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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiकमालात नमाज़नमाज़ और दीगर वज़ाइफ़ के तरीके

अध्याय 3 में से 3पृष्ठ 30–40

नमाज़ और दीगर वज़ाइफ़ के तरीके

अज़।सय्यद नूर आलम मिस्बाही

नोट: हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान दाम ज़ला का हुक्म हुआ कि किताब के अख़ीर में नमाज़ का तरीका और अज़कार व वज़ाइफ़ भी डाल दिए जाएँ ताकि किताब और मुफीद हो जाए। लिहाज़ा तामील हुक्म में मुंदरजा चीजों का इजाफा किया जा रहा है:

शराइत नमाज़:

नमाज़ की छ शर्तें हैं जिन्हें अल्लाह अकबर कहने तक पूरा कर लेना ज़रूरी है तभी नमाज़ होगी वर्ना नहीं।

पहली शर्त तहारत है यानी नमाजी के बदन, कपड़े और नमाज़ की जगह का पाक होना।

दूसरी शर्त सत्र अव्रत यानी मर्द का नाफ़ से ले कर घटने तक और अव्रत के पूरे बदन का ढका होना ज़रूरी है। अगर कपड़ा इतना बारीक हो कि जिस से बदन झलके तो नमाज़ नहीं होगी। आज कल के नौजवान ऐसी जींस पहनते हैं जो जगह जगह से फटी होती है, अगर घटने से उपर फटी है और चौथाई हिस्सा तीन मर्तबा सुबहान अल्लाह कहने की मिक़दार तक खुला रहा नमाज़ नहीं होगी। ऐसे ही इस जमाने में अव्रतें दो पट्टा बहुत बारीक ओढ़ती हैं अगर दुपट्टे के उपर से बालों की स्याही नज़र आयेगी तो नमाज़ नहीं होगी।

तीसरी शर्त क़िबला की तरफ़ मुँह करना है।

मसला: अगर कोई शख्स ऐसी जगह है जहां उसे यह नहीं मालूम कि क़िबला किधर है न ही कोई मुसलमान है जो बता दे और न ही सूरज चांद और सितारे वगैरह हैं कि पता लगाये, ऐसा शख्स तहर्री करे यानी जिधर दिल जमे उधर मुँह करके नमाज़ पढ़ ले।

अगर बाद में मालूम हुआ कि क़िबला की तरफ़ मुँह नहीं था तो नमाज़ दुबारा नहीं पढ़ना है बल्कि नमाज़ हो गई।

चौथी शर्त वक़्त है यानी ज़ुहर की नमाज़ पढ़ना हो तो ज़ुहर के वक़्त में ही होगी।

पाँचवीं शर्त नियत है। नियत दिल के पके इरादे का नाम है, हां मगर ज़बान से कह लेना मुस्तहब है।

छुट्टी शर्त तकबीर तहरीमा यानी अल्लाह तआला के नाम से नमाज़ शुरू करना। तकबीर तहरीमा के लिए अल्लाह अकबर कहना बेहतर है।

नमाजपढ़ने का तरीका:

नमाज़ पढ़ने का तरीका यह है कि बावुज़ू क़िबला रो दोनों पाऊं के पंजों में चार अंगुल का फासला कर के खड़ा हो और दोनों हाथ कान तक ले जाए कि अंगूठे कान की लो से चहु जाएँ और इंगुलियाँ न मिली हुई रखे न खूब खोले हुए बल्कि अपनी हालत पर हूँ और हथेलियों क़िबला को हूँ, नियत कर के अﷲ अकबर कहता हुआ हाथ नीचे लाये और नाफ़ के नीचे बांध ले, यों कि दहनी हथेली की गद्दी बाएं कलाई के सरे पर हो और बेच की तीन इंगुलियाँ बाएं कलाई की पुश्त पर और अंगूठा और छिंगलिया कलाई के अग़ल बगल और सना पढ़े।

سُبْحَانَكَ اللّٰھُمَّ وَ بِحَمْدِكَ وَ تَبَارَكَ اسْمُكَ وَتَعَالٰی جَدُّكَ وَلَا اِلٰـہَ غَیْرُكَ

फिर ताल्लुज़ यानी आऔज़ बिल्लाह मन अलशईतान अलर्वेजियम

पढ़े, फिर तसमीया यानी बिस्म अल्ला अलर्रहमान अलर्रहीम कहे फिर अलहम्द पढ़े और ख़त्म पर आमीन आहिस्ता कहे, इस के बाद कोई सूरत या तीन आयतें पढ़े या एक आयत कि तीन के बराबर हो, अब अﷲ अकबर कहता हुआ रुकवा में जाए और घुटनों को हाथ से

पकड़े, इस तरह कि हथेलियों घटने पर हूँ और इंगुलियाँ खूब फैली हूँ, न यों कि सब इंगुलियाँ एक तरफ़ हूँ और न यों कि चार इंगुलियाँ एक तरफ़ और एक तरफ़ फ़क़त अंगूठा और पीठ बिछी हो और सर पीठ के बराबर हो ऊँचा नीचा न हो और कम से कम तीन बार

سُبْحَانَ رَبِّیَ الْعَظِیْمِ

कहे फिर

سَمِعَ اللہُ لِمَنْ حَمِدَہ

कहता हुआ सीधा खड़ा हो जाए और मुनफ़रद (अकेला) हो तो इस के बाद

اَللَّھُمَّ رَبَّنَا وَلَکَ الْحَمْدُ

कहे, फिर अﷲ अकबर कहता हुआ सजदा में जाए, यों कि पहले घटने जमीन पर रखे फिर हाथ फिर दोनों हाथों के बेच में सर रखे, न यों कि सिर्फ़ पेशानी चहु जाए और नाक की नोक लग जाए, बल्कि पेशानी और नाक की हड्डी जमाए और बाजुओं को करवटों और पेट को राणों और राणों को पिंडलियों से जुदा रखे और दोनों पाऊं की सब उँगुलियों के पेट क़िबला रो जमे हूँ और हथेलियों बिछी हूँ और इंगुलियाँ क़िबला को हूँ और कम अज़ कम तीन बार

سُبْحَانَ رَبِّیَ الْاَعْلٰی

कहे, फिर सर उठाये, फिर हाथ और दाहिना क़दम खड़ा कर के इस की इंगुलियाँ क़िबला रुख करे और बायां क़दम बिछा कर इस पर खूब सीधा बैठ जाए और हथेलियों बिछा कर राणों पर घुटनों के पास रखे कि दोनों हाथ की इंगुलियाँ क़िबला को हूँ, फिर अﷲ अकबर कहता हुआ सजदे को जाए और इसी तरह सजदा करे, फिर सर उठाये, फिर हाथ को घटने पर रख कर पंजों के बल खड़ा हो जाए, अब सिर्फ़ बिस्म अल्ला अलर्रहमान अलर्रहीम पढ़ कर क़रा त शुरू कर दे, फिर इसी तरह रुकवा और सजदे कर के दाहिना क़दम खड़ा कर के बायां क़दम बिछा कर बैठ जाए और

اَلتَّحِیَّاتُ لِلّٰہِ وَالصَّلَوٰتُ وَالطَّیِّبَاتُ اَلسَّلَامُ عَلَیْکَ اَیُّھَا النَّبِیُّ وَرَحْمَۃُ اللہِ وَ بَرَکَاتُہٗ اَلسَّلَامُ عَلَیْنَا وَعَلٰی عِبَادِ اللہِ الصَّالِحِیْنَ اَشْھَدُ اَنْ لَّا اِلٰہَ اِلَّا اللہُ وَاَشْھَدُ اَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُہٗ وَرُسُوْلُہٗ ۔

पढ़े और इस में कोई हर्फ़ कम व बेश न करे और इस को तशहद कहते हैं और जब

कलिमा ला के क़रीब पहुँचे, दाहिने हाथ की बेच की इंगुली और अंगूठे का हलक़ा बनाए और छिंगलिया और इस के पास वाली को हथेली से मिला दे और लफ़्ज़ ला पर कलिमा की इंगुली उठाये मगर इस को जुंबिश न दे और कलिमा उल्ला पर ग्रा दे और सब इंगुलियाँ फ़ौरन सीधी कर ले, अगर दो से ज़्यादा रकातें पढ़नी हैं तो उठ खड़ा हो और इसी तरह पढ़े मगर फर्ज़ों की उन रकातों में अलहम्द के साथ सूरत मिलाना जरूर नहीं, अब पिछला कादा जिस के बाद नमाज़ ख़त्म करेगा, इस में तशहद के बाद दुरूद शरीफ़

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلٰی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَّعَلٰی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ کَمَا صَلَّیْتَ عَلٰی سَیِّدِنَا اِبْرَاھِیْمَ وَعَلٰی اٰلِ سَیِّدِنَا اِبْرَاھِیْمَ اِنَّکَ حَمِیْدٌ مَّجِیْدٌ اَللّٰھُمَّ بَارِکْ عَلٰی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَّعَلٰی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ کَمَا بَارَکْتَ عَلٰی سَیِّدِنَا اِبْرَاھِیْمَ وَعَلٰی اٰلِ سَیِّدِنَا اِبْرَاھِیْمَ اِنَّکَ حَمِیْدٌ مَّجِیْدٌ.

पढ़े फिर

اَللّٰھُمَّ اغْفِرْلِیْ وَلِوَالِدَیَّ وَلِمَنْ تَوَالَدَ وَلِجَمِیْعِ الْمُؤْمِنِیْنَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَالْمُسْلِمِیْنَ وَالْمُسْلِمَاتِ الْاَحْیَاءِ مِنْھُمْ وَالْاَمْوَاتِ اِنَّکَ مُجِیْبُ الدَّعْوَاتِ بِرَحْمَتِکَ یَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِیْنَ ۔

या और कोई दुआए मासूरा पढ़े। मसलन

اَللّٰھُمَّ اِنِّیْ ظَلَمْتُ نَفْسِیْ ظُلْمًا کَثِیرًا وَّ اِنَّہٗ لَا یَغْفِرُ الذُّنُوْبَ اِلَّا اَنْتَ فَاغْفِرْلِی مَغْفِرَۃً مِّنْ عِنْدِکَ وَارْحَمْنِیْ اِنَّکَ اَنْتَ الْغَفُوْرُ الرَّحِیْمُ

या यह पढ़े।

اَللّٰھُمَّ رَبَّنَا اٰتِنَا فِی الدُّنْیَا حَسَنَۃً وَّفِی الْاٰخِرَۃِ حَسَنَۃً وَّقِنَا عَذَابَ النَّارِ

(बिहार शरीअत)

फ़राइज़ नमाज़:

नमाज़ में सात चीजें फर्ज़ हैं:

1।तकबीर तहरीमा: (यह दर असल शर्त है मगर उलमा ने उसे फर्ज़ में भी शुमार किया है)

मसला: इमाम को रुकवा में पाया और तकबीर तहरीमा कहता हुआ रुकवा में गया और घटने तक हाथ पहुँचने से पहले तकबीर ख़त्म नहीं हुई तो नमाज़ नहीं होगी।

2।क़याम: यानी सीधा खड़ा होना, इस की कम से कम हद यह है कि हाथ फैलाये तो घुटनों तक न पहुँचे।

मसला: फर्ज़, वित्तर, फ़ज्र की सुन्नत और ईद बक्र ईद की नमाज़ में क़याम फर्ज़ है अगर बुला उज़्र कोई बैठ कर नमाज़ पढ़े तो नमाज़ नहीं होगी।

3।करायत: यानी फर्ज़ की दोनों रकातों और वित्तर व नफ़ल की हर रकात में कम से कम एक आयत का पढ़ना इमाम और मुनफ़रद (अकेले नमाज़ पढ़ने वाला) पर फर्ज़ है।

मसला: मुक़तदी को इमाम के पीछे न अलहम्द पढ़ना है और न ही कोई सूरत मिलाना है, इमाम चाहे बुलंद आवाज़ से करायत करे (जैसे मग़रिब, इशा और फ़ज्र में) या धीरे जैसे ज़ुहर और अस्र में।

मसला: आहिस्ता करायत में कम से कम इतनी आवाज़ से पढ़ना फर्ज़ है कि अगर शिवर शराबा न हो तो ख़ुद सन सके कि किया पढ़ रहा है अगर कोई इतना धीरे पढ़े और ख़ुद सन न सके तो नमाज़ नहीं होगी इस लिए कि फर्ज़ अदा न हुआ।

4।रुकवा: यानी कम अज़ कम इतना झुकना फर्ज़ है कि हाथ बढ़ाए तो घुटनों तक पहुँच जाए।

5।सजदा: हर रकात में दो सजदे फर्ज़ हैं।

(हमारे बहुत से भूले भाले भाई सजदे में बड़ी गलतियां करते हैं ख़ास कर सर और पीर टेकने में। सजदे का सही तरीका यह है कि नाक ओरपेशानी दोनों जमीन पर लगे ऐसे ही दोनों पैरों की कम अज़ कम तीन उँगुलियों के पेट का जमीन पर लगा होना वाजिब है, अगर अंगूठा भी नहीं लगा तो सजदा ही नहीं हुआ और अगर तीन उँगुलियों से कम लगाया तो नमाज़ लौटानी पड़ेगी)

6।कादा अख़ीरा: यानी नमाज़ की रकातें पूरी कर लेने के बाद इतनी देर तक बैठना कि जिस में पूरी इलतहयात पढ़ सके।

7।ख़ुरूज बसनआ: यानी कादा अख़ीरा के बाद सलाम व कलाम करे जो कि नमाज़ को ख़त्म करने वाला हो। (इस के लिए अस्सलाम अलैकुम व रहमत अल्लाह कहते हैं)

वाजिबात नमाज़:

नमाज़ में यह चीजें वाजिब हैं: तकबीर तहरीमा में लफ़्ज़ अल्लाह अकबर कहना, अलहम्द पढ़ना, फर्ज़ की दो पहली रकातों में और सुन्नत, नफ़ल और वित्तर की हर रकात में अलहम्द के साथ सूरत या छोटी तीन आयात मिलाना, फर्ज़ नमाज़ में पहली दो रकातों में करायत के बाद मुत्तसिलन रुकवा करना, सजदा में दोनों पाऊं की तीन तीन उँगुलियों का पेट जमीन से लगना , दोनों सजदों के दरमियान कोई रुकन फ़ासल न होना, तादील अरकान (यानी हर रुकन ठीक ठीक कामिल तौर पर अदा करना), कौमा यानी रुकवा से सीधा खड़ा होना, जलसा यानी दोनों सजदों के दरमियान सीधा बैठना, कादा औला में तशहद के दौरान कुछ न पढ़ना (यानी सिर्फ़ इलतहयात ही पढ़ें), हर कादा में पूरा तशहद पढ़ना, लफ़्ज़ सलाम दो बार कहना,, वित्तर में दुआए कनौत पढ़ना, तकबीर कनौत, ईदेन की छ तकबीरें, ईदेन की दूसरी रकात की तकबीर व रुकवा और इस तकबीर के लिए लफ़्ज़ अल्लाह अकबर कहना, हर जहरी नमाज़ (मग़रिब, इशा, फ़ज्र) में इमाम को जहर से तिलावत करना और गैर जहरी में आहिस्ता, हर

वाजिब और फर्ज़ का इस की जगह पर होना, रुकवा का हर रकात में एक ही बार होना, और सुजूद का दो ही बार होना, दूसरी से पहले कादा न करना, और चार रकात वाली नमाज़ में तीसरी पर कादा न होना, आयत सजदा पढ़ी तो सजदा तिलावत करना और सहू हो तो सजदा सहू करना, दो फर्ज़ या दो वाजिब या वाजिब फर्ज़ के दरमियान तीन तस्बीह की मिक़दार वक़फ़ा न होना, इमाम जब करायत करे मुक़तदी का खामोश रहना और सिवा करायत तमाम वाजिबात में इमाम की मुताबेत करना। (अनिवार शरीअत)

नमाज़ की सुनतीं:

नमाज़ की सुनतीं यह हैं: तहरीमा के लिए हाथ उठाना और हाथों की इंगुलियाँ अपने हाल पर छोड़ देना, बवक़्त तकबीर सर न झुकाना और हथेलियों और उँगुलियों के पेट का क़िबला रो होना, तकबीर से पहले हाथ उठाना, इसी तरह तकबीरात ईदेन में कानों तक हाथ ले जाने के बाद तकबीर कहना, अव्रत को सिर्फ़ मूंढूं तक हाथ उठाना, इमाम का अलल्लाआ अकबर, समा अलल्लाआ लिमन हमदा और सलाम बुलंद आवाज़ से कहना , बाद तकबीर हाथ लटकाए बग़ैर फ़ौरन बांध लेना, सना, ताल्लुज़, तसमीया पढ़ना और आमीन कहना, और उन सब का आहिस्ता होना, पहले सना पढ़ना फिर ताल्लुज़ फिर तसमीया और हर एक के बाद दूसरे को फ़ौरन पढ़ना, रुकवा में तीन बार तस्बीह सुबहान रब्बी उलअज़ीम कहना और इंगुलियाँ कुशादा रखना, हालत रुकवा में पीठ खूब बिछी रहना, रुकवा से उठने पर हाथ लटका हुआ छोड़ देना, रुकवा से उठने में इमाम को समा अलल्लाआ लिमन हमदा कहना, मुक़तदी को रबना लुक अलहम्द कहना, और मुनफ़रद को दोनों कहना, सजदा केलिये ओर्सजदा से उठने के लिए अल्लाह अकबर कहना, सजदा में कम अज़ कम तीन बार सुबहान रब्बी अलआअल्ला कहना, सजदा करने के लिए पहले घटना फिर हाथ फिर नाक फिर पेशानी जमीन पर रखना, और सजदा से उठने के लिए पहले पेशानी फिर नाक फिर हाथ फिर घटना जमीन से उठाना, सजदा में बाजू करवटों से और पेट राणों से अलग होना, और कुत्ते की तरह

कलाइयां जमीन पर न बिछाना, अव्रत का बाजू करवटों से और पेट राणों से रान पिंडलियों से और पिंडलियाँ जमीन से मिला देना, दोनों सजदों के दरमियान मसल तशहद के बैठना, और हाथों को राणों पर रखना, सजदों में हाथों की उँगुलियों का क़िबला रो होना और मिली हुई होना, और पाऊं की दसों उँगुलियों के पेट जमीन पर लगना, यानी उँगुलियों का क़िबला की तरफ़ मुड़ना, दूसरी रकात के लिए पंजों के बल घुटनों पर हाथ रख कर उठना, कादा में बायां पाऊं बिछा कर दोनों सुरेन इस पर रख कर बैठना, दाहिना क़दम खड़ा रखना, और दाहिने क़दम की इंगुलियाँ क़िबला रुख करना, अव्रत को दोनों पाऊं दाहिनी जानिब निकाल कर बाएं सुरेन पर बैठना, दाहिना हाथ दाहिनी रान पर और बायां हाथ बाएं रान पर रखना और उँगुलियों को अपनी हालत पर छोड़ देना, शहादत पर इशारा करना, कादा अख़ीरा में तशहद के बाद दुरूद शरीफ़ और दुआए मासूरा पढ़ना। (अनिवार शरीअत)

क़ज़ाए उमरी का आसान तरीका:

(क़ज़ाए उमरी अदा करना बहुत ज़रूरी है जब तक फर्ज़ नमाज़ें जिम्मे में बाक़ी रहती हैं नफ़ल नमाज़ें कबूल नहीं होती हैं। हमारे बहुत से भाई नमाज़ आशिवरा और सला इल्तस्बीह वगैरह में तो खूब दिलचस्पी लेते हैं मगर क़ज़ाए उमरी से बिलकुल गाफिल रहते हैं अगर शब् क़द्र और शब् ब्रायत में नफ़ल नमाज़ों की जगह क़ज़ाए उमरी अदा करें तो जिम्मे से बहुत सी नमाज़ें निकल जाएँ)

क़ज़ा नमाज़ें अदा करने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि ज़ुहर ही के वक़्त में अदा करें बल्कि सूरज निकलते वक़्त सूरज डूबते वक़्त और ठीक दोपहर के वक़्त (ज़हूह कुबरा) उन तीनों औकात के अलावा जब भी चाहें किसी भी नमाज़ की क़ज़ा अदा कर सकते हैं।

क़ज़ाए उमरी में सिर्फ़ फर्ज़ और वित्तर की क़ज़ा की जाती है (यानी फ़ज्र2, ज़ुहर4,

अस्र4, मग़रिब 3, इशा4 , और वित्तर की तीन) सुन्नत और नफ़ल की नहीं।

क़ज़ाए उमरी की नियत कैसे करें:

जिस नमाज़ की नियत करनी हो इस में यों कहीं इस नमाज़ की सब से पहली क़ज़ा या आखिर से शुरू करें तो कहीं सब से आखिरी क़ज़ा। ज़बान से भी कहना ज़रूरी नहीं है, बल्कि सिर्फ़ दिल में पक्का इरादा कर लें काफ़ी है।

आसान तरीका:

इस का आसान तरीका यह है कि सना न पढ़ें बल्कि फर्ज़ व वित्तर की पहली दो रकातों में सिर्फ़ अलहम्द शरीफ़ और कोई छोटी सूरत पढ़ें, खाली रकातों में यानी तीसरी और छोथी में अलहम्द न पढ़ कर सिर्फ़ तीन बार सुबहान अल्लाह कह कर रुकवा कर लें। रुकवा और सजदा में सुबहान रब्बी उलअज़ीम और सुबहान रब्बी अलआअल्ला तीन तीन बार के बजाए सिर्फ़ एक बार कहीं। आखिरी रकात में इलतहयात के बाद सिर्फ़ अलल्लाह्म सिल्ल एला मुहम्मद व अआला कह कर सलाम फेर दें। वित्तर में दुआए कनौत की जगह सिर्फ़ रब अग़फ़िरली कहना ही काफ़ी है। (मलख़स अज़ मलफ़ूज़ात आला हज़रत, ज: 1, स: 125)

वज़ाइफ़ बाद नमाज़ पुंज गाना:

کلمہ طیبہ ‘‘لَا اِلٰہَ اِلَّا اللّٰہُ مُحَمَّدٌ رَسُوْلُ اللّٰہِ’’ ۲۱ بار، (۲) ‘‘لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّۃَ اِلَّا بِاللّٰہِ الْعَلِیِّ الْعَظِیْمِ’’ سو بار۔ (۳) ‘‘یَا حَیُّ یَا قَیُّوْمُ لَا اِلٰہَ اِلَّا اَنْتَ اَسْئَلُكَ اَنْ تُنَوِّرَ قَلْبِیْ بِنُوْرِ مَعْرِفَتِكَ یَا اَللّٰہُ’’ ۴۱ بار، (۴) درود شریف سو بار۔

वज़ीफ़ा बाद नमाज़ ज़ुहर: अव्वल व आखिर 11/11 बार दुरूद शरीफ़ दरमियान में ‘‘अलल्लाआ अलस्समद’’ सौ बार।

वज़ीफ़ा बाद नमाज़ अस्र: अव्वल व आखिर 11/11 बार दुरूद शरीफ़ दरमियान में ‘‘याउलल्लाआ’’ सौ बार।

वज़ीफ़ा बाद नमाज़ मग़रिब: अव्वल व आखिर 11/11 बार दुरूद शरीफ़ दरमियान में 41 बार यह दुआ:

اَللّٰھُمَّ طَھِّرْ قَلْبِیْ عَنْ غَیْرِكَ وَ نَوِّرْ قَلْبِیْ بِنُوْرِ مَعْرِفَتِكَ اَبَداً یَا اَللّٰہُ یَا اَللّٰہُ یَا اَللّٰہُ۔

वज़ीफ़ा बाद नमाज़ इशा: (1) दुरूद गोसिया सौ बार, (2) ‘‘या है या कैयूम बरहमतक इस्तिग़ीस’’ सौ बार, (3) कलिमा तैबा सौ बार।

ख़त्म मुजद्दिदय:

इस ख़त्म का पढ़ना हल मुश्किलात व इंजाह मुहमात और हुसूल निस्बत ब हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के लिए इंतिहाई मुजर्रिब है जैसा कि हमारे सिलसिला में आज तक राइज है। हुज़ूर क़ल्ब के साथ वक़्त मुतय्यन कर के एक ही बैठक में पढ़ कर इस का सवाब हज़रत इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू की रूह अक़्दस को नज़र करें, तरीका यह है:

(۱)درود شریف سو بار (۲)لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّۃَ اِلَّا بِاللّٰہِ ۵۰۰ بار (۳)سُبْحَانَ اللّٰہِ وَ الْحَمْدُ لِلّٰہِ سُبْحَانَ اللّٰہِ الْعَظِیْمِ ۳۰۰ بار (۴)یَا حَیُّ یَا قَیُّوْمُ بِرَحْمَتِکَ اَسْتَغِیْثُ ۳۰۰ بار (۵)اَسْتَغْفِرُ اللّٰہَ الْعَظِیْمْ ۳۰۰ بار (۶)یَا ذَالْجَلَالِ وَ الْاِکْرَامِ ۳۰۰ بار (۷) یَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِیْنَ ۳۰۰ بار (۸)لا مَلْجَأَ وَلا مَنْجَا إِلا إِلَيْكَ ۳۰۰ بار (۹) رَبَّنَا ظَلَمْنَاۤ اَنۡفُسَنَا وَ اِنۡ لَّمْ تَغْفِرْلَنَا وَ تَرْحَمْنَا لَنَکُوۡنَنَّ مِنَ الْخٰسِرِیۡنَ ۳۰۰ بار (۱۰) پھر لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّۃَ اِلَّا بِاللّٰہِ ۵۰۰ بار (۱۱)درود شریف۔

ख़त्म ख़्वाजगान:

सूरह फ़ातिहा (अलहम्द शरीफ़) मा बिस्म अलल्लाआ सात बार, सौ बार दुरूद शरीफ़। हमारे मशाइख़ का मामूल यह दुरूद शरीफ़ रहा है:

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلٰی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَّ اٰلِہٖ وَ اَصْحَابِہٖ وَ سَلِّمْ

। सूरह अलम नशरह मा बिस्म अलल्लाआ हर दफ़ा 79 बार, सूरह इख़लास यानी क़ुल हो अलल्लाआ मा बिस्म अलल्लाआ हर दफ़ा हजार बार, सूरह अलहम्द शरीफ़ मा बिस्म अलल्लाआ सात बार, दुरूद शरीफ़ एक सौ बार।

यह हज़रात ख़्वाजगान क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहम का ख़त्म है। अलबत्ता हज़रात मशाइख़ का मामूल रहा है कि वह इस के बाद मुंदरजा जेल कलिमात और भी पढ़ते हैं:

یَا قَاضِیَ الْحَاجَاتِ

एक सौ बार,

یَا کَافِیَ الْمُھِمَّاتِ

एक सौ बार

یَا دَافِعَ الْبَلِیَّاتِ

एक सौ बार

، یَا رَافِعَ الدَّرَجَاتِ

एक सौ बार

یَا شَافِیَ الاَمْرَاضِ

एक सौ बार

، یَا مُجِیْبَ الَّدعْوَاتِ

एक सौ बार

، یَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِیْنَ

एक सौ बार

फिर हाथ उठा कर दुआ मांगे और फ़ातिहा पढ़ कर ख़्वाजगान नक़्शबंदिया की अर्वाह मुक़द्दसा को ईसाल सवाब करे।

नोट: अगर कोई ख़ास ज़रूरत या मुश्किल दरपेश हो तो सौ बार

یَا مُسَبِّبَ الاَسْبَابِ ....اور .....یَا مُحَلِّلَ الْمُشْکِلَاتِ

का इजाफा करे, मगर

شَافِیَ الاَمْرَاضِ

के बाद और आखिर में

یَا مُجِیْبَ الَّدعْوَاتِ ..............اور ..........یَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِیْنَ

। (माख़ूज़ अज़ शिजरा शरीफ़)

नोट: ख़त्म मुजद्दिदय और ख़त्म ख़्वाजगान हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान की मस्जिद में हर दो शंबा को बाद नमाज़जहर किया जाता है।