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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiकमालात नमाज़नमाज़ के फायदे

अध्याय 2 में से 3पृष्ठ 17–29

नमाज़ के फायदे

नमाज़ का पहला फायदा यह है कि इबादात में सब से ज़्यादा जामा और ताआत में सब से ज़्यादा ख़ुदा के क़रीब कर ने वाली चीज़ नमाज़ की अदाएगी है,सरकार अलैहि अस्सलात वस्सलाम ने फ़रमाया:‘‘अस्सलात इमाद उद्दीन फमन इक़ामहा फ़क़द इक़ाम उद्दीन वमन तर्कहा फ़क़द हुदुम उद्दीन’’यानी नमाज़ दीन का स्तवन है जिस ने उसे क़ायम किया इस ने दीन को क़ायम किया और जिस ने उसे छोड़ा इस ने दीन को छोड़ दिया।

नमाज़ का दूसरा फायदा यह है कि जिस शख्स को अदाय नमाज़ की तौफ़ीक़ मिलती है उसे फ़ुहश और बुरे अम्र से बाज़ रखती है,आयत करीमा है:अन् अलस्सलाओत तन्हाई अन अलफ़्हशा वाल्मनۡकर बेशक नमाज़ बे हयाई और बुरी बात से मना करती है ,इस बात की ताकीद करती है और जो नमाज़ ऐसी नहीं है वह सूरतन नमाज़ है हक़ीक़त नहीं रखती है लेकिन जब तक हक़ीक़त हासिल नहीं होती है सूरत को हाथ से नहीं जाने देना

चाहिए‘‘मालायदरक कल्ला ला यत्रक कल्ला’’यानी जिस का कल पाया नहीं जा सकता तो इस का कल छोड़ा भी नहीं जा ता,अकर्म अलाकरमैन (अल्लाह तआला) अगर सूरत को हक़ीक़त एतबारकरे तो बईद नहीं,पस तुम पर हमेशा जमातों और ख़ुशू वख़ुज़ू के साथ नमाज़ की अदाएगी लाज़िम है क्योंकि वह निजात व फ़लाह का सबब है।

नमाज़ में ख़ुशू फ़लाह का सबब है:

नमाज़ का तीसरा फायदा यह है कि ख़ुशू के साथ नमाज़ अदा करना फ़लाह का सबब है,इरशाद बारी तआला है:

قَدْ اَفْلَحَ الْمُؤْمِنُوۡنَ الَّذِیۡنَ ہُمْ فِیۡ صَلَاتِہِمْ خٰشِعُوۡنَ ( )

बेशक मुराद को पहुँचे ईमान वाले जो अपनी नमाज़ में गिड़गिड़ाते हैं।

दुनियामें नमाज़ का रुतबा:

नमाज़ का यह बड़ा अहम और ख़ास फायदा है कि दुनिया में नमाज़ का वही रुतबा है जो आख़िरत में दीदार इलाही का रुतबा है,दुनिया में निहायत क़ुर्ब, नमाज़ में हासिल होती है और आख़िरत में निहायत क़ुर्ब, दीदार के वक़्त है,यह बात भी जेहन नशीन रहे कि और इबादात नमाज़ के लिए वसाइल हैं जबकि नमाज़ मक़ासिद से है।

नमाज़ में लज़्ज़त हासिल करना:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इबादात में लज़्ज़त हासिल होना और अदा में रंज व मुसीबत का दौर होना हक़ सुब्हानहू की बड़ी नेअमतों से हैखास कर अदाय नमाज़ में कि गैर मनतही को मयस्सर नहीं,ख़ास कर फ़राइज़ की अदा में कि इबतिदा में नफ़ल नमाज़ की अदा में लज़्ज़त हासिल होती है और नहाय अलनहाय में यह निस्बत फ़राइज़ से वाबस्ता होजा ती

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। उलमोमिनोन,आयत:1व2

है,और अदाय नवाफ़िल से ख़ुद को बे कार जानता है इस के नज़दीक फ़क़त फ़राइज़ की अदाएगी बड़ा काम है,यह भी याद रहे कि अदाय नमाज़ के वक़्त जो लज़्ज़त मयस्सर आती है इस में नफ़्स को कोई भी हज़ व लज़्ज़त नहीं,उएन इस लज़्ज़त में वह नाला व फ़ुग़ां में है,सुबहान अल्लाह!किया रुतबा है؏

हनेयतालार्बाब अलनईम नईमहा

क़ुर्ब फर्ज़ और क़ुर्ब नफ़ल:

आलम अम्र पर आलम ख़ल्क़ की बरतरी और फ़ज़ीलत बयान करते हुए फ़रमाते हैं:ए फ़रज़न्द!सुनो!अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात ने दावत को आलम ख़ल्क़ पर मकसूर व महसूर रखा है,‘‘बनी उलइस्लाम अली ख़ुमस’’इस्लाम की बुनियाद पांच चीजों पर है(उन में से पांच चीजों का ख़ास ताल्लुक आलम ख़ल्क़ से है)और चूंकि क़ल्ब आलम ख़ल्क़ से ज़्यादा मुनासबत रखता है,इस लिए इस की तस्दीक की भी दावत फ़रमाई और मावराए क़ल्ब कोई कलाम न फ़रमाया और इस को कालमतिरूह फ़ी अलतरीक़ (यानी बे कार का ख़याल किया) और मक़ासिद से शुमार न फ़रमाया,ऐसा क्यों न हो कि बहिश्त के तनामात और दोज़ख के आलाम और दौलत दीदार और महरूमी की बे दौलती सब आलम ख़ल्क़ से वाबस्ता है,आलम अम्र का इस से कोई ताल्लुक नहीं है।

दूसरी वजह फ़ज़ीलत यह है कि जो अमल फर्ज़,वाजिब और सुन्नत है इस की बजाआवरी क़ालिब (बदन) से ताल्लुक रखती है जबकि आलम अम्र का नसीब आमाल नाफ़िला हैं,पस क़ुर्ब जो उन आमाल की अदाएगी का समरा और दलील हैवो आमाल के अंदाज़ एसे होगा,फिर तो ला मुहाला जो क़ुर्ब कि अदाय फ़राइज़ का नतीजा है आलम ख़ल्क़ का नसीब होगा और जो क़ुर्ब कि अदाय नवाफ़िल का समरा है आलम अम्र का नसीब है और इस में कोई शक नहीं कि फर्ज़ के मुक़ाबिल नफ़ल का कोई शुमार नहीं काश कि इतना भी शुमार होता जो

एक क़तरा बह्र मुहीत(समंदर)से रखता है।

अक्सर मख़लूकात चूंकि इस चीज़ से कुछ हिस्सा नहीं रखती है इस लिए फ़राइज़ को बर्बाद करके नवाफ़िल को रिवाज देने की कोशिश करते हैं,सूफ़िया ख़ाम ज़िक्र व फ़िक्र को सब से बड़ा मक़सद क़रारदे कर फ़राइज़ वसंन को बजा लाने में सस्ती करतेहैं और अर्बईनात,चलूँ और रियाज़ात को इख्तियार करके जुमा विजमाअत को छोड़ ते हैं,उन्हें नहीं मालूम कि एक फर्ज़ को जमात से अदा करना उन के हजारों चलूँ से बेहतर है।

हां!आदाब शरएहि की मुराआत के साथ ज़िक्र वफ़कर निहायत अहम और बेहतर है,उल्मा बे सरअंजाम भी नवाफ़िल की तरवेज में कोशिश करते हैं और फ़राइज़ को बर्बाद और नाक़िस जा नते हैं,मिसाल के तौर पर नमाज़ आशिवरा जो हुज़ूर ﷺ की किसी सही हदीस से साबित नहीं उसे पूरी जमईयत और जमात के साथ पढ़ते हैं,हालाँकि जा नते हैं कि फ़िक़ही रवायात जमात नाफ़िला को मकरूह बताती हैं ।

और(यही लोग)फ़राइज़ की अदाएगी में काहिली विसस्ती से काम लेते हैं,बहुत कम होता है कि फर्ज़ को वक़्त मुस्तहब में अदा करें बल्कि इस वक़्त से तजावुज़ कर जाते हैं,जमात की पाबंदी का कुछ ख़ास ख़याल नहीं करते हैं,एक या दोशख़सों के साथ जमात में क़नाअत कर लेते हैं बल्कि बहुत दफ़ा तो तन्हा ही पढ़ लेते हैं,जब इस्लाम के मुक़तदा विपेशवा हज़रात यह करें गे तो अवाम के बारे में किया कहा जाए,इस अमल की नहूसत की वजह से इस्लाम में ज़ोफ़ और कमज़ोरी पैदा होगई है और इस किरदार की स्याही व ज़ुल्मत से हवाए नफ़्स और बिद्दत ज़ाहिर है।

नवाफ़िल और फ़राइज़ में एक फ़र्क़ यह भी हैकि नवाफ़िल की उदाज़लाल से किसी महल का क़ुर्ब बख्शती है और अदाय फ़राइज़ क़ुर्ब असल का मोरिस है जो कि ज़लीयत का शाइबा

नहीं रखता है,हां!वह नवाफ़िल जो फ़राइज़ की तकमील के वास्ते अदा किए जाएँ वह क़ुर्ब असल के मुमद विमुआवन हैं और फर्ज़ के मुल्हिक़ात से हैं,पस ला मुहाला फ़राइज़ की अदा आलम ख़ल्क़ के मुनासिब है जो कि असल की तरफ़ मुतवज्जा है और अदाय नवाफ़िल आलम अम्र के मुनासिब है जिस का रुख ज़ुल की तरफ़ है, अगरचे सारे ही फ़राइज़ क़ुर्ब असली बख्शते हैं लेकिन उन में सब से अफ़ज़ल व अकमल नमाज़ है।’’

आज के अक्सर उलमा व मशाइख़ का हाल:

फ़क़ीर मुजद्दिदी अफ़ी अन्हु अर्ज़ करता है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपने अहद के इस किस्म के उलमा के जो हालात कलमबंद किए हैं आज इस से कहीं ज़्यादा बुरा हाल है,अब तो अक्सर उलमा सरे से नमाज़ रोज़े के पाबंद हैं ही नहीं,जो हैं भी तो उन की अक्सरीयत जमात ख़ास कर मस्जिद में मुक़तदियों के साथ नमाज़ अदा करने का कोई ख़याल ही नहीं रखते हैं जिस की वजह से अवाम के दलों से ऐसे उलमा की क़द्र वकीमत और अकीदत विमहबत निकल गई।

जवान उलमा की नज़र में तो नमाज़ की कोई हैसियत नहीं रही, अक्सर पीर और पीर ज़ादे और असातिज़ा नमाज़ से कोसों दौर हैं,पेशा वर मुक़र्रों का तो निहायत बुरा हाल है,अक्सर जवान हुफ़्फ़ाज़ वक़रा और उलमा जो मसाजिद के इमाम हैं वह मजबूरी में नमाज़ पढ़ते हैं,इमामत से बुर तरफ़ होते ही नमाज़ की कोई फ़िक्र नहीं।

आज के उलमा व मशाइख़ के इस किरदार से इस्लाम व संयत को जो नुकसान पहुँचा वह हर हस्सास और ज़ी इल्म जानता है,मुख़ालिफ़ फ़िरक़े अवाम को उन का किरदार दिखा दिखा कर वहाबी,देवबंदी वगैरह बना ए जा रहे हैं,नमाज़ के ताल्लुक से इस ला प्रवाही को देख कर आम इंसान नमाज़ की अहमियत व अज़मत को खो बैठा,जब उन उलमा व मशाइख़ का यह हाल है तो उन के मुरीदैन व मुतवस्सिलीन और उन के अहबाब व मुताल्लिक़ीन की ला प्रवाही का आप बखूबी अंदाजा

कर सकते हैं।

नमाज़ छोड़ने से ख़ुद उलमा के नुक़्सानात:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने सच फ़रमाया कि उन के इस अमल से इस्लाम कमजोर हुआ है,ऐसे हज़रात के अमल व किरदार से ख़ुद उन का भी बड़ा नुकसान हुआ एक तो उन कल या बाज़ नमाज़ों का अज़ाब व वबाल उन के सर रहा जो उन्हों ने छोड़ें,दूसरे वह चार उमूर जिन को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुतममात नमाज़ से शुमार किया,इसी तरह ख़ुशू व ख़ुज़ू के तर्क से जो क़ुर्ब ज़ात मयस्सर आता इस से महरूमी हो गई,यह इतना बड़ा ख़सारा है कि जिस का अंदाजा नहीं किया जा सकता है,और इस क़द्र अज़ीम नुकसान है कि जिस की तलाफ़ी नहीं की जा सकती है।

तीसरे फ़राइज़ छोटे तो संन विमुस्तहबात भी गए और नवाफ़िल से भी हाथ धो बैठे,लिहाज़ा जो उन से क़ुर्ब मयस्सर आता वह गया,चहारम नमाज़ एक अमल है जो दीगर बहुत सी भलाइयों को साथ में लगाये रहता है,मसला जो नमाज़ पढ़ता है तो वह बा वुज़ू होता है,खारिज नमाज़ भी बहुत सी तस्बीहात वाज़कार वगैरह का पाबंद रहता है,बराए नमाज़ रात वदन में मसाजिद की तरफ़ चल कर जाता है,मसाजिद में अल्लाह का ज़िक्र करता है ,वाज़ संता और सुनाता है,नीज़ नमाज़ की बरकत से बुरे और फ़ुहश उमूर से तौबा करता है ,नेकियों की तरफ़ सबक़त करता है,यह नमाज़ और दीगर नेकियां उसे दीगर बड़ी नेकियों की तरफ़ ले जा ती हैं,नूर इलाही क़ल्ब व बदन में सरायत करता है,नमाज़ पढ़ने और तिलावत वगैरह की रगबत बढती है।

उन के अलावा वह नुक़्सानात हैं जिन का ताल्लुक ख़ुद ऐसे लोगों से है जो बिलकुल नमाज़ नहीं पढ़ते,या कुछ पढ़ते हैं मगर जिन आदाब के साथ पढ़ना चाहिए नहीं पढ़ते हैं,इस के अलावा इस्लाम व संयत का वह बड़ा नुकसान भी है जो उन के किरदार व अमल को

देख कर हुआ,और लोगों में नमाज़ों की तरफ़ से का हिली व सस्ती पैदा हुई या वह बद अमली का शिकार हो ए,आज हर बा शऊर सन्नी जा नता है कि बाज़ फ़िर्क़ा बा तला ने सिर्फ़ नमाज़ को ज़रिया बना कर इस क़द्र शिवा वामूम पैदा कर लिया है कि उन की तादाद बढती चली जा रही है और हमारी घटती चली जा रही है।

पीरज़ादों के नाम अहम पैग़ाम:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू अपने पीरज़ादों ख़्वाजा मुहम्मद उबीद अल्लाह और ख़्वाजा मुहम्मद अब्द अल्लाह क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारह्मा अलालिया के नाम मक्तूब 266 में नमाज़ के ताल्लुक से एहतिमाम बलेग़ की,चनां चह यों ता केद फ़रमाते हैं:

‘‘नमाज़ जो कि दीन का स्तवन है इस के कुछ फ़ज़ाइल वारकॉन कलम बंद करता हूँ उन्हें सुनें!पहले कामिल वुज़ू ज़रूरी है इस तौर पर कि हर उज़ू को तीन बार कामिल तौर पर धुएँ ताकि सुन्नत के मुताबिक हो,सर के मस्ह में इस्तेआब करें यानी पूरे सर का मस्ह करें और कान विगरदन के मस्ह में एहतियात फ़रमा ईं और पीर की उँगुलियों के दरमियान बाएं हाथ की छिंगली से ख़लाल करें उसे अच्छी तरह ध्यान रखें और मुस्तहब पर अमल थोडा न समझें,मुस्तहब वह है जो अल्लाह तआला को महबूब और पसंद है।

वह एक फेअल जिस के बारे में यह मालूम हो जा ए कि यह हक़ सुब्हानहू व तआला को पसंद व महबूब है और इस पर अमल मयस्सर आजाए तो पूरी दुनिया के बदले वह गनीमत है,यह ऐसा ही है जैसे कोई शख्स ठीकरी के चंद टुकड़ों के इव्ज़ कीमती जो हर ( मोती )खरीद ले और बे फायदा पत्थर के बदले रूह हासिल कर ले।

कामिल तहारत और मुकम्मल वुज़ू के बाद नमाज़ का क़सद करें जो कि मोमिन की मेराज है और एहतिमाम फरमाएं कि नमाज़ फर्ज़ बे जमात अदा न हो बल्कि इमाम के साथ तकबीर अवला भी फ़ौत न हो,नमाज़ वक़्त मुस्तहब में अदा करें,क़िरात में मिक़दार मस्नून का

ख़याल रखें और रुकवा व सुजूद में तमानीयत ज़रूरी है जो कि फर्ज़ और बकौल मुख्तार वाजिब है।

कौमा में(रुकवा से उठने के बाद)सीधे खडे हो जा ईं और इस हद तक कि हडियां अपने अपने महल में लौट आएं और सीधा खड़ा हो जाए,तमानीयत ज़रूरी है जो कि बहसब इख़तिलाफ़ अक़्वाल फर्ज़,वाजिब या सुन्नत है।

इसी तरह जलसा(दोनों सजदों के दरमियान बैठना)में अच्छी तरह बैठने के बाद भी इतमीनान दरकार है जैसा कि कौमा में। रुकवा व सजदा की तस्बीहात कम से कम तीन बार पढ़े और ज़्यादा से ज़्यादा सात या ग्यारह बार मा इख़तिलाफ़ अलअक़वाल,इमाम की तस्बीह मुक़तदियों के हाल के अंदाज़े से है(यानी मुक़तदियों के हाल ज़ोफ़ वक़्व्वत को मलहूज़ रखे)।

श्रम आती है कि कोई शख्स तन्हा नमाज़ पढ़ने की हालत में कुव्वत व इस्तिताअत हो ने के बा वजूद तीन ही बार तस्बीह पर इक़तिसार करे और अगर ज़्यादा न हो सके तो पांच या सात बार कह ले।

सजदा में जाते वक़्त जो जमीन से नज़दीक तर है उसे पहले जमीन पर रखे पस पहले दोनों ज़ानु जमीन पर रखे इस के बाद दोनों हाथ,इस के बाद नाक,इस के बाद पेशानी को,और ज़ानु और हाथ रखते वक़्त आगाज़ दायें से हो और सर उठाते वक़्त जो आसमान से नज़दीक है पहले उठाये,पस उठाने का आगाज़ पेशानी से करे।

क़याम के वक़्त नज़र सजदा की जगह जमाना चाहिए और रुकवा के वक़्त अपने पैरों पर,सजदे में नाक के नथुनों और जुलूस (बैठने)में अपने दोनों हा थों पर या अपने किनार्यानी बगलों को मुलाहिजा करना चाहिए इस से नज़र परागंदगी और इंतिशार से महफूज़ हो जाए गी और मज़कूरा जगहों पर नज़र क़ायम रखने से जमईयत के साथ नमाज़ मयस्सर आजाती

है जैसा कि नबी अकर्म ﷺ से मनक़ूल है।

इसी तरह दोनों हा थों की उँगुलियों को रुकवा के वक़्त फैलाना और बवक़्त सजदा उन्हें मिलाए रखना सुन्नत है लिहाज़ा इस का भी ख़याल रखना चा हिएकि इंगुलियाँ खोलना या मिलाना बे फायदा नहीं है बल्कि साहिब श्रीअत ﷺ ने उन के ज़िमन में फ़वाइद मलहूज़ रख कर अमल किया है हमें साहिब शरीअत ﷺ की मुताबेत के बराबर को ई फायदा नहीं है,यह सारे अहकाम फ़िक़ही कुत्ता बों में तफ़सील और वज़ाहत के साथ मज़कूर हैं,उन को इस जगह बयान करने का मक़सद इल्म फ़िक़्ह के मुताबिक आमाल की रगबत दिलाना है।’’

इस्लाम के अरकान ख़मसा:

अक्सर आयात वाहादीस में दख़ूल जन्नत को आमाल सालहा से मरबूत और वाबस्ता किया है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को मुद्दतों इस बात में तर्दद रहा कि आमाल सालहा से मुराद सारे आमाल सालहा हैं या बाज़ अगर सारे मुराद हैं तो मुश्किल है इस लिए कि बहुत कम ही किसी को सारे आमाल सालहा करने की तौफ़ीक़ मिलती होगी और अगर बाज़ मुराद हैं तो वह बाज़ मजहूल और गैर मुतय्यन हैं।

आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि आखिर महज़ फजल ख़ुदावंदी से दिल में डाला गया कि शायद आमाल सालहा से इस्लाम के अरकान ख़मसा मुराद हूँ जिन पर इस्लाम की बुनियाद है,अगर यह उसूल पंजगाना कामिल तौर पर अदा हो जाएँ तो निजात व फ़लाह नकद वक़्त है क्योंकि बज़ात ख़ुद आमाल सालहा हैं और बुराइयों,गुनाहों और मुनकरात से रोकते हैं,आयत करीमा:

اِنَّ الصَّلٰوۃَ تَنْہٰی عَنِ الْفَحْشَآءِ وَالْمُنۡکَرِ ( )

। अलानकबोत: 45

यानी बे शक नमाज़ बे हयाई और बुराई से रोकती है, इस की गवाह है,जब उन पांचों की अदाएगी मयस्सर हो गई तो उम्मीद है कि शकर अदा हो गया और जब शकर अदा हो ज्ञातवाज़ाब से निजात हासिल हो गई,रब का नात जल व अला फरमाता है:

مَا یَفْعَلُ اللہُ بِعَذَابِکُمْ اِنۡ شَکَرْتُمْ وَاٰمَنۡتُمْ ( )

यानी अल्लाह तआला को तुम्हारे अज़ाब से किया काम अगर तुम शकर करू और ईमान लाओ।

पस इस पंजगाना को बजा लाने में जान से ज़्यादा कोशिश करना चाहिए,ख़ास कर नमाज़ को क़ायम करने में कि दीन का स्तवन है,जहां तक हो सके इस के आदाब में से कोई अदब छोड़ने पर राजी न हवागर नमाज़ को मुकम्मल कर लिया तो इस्लाम के बड़े रुकन को पालियाऔर दोज़ख से छुटकारा के लिए मजबूत रसी हासिल कर ली,अल्लाह सुब्हानहू ही तौफ़ीक़ देने वाला है।

तकबीरों की हिकमतें:

मालूम हो कि नमाज़ में तकबीर औला इशारा है इस तरह कि हक़ सुब्हानहू व तआला आबिदीन की इबादतों और नमाज़ियों की नमाज़ों से मस्तग़नी और बड़ा है और वह तकबीरें जो कि अरकान के बाद में(यानी क़याम व गैरह के बाद हैं) हैं इशारा हैं इस तरफ़ कि हर रुकन की अदाएगी बराए इबादत ख़ुदावंदी जल व अला लियाकत नहीं रखती है और रुकवा की तस्बीह(सुबहान रबी उलअज़ीम) में चूंकि तकबीर के माना मलहूज़ हैं इसी लिए रुकवा से उठते हुए अल्लाह अकबर कहने का हुक्म नहीं फ़रमाया बल्कि समा अल्लाह लिमन हमदा कहने का हुक्म दिया।

इस के बरख़िलाफ़ दोनों सजदों को उन की तस्बीहात के बावजूद अदाय आखिर में अल्लाह

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। अलनिसा: 147

अकबर कहने का हुक्म आया ताकि कोई वहम में न पड़ जाए कि सजदा में जो कि निहायत इन्पतात वानख़फ़ाज़ और ग़ायत तज़लल व इन्किसार पर है हक़ इबादत अदा हो गया इस वहम को दफा करने के लिए सजदे की तस्बीह में भी लफ़्ज़ ‘‘आला’’ इख्तियार फ़रमाया और तकबीर की तकरार(यानी सजदा में जाते और उठते वक़्त)मस्नून हो ई।

और चूंकि नमाज़ मोमिन की मेराज है इसी लिए नमाज़ के आखिर में उन कलिमात को पढ़ने का हुक्म आया जिन से हुज़ूर सर्वरालम ﷺ मेराज में मुशर्रफ़ हो ए थे,पस नमाजी को चाहिए कि नमाज़ को अपनी मेराज बनाए औरनमाज़ में निहायत क़ुर्ब तलाश करे,हदीस शरीफ़ में है कि बंदा सब से ज़्यादा क़रीब इस वक़्त हो ता है जब कि नमाज़ में हो।(अबू दाऊद व निसाई)

नमाज़ के बाद तसीहात की हिकमतें:

नमाजी चूंकि रब तआला से मुन्नाजी हो ता है (राज़ व नयाज़ की बातें करता है) और हक़ तआला की अज़मत विजलाल का मुशाहिदा करता है इस लिए यह जगह ऐसी है कि इस में रोब व हैबत पैदा हो इस लिए इस की तसल्ली के लिए नमाज़ का ख़त्म दो स्लामों से फ़रमाया,और वह जो हदीस शरीफ़ में नमाज़ फर्ज़ के बाद सोबार तस्बीह (सुबहान अल्लाह),तहमीद (अलहम्द लिल्लाह),तकबीर(अल्लाह अकबर) और तहलील (लाइलाह अल्लाह) का ज़िक्र आया है मेरे इल्म में इस का राज़ यह है कि अदाय नमाज़ में चूंकि तक़सीर और कोताही वाक़्य हो जाती है इसी लिए तस्बीह व तकबीर से इस की तलाफ़ी करना चाहिए और अब अदम लियाकत और अपनी ना तमामी इबादत का एतराफ़ करना चाहिए और चूंकि इबादत की अदाइगी तौफ़ीक़ इलाही से मयस्सर आती है इसी लिए तहमीद से इस नेमत का शकर बजालाना चाहिए और मुस्तहिक़ इबादत हक़ तआला के गैर को नहीं जानना चाहिए।

उम्मीद है कि अदाय नमाज़ जब शराइत आदाब से मक़रून और मिली हो ई हो और इस

के बाद तक़सीर की तलाफ़ी और शकर नेमत की तौफ़ीक़ और गैर हक़ से इस्तिहक़ाक़ इबादत की नफ़ी गहराई क़ल्ब से इस कलिमात तैबा के ज़रिया की जाए तो वह नमाज़ कबूल ख़ुदावंदी के लायक हो जाए गी और इस नमाज़ का पढ़ने वाला मुफ़लिह और कामयाब होगा।(मक्तूब 304)

नमाज़ में तसोर शैख़:

हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद अशरफ और हाजी मुहम्मदफ़रकती रहमहमा अल्लाह ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत में ख़त भेजा और तहरीर किया कि राबिता(सूरत शैख़ का तसोर)इस हद तक ग़ालिब है कि नमाज़ में इस को अपना मस्जूद जानता और देखता है और अगर बिलफ़र्ज़ नफ़ी करता है तो मुंतफ़ी नहीं होता है(मालूम रहे कि औलियाए कामलियन जब ज़ी इस्तिदाद मुरीद को राबिता की तालीम देते हैं तो इस का फ़ैज़ान कभी ऐसाहोता है कि हर तरफ़ उसे शैख़ ही दिखाई देता है और वह अजब कैफियत का शिकार होता है)

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जवाब में फ़रमाते हैं :‘‘एमुहब्बत अत्वार! यह दौलत तो तालिबान ख़ुदा का मुतमन्ना है शायद हजारों में से किसी एक को देते हैं,इस मामला का मालिक साहिब इस्तिदाद और शैख़ से कामिल मुनासबत रखता है,हो सकता है कि शैख़ मुक़तदा की थोडी सी सोहबत से शैख़ के जुमला कमालात को जज़्ब कर ले,राबिता की नफ़ी क्योंकर करें गे कि वह मस्जूद इलिया है(जिस की जानिब सजदा किया जाता है ) न कि मस्जूद ला(जिस के लिए सजदा किया जाता है)मेहराबों और मस्जिदों की क्यों नफ़ी नहीं करते?इस किस्म की दौलत सआदत मंदों को मयस्सर है ताकि जमी अहवाल में साहिब राबिता(शैख़ मुक़तदा)को अपना ज़रिया व वसीला जानें और जमी औकात में इस की तरफ़ मुतवज्जा रहीं।

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।जैसे काबा मुअज़्ज़मा

इस बे दौलत जमात की तरह न हूँ कि जो ख़ुद को बे नयाज़ जानती है और क़िबला तवज्जो को अपने शैख़ से मुनहरिफ़ करते हैं और अपने मामले को खराब और नाक़िस करते हैं।’’(मक्तूब30 दफ्तर दोम)

मालूम रहे कि हालत नमाज़ में शैख़ कामिल का तसोर ख़ुद बखुद होजाना अलग चीज़ है और ब तकल्लुफ़ तसोर करना दूसरी चीज़ है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने जो कुछ फ़रमाया है इस का ताल्लुक अव्वल से है दोम से नहीं यह कैफियत किस क़द्र महमूद और मुफीद है वह मक्तूब मज़कूर से वाज़िह और अयाँ है।

इस से पता चला कि शैख़ कामिल के तसोर का जब यह आलम है तो इस खुश नसीब का किया हाल होगा जिस को सर्वर आलम ﷺ की सूरत मुबारका के ताल्लुक से यह दौलत हासिल हो जाए,इस से उन लोगों को इबरत हासिल करना चाहिए जो रसूल पाक ﷺ के ख़याल मुबारक को भी निहायत क़बीह अलफ़ाज़ से ताबीर करते हैं।( )

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।जैसा कि मौलवी इस्माईल देहलवी अपनी किताब ‘‘स्रात मुस्तक़ीम’’ मतबूआ मुज्तबाई, दिहली के स: 86 में लिखते हैं: ‘‘अज़ वस्वसा ज़िना खयाल मजामात ज़ौजा ख़ुद बेहतर अस्त व सिर्फ़ हिम्मत बसवे शैख़ व इमसाल आं अज़ मुअज़्ज़मीन गो जनाब रिसालत मआब बाशिंद बचन्दें मर्तबा अज़ इस्तिग़राक़ दर सूरत गाओ ख़र ख़ुद अस्त’’ इस का मफ़हूम यह है कि नमाज़ में शैख़ और दीगर मुअज़्ज़मीन का तसोर चाहे वह जनाब रिसालत मआब ﷺ ही क्यों न हूँ, इस से तो बदरजहा बेहतर है कि ज़िना और अपनी बीवी से सोहबत का वस्वसा हो नीज़ अपने बेल और गधे का ख़याल आये। नऊज़ बिल्लाह

मुसलमानों को चाहिए कि इमाम रबानी का तरीका अपनाएं और ऐसे गुस्ताखों के बहकावे में न आएं।