अध्याय 3 में से 8पृष्ठ 26–38
अहले सुलूक के मुख़तलिफ़ तरीके
तकमील के बाद बुजुर्गों ने मुख़तलिफ़ तरीके इख्तियार किए बाज़ ने ख़ुद को मख़लूक़ की तालीम व तरबीयत और इसलाह व इरशाद के लिए लोगों के बेच रखा, उन के ज़ाहिर को शरीअत से और बातिन को तरीक़त व हक़ीक़त से आरास्ता किया, उन के बड़े फ़ज़ाइल हैं, बुजुर्गों ने फ़रमाया कि ऐसे शख्स को
मलकूत समावात में अज़ीम कह कर पुकारा जाता है इस की मिसाल सूरज की तरह है जो ख़ुद भी रोशन है और दूसरों को भी रोशन करता है या मुश्क की तरह है जो ख़ुद पाकीज़ा है और दूसरों को खुशबू दार करता है।
बाज़ का तरीका इबादात नाफ़िला में कसरत जैसे नमाज़, रोजा, तिलावत कुरआन, यह हज़रात औराद व वज़ाइफ़ और तस्बीहात में ख़ुसूसीयत से इश्तग़ाल रखते थे। यह उन के दर्जात से शुमार होता है जिन्हों ने इबादत अलहाई के लिए ख़ुद को फ़ारिग़ कर लिया और यह भी सालहीन के तरीकों से है। बाज़ सूफ़िया ने फ़िक़हा व सूफ़िया और अहले दीन की ख़िदमत को इख्तियार किया। इस को अफ़ज़ल नवा फ़िल से शुमार्किया गया क्यों कि यह इबादत भी है और इआनत मुसलमीन भी जैसा कि हज़रत ग़ौस आज़म क़ुद्दिस सरह से नकल किया गया है कि ‘‘में शब् बेदारी और दिन के रोज़ों के ज़रिया अल्लाह तआला तक नहीं पहुँचा बल्कि इस तक पहुँचा हूँ कर्म, तवाज़ा और सलामत सदर के साथ’’ बाज़ बुजुर्गों ने यह तरीका इख्तियार किया कि लकड़ियाँ पीठ पर उठा कर लाते, बाजार में बेचते और सदक़ा देते यह भी इबादत नाफ़िला से है इस के ज़रिया अहले ईमान की दुआओं की बरकात नसीब होती हैं।
अक्सर नक़्शबंदी बुजुर्गों ने इत्तिबा सुन्नत के साथ साथ तालीम व तदरीस को ख़ुसूसीयत से इख्तियार फ़रमाया और सीने के सलामती यानी क़ल्ब को मासवाए हक़ की मुहब्बत से पाक करने की आगाज़ ही से कोशिश फ़रमाई, इस के साथ साथ अशग़ाल तरीका को लाज़िम रखा और मुरीदों से कसरत इबादात तलब करने के बजाए अपनी तवज्ज्हात आलीया से मनाज़िल तै किराये और इत्तिबा सुन्नत पर जोर दिया गोया मुरीद पहले इस शैख़ को इख्तियार करे जो मुतबा सुन्नत हो और यह मुरीद इस शैख़ की कामिल पैरवी कर ए इस तरह मुरीद में शैख़ की आदतें पैदा हूँ गी और यह चीज़ अफ़ाज़ा व इस्तिफ़ाज़ा का दरवाजा खोले गी और शैख़ में फिनाईयत यानी फना फ़ी उलशेख़ की मंज़िल के हुसूल पर फना फ़ी अलरसोल होने का दरवाजा खिल जाए गा क्यों कि शैख़ मुतबा रसूल है इस तरह ‘‘तख़ल्लुक़ बाख़लाक़ अल्लाह’’ की दौलत बे बहा हाथ आजाए गी और अख़लाक़ नबवी अख़लाक़ अलहाई के ताबे हैं तो मुरीद का मिल को रफ़्ता रफ़्ता‘‘तख़ल्लुक़ बाख़लाक़ अलरसोल’’ की दौलत
बे बहा नसीब हो जाए गी जो कि मक़ासिद सुलूक से अहम मक़सद है, अब्दी व सर मदी ज़िन्दगी की तामीर व तरक्की यही है और इसी पर अब्दा ला बाद तक रहमतें मुरत्तिब होती रहीं गी।
अब हम सुलूक में मज़ेदतरक़ी व इस्तिहकाम के लिए बुजुर्गों के वसाया तसा यानी नो वसीयतें पेश कर रहे हैं जो हर तालिब ख़ुदा के लिए ज़रूरी हैं, अज़ाब अलहाई से बचने के लिए उन को अमल में लाना अज़ हद ज़रूरी है और कोई शैख़ उन पर अमल किए बग़ैर कामिल व मुरब्बी नहीं होसकता है।
वसाया तसा:
आम बुजुर्गों ने तरीक़ ओलिया पर चलने और दर्जा विलायत तक पहुँचने के लिए नो उमूर की वसीयत फ़रमाई है जो यह हैं: (1) तौबा (2) क़नाअत (3) ज़हद (4) ताल्लुम इल्म शरई (5) मुहाफ़िज़त संन (6) तोकल (7) इख़लास (8) अजिलित (9) हिफ़्ज़ अलावकात।
1। तौबा: मुक़ामात सुलूक में सब से पहला मक़ाम तौबा है।
किफाय अलातक़िया में अल्लामा सय्यद बकरी मक्की क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि तौबा सब से पहली वसीयत और क़वाइद दीन में सब से अहम और मनाज़िल सालकेन की पहली मंज़िल और मक़ाम तालिबान ख़ुदा में पहला मक़ाम है तौबा के मानी दर असल रुजू करने के हैं जो चीजें अज़ रवे शरा मज़मूम व नापसंदीदा हैं उन से महमूद व पसंदीदा की तरफ़ रुजू करने और लौटने का नाम तौबा है कुरआन व सुन्नत में तौबा के बे हद फ़ज़ाइल बयान फ़रमा ए गए हैं जो कुतुब अहादीस व कुतुब सूफ़िया मसला अहया उलउलूम व गैरह में बालतफ़सील मज़कूर हैं यह फ़क़ीर मुजद्दिदी भी क़दरे किताब ‘‘तसव्वुफ़ और इस के फ़वाइद’’ में बयान कर चुका है लिहाज़ा वहाँ देखें। यहाँ चंद उमूर जेहन में रखें।
तौबा के शराइत यह हैं:
(अल्फ़) जो गुनाह और मासियत कर चुका है इस पर नादिम हो, नदामत इस वक़्त सही हो गी जब कि रक्त क़ल्ब हो और किए हुए पर पशेमा M हो; लिहाज़ा नदामत सब से बड़ी शर्त है इसी लिए हदीस
में फ़रमाया गया ‘‘अलंदम तौबत’’ जैसे हज के ताल्लुक से फ़रमाया गया ‘‘उलहज्ज उर्फ’’
(ब) दूसरी शर्त यह है कि इस गुनाह को आइंदा न करने का पुख्ता इरादा हो और तीसरी शर्त यह है कि पूरे तौर पर गुनाहों से ख़ुद को दौर करे और अहले हुक़ूक़ के हुक़ूक़ से खुलासी हासिल करे हदीस शरीफ़ में है: जो गुनाहों से तौबा कर ले तो गोया वह ऐसा है जिस ने गुनाह किया ही नहीं और जो गुनाह से इस्तिग़फ़ार करे जब कि वह गुनाह पर क़ायम है तो वह इस शख्स की तरह है जो अपने रब से इस्तिहज़ा करता है’’
नीज़ हदीस शरीफ़ में है कि बंदा जब तौबा कर लेता है तो अल्लाह मुहाफ़िज़ फरिश्तों को इस के गुनाह भला देता है और इस के ज्वारह को भी भला देता है और जमीन की उन जगहों को भी जहां इस ने गुनाह किए हती कि वह अपने रब जिला व अला से इस हाल में मिले गा कि इस पर गुनाह का कोई गवाह न होगा।
2। अगर किसी पर माल या इज्जत व आबरू वगैरह के ताल्लुक से जुल्म किया हो तो इस से बरात हासिल कर ले या अर्बाब हुक़ूक़ के हुक़ूक़ मालय हूँ तो वापस करे या फिर माफी मांग कर छुटकारा हासिल करे इस में काफ़ी तफ़सील है।
मुहासिबा:
तौबा पर दवाम और हमेशज्ञ हासिल करने के लिए ज़रूरी है कि गुनाहों और शरीअत की मुखालफत से बचे और अपने नफ़्स से मुहासिबा करे, इंसान को चाहिए कि पहले अपनी ज़ात का मुहासिबा करे और गौर करे कि रात और दिन में जो इस से अफ़आल व अक़्वाल और हरकात व सकनात सरज़द हुई हैं और जो साँसें बुर आमद हुई हैं वह किस क़द्र शरीअत व सुन्नत के माफ़िक़ हैं और कितनी मुख़ालिफ़ हैं कितनी साँसें याद अलहाई और ज़िक्र अल्लाह के साथ आएं और गईं और कितनी गफलत में? जो अफ़आल व अक़्वाल नेक
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।1 इब्न माजा,किताब अलज़हद,बाब ज़िक्रालतूबा,रकम:4252
।2 अलफ़र्दूस ललदेलमी,ज:2स:148 रकम:2755
।3 अलफ़र्दूस ललदेलमी,ज:2स:77 रकम:2432
हुए उन पर शकर अलहाई बजा लाये और जो खिलाफ़ शरा हुए उन से तौबा करे और अज़म कर ए कि आइंदा गफलत नहीं बर्तों गा इसी तरह अहद करे कि कोई सांस बग़ैर ज़िक्र के नहीं लूँ गा। हज़रत अमीर उलमोमिनीन सय्यदना फ़ारूक़ आज़म रज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाते हैं:
‘‘हासबवा इन्फ्सिकम क़ब्ल उन्न तहासबवा व ताहबुआ ललअरज़ अलाकबर अली अल्लाह’’ अपना मुहासिबा करू इस से क़ब्ल कि तुम से हिसाब लिया जाए और अल्लाह तआला के सामने बड़ी पेशी के लिए तैयार हो जाओ, इरशाद बारी ताली है:
یَوْمَئِذٍ تُعْرَضُوۡنَ لَا تَخْفٰی مِنۡکُمْ خَافِیَۃٌ
इस दिन तुम सब पेश हो गेकि तुम में कोई चहपने वाली जान च्हप न सके गी।
बुजुर्गों ने फ़रमाया कि हमें चाहिए कि दुआ और इस्तिग़फ़ार कसरत से किया करें और यह दुआमांगा करें:
رَبَّنَاۤ اٰتِنَا فِی الدُّنْیَا حَسَنَۃً وَّ فِی الۡاٰخِرَۃِ حَسَنَۃً وَّ قِنَا عَذَابَ النَّارِ
तर्जुमा: ए हमारे रब! हमें दुनिया में भलाई दे और हमें आख़िरत में भलाई दे और हमें अज़ाब दोज़ख से बचा।
हदीस शरीफ़ में उसे इस्तिग़फ़ार से शुमार किया गया इस के साथ साथ दर्द अंगेज़ अशआर अरबी, फ़ारसी और उर्दू में मुनाजात के पढ़े इस से क़ल्ब में रक्त पैदा होती है और यह मुहब्बत , उलफ़त और ख़ौफ़ व ख़शीयत का सबब बनते हैं ख़ास कर तहजद के वक़्त कलबी कैफियात हासिल करने का बड़ा ज़रिया हैं। मालूम रहे कि इंसानी कमज़ोरियों से है कि वह हमेशा तौबा पर क़ायम नहीं रह पाता, बाद तौबा भी ग़लबा नफ़्स की वजह से फिर इस जुर्म का इर्तिकाब कर बैठता है लिहाज़ा उसे चाहिए कि जब गुनाह हो जाए तोमज़कूरा बाला तरीक़ पर तौबा करे इस का फायदा यह होगा कि इसरार करने वालों से नहीं रहे गा।
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।1 सूरत उलहाक़: 69/18
।2 सूरत अलबकर: 2/201
इसरार अली उलमासीत बहुत ख़ौफ़ की चीज़ है हदीस शरीफ़ में है‘‘ जिस ने इस्तिग़फ़ार किया इस ने इसरार नहीं किया यानी गुनाह पर क़ायम नहीं रहा अगरचे सत्र बार टूटे।’’
आज़ाए सबा की हिफाज़त:
तौबा पर दवाम और हमेशज्ञ हासिल करने के लिए ज़रूरी है कि आज़ाएसबा यानी सात आज़ा जिन से अक्सर गुनाह सर ज़िद होते हैं उन की हिफाज़त करे वह यह हैं:
1। आंख की हिफाज़त यह है कि मुस्लिम को हिकारत की नज़र से न देखे और मुसलमानों के उयूब देखने से ख़ुद को बचाए, किसी तस्वीर पर या सूरत की तरफ़ शहवत से न देखे, न किसी अजनबी अव्रत की तरफ़ न किसी अजनबी और गैर के आज़ा अव्रत की तरफ़ नज़र करे अगर इत्तफाक़ से पड़ जाए फ़ौरन निगाह फेर ले। अहया उलउलूम में है कि बरोज़ कयामत फिजूल नज़र के बारे में सवाल होगा जैसा कि फिजूल कलाम के बारे में।
2। दूसरा उज़ू ज़बान है, ज़बान की हिफाज़त यह है कि उसे झूट, ग़ीबत, चुगली, वादा ख़िलाफ़ी, मजादला, गाली गलौज, अपनी मदह, लानत, बद दुआ, इस्तिहज़ा व मजाक वगैरह से बचाया जाए, ज़बान की आफतीं अनगिनत हैं, आज जो जिस के बारे में चाहता है कह बैठता है उमूमन एजाए क़ल्ब मोमिन में ज़िबा नें खुलती रहती हैं, लायानी, लगू और फ़ुहश बातें होती रहती हैं, हदीस शरीफ़ में है कि लोग अपनी ज़बानों की बातों की वजह से जहनम में दाखिल हूँ गे।
3। तीसरा उज़ू कान है इस की हिफाज़त यह है कि उसे बुरी और मज़कूरा बाला बातों के सुनने से बचाया जाए।
4। चौथा उज़ूनाक है, इस की हिफाज़त यह है कि अजनबी अव्रत की बो सूँघने से बचाए।
5। पाँचवां उज़ू शिकम है, इस की हिफाज़त यह है कि मुहरमात व शुबहात और उन ख़ाहिशात से बचाया जाए जो मुनासिब नहीं, पेट की हिफाज़त आज बहुत अहम मसला बिन गयाहै इस पर काबू बहुत
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। बुखारी व मुस्लिम व गैरह
मुश्किल है रूहानियत के ज़वाल का बड़ा सबब शिकम परवरी और हलाल व हराम की प्रवाह न करना है।
6। छटा उज़ू शर्मगाह है इस की हिफाज़त हर हराम से उसे बचाना और ज़िना कारी और लवातत से दौर रहना है।
7। सातवां उज़ू हाथ है इस की हिफाज़त यह है कि किसी बे गुनाह पर न उठाया जाए, न इस से किसी माल हराम को पकड़ा जाए, न मख़लूक़ से किसी को इस के ज़रिया ईज़ा दी जाए, न खयानत की जाए और न इस के ज़रिया वह चीजें लिखी जाएँ जिन के साथ गुफ़्तगू जायज़ नहीं।
8। बाज़ बुजुर्गों ने दीगर आज़ा भी शुमार फ़रमाए जैसे कि पीर कि हराम की तरफ़ चलने से उसे बचाया जाए, किसी ज़ालिम हाकिम, बादशाह या वजीर के दरवाजा प्रास के जुल्म पर राजी रहते हुए उन से चल कर न जाया जाए हां ! उसे जुल्म से बाज़ रखने और नसीहत वगैरह के लिए जाए तो कोई हर्ज नहीं।
बुजुर्गों ने फ़रमाया :ऐसे ज़ालिमों के पास बुला ज़रूरत जाना गुनाह है।
9। नवाँ क़ल्ब यानी दिल है, हसद, कीना, बुग़ज़, रिया, अजब, हुब्ब जाह व माल, हुब्ब मदह वगैरह से क़ल्ब को बचाना यही इस की हिफाज़त है, मालूम रहे कि क़ल्ब के अमराज़ भी बहुत से हैं जिन को अहया उलउलूम वगैरह में काफ़ी तफ़सील से बयान करदिया गया है। क़ल्ब की हिफाज़त भी आज नापैद है अक्सर लोग जिन के हाथ में दीन का लगाम है वह इस का ख़ुद शिकार हैं दूसरों को किया बचा सकें गे? सूफ़िया की इस्तिलाह में इस कोतसफ़िया क़ल्ब कहते हैं जो हजारों मेहनतों और मुजाहिदों के बाद हासिल होता है।
फायदा:
इंसान को जब मक़ाम तौबा में रसूख हासिल हो जाए और इस्तिक़ामत पैदा हो जाए तो बुजुर्गों ने फ़रमाया कि उसे मुजाहिदा और अपने आज़ा को ताआत में इस्तेमाल करना लाज़िम है, बंदा जब मुजाहिदा में दवाम हासिल कर लेता है तो हरकात ज़ाहिरा व हरकात बातिना पैदा होती हैं ज़ाहिर की हरकात बातिन की
हरकात का सबब होती हैं। हज़रत अबू उसमान मग़रिबी क़ुद्दिस सरह फ़रमाते हैं कि जिस ने बग़ैर मुजाहिदा के यह ख़याल किया कि इस पर इस तरीक़त की कोई चीज़ मफ़तूह होगी या खुले गी वह गलती पर है।
हज़रत सुलतान उलारफ़ैन बा यज़ीद बस्तामी क़ुद्दिस सरह फ़रमाते हैं कि में ने बारह साल तक नफ़्स के खिलाफ़ मुजाहिदा किया औरपचास साल तक में नफ़्स का आईना रहा और एक साल में ने उन के दरमियान गौर किया तो में ने अपने अंदर ज़िना रेखा, पस ज़िना रुको तोड़ने के लिए में ने पांच साल गौर किया कि में किस तरह तोड़ों तो मुझे मक्षुफ़ हुआ , में ने मख़लूक़ को देखा तो सब को मुर्दा पाया में ने इस पर चार तकबीरें कह दें।
बुजुर्गों ने हज़रत बस्तामी क़ुद्दिस सरह के कौल के यह मानी बयान किए कि हज़रत शैख़ बस्तामी क़ुद्दिस सरह मुजाहिदा नफ़्स और इस की ख़बास्तों अजब, कब्बर, हिर्स, कीना, हसद वगैरह के अज़ाले की मंज़िल में थे उन्हों ने इस के लिए अमल किया बायं तौर कि ख़ुद को तख़वीफ़ की भट्टी में डाल दिया फिर इस को अमरो नही के हथौड़े से कोटा यहाँ तक कि इस को मशक्कत में डाल दिया इस वक़्त वह समझे कि हम ने नफ़्स को साफ सुथरा कर लिया फिर क़ल्ब को इख़लास के आईने में देखा तो इस में शिर्क ख़फ़ी, रिया कारी ,अपने आमाल पर नज़र, सवाब व उक़ाब की याद और करामात व मुवाहिब का शौक बाक़ी नज़र आये इसी को ज़िना र से ताबीर फ़रमाया और इस को तो ड़ने के अमल से मुराद इलायक व मवाने से नफ़्स को जुदा कर लेना, ख़ल्क़ से निगाह फेर कर हती ٰکہ वह इस मंज़िल पर पहुँच गए कि नफ़्स जो ज़िंदा था उसे मुर्दा करदिया और जो क़ल्ब में मुर्दा था उसे ज़िंदा करदिया यहाँ तक कि शहूद क़दम में वह साबित क़दम हो गए और सब को बमंज़िल अदम में ले आये इस वक़्त ख़ल्क़ पर तकबीर कह दी और हक़ की तरफ़ पलट गए और यह जो उन्हों ने फ़रमाया कि मख़लूक़ पर चार तकबीरें कह दें क्यों कि मीत पर चार तकबीरें कही जाती हैं नीज़ हक़ से ख़ल्क़ का हिजाब चार चीजें हैं (1) नफ़्स (2) हवा (ख्वाहिश नफ़सानी) (3) शैतान (4) और दुनिया, बस अपने नफ़्स और इस की ख्वाहिश को तोड़ दिया और शैतान व दुनिया को छोड़ दिया।
दूसरी वसीयत क़नाअत है, थोडी अता पर राजी होना क़नाअत है, बंदे को क़नाअत मिल जाना परवरदिगार जल व अला की बड़ी रहमत व नेमत है दिल की बड़ी बीमारियों का इलाज क़नाअत है, हदीस शरीफ़ में है ‘‘उलक़ना कंज़िला यफ़नी’’ क़नाअत ख़त्म न होने वाला खजाना है ।जब यह मिल जाती है तो लोगों के माल व ज़र और जाह व हशम की तरफ़ नज़र नहीं जाती है न उन्हें देख कर वह बुराइयां दलों में जन्म लेती हैं जो आम तौर पर दुनिया वालों को देख कर पैदा होती हैं दूसरी हदीस में है ‘‘इज़ मिन कना व ज़िल मिन तमा’’ जिस ने क़नाअत की, इज्जत वाला हुआ और जिस ने तमा की वह ज़लील हुआ।
क़नाअत की बुनियाद दर असल ज़हद फ़ी अलदन्या पर है जब तक दुनिया से बे रग़बती और आराज़ नहीं होगास वक़्त तक क़नाअत की तवक़्क़े अबस है जब दुनिया की फना व नीस्ती और इस का ज़वाल जेहन व दिमाग में बस जाता है और इंसान को पूरे तौर पर एहसास होजाता है कि जो माल हमारे पास है वह या तो मुख़तलिफ़ चीजों में खर्च होजाए गा या किसी हादसा का शिकार हो जाए गा या फिर वारिस के हाथ लगे गा तो ऐसी सूरत में इस की रगबत बमुक़ाबला दुनिया आख़िरत की तरफ़ कवी तर होगी और इस की तलब ब निस्बत दुनिया आख़िरत से ज़्यादा होगी। अगर आप चाहें कि दुनिया में रहते हुए दुनिया से बे रगबत हो जाएँ और आप का ज़हद ज़्यादा हो तो गौर करें कि दुनिया किस के पास है और किस हाथ में है बावजूदिके अगरचे बितरीक़ हलाल मिलती है तब भी इस का हिसाब देना होगा और हराम ज़राए से मिले गी तो उक़ाब और सज़ा है और जुआ से तलब करता है इस से फ़ौत होती है और इस से भागती है और जो इस की तरफ़ नज़र करता है उसे अंधा करती है और जो इस में गुना हासिल करता है वह फ़ित्ने में मुबतला होता है और जो इस का मुहताज होता है वह ग़मगीन होता है।
किफायआलातक़िया में हज़रत इमाम शाफ़ई रज़ि अल्लाह अन्हु के अरबी अशआर ज़िक्र फ़रमाए जिन का हासिल
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। बेहक़ी
यह हैकि ए तालिब आख़िरत ! तो उन चीजों के तर्क पर राजी हो जा जिन की ख्वाहिश तेरा नफ़्स करता है और जिन खानों , लिबासों और मकानात के ज़रिया फख्र करता है उन में से थोड़े पर राजी हो जा, खाने में थोडा वह है जो भूक को रोक दे और इतना लिबास जो आज़ाए अव्रत को छिपाले और इतनामकान जो सर्दी व गर्मी को दफा करदे।
हज़रत फ़ातिमा रज़ि अल्लाह अन्हा से हज़रत इंस रज़ि अल्लाह अन्हु रिवायत करते हैं कि वह अल्लाह के रसूल सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम के लिए रोटी का टुकड़ा ले कर आएं आप ﷺ ने फ़रमाया कि यह टुकड़ा किया है? हज़रत फ़ातिमा रज़ि अल्लाह अन्हु ने कहा कि रोटी का टुकड़ा है जो में ने आप के लिए पकाया है यह मुझे अच्छा नहीं लगा कि में खाओं और आप को न खिलाओं , आप ﷺ ने फ़रमाया :यह पहला खाना है जो तीन दिन बाद तुम्हारे बाप के मुँह में दाखिल हुआ है
ए तालिब आख़िरत! अल्लाह तुझ पर रहम करे इस सय्यदा शरीफा को देख कि थोडी रोटी पर राजी हो गईं और इस नबी क्रीम ﷺ को देख कि तीन दिन से कुछ खाना नहीं चखा।
हज़रत सहल बिन अब्द अल्लाह रज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाते हैं कि सारी भलाई चार ख़सलतों में है जिन की वजह से अबदाल अबदाल हो गए:
(1) पीटों को भूका रखना (2) खामोशी (3) ख़लवत और (4)रात में जागना।
हदीस शरीफ़ में है ‘‘तूबी लिमन हदी ललिस्लाम विकान रिज़्क़ा क़फ़्फ़ाफ़्न वर्ज़ी ब’’
इस के लिए खुश खबरी है जिसे इस्लाम की रहनुमाई हुई और इस का रिज़्क़ बक़दर किफायत रहा और वह
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। 1किफायआलातक़िया,स:19 उलमाहद उलइस्लामी
।2 उलमाजम अलकबीर ललतब्रानी,बाब अलालफ़ रकम:750
।3 किफायआलातक़िया,स:19, उलमाहद उलइस्लामी
। 4किफायआलातक़िया,स:19
। 5अलफ़र्दूस ज:2स:447 रकम3929
इस से खुश रहा। नीज़ हदीस शरीफ़ में है ‘‘ग़ुन अल्लाह क़ज़ा अहब अबदा जाल रिज़्क़ा क़फ़्फ़ाफ़ा’’ जब अल्लाह तआला किसी बंदे से मुहब्बत करता है तो इस की रोज़ी बक़दर किफायत करता है यानी जो इस के अख़राजात के लिए काफ़ी होती है न ज़्यादा देता है कि वह सुरक्षी करे और न कम कि उसे तकलीफ़ हो।
यह भी नकल किया गया है कि सरकार मदीना ﷺ ने फ़रमाया कि बरोज़ कयामत मेरी उम्मत के कुछ अफराद के लिए अल्लाह तआला पर पैदा करे गा वह अपनी कब्रों से जन्नतों की तरफ़ उड़ कर जाएँ गे इस में जहां चाहें गे आएं जाएँ गे जिस तरह चाहें गे नेअमतों को इस्तेमाल करें गे उन से फरिश्ते कहीं गे: किया तुम ने हिसाब देखा? कहीं गे: नहीं, फरिश्ते कहीं गे: किया तुम ने पल स्रात को तै किया? वह कहीं गे: हम ने पल स्रात को न देखा, फरिश्ते कहीं गे: किया तुम ने जहनम को देखा है? कहीं गे हम ने कुछ नहीं देखा है, फरिश्ते कहीं गे: तुम किस की उम्मत हो? वह कहीं गे मुहम्मद ﷺ की ,फरिश्ते कहीं गे: तुम्हें अल्लाह तआला का वास्ता हमें बताओ कि तुम दुनिया में किया आमाल करते थे? वह कहीं गे: हम में दो ख़सलतीं थीं कि रहमत अलहाई के फजल से इस मंज़िल पर पहुँच गए, फरिश्ते पूछें गे वह किया थीं? तो वह कहीं गे (1) जब हम तन्हाई में होते थे तो हमें अल्लाह तआला की ना फरमानी करने से श्रम आती थी और हम (2) थोड़े पर राजी हो जाते थे जो हमारी किस्मत में होता फरिश्ते कहीं गे कि तुम इस (बुलंद) मंज़िल के हक़दार हो।
तंबीया:
क़नाअत अल्लाह तआला की बड़ी नेमत है और बुजुर्गों की सिफ़त है जिस को यह नेमत नसीब होती है इस का क़ल्ब बे नयाज़ हो जाता है, सुकून में रहता है, परागंदगी और तफ़र्क व इंतिशार से महफूज़ रहता है वह क़ल्ब की बीमारियों से भी अमान में रहता है , इस की ज़िन्दगी चेन से गुजरती है बारगाह
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। अहया उलउलूम ज5स:2366
। तख़रीज अहादीस अहया उलउलूम ज:5,स:3566
अलहाई की तरफ़ तवज्जो बड़ी आसानी से होजा ती है और ऐसी हालत में बंदा बारगाह क़ुद्दिस से खूब खूब फ़ैज़ हासिल करता है, ऐसे बंदे यकसूई के मालिक होते हैं और अगर मुर्शद कामिल हाथ आजाए तो बड़ी मंजिलों पर फ़ाइज़ होते हैं आज क़नाअत से महरूमी ने इंसान को बे चेन करदिया है तमाम नेअमतें हो कर भी उसे चेन नहीं है।
अच्छा खा कर, अच्छा पहन कर और अच्छे मकानों में रह कर भी वह सुकून की दौलत से महरूम है हिर्स व तमा उसे हर वक़्त दुनिया की तरफ़ मुतवज्जा रखती है चाहत है तो माल व ज़र की, इज्जत की, अगर नमाज़ भी पढ़ता है तो भी ख़ुदा व रसूल ﷺ की मुहब्बत में नहीं बल्कि ख़ौफ़ की वजह से और कभी माल की चाहत में, इस की चाहतों की फिहरिस्त इतनी लंबी है कि मुरत्तिब नहीं की जासकती है वह इस की वजह से दाइमी फ़लाह व कामरानी और अब्दी नेअमतों और सरमदी जलवों से महरूम हो गया, अलम व तकलीफ़ में जीता है और इसी में मरता है यह फिराक दुनिया उसे कब्र में भी बे चेन रखता है इस कोताही का एहसास उसे आख़िरत में भर पुर होगा, आज ज़रूरत है कि लोगों को क़नाअत की तरग़ीब दी जाए, क़नाअत पैदा हो जाए तो हजार ग़मों से निजात मिल जाए।
माला यानी और मा यानी:
माला यानी में वह तमाम उमूर दाखिल हैं जिन की हाजित न हो उन की मुख़तलिफ़ अन्वा व इक़साम हैं मसलन खेल कूद, हँसी और हर वह अम्र जो मुर्व्वत में मुख़ल हो नीज़ दुनिया में तोसे मनासिब और रियासत की तलब, तारीफ़ व मदह की तलब वगैरह वह उमूर जिन से कोई उखरवी फायदा हासिल नहीं और कीमती वक़्त की इज़ाअत हो जिस का कोई इव्ज़ नहीं।
बाज़ उलमा फ़रमाते हैं कि ‘मा यानीय’ से मुराद वह है जिस से कोई दीनी मनफ़ात हासिल होया ऐसा दुनयवी नफा जो आख़िरत तक पहुँचाए और माला यानीय इस के बुर अक्स को कहते हैं। हज़रत अली रज़ि अल्लाह तआला अन्हु ने फ़रमाया: ‘‘मिन तलब माला यानीय फ़ाता मा यानीय’’
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। किफायआलातक़िया,स: 20 उलमाहद उलइस्लामी
जिस ने ला यानी को तलब किया इस से मा यानी फ़ौत हो गया, ला यानी की तलब भी क़नाअत के खिलाफ़ है तालिब आख़िरत कभी भी ला यानी उमूर में मशगूल नहीं होता अल्लाह तआला ने जिन्हें अक्ल व शऊर की नेमत से नवाजा है वह हमेशा ख़ुदा को और इस के महबूब ﷺ को तलब करते हैं वह सिर्फ़ इसी की तरफ़ तवज्जो करते हैं जो उन्हें ख़ुदा जल व अला के क़रीब लाये।
3।ज़हद:
बुजुर्गों ने जिन निवामुर्की वसीयत की है उन में से एक ज़हद है लुग़त में अदम रगबत का नाम ज़हद है शरीअत में ज़हद से किया मुराद होता है इस में उलमा का इख़तिलाफ़ है शैख़ मुहम्मद नववी अलैहि अर्रहमा ने ‘सलालम अलफ़ज़ला ’ में फ़रमाया कि राजह यह है कि सारी दुनिया को हक़ीर समझना ज़हद है जिस के नज़दीक दुनिया हक़ीर व सग़ीर होगी दुनिया इसी पर हल्की होगी वह दुनिया की किसी चीज़ के हुसूल पर खुश न होगा और न इस के फ़ौत से ग़मगीन और रंजीदा होगा और दुनिया से इतना ही अवरोही ले गा जो ताअत अलहाई में मददगार और मुआविन होगा इस के बावजूद वह हमेशा जाकिर व शाग़ुल रहे गा और अल्लाह इज़ व जल के ज़िक्र और याद से कभी गाफिल न होगा ऐसा शख्स जिसम के साथ दुनिया में और अक्ल व रूह के साथ आख़िरत में रहता है।