा जो शख्स इस पर दवाम इख्तियार करता है इस को तमाम अहवाल तरीक़त और कमालात हक़ीक़त हासिल हो जाते हैं और जिस का राबिता सही नहीं इस के इस्तिफ़ाज़ा का रिश्ता मुनक़ते रहेगा न इस को सुलूक हासिल हूँ

गे और न ही इसरार वसूल ज़ाहिर हूँ गे। (अलबाज अस्सुन्निया)

आदाब राबिता:

यह हैं कि मुरीद यह एतिक़ाद रखे कि शैख़ के कमालात इस की रूहानियत से जुदा नहीं हैं और इस की रूहानियत किसी जगह से ख़ास नहीं हैं। पस जिस जगह इस का तसोर करेगा रूहानियत हाजिर होगी नीज़ यह एतिक़ाद रखे कि शैख़ की रूहानियत के तसर्फ़ात दर हक़ीक़त हज़रत हक़ तआला के तसर्फ़ात हैं और सोहबत शैख़ की हिफ़ातित करे और इस के आदाब की रियायत हर हाल में रखे नीज़ जब तक राबिता कामिलन न हो तो ऐसी सूरत में अगर बाज़ अहवाल भी हो जाएँ फिर भी राबिता तर्क न करे क्यों कि अगर राबिता तर्क करेगा तो वह हाल जुदा हो जाएगा क्यों कि शैख़ का हाल इस के पास गोया बतौर आरियत है नीज़ तमाम औकात में राबिता पर मदावमत बहुत ज़रूरी है ।

तंबीया:

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि जिस शैख़ का राबिता दुरुस्त है वह वह है जिस को फना उत्तम और बक़ाए अकमल हासिल हो और इस ज़माना में ऐसे नादिर उलवजूद बल्कि कुलअदम हैं चों कि सिलसिला नक़्शबंदिया में निहायत बदायत में दर्ज है इस लिए बाज़ सालकेन को इबतिदाई मंजिलों में फना से क़ब्ल वह अहवाल हासिल हो जाते हैं तो वह उन्ही को आला दर्जा का कमाल समझ लेते हैं और अपने मुरीदैन को राबिता का हुक्म दे देते हैं इस में पीर व मुरीद दोनों ही के लिए अज़ीम खतरा है।

फायदा:

मुरीद राबिता का इस वक़्त मुहताज है जब कि बुलाबास्ता अल्लाह तआला से फ़ैज़ हासिल करने पर कादर न हो। पस अगर इस लायक हो जाए तो राबिता तर्क कर देगा क्यों कि इस वक़्त राबिता में मशगूल होना यह तरक्की से तंज़िल की तरफ़ आना है और मर्तबा हिजाब को

शहूद पर तरजीह देना है। यह अल्लाह तआला से आराज़ है। हां शैख़ कामिल की सोहबत व निस्बत तर्क न करे क्यों कि हिफ़्ज़ सोहबत व निस्बत मुशाहिदा को ज़्यादा करता है और मक़ाम इंस व मुहादसा के क़रीब करता है।

मुराक़बा:

लुगवी ऐतबार से यह लफ़्ज़ या तो रक़ाबत बमानी मुहाफ़िज़त या रक़ूबत बमानी इंतजार से माख़ूज़ है। तमाम हवास ज़ाहिरा व बातिना को जमा करके मतलूब के इंतजार में बैठने का नाम मुराक़बा है, सिलसिला आलीया नक़्शबंदिया में इस की तरकीब यों है कि आंखें बंद करके लताइफ़ अशरा में से किसी लतीफ़ा की तरफ़ मुतवज्जा हो जाए और मुबदा फ़ैज़ से इस लतीफ़ा पर फ़ैज़ के आने का इंतजार करे और इसी में मुस्तग़र्क रहे।

इमाम उलहिंद हज़रत शाह वली अल्लाह साहिब मुहद्दिस देहलवी रहमत अल्लाह अलैहि की तशरीह के मुताबिक मुराक़बा की ऐसी तारीफ़ जो इस की तमाम इक़साम को शामिल हो यह है:

‘‘कुव्वत दराकि के तवस्सुत से अल्लाह तआला की सिफ़ात की जानिब तवज्जो ताम के साथ मुतवज्जा होना या जिसम से रूह के फिराक की हालत की जानिब या इस के मसल यहाँ तक कि अक्ल व फ़हम व ख़याल व तमाम हवास इसी तवज्जो के ताबे हो जाएँ और जो चीज़ महसूस नहीं है वह महसूस के मंज़िला में हो जाए।’’

हज़रत ग़ौस आलम सय्यदना शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: दिल के ख़तरात व वसावस से निगहरानी करना और ज़िक्र और राबिता के तवस्सुत के बग़ैर फ़ैज़ इलाही की निगरानी करने का नाम मुराक़बा है। यह कैफियत इस तौर पर कि बुनियाद ताम व शिकस्त तमाम के साथ ज़ात इलाही की तरफ़ मुतवज्जा रहे यहाँ तक कि तवज्जो अली अल्लाह बग़ैर मुज़ाहमत ख्वातर दिल का मलिका हो जाए।’’

हज़रत ख़्वाजा जहां मुहम्मद बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि मुराक़बा

के मानी हैं निस्यान रवीत अलमख़लूक़ बदवाम उलनज़र अली अलख़ालिक़ यानी ख़ालिक़ की तरफ़ हर वक़्त देखने रहने की वजह से मख़लूक़ की दीद को बिलकुल भूल जाना। आप फ़रमाते हैं: मुराक़बा पर मदावमत नादिर चीज़ है जिस को इस गिरोह के बहुत कम लोगों ने पाया है में ने इस का तरीका मालूम कर लिया है और वह है नफ़्स इमारा की मुखालफत और सुन्नत सनेह की इत्तिबा करना।

हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने जो दवाम मुराक़बा का तरीका बताया है यक़ीनन बड़ी दिक्कत नज़र पर मबनी है अगर मुतामल (गौर करने वाला) गौर करे तो आप के इस कलाम में बड़ी मानवियत नज़र आये गी। बह्र हाल दवाम तवज्जो और मुराक़बा अगर हो सकता है तो आका अलैहि अस्सलाम की संतों पर अमल से हो सकता है।