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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiख़साइस नक़्शबंदियानिस्बत नक़्शबंदिया के फ़राइज़

अध्याय 12 में से 22पृष्ठ 141–152

निस्बत नक़्शबंदिया के फ़राइज़

गुज़शता बयान से आप ने समझ लिया होगा कि नक़्शबंदी निस्बत का हासिल दवाम हुज़ूर व आगाही और दिल से ख़तरात का गुम होजाना है। हज़रत शाह गुलाम अली देहलवी मुजद्दिदी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि मेरे नज़दीक ख़तरात का कम हो जाना गुम हो जाने के मंज़िला में है। एक मर्तबा आप से सवाल किया गया कि नक़्शबंदिया में किया चीज़ फर्ज़ है? आप ने फ़रमाया: दो चीजें फर्ज़ हैं; एक वक़ूफ़ कलबी, दोम निगहदाशत ख्वातर। एक मक़ाम पर आप ने फ़रमाया कि आयत करीमा:

رِجَالٌ ۙ لَّا تُلْہِیۡہِمْ تِجَارَۃٌ وَّ لَا بَیۡعٌ عَنۡ ذِکْرِ اللہِ

में दवाम ज़िक्र कलबी की तरफ़ इशारा है और दूसरी आयत:

فَاذْکُرُوا اللہَ قِیٰمًا وَّقُعُوۡدًا وَّعَلٰی جُنُوۡبِکُمْ

से भी यही ज़िक्र कलबी मफ़हूम होता है क्यों कि ज़िक्र कलबी हर वक़्त हो सकता है और ज़िक्र लिसानी अली अलदवाम मुश्किल है।

चार चीजों का नाम निस्बत नक़्शबंदिया है:

हज़रत शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि तरीका आलीया नक़्शबंदिया चार चीजों का नाम है; एक बे खतरगी, दोम दवाम हुज़ूर, सोम जज़्बात, चहारम वारदात। एक दूसरे मक़ाम पर फ़रमाते हैं कि इस तरीका शरीफा में मदार कार पांच चीजों पर रखा गया है; एक सालिक की तवज्जो दिल की जानिब, दोम दिल का ख़ालिक़ की तरफ़ मुतवज्जा रहना, सोम ख़तरात से गाफिल रहना, चहारम ज़िक्र में मशगूल रहना, पंजिम क़ल्ब में यह मानी मलहूज़ रखना कि ख़ुदावंद मेरा मकसूद तो ही और तेरी रज़ा मतलूब। (दर उलमारफ़)

हुज़ूर दो किस्म पर है:

जामा कमालात अहमदी हज़रत सय्यदना शाह गुलाम अली क़ुद्दिस सिर्रहू इरशाद फ़रमाते हैं कि हुज़ूर दो किस्म पर है; एक हुज़ूर ज़िक्र है , अव्वल हाल में कि लताइफ़ जाकिर हो जाते हैं, उन की हिफाज़त व निगहदाशत करनी चाहिए, दोम हुज़ूर मा अल्लाह कि इस को हमारे तरीका में याददाश्त, तवज्जो और आगाही दर हुज़ूर कहते हैं और दीगर तरीकों में शहूद नाम है यह हक़ सुब्हानहू की जानिब दिल की बेनाई है जब यह हासिल हो जाए तो इस की निगहदाशत ज़रूरी है यहाँ तक कि मलिका दिल हो जाए और हुज़ूर दाइमी हो जाए और गफलत राह न पाए अगरचे ज़ाहिर में मामला दुनिया में मसरूफ़ हो लेकिन बातिन में हक़ सुब्हानहू के साथ मालूफ़ जैसा कि कहा गया है कि ‘‘दिल बयार व दस्त बकार’’।

यह हुज़ूर दाइमी हज़रत शैख़ मुही उद्दीन इब्न अरबी के नज़दीक इस वक़्त मयस्सर आता है जब कि ख्वाब (सोने) में भी हज़रत रब अलाज़त से गफलत न आये और हमारे नज़दीक इस वक़्त जब कि नींद से बेदार हो तो दिल को आगाह पाए और हज़रत

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।दिल यार में और हाथ काम में।

मौलाना जामी क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक इस वक़्त जब कि दिल की तरफ़ मुतवज्जा हो तो दिल को ज़ात के मुशाहिदा में पाए। (दरालमारफ़)

तरीका की दरवेशी दो चीजों से मशरूत है:

तरीका नक़्शबंदिया मुजद्दिदय में दरवेशी दो चीजों का नाम है; एक दवाम हुज़ूर व आगाही और दोम मुहब्बत मशाइख़ जो कि मुहब्बत इलाही का ज़ुल है जल्ल जिक्रा इस की शर्त दो चीजें हैं; एक दवाम सोहबत, दोम इत्तिबा सुन्नत अला साहबहा अस्सलात व अस्सलाम।

जहां तक कश्फ़ का ताल्लुक है तो वह तरीका का रुकन है और न शर्त और न ही इस के लिए लाज़िम व ज़रूरी है। हज़रत ख़्वाजा मिर्ज़ा जान जानां शहीद देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया है कि हज़रत ख़्वाजा ख़्वाजगान मुहम्मद बहाआलदीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू ने कश्फ़ को तरीका से बिलकुल उठा दिया जैसा कि हज़रत बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू के मलफ़ूज़ात में तहरीर है कि जो लोग अल्लाह तआला की तरफ़ मुतवज्जा हैं उन को कश्फ़ की कोई ज़रूरत नहीं है क्यों कि कश्फ़ की दो किस्में हैं।

कश्फ़ की दो किस्में हैं:

एक दुनयवी यानी दुनिया के उमूर में से किसी का मक्षुफ़ होना कश्फ़ की यह किस्म बिलकुल कारामद नहीं और दोम उखरवी कश्फ़ जिस का ताल्लुक उमूर आख़िरत से होता है यह कश्फ़ किताब व सुन्नत में अच्छी तरह बयान कर दिया गया है और हमारे लिए वही काफ़ी है इस के बराबर कोई कश्फ़ नहीं हो सकता है नीज़ हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं।

तरीक़त के अकाबिरीन ने अपने तरीकों में रियाज़ात व मुजाहिदात को ऐसे तौर पर इख्तियार किया है जिस की वजह से अश्या का कश्फ़ होता है और वाक़ियात वगैरह ज़ाहिर होते हैं नीज़ सुलूक को भी बिलतर्तीब शर्त करार दिया है उन बुजुर्गों की सुलूक में रफ़्तार

बितरीक़ कश्फ़ होती है उन के यहाँ हर हर क़दम पर चाहिए कि वह चीज़ देखे जो उन्हों ने मुक़रर की है अगर वह सारी चीजें जिन का जिस मक़ाम से ताल्लुक है नज़र नहीं आती हैं तो यह उन के यहाँ नुकसान की अलामत है।

और हमारे मशाइख़ क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम ने अपना तरीका ऐसे तौर पर इख्तियार किया है कि मकाशफ़ात व वाक़ियात पैदा ही न हूँ इस की दो वजहें हैं; एक यह कि सालकेन उमूमन कश्फ़ के दिलदादा होते हैं ऐसी सूरत में हालात व वाक़ियात के ज़ुहूर से सालिक उन में गिरफ्तार हो कर मानूस हो जाता है जिस की वजह से मदारिज क़ुर्ब में इस तरक्की से रुक जाता है जो कि उएन जमईयत में इस्तिहलाक व अज़महलाल है जब कि मकसूद व मतलूब सिर्फ़ और सिर्फ़ हक़ सुब्हानहू होना चाहिए और हालात व वाक़ियात वगैरह को गैर और ज़ाइद जानना चाहिए।

हज़रत ख़्वाजा ख़्वाजगां मरहम दिल दर्दमंदां सय्यद मुहम्मद बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू से लोगों ने अहवाल व मकाशफ़ात के बारे में पूछा तो आप ने फ़रमाया सब की कलिमा ला के तहत हम ने नफ़ी की है। दूसरी वजह यह कि हर वह तजल्ली जिस के साथ रहमान जल जलाला मुतजली होता है शैतान रिजिम को भी कुव्वत दी गई है कि इसी तजल्ली से मुतजली हो सके और तजल्लियात रहमानी और तजल्लियात शैतानी के दरमियान फ़र्क़ और तमीज़ बहुत दुश्वार है इस वजह से मशाइख़ नक़्शबंदिया ने ऐसा तरीका इख्तियार किया है कि मज़कूरा बाला उमूर में से कुछ भी ज़ाहिर न हो और यकीन से जान लिया है कि मकसूद हक़ीक़ी यही है कि तमाम चीजों से बेज़ार हो कर हक़ सुब्हानहू के साथ इस तरह मशगूल हो जाए कि हर चंद हुज़ूर व आगाही को अपने से दौर करना चाहे मगर दौर न हो सके।

मज़कूरा बाला बयान से आप ने अच्छी तरह समझ लिया होगा कि नक़्शबंदी बुजुर्गों की हिम्मत कितनी बुलंद है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ तवज्जो अली अल्लाह की ताकीद करते हैं सालकेन को

हमेशा यही तंबीया फ़रमाते हैं कि मतलूब व मकसूद सिर्फ़ एक ज़ात ख़ुदावंदी हो इस के अलावा दिल में किसी चीज़ की तलब न हो, ख़ुदावंद क़ुद्दूस इनायत भी फ़रमाए तो भी अहवाल व वाक़ियात से जरा भी लगाव न हो, नक़्शबंदी सालकों को अगर राह सुलूक में कोई कश्फ़ न हो तो कभी बद दिल नहीं होना चाहिए यह तो उन के तरीका का मिजाज ही है, हां कफ अफसोस इस वक़्त मिलना चाहिए जब कि सुनतीं तर्क हो रही हूँ और फिर कश्फ़ होता रहे।

कितना अफसोस होता है उन नक़्शबंदियों को देख कर जिन को सुन्नत पर अमल की कोई फ़िक्र नहीं,ख़ुद भी और मुरीदों को कश्फ़ में उलझाए रहते हैं। बड़ा अफसोस यह देख कर होता है कि तर्क सुन्नत के बावजूद जब किसी चीज़ का कश्फ़ होता है तो उसे अपनी मक़बूलियत की दलील तसोर कर लेते और तर्क सुन्नत की वजह से जो नुकसान लाहक़ होता है इस की फ़िक्र नहीं करते हैं। में ऐसे लोगों के लिए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के एक फरमान को नकल करता हूँ जिस का हर हर जुमला काबिल हिफ़्ज़ है जिस से बखूबी अंदाजा हो जाएगा कि कश्फ़ वक़ाऐ की नक़्शबंदी बुजुर्गों के यहाँ किया गिनती है, आप फ़रमाते हैं: मौत के आने से पहले अपना काम करनाचाहिए और या शौक कहते हुए मरना चाहिए, अव्वल एतिक़ाद की दुरुस्ती से चारा नहीं और जो कुछ बितरीक़ ज़रूरत और तवातर दीन से मालूम है इस की तस्दीक ज़रूरी है। दोम जानना और अमल करना इस पर जो इल्म फ़िक़्ह से मुताल्लिक़ है नीज़ ज़रूरी है। सोम सुलूक सूफ़िया भी दरकार है न इस ग़रज के लिए कि ग़ैबी सूरतों और शक्लों का मुशाहिदा करें और अनिवार और रंगों को देखें यह ख़ुद लहू व लइब में दाखिल है, सूर व अनिवार हस्सी में किया नुकसान है कि कोई उन को छोड़ कर रियाज़ात व मुजाहिदात से सूर व अनिवार ग़ैबी का लालच करे सूर व अनिवार ग़ैबी और हस्सी दोनों हक़ सुब्हानहू की मख़लूक़ हैं और इस के साने होने पर दलालत करने वाली निशानियों से

हैं, सूरज और चांद का नूर जो आलम शहादत से है कई तरह उन अनिवार पर फ़ज़ीलत रखता है जो आलम मिसाल में देखते हैं लेकिन चों कि यह दीद दाइमी है और ख़वास व अवाम इस में शरीक हैं इस लिए नज़र ऐतबार से साक़ित कर के अनिवार ग़ैबी का लालच करते हैं, हां ؏

जो पानी तेरे दरवाजे के आगे जारी है वह गुदला मालूम होता है

बल्कि तरीक़ सूफ़िया के सुलूक से मकसूद एतिक़ादियात शरएहि में यकीन की ज्यादती हासिल करना है ताकि इस्तिदलाल की तंग जगह से कश्फ़ की फ़राख़ जमीन में आजाऐं और इजमाल से तफ़सील की तरफ़ आजाऐं। (मक्तूब210, जिल्द अव्वल)

विलायत और विलायत:

हज़रत सय्यदना व ग़ोस्ना ख़्वाजा मुहम्मद बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू इरशाद फ़रमाते हैं विलायत (वाव के ज़बर के साथ) बंदा के क़ुर्ब को कहते हैं जो वह हक़ सुब्हानहू से रखता है और विलायत (वाव के जीर के साथ) इस चीज़ को कहते हैं जो ख़ल्क़ में मकबूल होने का सबब है और अहले आलम इस की तरफ़ गर्वीदा होते हैं और कमाल मख़लूकात से ताल्लुक रखता है ख़वारिक़ व तसर्फ़ात दूसरी किस्म में दाखिल हैं, हाज़िरीन में से एक शख्स ने सवाल किया कि जो बरकतें साहिबान इस्तिदाद को पहुँचती हैं वह किस किस्म में दाखिल हैं? आप ने जवाब में फ़रमाया कि वह विलायत (वाव के ज़बर के साथ) का असर हैं। इस बयान के अस्ना में आप ने तालिबों के इस्तिफ़ादा का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया कि जिस वक़्त तालिब का आईना मुर्शद के आईना के मुक़ाबिल होता है तो जो कुछ मुर्शद के आईना में होता है वह तालिब के आईना पर बक़दर मुनासबत अपना परतो डालता है इसी मौका पर आप ने फ़रमाया कि बाज़ को विलायत उन दोनों किस्मों में से एक हासिल होती है और बाज़ को दोनों किस्मों से काफ़ी हिस्सा मिलता है या किसी को दोनों में से एक से ज़्यादा

और दूसरी से कम हिस्सा मिलता है।

मशाइख़ नक़्शबंदिया रहिमहुम अल्लाह तआला में हमेशा विलायत (वाव के ज़बर के साथ) विलायत (वाव के जीर के साथ) पर ग़ालिब रही है। आप ने यह भी फ़रमाया कि जब कोई मुक़तदा इस जहां से इंतकाल कर जाता है तो विलायत (बक्सर वाव) अपने किसी मुख़लिस के हवाले कर जाता है और विलायत (बफतह वाव) अपने साथ ले जाता है। (तज़किरा मशाइख़ नक़्शबंदिया)

निस्बत नक़्शबंदिया इनाकासी और हबीत है:

मज़हर तजल्लियात रहमानी हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू मौलाना मुहब् अली को तहरीर फ़रमाते हैं: ए मख़दूम! शरई वज़ों में से किसी भी वज़ा पर हूँ महल मज़ाइक़ा नहीं है इस शर्त के साथ कि इस मुहब्बत का रिश्ता कमजोर न पड़े बल्कि रोज़ बरोज़ कुव्वत पैदा करे और इस इश्तियाक़ की आह सर्द न हो साअत बसाअत शोला ज़नी में ज्यादती पैदा करे क्यों कि हमारा इर्तिबात हब्बी है और हमारी निस्बत इनाकासी और अंसबागी है क़ुर्ब व बाद में तफ़ावुत नहीं रखती है।

एक दूसरे मक्तूब में इरशाद फ़रमाते हैं: इफ़ादा व इस्तिफ़ादा इनाकासी व अंसबागी है मुरीद इस राबिता मुहब्बत की वजह से जो वह शैख़ मुक़तदा से रखता है घड़ी घड़ी इस के रंग से रंगीन होता है और बितरीक़ इनाकास इस के अनिवार से मनोर होता है इस सूरत में इफ़ादा और इस्तिफ़ादा में इल्म दरकार नहीं, खरबूजा सूरज की शुआ से धीरे धीरे पकता है और दिनों के गुज़रने से पक जाता है किया दरकार है कि इस को अपने पकने का इल्म हो या सूरज को इल्म हो कि इस को पक्का रहा है, हां इख्तियारी तसलीक व सुलूक जो कि दूसरे सिलसिलों में होता है इस में इल्म दरकार है और हमारे तरीका में कि सहाबा कराम का तरीका है अलैहिम इलरिज़्वान सुलूक व तसलीक का इल्म कुछ भी दरकार

नहीं है अगरचे शैख़ मुक़तदा कि बानी तरीका के मसल है कमाल इल्म और वफ़ूर मार्फत से तहक़्क़ रखता है तो लामुहाला इस तरीक़ आली में वसूल के हक़ में ज़िंदा व मुर्दा, बचे बूढ़े, जवान व शयूख़ सब बराबर हैं कि राबिता मुहब्बत या साहिब दौलत की तवज्जो की वजह से मक़ासिद की इन्तहा पर पहुँचते हैं। (मक्तूब 261।262)

खुलासा यह कि नक़्शबंदी निस्बत की बुनियाद इनाकास व अंस्बाग की है मुरीद को जितनी ज़्यादा शैख़ से मुहब्बत होगी और जितना ज़्यादा वह शैख़ का मुतबा होगा इतनी ही ज़्यादा उसे शैख़ से मुनासबत होगी। ऐसी सूरत में शैख़ के कमालात मुनाकिस हो कर मुरीद पर अपना परतो डालें गे जब दार व मदार इनाकास पर है तो यह भी ज़रूरी नहीं कि मुरीद को या पीर को अपने मक़ाम व मंज़िल का इल्म हो हां जो सुलूक इख्तियारी है जैसाकि दीगर सलासल में वहाँ इल्म जरूरदरकार है इस की मज़ेद वज़ाहत आगे आयेगी।

फायदा:

ख़्वाजा ख़्वाजगां इमाम तरीक़त सय्यदना मुहम्मद बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू को मौलाना याकूब चरखी क़ुद्दिस सिर्रहू के बयान के मुताबिक तसव्वुफ़ में चार तरीके से निस्बत हासिल है; एक बितरीक़ अवैसियत हज़रत ख़िज़र अलैहि अस्सलाम से।

दोम हज़रत सय्यद अलताइफा जुनेद बग़दादी क़ुद्दिस सिर्रहू से इस की तफ़सील यह है कि हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग क़ुद्दिस सिर्रहू को हज़रत ख़्वाजा सय्यद अमीर कलाल से उन को हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद बाबा समासी से उन को ख़्वाजा अज़ीज़ां अली रामयतनी से उन को ख़्वाजा महमूद अंजीर फ़ुग़नवी से उन को ख़्वाजा मुहम्मद आरिफ देवगिरी से उन को ख़्वाजा अब्द अलख़ालिक़ ग़जददानी से उन को ख़्वाजा यूसुफ हमदानी से उन को ख़्वाजा बो अली फार्मदी से उन को ख़्वाजा इमाम अबू अलक़ासम कशीरी से उन को ख़्वाजा अबू अली दक़ाक़ से उन को ख़्वाजा अबू अलक़ासम नसीराबादी से उन को ख़्वाजा अबू बुकर शिबली से उन को सय्यद अलताइफा हज़रत ख़्वाजा जुनेद बग़दादी से क़ुद्दिस अल्लाह तआला

इसरारहम व उफ़ाज़ इलेना मिन बरकाताम।

हज़रत ख़्वाजा की यह निस्बत हज़रत अमीर अलममनीन अली मुर्तज़ा कर्म अल्लाह तआला वजहा उलक्रीम तक पहुँचती है।

तीसरी निस्बत वह है जो हज़रत बायज़ीद बस्तामी के तवस्सुत से अमीर अलममनीन सय्यदना अबू बुकर सिद्दीक़रज़ि अल्लाह अन्हु तक मनतही होती है और

चहारम वह है जो हज़रत बस्तामी क़ुद्दिस सिर्रहू के तवस्सुत से हज़रत अली मुर्तज़ारज़ि अल्लाह अन्हु तक मनतही होती है।

आम तौर पर नक़्शबंदिया में बिलख़सूस नक़्शबंदिया मुजद्दिदय जो निस्बत जलवा फ़रमा है और जिस पर नक़्शबंदिया को इतने बुलंद कमालात और दर्जात हासिल हुए वह वही निस्बत है जो हज़रत अबू बुकर से सलमान फ़ारसी को और उन से हज़रत इमाम कासिम को और उन से इमाम जाफर सादिक को और उन से बितरीक़ अवैसियत हज़रत सुलतान बायज़ीद बस्तामी को और उन से इसी तरह हज़रत ख़्वाजा अबू उलहसन खरक़ानी को और उन से हज़रत ख़्वाजा बो अली फार्मदी रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम अजमईन को हासिल हुई बाक़ी वही सिलसिला है जो निस्बत जुङ्यद्य में मज़कूर हुआ।

अलक़ाब निस्बत:

मालूम होना चाहिए कि हमारे मशाइख़ के यहाँ जो मशहूर निस्बत है वह वही है जो हज़रत सय्यदना अबू बुकर सिद्दीक़रज़ि अल्लाह अन्हु से है कमा मर्र (जिस का अभी ज़िक्र हुआ)। इस निस्बत आलीया के जमाने के इख़तिलाफ़ के ऐतबार से मुख़तलिफ़ नाम रहे हैं पस हज़रत अबू बुकर सिद्दीक़रज़ि अल्लाह अन्हु से हज़रत सुलतान उलारफ़ैन तिफोर इब्न ईसा अलमशहूर ब बायज़ीद बस्तामी इस निस्बत को सिद्दीक़ीय कहा जाता था और हज़रत बायज़ीद बस्तामी से ले कर हज़रत ख़्वाजा अब्द अलख़ालिक़ ग़जददानी क़ुद्दिस इसराहम तक इस का नाम तिफोर्य था और आप से ले कर हज़रत

ख़्वाजा बुजुर्ग मुहम्मद बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू तक इस को ख़्वाजगान्या कहा जाता रहा और हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग क़ुद्दिस सिर्रहू के ज़माना मुबारक से इस का नाम नक़्शबंदिया करार पाया जो अभी तक चल रहा है।

बाज़ किताबों से मालूम होता है कि हज़रत ख़्वाजा उबीद अल्लाह एहरार क़ुद्दिस सिर्रहू की ज़ात से जब यह निस्बत एक मख़सूस नूर से पुरनूर हुई तो इस वक़्त से हज़रत इमाम रबानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू तक इस को एहरार यह कहा गया, जो निस्बत नक़्शबंदिया हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू के तवस्सुत से लोगों को मयस्सर आई चों कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू से इस को एक नयी ताजगी और रोशनी मिली आप की बुलंद और अर्फ़ा ज़ात ने इस को बुलंदियों और रफातों की उन हदों तक पहुँचा दिया कि रफात अर्श भी महव हैरत हो कर रह गई इसी वक़्त से मुस्तक़िल नक़्शबंदिया मुजद्दिदय फ़ैज़ान इलाही की एक अज़ीम शाहराह हो गई बल्कि जब से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का ज़ुहूर हुआ और मुजद्दिदी अनिवार से यह निस्बत मामूर हुई इस वक़्त से ज़्यादा शहरत और मक़बूलियत नक़्शबंदिया की इसी शाख को हुई और इस ने जहान को मनोर कर दिया इसी वक़्त से यह निस्बत नक़्शबंदिया मुजद्दिदय के नाम से मशहूर हुई फिर यही निस्बत जिन लोगों को हज़रत शम्स उद्दीन हबीब अल्लाह मिर्ज़ा जान जानां शहीद देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू के तवस्सुत से मिली उन के यहाँ इस के साथ मज़हरीय के लफ़्ज़ का और इजाफा हो गया फिर यह निस्बत जिन हज़रात को हज़रत कुतुब इलाक़ताब अल्लामा मुफ्ती रज़ा अली साहिब बनारसी क़ुद्दिस सिर्रहू के ज़रिया से मिली इस वक़्त से लफ़्ज़ रिज़वीह का इजाफा हो गया।

हज़रत मौलाना रज़ा अली क़ुद्दिस सिर्रहू चों कि इल्म व फजल और बुज़ुर्गी में एक अज़ीम मंज़िल के हामिल हुए और बनारस के दयार में आप का फ़ैज़ान बहुत आम हुआ आप के मुतअद्दिद ख़ुलफ़ा हुए जिन्हों ने इस निस्बत की खूब इशाअत की सब से ज़्यादा हज़रत

मौलाना रज़ा अली क़ुद्दिस सिर्रहू के फ़ैज़ान को जिस ने आम किया वह हैं आप के ख़लीफ़ा अरशद हज़रत मौलाना सय्यद अब्द उलहलीम साहिब सेवानी और उन के फ़रज़न्द अर्जुमंद कुतुब आलम मौलाना सय्यद अबू अलख़ैरात साहिब क़ुद्दिस इसरारह्मा हज़रत मौलाना सय्यद अबू अलख़ैरात क़ुद्दिस सिर्रहू की कुव्वत फ़ैज़ की वजह से आज भी यह निस्बत अपनी पूरी आप व ताब के साथ जलवा गर है आप के जमाने से इस में लफ़्ज़ खैरिय का और इजाफा हो गया।

हज़रत मौलाना अबू अलख़ैरात क़ुद्दिस सिर्रहू के मुतअद्दिद बाकमाल ख़ुलफ़ा थे मगर आज आप की निस्बत अपनी उन्ही रफातों के साथ जिन के पास मौजूद है वह मिली है आप के ख़लीफ़ा उज्जल शैख़ अलमशाइख़ हज़रत मौलाना गुलाम मुहम्मद ख़ाँ साहिब कमालपुरी क़ुद्दिस सिर्रहू को और उन के औसाफ़ के हामिल और कमालात के जामा और आप के फ़रज़न्द दलबंद हज़रत सीदी व संदी आक़ाई व मुर्शदी मौलाना शाह अहमद रज़ा ख़ान साहिब मता अल्लाह उलमुस्लिमीन बतूल बकाआ व उफ़ाज़ अलै व अला जमी उखुवती दाइमन अबदन हैं। अब यह निस्बत आप के शिजरा में यों है नक़्शबंदिया मुजद्दिदय मज़हरीय खैरिय रिज़वीह लफ़्ज़ रिज़वीह, खैरिय के बाद आप ही की निस्बत से लाया गया।

निस्बत नक़्शबंदिया और मुजद्दिदय में फ़र्क़:

निस्बत नक़्शबंदिया आप तफ़सील से पढ़ चुके और निस्बत अहमदिया मुजद्दिदय यह है कि लताइफ़ सबा (सातों लतीफ़ों) में से हर लतीफ़ा में इस तरह तवज्जो पैदा हो जाए कि फिर यह तवज्जो ज़ाइल हो जाए और अल्लाह तआला का हुज़ूर इस तरह हो जाए जिस तरह सालिक का नफ़्स ख़ुद सालिक के पास हुज़ूर रखता है और ज़ौक़ व शौक व तवज्जो कुछ बाक़ी न रहे और लताइफ़ आलम ख़ल्क़ में निस्बत के अनिवार में वसात व फ़राखी और लताफ़त अहवाल हासिल हो जाए इस का नाम निस्बत अहमदिया मुजद्दिदय है। (मक्तोबात हज़रत शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू)

हज़रत शाह गुलाम अली मुजद्दिदी क़ुद्दिस सिर्रहू ‘‘ईज़ाह अलतरीका’’ में इरशाद फ़रमाते हैं जान लो कि तरीका मुजद्दिदय नक़्शबंदिया के उसूल पर मबनी है और वह वक़ूफ़ कलबी व तवज्जो बिम्बदा फ़य्याज़ व निगहदाशत ख्वातर व दवाम ज़िक्र व एतसाम बसहबत शैख़ मुक़तदा हैं हर मक़ाम में लिहाज माहूद और फ़ैज़ और इस का माख़ज़ (मलहूज़) रखे और इसी तरीका के अज़कार व अशग़ाल पर मुवाज़बत इख्तियार करे लेकिन मुक़ामात बुलंद और इस्तिलाहात अर्जुमंद उन बुज़ुर्गवारों के चीजे दीगर हैं (दो स्तर बाद फ़रमाते हैं) इस तरीका शरीफा का हामिल दवाम हुज़ूर और दवाम आगाही है।

हज़रत ज़ात इलाही सुब्हानहू के साथ अहले सुन्नत व जमात के माफ़िक़ अक़ीदा सहीहा के इल्तिज़ाम के साथ और सुन्नत नबूय ﷺ की इत्तिबा के इल्तिज़ाम के साथ और जो शख्स उन तीन (दवाम हुज़ूर, अक़ीदा सहीहा का इल्तिज़ाम व इत्तिबा सुन्नत) उमूर में से किसी एक को नहीं रखता है वह तरीका से निकल जाता है नऊज़ बिल्लाह मुँहा इस हालत को सहाबा रज़ि अल्लाह अन्हुम के तरीका में एहसान कहते थे और सूफ़िया की इस्तिलाह में शहूद व मुशाहिदा व याददाश्त और उएन अलीक़ीन कहते हैं यह दौलत जो कि उबूदीयत का सरमाया है इस के हुसूल के वास्ते चार तरीके मुक़रर किए हैं।