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अध्याय 15 में से 22पृष्ठ 175–185

होश दर दम

इस कलिमा में होश बमानी अक्ल और दर बमानी तरफ़, जानिब और दम बमानी सांस है। इस के मुरादी मानी यह हैं कि सालिक को चाहिए कि वह हर वक़्त होशियार और बेदार रहे और इस बात का एहसास रखे कि हर सांस में वह गाफिल है या जाकिर और कोशिश करे कि इस की कोई सांस याद इलाही से खाली न हो। इस तरीके से बतदरीज दवाम हुज़ूर हासिल हो जाता है क्यों कि गफलत से साँसों की हिफाज़त हुज़ूर मा अल्लाह तक पहुँचाएगी। होश दर दम का यह इबतिदाई मरहला है जो इस मुबतदी सालिक के साथ मख़सूस है जो मज़कूरा तौर पर होशियार हो फिर जब यह सालिक सुलूक के दरमियानी मरहला में आये तो चाहिए कि इस बात की ततब्बो और तलाश में रहे कि यके बाद दीगरे साअतों में किसी साअत में गफलत आती है या नहीं अगर किसी साअत में आती है तो इस्तिग़फ़ार करे और आइंदा इस के छोड़ने का इरादा करे। इसी तरह हर साअत का ख़याल रखे ताकि दवाम हुज़ूर तक पहुँच जाए।

इस पिछली हालत को वक़ूफ़ ज़मानी कहते हैं जिस को हज़रत ख़्वाजा बहा उद्दीन नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस्तिख़राज फ़रमाया दर असल इस की वजह यह हुई कि आप ने यह ख़याल फ़रमाया कि मुतवज्जा होना इल्म अलालम (इल्म का इल्म) है हर हर सांस में और यह सालिक मुतवस्सित के हाल को परेशान करता है सालिक मुतवस्सित के मुनासिब तो तवज्जो अली अल्लाह में इस तरह इस्तिग़राक़ है कि इस को अपनी तवज्जो की दानिस्त मुज़ाहम न हो।

नज़र बुर क़दम:

(क़दम पर नज़र) ख़याल रहे कि इस कलिमा का ताल्लुक दो मफ़हूमों से है एक इस का

ज़ाहिर में मफ़हूम है यानी सालिक को चाहिए कि रास्ता चलते वक़्त नज़र क़दम पर रखे ताकि मुख़तलिफ़ लोगों और चीजों पर न पड़े क्यों कि उन चीजों की तरफ़ नज़र क़ल्ब में हिजाब पैदा करती है इस लिए कि नज़र के रास्ते से क़ल्ब में जो सूरतों मुंतक़िस् हो जाती हैं वही क़ल्ब के लिए हिजाब बिन जाती हैं इस कलिमा का एक मफ़हूम यह भी हो सकता है कि नज़र कदमों की तरफ़ रहनी चाहिए क्यों कि मुख़तलिफ़ अश्या की तरफ़ नज़र करने से क़ल्ब गाफिल न हो क्यों कि मुबतदी जाकिर की नज़र अश्या से जब मुताल्लिक़ होती है तो इस का क़ल्ब ज़िक्र से गाफिल हो जाता है इस तफ़र्क़ा और इंतिशार की वजह से जो अश्या की रवैत से पैदा होता है क्यों कि मुबतदी को हिफ़्ज़ क़ल्ब पर ताकत नहीं होती है।

यह मानी भी हो सकते हैं कि नज़र कदमों पर होनी चाहिए ताकि अग़यार के चेहरों पर न पड़े क्यों कि अग़यार के चेहरों पर नज़र भी सूफ़िया कराम के यहाँ ममनू व महज़ू रहे क्यों कि क़ुलूब साफ़िया उन साफ व शफ़्फ़ाफ़ आईनों की तरह होते हैं जिन में उन चीजों का अक्स आजाता है जो इस के मुक़ाबिल होती हैं बाज़ दलों में जो कसावत और संगदिली होती है या बुरे अख़लाक़ और गलत तफ़करात होते हैं क़ुलूब साफ़िया में वह भी मुनाकिस हो जाते हैं जिस वक़्त उन चेहरों पर नज़र पड़ती है जो ऐसे अश्ख़ास के होते हैं नीज़ यह मानी भी हो सकते हैं कि नज़र कदमों पर इस लिए चाहिए ताकि हसीन और खूबसूरत चेहरों पर न पड़े क्यों कि अक्सर ऐसे चेहरे देखने से दिल उन की तरफ़ रागब हो जाता है और यह रगबत वसूल अली अल्लाह से रोकती है।

ज़ाहिरी व लुगवी मफ़हूम से हट कर यह भी हो सकता है कि यह कलिमा इलो हिम्मत से किनाया हो क्यों कि आली हिम्मत सालिक हक़ के सिवा किसी को नहीं देखता है, तवाज़ा से भी किनाया हो सकता है जो लोग मुतवाफ़ईन और मुतकब्रियन के अहवाल व औज़ा से वाकिफ़ हैं वह अच्छी तरह इस को समझ सकते हैं कि मुतवाज़ा उमूमन सुरंगों होता है यह भी हो

सकता है कि इस कलिमा में एक सुन्नत पर तंबीया हो क्यों कि सर्वर कौन व मकां ﷺ चलते वक़्त दायें बाएं जानिब नहीं देखते थे बल्कि कदमों की जानिब देखते थे।

नज़र बुर क़दम के मआनी इमाम रबानी क़ुद्दिस सिर्रहू की जुबानी:

नज़र बुर क़दम का एक मफ़हूम वह है जिसे हम ने बातिनी कहा है जिस का ताल्लुक मुक़ामात सुलूक से है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि सुलूक में नज़र बुर क़दम से मुराद यह है कि नज़र हमेशा उपर रहे और क़दम इस के पीछे आये क्यों कि बुलंद ज़ीनों पर चढ़ते वक़्त पहले नज़र बुलंद ज़ीनों पर पड़ती है फिर क़दम नज़र के मक़ाम तक पहुँचता है फिर नज़र इस से उपर के ज़ीने पर पड़ती है और क़दम नज़र की पैरवी में बुलंदी की तरफ़ चढ़ता है अला हाज़ा उलक़यास।

दोम यह मानी भी हो सकते हैं कि अस्नए सुलूक में नज़र क़दम से उपर यानी आगे जाती है और क़दम पीछे रह जाता है। इस की तफ़सील यह है कि क़दम की इन्तहा सालिक की इस्तिदाद के इंतिहाए मुरातिब तक है बल्कि इस की इन्तहा में इस्तिदाद तक जिस के जीर क़दम वह सालिक है लेकिन पहला क़दम (जो ख़ुद इस्तिदाद सालिक के इंतिहाए मुरातिब तक उठता है) बालासालित और दूसरा क़दम (जो नबी की इंतिहाए इस्तिदाद तक जाता है) इस नबी की पैरवी में और उन दोनों इस्तिदादों के मुरातिब से उपर इस सालिक का क़दम नहीं जा सकता है लेकिन नज़र जा सकती है।

और यह नज़र जब तेजी पैदा कर लेती है तो इस का मनतही इस नबी की नज़र के मुरातिब का मनतही होता है जिस के क़दम पर वह सालिक है क्यों कि कामिल पैरोकारों के लिए इस नबी के तमाम कमालात से हिस्सा है लेकिन मुरातिब इस्तिदाद की निहायत जो सालिक की असालित व तबईत है क़दम और नज़र आपस में मुआफ़िक़त रखते हैं इस के बाद क़दम कोताह हो जाता है और अकेली नज़र ही उपर को चढ़ती जाती है और इस नबी की मुरातिब नज़र

के निहायत तक तरक्की करती है।

इस से यह भी मालूम हो गया कि अंबिया अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात की नज़र भी उन के इक़दाम से उपर सऊद फरमाती है और उन बुजुर्गों के कामिल पैरोकारों को उन की नजरों के मुक़ामात से हिस्सा मिलता है जिस तरह उन के कदमों के मुक़ामात से और ख़ातिम अलांबिया अलैहि व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात के क़दम मुबारक के उपर मक़ाम रवैत है जिस का दूसरों के लिए आख़िरत में वादा जो दूसरों के लिए उधार है और आप के लिए नकद है आप के कामिल पैरोकारों को भी इस मक़ाम से हिस्सा हासिल है।

हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवीरहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं: ज़ाहिरी मफ़हूम बयान करने के बाद फ़रमाते हैं कि में ने अपने वालिद क़ुद्दिस सिर्रहू को फ़रमाते सुना है कि यह मुबतदी की बनिस्बत है वर्ना मनतही पर वाजिब है कि अपने हाल में गौर व फ़िक्र करे कि किस नबी के जीर क़दम है फिर जब अपने पेशवा को पहचान ले तो चाहिए कि इस के हालात व वाक़ियात इस के पेशवा के हालात व वाक़ियात के मुनासिब हूँ।

सुलूक मुजद्दिदी:

मज़हर तजल्लियात रहमानी, महबूब सुबहानी इमाम रबानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी हज़रत शैख़ अहमद फ़ारूक़ी सरहंदी क़ुद्दिस सिर्रहू उलनूरानी को ख़ालिक़ कायनात जल जलाला ने वह आली कमालात और जामा सिफ़ात इंसान बनाया कि औलीए कराम में आप जैसे इंसान बहुत कम पैदा हुए। सरहिंद की सरजमीं को यह फख्र हासिल है कि आप जैसा लाल इस की आगोश में आराम फ़रमा है। आप के आने से शरीअत अहमदिया अला साहबहा अस्सलात वा लस्सलाम को एक नयी ताजगी और जान मिली। निस्बत नक़्शबंदिया अपने बाम उरूज पर पहुँच गई। आप के ख़ालिक़ विमहब ने आप को एक निराला तरीका जदीदा अता फ़रमाया जिस पर चल कर लाखों नहीं करोड़ों राह ख़ुदा

के मुसाफिर मंज़िल मकसूद पर पहुँचे और मतलूब हक़ीक़ी की दौलत विसाल से मालाल हुए और क़ुर्ब व मंजिलत की उन हदों में दाखिल हो गए जहां तजल्ली ज़ात बे परोह सिफ़ात उन का दाइमी नसीब बिन गई। रब अकबर उन की कब्र को रहमतों का गुलशन बनाए जिन्हों ने हम को ऐसा तरीका अता फ़रमाया जो सब से असहल तर सब से क़रीब तर औरकम मेहनत में सब से मुफीद तर है।

ख़साइस तरीका अहमदिया:

जानना चाहिए कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ज़ात अक़्दस से जो ख़साइस नक़्शबंदी सिलसिले में शामिल हुए और जिन की वजह से वह एक मुस्तक़िल तरीका मुजद्दिदय हो गया उन का खुलासा दर्ज जेल सुतूर में मुलाहिजा फरमाएं जिन की तफ़सील आइंदा सफ़हात में ह्दय नाज़रीन होगी। तरीका मुजद्दिदय के ख़साइस बहुत हैं जिन में बाज़ यह हैं:

पहली ख़ुसूसीयत:

मुजद्दिदी तरीक़ की एक ख़ुसूसीयत यह है कि आप के नज़दीक इंसान दस लताइफ़ से मुरक्कब है उन में पांच आलम अम्र से और पांच आलम ख़ल्क़ से ताल्लुक रखते हैं और पांच यह हैं; क़ल्ब, रूह, सर, ख़फ़ी, अख़फ़ा, और दोम यह हैं; लतीफ़ा आब, खाक, हुआ, नार यानी अनासिर अर्बा और नफ़्स नातिक़ा उन अजज़ा के अलावा जो क़ुवा और ज्वारह हैं वह उन्ही की तरफ़ राजा हैं। यह अजज़ा मज़कूरा एक दूसरे के मुख़ालिफ़ हैं अनासिर अर्बा का बाहम मुख़ालिफ़ होना ज़ाहिर है इसी तरह आलम अम्र और ख़ल्क़ के माबैन तज़ाद भी रोशन है नीज़ आलम अम्र के लताइफ़ पुंज गाना भी बाहम जुदा जुदा ख़ुसुसीआत और कमालात रखते हैं। इसी तरह नफ़्स नातिक़ा ख़ुद अपनी ख़ाहिशात का तालिब है वह किसी के सामने सर नहीं झुकाता है।

खुलासा यह कि आप के नज़दीक उन लताइफ़ में से हर एक को बदन के एक मख़सूस उज़ू से ताल्लुक व इर्तिबात है और हर एक में एक हरकत है नब्ज की मानन्द

इस हरकत की हिफाज़त आप के नज़दीक बड़ी अहम चीज़ है। इसी तरह उन लताइफ़ के अनिवार व असरात भी जुदा जुदा हैं। मुतक़द्दिमीन मशाइख़ नक़्शबंदिया क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसराहम के नज़दीक हुज़ूर हक़ के ग़लबा व इस्तेला का नाम लताइफ़ है, उन बुजुर्गों के नज़दीक अगर हुज़ूर हक़ हुज़ूर ख़ल्क़ के बराबर है तो यह ज़िक्र क़ल्ब है और अगर हुज़ूर हक़ ग़ालिब है तो ज़िक्र रूह है और अगर हुज़ूर हक़ हुज़ूर ख़ल्क़ की ग़ीबत के साथ है तो ज़िक्र सर और अगर हुज़ूर हक़ ख़ुद सालिक और हुज़ूर ख़ल्क़ की ग़ीबत के साथ है तो ज़िक्र ख़फ़ी।

दायरा इमकान:

मालूम होना चाहिए कि हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू ने तीन विलायात व तीन कमालात व हक़ायक़ वगैरह करार दिए हैं उन के अलावा की तरफ़ भी इशारा फ़रमाया है हर एक के जुदा जुदा हालात व कैफियात और उलूम व मआरिफ़ हैं अल्लाह तआला के कौल रफ़ी उलदर्जात और हदीस मुबारक लायज़ाल अलाबद यतक़र्र्ब इलिया अलख में उन्ही की तरफ़ इशारा है। यह मुरातिब क़ुर्ब अगरचे बे चवन व बे चुगवन हैं मगर हज़रत मुजद्दिद रज़ि अल्लाह तआला अन्हु ने उन को दायरा से ताबीर किया है क्यों कि साहिब कश्फ़ सालिक को यह मुरातिब आलम मिसाल में दायरों की शक्ल में नज़र आते हैं चनां चह तमाम आलम नज़र कशफ़ी में बसूरत दायरा नज़र आता है और अर्श मजीद इस दायरा का क़तर दिखाई देता है।

ख़ुदाए तआला की तमाम कायनात को आलम कबीर या दायरा इमकान कहते हैं चों कि दायरा बे जिहत होता है सालिक को बंज़र कशफ़ी यह आलम दायरा ही की शक्ल में मक्षुफ़ होता है। इस दायरा के हर दो हिस्से में निचले हिस्से को नसफ़ साफिल और उपरी को नसफ़ आली कहते हैं जो चीज़ उन दोनों हिस्सों की तन्सीफ़ करती है वह दर असल अर्श है अर्श से ले कर मुंतहाए फर्श तक यानी नसफ़ साफिल को आलम ख़ल्क़ और अर्श के उपर वाले नसफ़ को आलम अम्र कहते हैं अर्श ख़ुद भी आलम ख़ल्क़ में दाखिल है।

अर्श के उपर आलम अम्र के लताइफ़ के उसूल मौजूद हैं मज़कूरा बाला तरतीब के माफ़िक़ आलम अम्र का आगाज़ लतीफ़ा क़ल्ब की असल से होता है अर्श और असल लतीफ़ा क़ल्ब के माबैन जो जगह है वह बर्ज़ख़ कहलाती है ख़याल रहे कि अजसाम और अश्ख़ास सब की जाए करार आलम ख़ल्क़ है अर्श कुर्सी, लौह व कलम, जन्नत व दोज़ख, आसमान व जमीन वगैरह सब इसी में दाखिल हैं। इसी तरह अनासिर अर्बा वगैरह का ताल्लुक इसी से है। इस आलम के भी दो हिस्से हैं एक नीचे से शुरू हो कर आसमान दुनिया तक जाता है। इस हिस्सा का नाम आलम मुल्क है और दूसरा हिस्सा इस आसमान से शुरू होता और अर्श पर ख़त्म होता है इस का आलम मलकूत है।

दायरा इमकान का नसफ़ आली जो असल लतीफ़ा क़ल्ब से शुरू हो कर लतीफ़ा अख़फ़ा की असल तक पहुँच कर ख़त्म होता है और जिस को आलम अम्र कहते हैं तमाम मख़लूकात के उसूल, जमी मुम्किनात के हक़ायक़ और सारे जानदारों की रूहों का मावा व मस्किन यही आलम है, आलिम अर्वाह और आलम मिसाल का ताल्लुक इसी से है। यह पूरा आलम अल्लाह तआला की सिफ़ात और असमा की तजल्लियात का मज़हर है जो भी चीज़ ज़ाहिर हुई या होगी ख़ुदावंद क़ुद्दूस की बे इन्तहा तजल्लियात सिफ़ात में से किसी तजल्ली से वाबस्ता है फिर उन तजल्लियात से वाबस्तगी बाज़ बुजुर्गों की बुलाबास्ता यानी असालतन है जैसे अनबीए कराम और फरिश्ते , यह बुजुर्ग अपनी सफ़ाई तबा और बुलंदी इस्तिदाद की वजह से ज़लाल के वास्तों के मुहताज नहीं बल्कि तजल्लियात से ताल्लुक असालतन होता है फिर यहाँ भी दो सूरतों हैं तजल्लियात सिफ़ात से बुला वास्ता ताल्लुक अगर तजल्ली ज़ाती के साथ इमतिज़ाज के बग़ैर होगा जैसे अनबीए कराम का या इमतिज़ाज के साथ जैसे मलाइका अजाम का।

और बाज़ अपनी कम ज़र्फ़ी और कसूर हिम्मत की वजह से बुला वास्ता तजल्लियात से वाबस्तगी की काबिलियत नहीं रखते हैं । लिहाज़ा उन का ताल्लुक पहले तजल्लियात सिफ़ात के ज़लाल से होता

है और ज़लाल के अनिवार से पर नूर होने के बाद जब तजल्लियात सिफ़ात से कुछ मुनासबत पैदा कर लेते हैं और कुव्वत परवाज़ हासिल हो जाती है इस वक़्त तजल्लियात सिफ़ात के पर्दों तक पहुँच जाते हैं।

आलम अम्र व ख़ल्क़ की वजह तसमीया:

आलम ख़ल्क़ दर असल इस को कहते हैं जिस की तख़लीक़ और पैदाइश का ताल्लुक इलतों और असबाब से और मुद्दत व जमाने से हो और निशा व नुमा एक कानून के तहत ज़ाहिर हो और इस दायरा का नसफ़ साफिल ऐसा ही है इस लिए उसे आलम ख़ल्क़ कहते हैं इस के बरख़िलाफ़ जो आलम अम्र है इस के ज़ुहूर और तख़लीक़ में माद्दा व असबाब वगैरह को दखल नहीं होता है बल्कि महज़ अल्लाह तआला के अम्र यानी हुक्म से मौजूद हो जाता है इस के ज़ुहूर के लिए कोई मुद्दत भी नहीं होती है बल्कि जों ही अम्र हुआ फ़ौरन वह क्षे ज़ाहिर हो गई दायरा के नसफ़ आली की यही कैफियत है इसी लिए आलम अम्र कहते हैं, यह दोनों लफ़्ज़ सूफ़िया कराम ने हक़ सुब्हानहू के कौल उला ला अलामर वालख़लक से लिए हैं दायरा इमकान की शक्ल यह है।

अम्र व ख़ल्क़ के कमालात:

आलम अम्र व ख़ल्क़ के अजज़ा के जुदा जुदा कमालात व औसाफ़ हैं कमालात के तईन में किसी की नज़र कहीं तक पहुँची किसी की कहीं तक यही वजह है कि सूफ़िया कराम में इस सिलसिले में इख़तिलाफ़ हो गया कि आया आलम अम्र के अजज़ा अफ़ज़ल हैं या आलम ख़ल्क़ के । आम तौर पर सूफ़िया कराम अव्वल की अफ़ज़लीयत के कायल हैं मेरी नज़र में इस इख़तिलाफ़ का ख़ास सबब यह है कि अजज़ाए आलम ख़ल्क़ के कमालात दर असल इस वक़्त नज़र आते हैं जब सालिक विलायत के तंग कोचों से निकल कर कमालात नुबुव्वत की शाहराह पर गामज़न होता है या विलायत के नुकता उरूज पर पहुँच जाता है अक्सर बुजुर्गों की रसाई विलायात के

हदूद में रही है बाहर क़दम नहीं निकाला इस लिए उन की नज़र में आलम अम्र की नूरानियत वगैरह रही और अजज़ाए आलम ख़ल्क़ के कमालात नजरों से बिलकुल ओझल रहे इस लिए आलम अम्र को अफ़ज़ल करार दिया।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जैसे बुलंद नज़र अज़ीम कुव्वत परवाज़ रखने वाले बुजुर्गों ने ख़ल्क़ व अम्र दोनों के कमालात को तफ़सील से देखा तो कमालात आलम ख़ल्क़ की बरतरी उन की नज़र में कई वजूह से साबित होगई।

अफ़ज़लीयत के चार वजूह:

अजज़ाए आलम ख़ल्क़ अजज़ाए आलम अम्र से अफ़ज़ल हैं इस की चार वजूह हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तोबात से नकल करता हूँ; एक वजह यह कि आलम के पुंज गाना लताइफ़ व मुरातिब का उरूज दायरा असमा व शिवनात तक है इस के बाद मुतअद्दिद दायरे रह जाते हैं जिन की सैर करने के बाद असम अलजाहिर की सैर मुकम्मल होती है फिर असम अलबातिन की सैर पेश आती है इस के जो तरक़्क़ीयात व उरूज वाक़्य होता है वह तरक़्क़ीयात असालित के तौर पर अंसर नारी, हवाई, आबी की नसीब हैं फिर बहुत आगे जा कर जब वह कमालात हासिल होते हैं जो मक़ाम नुबुव्वत से नाशी होते हैं और अनबीए कराम के कामिल ताबेदारों को उन कमालात से हिस्सा मिलता है इस मक़ाम में बालासालित यह कमालात अंसर खाकी को अता होते हैं बाक़ी तमाम अजज़ाए इंसानी ख़्वाह वह आलम अम्र से हूँ या ख़ल्क़ से इस मक़ाम में इस अंसर पाक के ताबे हैं और इस के तुफ़ैल इस दौलत से मुशर्रफ़ होते हैं और यह अंसर चों कि बशर के साथ मख़सूस है इस लिए ख़वास बशर ख़वास मुल्क से अफ़ज़ल होगए। इस बयान से दो बातें साबित हुईं; एक तो यह कि अजज़ाए ख़ल्क़ अफ़ज़ल हैं अजज़ाए अम्र से, दोम ख़ुद अजज़ाए ख़ल्क़ में सब पर अंसर खाक को बरतरी हासिल है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू एक मक़ाम पर फ़रमाते हैं: वह कमालात जो आलम अम्र से ताल्लुक रखते हैं उन कमालात के लिए जो आलम ख़ल्क़ से मुताल्लिक़ हैं मुक़द्दमात और ज़ीनों की तरह हैं आलम अम्र के कमालात ज़लीयत से खाली नहीं हैं और मुक़ामात विलायत से मख़सूस हैं और आलम ख़ल्क़ के कमालात ज़लीयत की आमेज़िश से खाली हो कर मुक़ामात नुबुव्वत से कामिल हिस्सा पाया है इस निशा दुन्यवीय के ज़हूरात के मुनासिब यही है

विसरी वजह यह कि अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात ने दावत हक़ को आलम ख़ल्क़ पर मुनहसिर रखा है और चों कि क़ल्ब को आलम ख़ल्क़ से ज़्यादा मुनासबत थी इस लिए इस की तस्दीक की भी दावत फ़रमाई और क़ल्ब के वक़्त मासवा की निस्बत कुछ न फ़रमाया बल्कि इस को मत्रूह फ़ी अलतरीक़ की तरह समझा, हां बहिश्त की नेअमतें और दोज़ख के रंज व अलम और दीदार की दौलत और हिरमान की बदबख़ती सब आलम ख़ल्क़ से वाबस्ता है आलम अम्र के साथ उन को कुछ ताल्लुक नहीं लिहाज़ा उन्हें तफ़सील से बयान फ़रमाया।

तीसरी वजह यह कि जो अमल फर्ज़ व वाजिब व सुन्नत हैं उन का बजालाना क़ालिब से ताल्लुक रखता है जो कि आलम ख़ल्क़ से है और नवाफ़िल आलम अम्र का नसीब हैं पस वह क़ुर्ब जो उन आमाल को अदा करने का समरा और नतीजा से आमाल का अंदाजा के माफ़िक़ होगा चों कि पस नाचार वह क़ुर्ब जो फ़राइज़ अदा करने का समरा है आलम ख़ल्क़ का नसीब होगा और जो उदाए नवाफ़िल का समरा है वह आलम अम्र का नसीब और शक नहीं कि नफ़ल फर्ज़ के मुकाबले कुछ भी काबिल शुमार नहीं ग़रज़कि नवाफ़िल व फ़राइज़ के क़ुर्ब में इतना फ़र्क़ है तो यह जिस के नसीब हैं उन में भी बहुत फ़र्क़ होगा।

चौथी वजह यह है कि आलम अम्र ने आज इस दुनिया में अपना पूरा हिस्सा ले लिया है और मुशाहिदा व मुआइना हासिल किया है कल बहिश्त में मामला आलम ख़ल्क़ से मुताल्लिक़ होगा और बुला कैफ़ दीदार इसी को मयस्सर होगा नीज़ मुशाहिदा का जिस से ताल्लुक होता है वह ज़लाल वजूब में

से एक ज़ुल है और आख़िरत में ख़ुद वाजिब उलवजूद का दीदार होगा ज़ुल का नहीं। पस जिस क़द्र रवैत और मुशाहिदा के माबैन और असलियत व ज़लीयत के दरमियान फ़र्क़ है इसी क़द्र फ़र्क़ आलम ख़ल्क़ व अम्र के दरमियान है। ख़याल रहे मुशाहिदा विलायत का और रवैत नुबुव्वत का समरा है।