अध्याय 5 में से 8पृष्ठ 48–62
फ़राइज़ व नवाफ़िल
हुज़ूर मुक़तदए आलिम ﷺ की जिन अमौरमें मुताबेत व पैरवी की जाती है उन में बाज़
फ़राइज़ हैं और बाज़ नवाफ़िल उन दोनों से जुदा जुदा क़ुर्ब वाबस्ता है, हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी और उन के फ़र्रज़िंदों ने मुतअद्दिद मक्तोबात में इस क़ुर्ब को तफ़सील से बयान फ़रमाया। इस फ़क़ीर मुजद्दिदी अफ़ी अन्हु ने भी उन बुजुर्गों से नकल कर के किताब ‘‘नुबुव्वत व विलायत’’ में क़दरे तफ़सील बयान की है। हासिल यह है कि फ़राइज़ इस क़द्र अहम हैं कि जो क़ुर्ब उन से वाबस्ता है वह क़ुर्ब ज़ात है और नवाफ़िल से वाबस्ता क़ुर्ब सिफ़ात है उन दोनों में वही निस्बत है जो एक क़तरा को समंदर से, मारूफ़ व मशहूर हदीस क़ुदसी जिसे हज़रत इमाम बुखारी क़ुद्दिस सरह ने हज़रत अबू हुरीरा रज़ि अल्लाह अन्हु से बायं अलफ़ाज़ बयान फ़रमाया:
‘‘ग़ुन अल्लाह तआला क़ाल मिन आदिली व लिया फ़ुक़दाआ ज़ंता बालहर्ब व मातकर्ब मक्ली अबदी बिशी अहब मक्ली मम्मा इफ़्तिरज़त अलैहि विला यज़ाल अबदी यतक़र्ब अली बालनवाफ़िल हती अहबा फ़ाज़ा अहबबता किन्नत समा अलज़ी यसमा ब व बस्रा अलज़ी यबस्र ब व यदा उलती यबतिश बहा वर्जिला अलज़ी यमशी बहा वज्जन सालनी ला अतीता व ग़ुन इस्तिआज़ नी ला ईज़ना’’
जिस ने मेरे वली से अदवात की में इस से जिंग का ऐलान करता हूँ और मेरा बंदा किसी ऐसी शए के ज़रिया क़रीब नहीं जो मुझ को इस से ज़्यादा महबूब हो जो में ने इस पर फर्ज़ की और नवाफ़िल के ज़रिया मेरा बंदा बराबर मेरे क़रीब होता रहता है हती कि में उसे महबूब बना लेता हूँ पस जब महबूब बना लेता हूँ तो में इस के कान बिन जाता हूँ जिस से वह संता है और इस की आंख हो जाता हूँ जिस से वह देखता है और इस का हाथ बिन जाता हूँ जिस के ज़रिया पकड़ ता है और इस का पीर हो जाता हूँ जिस के ज़रिया वह चलता है अगर मेरा बंदा मुझ से मांगे तो में उसे जरूर दों गा और अगर मुझ से पनाह चाहे गा तो में पनाह दों गा।’’
हदीस मज़कूर पर सर सुरी नज़र डालने से यह चंद उमूर सामने आते हैं:
1। वली की अज़मत व रफात और ख़ुदा रसीदगी। इस की मुखालफत व अदावत में हिला कित है।
2। क़ुर्ब दो किस्म का है एक वह जो फ़राइज़ की अदाएगी से बंदे को हासिल होता है दोम वह जो नवाफ़िल के ज़रिया मयस्सर आता है।
3। सब से ज़्यादा महबूब क़ुर्ब ‘‘क़ुर्ब फ़राइज़’’ है।
4। क़ुर्ब नवाफ़िल के ज़रिया बंदा अल्लाह तआला का महबूब बिन जाता है और मक़ाम महबूबीयत हासिल कर लेता है।
5। मक़ाम महबूबीयत पर फ़ाइज़ होने के बाद इस की किया शान हो जाती है कि ख़ुदाए तआला इस का कान आंख वगैरह हो जाता है। मालूम हो कि आ निख कान वगैरह हो जाने की बुजुर्गों ने चंद तफ़सीरें फ़रमाई हैं :एक यह कि जिस तरह बंदा अपनी हाजात उन्हें के ज़रिया पूरा करता है यानी जिस तरह आंख से किसी को देखने की हाजित हो ती है तो इरादा करते ही आंख उठ जाती है और देख लेती है। इसी तरह कान से किसी चीज़ को सुनने का इरादा करता है तो कान फ़ौरन सन लेता है इसी तरह जो बंदा नवाफ़िल में मशगूल रहता है और मक़ाम महबूबीयत पर फ़ाइज़ हो जाता है तो वह चाहता है और अल्लाह तआला इस की हाजित उन आज़ा से तेज पूरी कर देता है। दूसरी तफसीर यह बयान की गई कि मुराद यह है कि अल्लाह तआला उन आज़ा का मुहाफ़िज़ हो जाता है लिहाज़ा ऐसी मंज़िल पर बंदा कान से सिर्फ़ वही संता है जिस का सुनना हलाल है आंख से सिर्फ़ वही देखता है जिस का देखना हलाल है, हाथ से सिर्फ़ वही पकड़ता है जिस का पकड़ना हलाल है, पीर से सिर्फ़ इसी की तरफ़ चलता है जिस तक जाना हलाल है, मकसूद यह कि ऐसा बंदा ख़ाहिशात व शहवात से मुनक़ते और ला ताल्लुक हो जाता है, ताआत में मुस्तग़र्क रहता है औरअपने आज़ा व ज्वारह सिर्फ़ उन में इस्तेमाल करता है जिन के लिए उन्हें पैदा किया गया, बुजुर्गों ने फ़रमाया कि हदीस में इशारा है कि मुहब्बत अलहाई का दरवाजा तक़र्ब बालनवाफ़िल है।
फ़क़ीर मुजद्दिदी अफ़ी अन्हु अर्ज़ करता है कि हदीस मज़कूर में एक इस तावेल की भी गुंजाइश है कि मुराद यह है कि बंदा जब ख़ास क़ुर्ब हासिल कर लेता है और यह आज़ा व ज्वारह जब तजल्लियात अलहाय का मरकज़ हैं तो उन की क़ुव्वतें इस क़द्र हो जाती हैं कि हजारों कोस दौर कान सन लेते हैं हजारों मेल दौर आंख देख लेती है पल में वली बितरीक़ ‘‘तै अर्ज’’ कहीं से कहीं पहुँच जाता है, जो ज़बान से निकल जाता है अल्लाह तआला उसे पूरा फ़रमा देता है, निगाह कहर व गजब पड़ जाती है तो इशारों में बस्तियां की
की बस्तियां उलट जाती हैं, अल्लाह वालों ख़ास कर मुतक़द्दिमीन बुजुर्गों के तसर्फ़ात व करामात पढ़िए तो हैरत होती है कि उन के आज़ा व ज्वारह में किस क़द्र कुदरत अलहाय की तजल्लियात मोजज़िन हो जाती हैं कि पल में वह कर गुज़रे हैं कि अकलें हैरान रह जाती हैं। वाल्लाह तआला आलम बालसवाब।
6। तोकल:
अहले अल्लाह ने जिन उमूर की ख़ुसूसीयत से वसीयत की है उन्हें में से तोकल भी है कुरआन व सुन्नत में तोकल की मुख़तलिफ़ मवाक़े पर ताकीद फ़रमाई गई है और अल्लाह अज़ो जल ने हुक्म फ़रमाया कि मोमिनों को चाहिए कि वह अल्लाह तआला ही पर भरोसा और तोकल करें नीज़ इरशाद बारी ताली है ‘‘व मनۡ यतविक्षल अली अल्ला फहू हसबा’’ जो अल्लाह पर भरोसा करता है अल्लाह तआला उसे काफ़ी है, नीज़ इरशाद रब्बानी है ‘‘फ़ाज़ा अज़मत फतविक्षल अली अल्ला’’ जब तुम पुख्ता इरादा कर लो तो अल्लाह तआला पर भरोसा करू।’’
हज़रत इमाम बुखारी वगैरह ने अपनी सही में बयान फ़रमाया कि जो सत्र हजार बुला हिसाब जन्नत में जाएँ गे वह वही हूँ गे जिन को अल्लाह तआला पर तोकल हासिल है। (मज़ेद तफ़सील के लिए देखिए कुतुब तफ़ासीर व अहादीस व तसव्वुफ़) मुख़तलिफ़ बुजुर्गों ने तोकल के अपने अपने हाल के ऐतबार से मुतअद्दिद मआनी बयान फ़रमाए, हज़रत ज़ो अलनून मिस्री क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: ‘‘तदबीर नफ़्स को छोड़ देना और हौल व कौ से खाली हो जाना कि अल्लाह तआला के सिवा में कोई हौल व कौ न जाने तोकल है , यानी ला हौल विला कौ उला बिल्लाह‘‘
हज़रत अबू बुकर दक़ाक़ क़ुद्दिस सरह फ़रमाते हैं: बस एक दिन जीने का इंतजाम कर लेना और कल की फ़िक्र को तर्क कर देना तोकल है।’’ बाज़ ने फ़रमाया: अल्लाह तआला पर एतिमाद करते हुए कमा ना तर्क कर देना तोकल है।’’ हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सरह की तहक़ीक़ यह है कि ‘‘एतिमाद अलक़लब अली अलोकील
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। सूरत अलतलाक़: 65/3
। सूरत आल इमरान:3/159
उलहक़ वहदा’’ एक अल्लाह पर दिल का भरोसा कर लेना तोकल है।
आज हमारी अक्सर परेशानियों और मुश्किलात का सबब अदम तोकल है हम इस आलम असबाब में रहते हैं और अक्सर अश्या को असबाब से मरबूत और वाबस्ता पाते हैं, खेत में बीज डालते हैं, उगता है फसल तैयार होती है इस तरह हमें अनाज हाथ आता है, बीमार होते हैं दवाएं इस्तेमाल करते हैं मर्ज दौर हो जाता है, इश्याय आम तौर पर असबाब के तहत वजूद में आती हैं मोमिन की शान यह है कि वह यकीन रखे कि अल्लाह तआला ही मुसबब अलासबाब है इसी ने दवाओं में अज़ाला मर्ज की तासीर रखी है वही अनाज देता है वही बारिश बरसाता है फ़ाइल हक़ीक़ी वही है इसी की मशीयत से असबाब के तहत अश्या वजूद में आती हैं इस ने जब चाहा हज़रत आदिम को बुला मां बाप पैदा फ़रमा दिया जब चाहा हज़रत ईसा को बुला बाप वजूद बख्श दिया अली नबीना वालैहिमा अस्सलात वस्सलाम। दवाओं की तासीर इस की मशीयत से है आखिर किया बात है कि एक ही दुआ किसी मर्ज से शिफा देती है और वही दुआ इसी मर्ज में कभी नाकाम होजाति है? बीज बौने के बाद भी कभी फसल नहीं उगती और कभी बहुत अच्छी पैदावार होती है? यह काफ़िराना व मुशरिकाना नज़रिया है कि असबाब में तासीर हक़ीक़ी एतिक़ाद कर ली जाए? एमानी तक़ाज़ा यह है कि असबाब के पीछे मुसबब अलासबाब पर कामिल नज़र रखे आज आम तौर पर मुसलमानों का अल्लाह तआला की ज़ात पर एतिमाद निहायत कमजोर हो गया है, उन्हें ख़ुदाए तआला की रज़ाक़ीयत पर कामिल यकीन नहीं इस लिए वह असबाब पर एतिमाद करते हैं और अब इस मामला में हराम व हलाल की प्रवाह ही ख़त्म हो गई है, हद तो यह है कि कौम के दीनी रहनुमाई के ठेकदारभी अब नेताओं, मालदारों और हुक्मरानों पर तो एतिमाद करते हैं लेकिन ख़ुदाए कार साज़ पर नहीं इसी लिए जिल्लत व रुसवाई के सिवा अब कुछ नहीं।
दर्जात:
तोकल के बे शुमार दर्जात हैं जिस बंदे को जैसा ख़ुदाए कदीर पर एतिमाद है, भरोसा है वैसा ही वह फ़ैज़ याब है। हदीस क़ुदसी है ‘‘अना इंद ज़न अबदी बी’’ यानी में बंदे के साथ
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। किफायआलातक़िया स:30
वैसा मामला करता हूँ जैसा कि वह हमारे बारे में गुमान करता है।
हदीस सही तो है ही लेकिन तजरबा भी है आप अपने रब पर सच्चा एतिमाद करें वह रहीम व क्रीम आप के एतिमाद की जरूर लॉज रखे गा। आप दिल में यकीन रखें कि हमारा रहीम व क्रीम ख़ुदा हमें गुमराह नहीं करे गा तो वह नहीं करे गा, आप यकीन रखें कि वह ज़लील नहीं करे गा तो नहीं करे गा, आप को पूरा एतिमाद हो कि वह हमें और हमारी औलाद को भूका नहीं रखे गा तो वह बिलकुल उन्हें भूका नहीं रखे गा आप को यकीन हो कि वह बीमारी से शिफा दे गा तो जरूर दे गा।
जिन बंदों ने इस पर कामिल एतिमाद किया उन के लिए आसमानों से खाने की थाल आये, ऐसे ऐसे मत्विकलीन हुए जिन्हों ने कभी किसी तबीब और डाक्टर से अपना हाल नहीं बताया न दुआ इस्तेमाल की वह भी दौर इबतला से निकल कर सेहत याब हो ए, सुलतान उलारफ़ैन हज़रत बायज़ीदबिस्तामी क़ुद्दिस सरह से पूछा गया ‘‘मिन एन ता कल’’ ? आप कहां से खाते हैं? फ़रमाया : ‘‘मौला ई यताम अलक्लब व अलख़नज़ यर इफ्तिरा उन्न ला यताम अब्बा यज़ीद?’’ मेरा मूली कुत्ते और ख़िंज़ीर को खिलाता है तो तुम समझते हो कि वह बायज़ीद को नहीं खिलाए गा?
रसूल ﷺ ने फ़रमाया : जो सब से कट कर अल्लाह का हो रहा है अल्लाह इस के हर मउन्नत (खर्च या मेहनत) के लिए काफ़ी है और उसे इस जगह से रोज़ी दे गा जहां गुमान भी न होगा और जो दुनिया का हो रहा है अल्लाह तआला उसे दुनिया के हवाले कर देगा।’’
इकतिसाब अफ़ज़ल है या तोकल:
ज़रिया मआश को इख्तियार करना और रोज़ी कमाना जिसे इकतिसाब कहते हैं अफ़ज़ल है या तोकल? यानी ज़राए मआश न इख्तियार करना और उन से आराज़ करना? बुजुर्गों के इस में तीन कौल हैं:
1। तोकल अफ़ज़ल है क्यों कि यह अल्लाह तआला के रसूल ﷺऔर अहले सफ़ा का हाल है।
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। किफायआलातक़िया स:30
। ईज़ास:30
2। बाज़ के नज़दीक इकतिसाब अफ़ज़ल है, उन के नज़दीक तोकल के मुक़ाबिल वह इकतिसाब अफ़ज़ल है जो जमा माल के लिए न हो और न यह एतिक़ाद हो कि इकतिसाब रिज़्क़ लाये गा और नफा पहुँचाए गा बल्कि जो उन नवाफ़िल से है जिन का अल्लाह तआला ने हुक्म दिया ,सूरह जुमा में इरशाद ख़ुदावंदी है:
फ़ाज़ा क़ज़ीत अलस्सलाओत फ़ानۡतश्रूۡअ फि उलअर्ज़ व इबतगोۡअ मनۡ फजल अल्ला यानी जब नमाजजुमआ अदा कर ली जाए तो जमीन में फैल जाओ और अल्लाह तआला का फजल तलाश करू।’’ इस में फजल से मुराद रिज़्क़ है।
तीसरा कौल जोकि मुख्तार है जैसा कि हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सरह ने फ़रमाया कि इस में तफ़सील है जिस शख्स की यह हालत हो कि वह तर्क कसब कर के ख़ुद को ज़िक्र व फ़िक्र और इबादत वगैरह के लिए फ़ारिग़ करे गा और कसब इस में खलल अंदाज़ होगाऔर तशवीश क़ल्ब का बाइस होगा तो ऐसे शख्स के लिए तोकल अफ़ज़ल है क्यों कि तोकल में सब्र और मुजाहिद नफ़्स है और जो शख्स इस हालत और पोजीशन का नहीं है बल्कि उसे लोगों से उम्मीदें हूँ गी कि लोग हमारे लिए कुछ लाएं और क़ल्ब मुज़्तरिब रहता है, तंगी रिज़्क़ के वक़्त ग़ैज़ व गजब में मुबतला होगा तो ऐसे शख्स के लिए कसब अफ़ज़ल है, बाज़ बुजुर्गों ने फ़रमाया कि तोकल रसूल अल्लाह ﷺ का हाल है और कसब आप की सुन्नत है पस जो आप ﷺके हाल से कमजोर हो उसे चाहिए कि वह आप की सुन्नत प्रचले।
तंबीहात:
तोकल के आम तौर पर मानी तर्क कसब के लिए जाते हैं यानी रोज़ी न कमाना इस मानी कर अयालदार आदमी के लिए तोकल जायज़ नहीं है और बुजुर्गों के नज़दीक तोकल दूसरे मानी में है कि असबाब इख्तियार करे मगर नज़र मुसबब अलासबाब पर हो, इस मानी कर जो ज़रिया मआश इख्तियार किए हुए है मगर नज़र रज्जाक पर है तो वह भी मुतविकल है। इसी लिए ‘सलालम अलफ़ज़ला’ में इमाम सेवती से नकल करते हुए फ़रमाया कि मेरे नज़दीक कसब तोकल के खिलाफ़ और मुनाफ़ी नहीं है बल्कि बंदा बैक वक़्त मुतविकल और मुक्तसब दोनों हो सकता है बायं तौर कि जो अल्लाह ने इस के लिए मुक़रर
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। सूरत अलजम: 62/10
करदिया है इस पर राजी रहे और इस से ज़्यादा की लालच न करे। अमीर अलममनीन हज़रत फ़ारूक़ आज़म रज़ि अल्लाह अन्हु ने इस कौम से फ़रमाया जो कमाते नहीं थे और तोकल का दावा करते थे कि ‘‘मुतविकल तो वह है जो बीज जमीन में बोए और ख़ुदा पर भरोसा करे।’’
हज़रत सहल बिन अब्द अल्लाह रज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाते हैं कि तोकल सर कार अलैहि अस्सलाम का हाल है और कसब आप की सुन्नत है, जिस का हाल अच्छा होगा वह सुन्नत न छोड़े गा।
हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सरह असबाब पर क़दरे तफ़सील से बहस करने के बाद फ़रमाते हैं: इस बयान से वाज़िह होगया कि तवस्सुत असबाब तोकल के मुनाफ़ी नहीं जैसा कि नाक़िसों ने गुमान किया है बल्कि तवस्सुत असबाब में कमाल तवस्सुत है। हज़रत याकूब अली नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम ने मामला को हक़ सुब्हानहू के हवाला करते हुए रियायत सबब का तोकल नाम रखा है यानी मामला को अल्लाह तआला के सुपुर्द किया और सबब की रियायत भी फ़रमाई और इरशाद फ़रमाया:
یٰبَنِیَّ لَا تَدْخُلُوۡا مِنۡۢ بَابٍ وَّاحِدٍ وَّادْخُلُوۡا مِنْ اَبْوَابٍ مُّتَفَرِّقَۃٍ
यानी ए मेरे बेटो! एक दरवाजे से दाखिल न होना और मुतफ़र्रिक़ दराज़ों से दाखिल होना।
मुफ़स्सिरीन कराम रहिमहुम अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि हज़रत याकूब अली नबीना व अलैहि अस्सलात वस्सलाम का बेटों को यह हुक्म इस लिए था कि वह नज़र बद से महफूज़ रहीं, ज़ाहिर है कि इस मामला में उन्हों ने सब को मलहूज़ रखा फिर मामले को बारगाह अलहाई के हवाले करते हुए फ़रमाते हैं:
وَمَاۤ اُغْنِیۡ عَنۡکُمۡ مِّنَ اللہِ مِنۡ شَیۡءٍ اِنِ الْحُکْمُ اِلَّا لِلہِ عَلَیۡہِ تَوَکَّلْتُ وَ عَلَیۡہِ فَلْیَتَوَکَّلِ الْمُتَوَکِّلُوۡنَ
में तुम से अल्लाह तआला का कोई फैसला और क़ज़ा दफा और दौर नहीं करता हूँ हुक्म तो सिर्फ़ अल्लाह ही के
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। सलालम अलफ़ज़लाबरहाश्या किफायआलातक़िया स:30
। ईज़ास:30
। सूरत यूसुफ: 12/67
। सूरत यूसुफ: 12/67
लिए है इसी पर में ने तोकल किया और चाहिए भरोसा करने वाले इसी पर भरोसा करें।
हज़रत याकूब अलैहि अस्सलाम की इस मार्फत की अल्लाह तआला ने तहसीन फ़रमाई और अपनी अता करार दिया। देखिए सूरह मज़कूर।
मालूम हुआ कि तोकल के दर्जात हैं और अल्लाह वालों के मुख़तलिफ़ अहवाल होते हैं वह मुख़तलिफ़ औकात में मुख़तलिफ़ अहवाल व कैफियात से दो चार होते हैं इसी वजह से तोकल के ताल्लुक से कुतुब सवानिह में बुजुर्गों के मुख़तलिफ़ अहवाल और दर्जात पढ़ने को मिलते हैं। जो सब से मुनक़ते हो कर सिर्फ़ अल्लाह तआला की तरफ़ मुतवज्जा हैं वह असबाब से कोसों दौर हैं और अल्लाह तआला उन के साथ वही मामला करता है जैसा कि वह इस के साथ गुमान रखते हैं जैसा कि ख़ुद हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सरह के एक दूसरे मक्तूब से ज़ाहिर है, ऐसे हज़रात के काम ब्लासबब होते हैं उन के लिए आसमानों से खाने के थाल आते हैं ऐसे हज़रात को इस जमात में शुमार किया गया है जो बुला हिसाब व किताब जन्नत में दाखिल हूँ गे जैसा कि इमाम बुखारी वगैरह ने बयान फ़रमाया।
दूसरे वह हज़रात हैं जिन का नुज़ूल काफ़ी कामिल होता है ऐसे हज़रात बहुत बा कमाल होते हैं जो भरोसा तो सिर्फ़ मुसबब अलासबाब जल व अला पर करते हैं, लेकिन इस आलम असबाब में रियायत सबब भी रखते हैं यह वही बड़े लोग हैं जिन को आप ने अभी हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सरह के कलाम से पढ़ा इस में और भी बड़ी प्यारी बहसें हैं जिन को बुजुर्गों के कलाम से जाना जा सकता है।
असबाब व वसाइत:
अल्लाह तआला को चों कि इस दुनिया को दार इबतला व इम्तहान बनाना था, इस ने हिक्मत बालग़ा से मुसबबात और अश्या के हुसूल को उमूमा असबाब से मरबूत करदिया, कुफ़्फ़ार व मुशरिकीन ने उन्हें असबाब को मोस्सर हक़ीक़ी गुमान कर लिया, आज उन कुफ़्फ़ार की सहबुतों औरअलूम शरएहि से दूरी की वजह से बहुत से मुसलमान भी असबाब कौमूसिर समझ कर इख्तियार करने लगे जिस का नतीजा यह निकला कि असबाब पर एतिमाद बढ़ गया और अल्लाह तआला पर कम बल्कि ख़त्म सा हो गया। हम इस मज़मून के आगाज़ में क़दरे कुछ इस ताल्लुक से बयान कर चुके हैं,
ज़ात ख़ुदावंदी पर अदम एतिमाद से जो नताइज बुर आमद हो रहे हैं वह ज़लालत की तरफ़ ले जाने वाले, गुमराह कण और बंदों को मुश्किलात में मुबतला करने वाले हैं, असबाब व वसाइत के इख्तियार करने और न करने और उन में तासीर व अदम तासीर के ताल्लुक से सूफ़िया कराम व उलमा-ए अजाम ने काफ़ी तवील अबहासि सुपुर्द कलम फ़रमाई हैं हज़रत इमाम मुहम्मद ग़ज़ाली क़ुद्दिस सरह ने इस को आखिर तक पहुँचा दिया। हम हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सरह का मुख़्तसर कलाम एक कौल फैसल की हैसियत से सुपुर्द कलम करते हैं जो हक़ व हिदायत का रास्ता है, अल्लाह तआला बंदों की सही रहमनाई फ़रमाए ताकि यह उसे सही पहचानें।
एक गलत फ़हमी:
मालूम होक्का बाज़ मुतकल्लिमैन ने मुमकिन और वाजिब जल व अला के दरमियान वह निस्बत ख़याल कर ली जो कोज़ा और इस के बनाने वाले के दरमियान है, इस का मतलब यह हुआ कि उन्हों ने यह गुमान कर लिया कि मुमकिन अदम से वजूद में आने में अल्लाह तआला का मुहताज है, बका में मुहताज नहीं, जिस तरह कोज़ा अपने वजूद में अपने फ़ाइल (कलाल) का मुहताज है बका में नहीं जब कि यह फ़िक्र सरीह कुरआन के खिलाफ़ थी रब कायनात जल व अला फरमाता है:
याۤईयहा इलिनास उन्नۡतुम अल्फ़िक़रा अली अल्ला वाल्लाह हो अलग़नी अलहमीۡद ए लोगो! तुम अल्लाह तआला के मुहताज हो और अल्लाह तआला बे नयाज़ महमूद व पसंदीदा है।’’
उन अहले इल्म ने चों कि मुमकिन को बका में मुहताज माना इस लिए तजदद इमसाल के कायल हुए ताकि मुमकिन का दाइमी तौर पर मुहताज होना साबित हो जाए तजदद इमसाल किया है? यह दूसरी बहस है, उसे इस के मक़ाम पर समझें ग़रज़कि हक़ यही है जो जमहूर मुतकल्लिमैन का मजहब है कि मुमकिन जिस तरह अदम से वजूद में आने में वाजिब का मुहताज है इसी तरह बका में भी अपनी इसी इल्लत की मुहताज से जो उसे वजूद में लाई है (इल्लत मौजिदा) इस की दलील यह है कि बका नाम है ज़मान सानी में वजूद का और मुमकिन जब वजूद के लिए ज़मान अव्वल में मुक़तज़ी नहीं तो ज़बान सानी में वजूद का मुक़तज़ी की
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। सूरत फ़ातिर:35/15
क्योंकर होगा क्यों कि इक़तिज़ा ज़मानों के इख़तिलाफ़ से मुख़तलिफ़ नहीं होता है। पस जब तक मुमकिन पर वाजिब की तरफ़ से अफ़ाज़ा वजूद है तब तक वह मौजूद और होगा और जब फ़ैज़ान मुनक़ते हो जाए गा तो मुमकिन का कोई असर न रहे गा।
हज़रत मुजद्दिद क़ुदसर सरह फ़रमाते हैं सारे मुम्किनात किया जवाहर, किया आराज़ ,किया अजसाम ,किया अक़ूल ,किया नफ़ूस, किया अफ़्लाक औरकिया अनासिर? सब कादर मुख्तार जल व अला की ईजाद से वाबस्ता हैं कि वह उन को अदम से वजूद में लाया है और जिस तरह यह सब (मज़कूरा) चीजें वजूद व हादस पैदा होने में अल्लाह तआला की मुहताज हैं तो बका (पैदाइश के बाद बाक़ी रहना) में भी इस सुब्हानहू तआला की मुहताज हैं। असबाब व वसाइत को इस सुब्हानहू ने अपने फेअल का नक़ाब बना दिया और हिक्मत को वजूद कुदरत का वसीला फ़रमा दिया क्यों कि अर्बाब ज़हानत व फ़ितान्त जिन की बसीरत (चश्म बातिन) अंबिया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात की मुतआबात के सुरमा से सुरमगें है जानते हैं कि असबाब व वसाइल जो कि वजूद व बका में बारी तआला के मुहताज हैं और इसी से सबूत व क़याम रखते हैं और इसी से वाबस्ता हैं और दर हक़ीक़त जमाद महज़ हैं दूसरे में जो कि जमाद महज़ होने में उन्हें जैसा है वह किस तरह असर डालें गे और दूसरे का अहदास व इख़तिरा (वजूद अता करना और पैदा करना )कैसे करें गे? उन के पस पर्दा एक कादर है जो कि उन को वजूद में लाता है और उन के लायक कमालात अता करता है। यह ऐसा है जैसे अहले अक्ल व खुर्द जमाद महज़ से कोई फेअल देखते हैं इस जगह से इस जमाद महज़ (पत्थर) के फ़ाइल व मुहर्रिक का सुराग लगा लेते हैं क्यों कि जानते हैं कि फेअल इस जमाद के लायक नहीं इस के पीछे कोई फ़ाइल है जो कि इस फेअल को अदम से वजूद में लाता है, पस बे जान (जमाद महज़) का फेअल अहले अक्ल व खुर्द के नज़दीक फ़ाइल हक़ीक़ी के फेअल के लिए नक़ाब व हिजाब न बिन सिक्का जब कि वह फेअल इस की जमादेत के पेश नज़र फ़ाइल हक़ीक़ी पर दलील हो गया, पस इसी तरह यह भी, हां अहमक़ की समझ में फेअल जमाद फ़ाइल हक़ीक़ी के फेअल के लिए नक़ाब व हिजाब है कि कमाल दर्जा की कंद ज़हनी की
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। कमा फ़ी हाशिया उलमकतूब, 266, नाक़िलन अन मकातीब क़ाज़ी सना अल्लाह रहमत अल्लाह अलैहि
वजह से जमाद महज़ को ही इस फेअल की वजह से साहिब कुदरत जान लिया और फ़ाइल हक़ीक़ी का इंकार करदिया।
फायदा:
जो जाह व माल वगैरह मख़लूक़ के पास है इस के हुसूल के लिए ख़ुद को उन के सामने ज़लील करना और उन की तमा करना बुजुर्गों ने कभी पसंद न किया, बल्कि उन के यहाँ यह निहायत क़बीह आदतों से है, इस तमा से बचने के लिए दो ही रास्ते हैं एक तो कल दूसरे ज़राए आमदनी इख्तियार करे और असबाब माल के ज़रिया माल कमाए जब कि इस के पास भी वही होगा जो दूसरों के पास है तो यह इस की तमा में ख़ुद को उन के सामने ज़लील नहीं करे गा।
किफ़ाया में है ‘‘
ला तबज़लन् लाबना अलदन्या अर्ज़क अश्शरीफ़ हाल को निक ता माफी मालहम व जाह्हम व हाल कोणिक मुतज़ल्लिलन बालतर्ददफ़ी खिदमतहम वालान अली अग़राज़हम वालसना अलैहिम वालदा लहम व इज़हार हबहम व तकसीर जमाहम फ़ान ज़लक़ मिन असर मुहब अलदन्यावताज़ीमहा फ़ी कलबा व मिन अहबहा व अज़महा फ़िग़ुना याज़म मिन अक़्बलित अलदन्या अलैहि व यतमनी उन्न युनाल मुँहा मा नाल वहज़ा सफ़ उबीद अलदन्या व उबीद हवाहम’’
यानी दुनिया दारों के लिए अपनी शरफ़ वाली इज्जत या जान न खर्च करू इस हाल में कि तुम उन के माल व जाह की तमन्ना कर रहे हो और दरां हालिका तुम इज़हार जिल्लत कर रहे हो उन की ख़िदमत में आमद व रफ्त देख कर और उन के अग़राज़ पर इआनत और उन की तारीफ़ व सना और उन के लिए दुआ और उन की मुहब्बत का इज़हार और उन की जमईयत को बढ़ाना और ज़्यादा करना क्यों कि यह सब इस के दिल में दुनिया की मुहब्बत और इस की ताज़ीम का असर है और जिस ने दुनिया से मुहब्बत और इस की ताज़ीम की तव्य इस की ताज़ीम कर रहा है जिस पर दुनिया मुतवज्जा हो चुकी है और यह तमन्ना कर रहा है कि दुनिया से वह पाले जो इस ने चाहा, दुनिया के गुलामों और अपनी ख़ाहिशात नफ़्स की पैरवी करने वालों की यही सिफ़त है।
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। मक्तूब 266 दफ्तर अव्वल
। किफायआलातक़िया स:32
मालूम रहे दरवेश कभी अपने लिए बुला उज़्र सही किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता हज़रत इमाम ग़ज़ाली कद सरह फ़रमाते हैं कि हज़रत बशर फ़रमाया करते थे कि फ़िक़रा तीन किस्म के हैं।
1। एक वह फ़क़ीर जो माँगता नहीं और अगर दिया जाए तो लेता नहीं यह रूहानियों के साथ अल्येन में होगा।
2। दोम वह फ़क़ीर जो माँगता नहीं और अगर दिया जाए तो लेता है ऐसा फ़क़ीर मुक़रबीन के साथ जिन्नात फ़िरदौस में होगा।
3। सोम वह फ़क़ीर जो हाजित के वक़्त माँगता है। यह अर्बाब यमीन से सादिक़ीन के साथ होगा।
सारे सूफ़िया कराम का इत्तफाक़ है कि माँगना बुरी और मज़मूम चीज़ है और फ़ाक़ा के बावजूद भी माँगना दर्जात में गिरावट का सबब है।
7। इख़लास:
वसाया तसा से एक अम्र इख़लास है इस का ताल्लुक आमाल कलबेह से है और यह एसआरकन आज़म है कि सारी ताआत व इबादात की क़बूलीयत इसी पर मौक़ूफ़ है इसी लिए कुरआन ने जगह जगह इख़लास की ताकीद फ़रमाई और अर्बाब इख़लास के मुरातिब और औसाफ़ व कमालात बयान फ़रमाए।
चंद इर्शादात मुलाहिजा हूँ।
۱۔ وَ مَاۤ اُمِرُوۡۤا اِلَّا لِیَعْبُدُوا اللہَ مُخْلِصِیۡنَ لَہُ الدِّیۡنَ
यानी उन्हें नहीं हुक्म दिया, मगर यही कि वह अल्लाह तआला की इबादत करें इसी के लिए दीन को खालिस करते हुए।
۲۔ اَلَا لِلہِ الدِّیۡنُ الْخَالِصُ
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। सूरत अलबेन: 98/5
। सूरत अलज़मर: 39/3
खबरदार! अल्लाह तआला के लिए , दीन खालिस है।
हुज़ूर सर्वर आलम ﷺ का इरशाद है:
1। अपने दीन को खालिस कर लो तुम को थोडा अमल भी काफ़ी होगा।
2। सरकार अलैहि अस्सलात वस्सलाम से ईमान के बारे में पूछा गया, फ़रमाया: हुआ लइख़लास लिल्लाह ताली’’ ईमान तो अल्लाह तआला के लिए दीन को खालिस करनाहै।
3। जान आलम ﷺ फ़रमाते हैं: ला यक़बल अल्लाह मिन अलामाल ज़िला मा कान खालिसा ला वाबतग़ा बहा वजहा’’ यानी अल्लाह तआला सिर्फ़ वही आमाल कबूल फरमाता है जो खालिस इस के लिए हो और उन आमाल से इस की रज़ा चाहे।
4। हुज़ूर दानए मा कान व मा युकोन ﷺ फ़रमाते हैं: जो शख्स अल्लाह तबारक व तआला के लिए चालीस दिन खालिस कर लेता है अल्लाह तआला इस के दिल से इस की ज़बान पर हिक्मत के चश्मे फोड़ देता है।
5। रहमत आलम ﷺ फ़रमाते हैं: जिस ने अल्लाह वहदा ला शरीक ला के लिए इख़लास पर दुनिया को छोड़ा और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी तो वह दुनिया को इस हाल में छोड़े गा कि अल्लाह तआला इस से राजी होगा।
मानी इख़लास:
जुमला ताअत व आमाल से मकसूद सिर्फ़ अल्लाह तआला का तक़र्ब और उसे राजी करना इसी का नाम इख़लास है अगर कोई नेक अमल इस लिए करता है कि लोगों को दिखाए या नियत यह हो कि लोग हमारी
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। किफायतस:32
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तारीफ़ करें या उन से तमा माल वगैरह हो तो ऐसा अमल इख़लास से निकल कर शिर्क ख़फ़ी के दर्जा में आजाता है और ऐसा करने वाला सज़ा का मुस्तहिक़ करार दिया जाता है।बुजुर्गों से इख़लास के मुतअद्दिद मआनी मनक़ूल हैं एक तो वही जो मज़कूर हुआ।
हज़रत सहल बिन अब्द अल्लाह रज़ि अल्लाह तआला अन्हु फ़रमाते हैं कि इख़लास यह है कि बंदे का सुकून व हरकत सिर्फ़ अल्लाह तआला के लिए हो नीज़ आप क़ुद्दिस सरह फ़रमाते हैं कि अक्लमंदों ने इख़लास की तफसीर में नज़र की तो उन्हों ने सिर्फ़ यही मानी पाए कि ख़लवत व जलवत में बंदे का सुकून व हरकत सिर्फ़ अल्लाह तआला के लिए हो कोई दीगर चीज़ इस में मख़लूत न हो, न नफ़्स, न ख़ाहिशात और न दुनिया, हज़रत सहल क़ुद्दिस सरह की इस तफसीर को बुजुर्गों ने बहुत जामा करार दिया।
सय्यद अलताइफा हज़रत जुनेद बग़दादी क़ुद्दिस सरह फ़रमाते हैं : अलज़ख़लास तसफ़ीत उलअमल मिन अलकदौरात’’ गंदगियों से अमल को साफ रखना इख़लास है।
बाज़ बुजुर्गों ने फ़रमाया:तसफ़ीत उलअमल मिन उलाजब’’ अजब से अमल को पाक व साफ रखना इख़लास है। (अपने आमाल पर इलतिफ़ात और नज़र का नाम अजब है)
नीज़ फ़रमाया गया कि दवाम मुराक़बा और सारे हज़ूज़ को भला देने का नाम इख़लास है।