अध्याय 2 में से 3पृष्ठ 19–33
‘‘मुताला तसव्वुफ़’’ से चंद इक़तिबासात
1।तमहीदी गुफ़्तगू में लिखते हैं ‘‘अस्नए तहरीर मुसन्निफ़ को यह एहसास बराबर दामन गीर रहा है कि किताब के फ़हम से क़ारी के जेहन पा ऐसा मनफ़ी तास्सुर क़ायम होने का एहतिमाल है जिस के जीर असर वह कहीं तसव्वुफ़ को यकसर मुस्तर्द करके उन जवाहर रेज़ों से हाथ न धो बैठे जो तसव्वुफ़ के दफ्तरों में पिनहां हैं।’’
2।तसव्वुफ़ इस्लाम के जमाली पहलू का तर्जुमान है और इस के ज़रिया बाज़ औकात इस्लाम की शान जमाल का भर पुर ज़ुहूर हुआ है ,इस का ताबनाक और रोशन हिस्सा वह है जो कुरआन व सुन्नत से माख़ूज़ या हम आहंग है, अल्लाह तआला ने कुरआन में सालहीन, कान्तीन, मुख़लिसीन, मुहसिनैन, आबिदीन, ख़ाशईन, मत्विकलीन, साबरीन, ओलिया, अबराबर वगैरह नामों से अपने नेक औरसालेह बंदों का ज़िक्र किया है। सिदक़, इख़लास, एहसान, इबादत, ख़ुशू, ख़ुज़ू, फक्र, तोकल, सब्र, शकर चों कि सूफ़िया की सिफ़ात हैं इस लिए यह कहना दुरुस्त है कि सूफ़िया माअनवी तौर पर उन में शामिल हैं इसी तरह कुरआन में तौबा ,अनाबत, इख़लास, सब्र शकर, रज़ा, तोकल,क़ुर्ब, ख़ौफ़, रजा, मुशाहिदा, यकीन वगैरह की तारीफ़ आई है।
यही चीजें तसव्वुफ़ में अहवाल या मुक़ामात कहलाती हैं अलावा अज़ीं कुरआन में
दुनयवी ज़िन्दगी को लहू व लइब और धोके की पूँजी कहा गया है। यह चीज़ तसव्वुफ़ की असास है और कुरआन हकीम में अख़लाक़ हसना पर ख़ास जोर दिया गया है और यह सब को मालूम है कि तसव्वुफ़ हसन अख़लाक़ का दूसरा नाम है। अहादीस रसूल ﷺ में भी सिद्दीक़ीन, सालहीन और दूसरे नामों से मर्दान ख़ुदा की तारीफ़ की गई है। इस के अलावा इर्शादात नबवी में सिदक़, इख़लास, फक्र, तोकल और सब्र जैसे कलबी और रूहानी आमाल की ताकीद आई है नीज़ सुन्नत रसूल अल्ला ﷺ में अख़लाक़ आलीया को मुमताज़ मक़ाम हासिल रहा है, ख़ुद रसूल अल्ला ﷺ की हयात मुबारका जिस तरह तमाम मुसलमानों के लिए उस्वा हसना है इसी तरह सूफ़िया के लिए भी सर चश्मे हिदायत और अम्र वाक़ा यह है कि अइम्मा तसव्वुफ़ ने अपने आमाल या अहवाल व मुक़ामात के लिए सुन्नत रसूल से दलीलें फ़राहम करने की कामयाब कोशिश की है।
2।इबादात में से ईमान, नमाज़, रोजा, ज़कात, हज और दूसरी इबादात के मुताल्लिक़ सूफ़िया का नुकता निगाह वही है जो उम्मत के स्वाद आज़म का है लेकिन सूफ़िया को दूसरे लोगों पर इस लिहाज से एक गुना बरतरी हासिल है कि उन्हों ने अरकान इस्लाम और अहकाम शरीअत के मुताल्लिक़ बाज़ ऐसे लतीफ़ इर्शादात और दकीक़ नकात बयान किए हैं जो निगाह ज़ाहिर बें की हदूद से बाहर हैं। अख़लाक़ व आदाब और अहवाल व मुक़ामात के बाब में सूफ़िया ने जो नुक्ता आफ़रीनी की है वह इस्लामी निजाम अख़लाक़ का उनमोल सरमाया है।
(3) अमराज़ क़ल्ब की निशान दही और उन के इलाज के लिए सूफ़िया ने जो नुस्खे तजवीज़ किए हैं उन से मालूम होता है कि अर्बाब बातिन कितनी बारीक बेनी से इंसान की बातिनी बीमारियों का सुराग लगाते थे और वह इंसानी नफ़सियात के कितने बड़े राज़दान थे।
4।इबादात और ज़िक्र व अज़कार पर मदावमत का अमल भी कुरआन व सुन्नत से माख़ूज़ है। खानक़ाही ज़िन्दगी के लिए अर्बाब सुलूक की खातिर जो दस आदाब मुक़रर किए गए हैं उन में
से हर अदब कुरआन की एक एक आयत से माख़ूज़ है और हर अदब के लिए कुरआन की मुताल्लिक़ा आयत भी नकल की गई है।
5।ख़ुर्द व नोश, रहन सहन और सफर व हज़र के सिलसिले में सूफ़िया के यहाँ ख़ास आदाब की पाबंदी की जाती है, उन के आदाब का बहुत बड़ा हिस्सा ब्राह रास्त कुरआन व सुन्नत से लिया गया है।
6।कुरआन और सूफ़िया के अनवान के तहत रकम तराज़ हैं: ‘‘दूसरे उलूम इस्लामीया की तरह तसव्वुफ़ में भी कुरआन को मर्जा अव्वल का मक़ाम हासिल है। तसव्वुफ़ की किताबों में हर बहस के शुरू में क़ुरआनी आयात से इस्तिदलाल किया गया है। मुताला तसव्वुफ़ के दौरान कुरआन से सूफ़िया का कसरत इस्तिदलाल क़ारी के दिल को मोह लेता है। सूफ़िया का तर्ज़ इस्तिदलाल इस फ़हम पर मबनी होता है जो तिलावत के दौरान अल्लाह तआला सोफी को अता करता है। चनां चह फ़हम कुरआन के बाब में सूफ़िया ने जो नुक्ता आफ़रीनी की है उन से तफसीर की ज़ख़ीम किताबें काली हैं। सूफ़िया के अख़ज़ करदा लताइफ़ का रोशन पहलू यह है कि उन से दिल व दिमाग मनोर होते हैं, फ़िक्र व नज़र को जिला मिलती है और ईमान व यकीन ताजे हो जाते हैं।
7।डाक्टर गुलाम कादर लोन ने मज़कूरा बाला इनावेन के अलावा कुरआन और मक़ाम रसूल, इस्तिक़ामत, बंदगी, सुन्नत रसूल, इबादात, नमाज़, ज़कात, हज के इनावेन क़ायम किए और हर अनवान के तहत सूफ़िया कराम अलैहिम इलरिज़्वान की मुमताज़ हैसियत बयान फ़रमाई। अख़ीर अनवान के तहत क़दरे तफ़सील से गुफ़्तगू करते हुए लिखते हैं ‘‘यही वह आला व अर्फ़ा तसोर इबादत है जिस ने हर दौर में लाखों बंदगान ख़ुदा को मुतास्सिर कर के उन की ऐसी काया पलट दी कि वह रूहानी मदारिज की बुलंदियों तक पहुँच गए और हक़ यह है कि सूफ़िया का यह तसोर इबादत क़ल्ब व नज़र के लिए ग़ज़ाए ख़ास है। नीज़ इसी अनवान के तहत रकम तराज़ हैं ‘‘अहले तसव्वुफ़ ने उन ही तालीमात की रोशनी में मख़लूक़ ख़ुदा पर शफकत, गरीबों और
बैकसों से हमदर्दी और शिकस्ता दलों की तसल्ली को अपना शआर ही नहीं जुज़ु ईमान बनाया। फिर बाज़ जुज़वी मिसालें देने के बादलिखते हैं ‘‘सूफ़िया की यह दर्दमंदी और हमदर्दी सिर्फ़ मादी दायरे तक महदूद नहीं थी, इस के पस पर्दा इशाअत इस्लाम और एक सालिह इंसानी मुआशरे के क़याम का बे पनाह जज्बा भी कार फ़रमा था। उन्हों ने दीन की तरवेज व इशाअत में जो कोशिशें कीं उन से सिर्फ़ नज़र करना तारीख के साथ नाइंसाफ़ी होगी।
आखिर में लिखते हैं ‘‘सूफ़िया ने अपने हसन अख़लाक़ से समाज के तमाम तबकों को मुतास्सिर किया है उन की खानक़ाहों के दरवाजे अमीर व गरीब सब के लिए खुले थे। उन्हों ने अर्बाब दौल को अदल व इंसाफ की तलक़ीन की और रिआया को हुक्मरानों के हुक़ूक़ की अदाइगी की तालीम दी। शिकस्ता दलों का और समाज के निचले तबकों को उन की मजलिसों में अपने दर्द का दरमाँ मिला तो अर्बाब इक़तिदार को आख़िरत की याद आई।
अहले तसव्वुफ़ ने आलमगीर उखुवत, मुसावात और भाई चारे का सबक दिया और इख़तिलाफ़ व तफ़रीक़ को हुआ देने के बजाए ख़ुलूस, दर्दमंदी, मुहब्बत और मोद्दत के चिराग रोशन किए। उन्हों ने अपने हसन अख़लाक़ और आला ज़र्फ़ी से बाज़ औकात ऐसे दलों क्विजन्दगी बख्शी जो इंसान दोस्ती से खाली हो कर वीरान हो चुके थे, उन्हों ने लक़ व दिक़ सहराओं, फलक बोस पहाड़ों, बे करां समंदरों और बंजर ज़मीनों को उबूर करके इशाअत दीन की वह ताबनाक रवायात क़ायम कीं जो हमारी मिली तारीख का एक रोशन और नाकाबिल फ़रामोश बाब बिन चुकी हैं।’’
सूफ़िया कराम रहिमहुम अल्लाह तआला के औसाफ़ व कमालात और अख़लाक़ व आदात मज़कूर अश्ख़ास की तहरीरो M से काफ़ी हद तक आप समझ गए हूँ गे कि यह औसाफ़ व अख़लाक़ व कमालात उन की प्राणवार ज़ातों में इस क़द्र नुमायाँ और वाज़िह थे कि जिस ने भी उन की
सीरतों का सरसरी मुताला भी किया है वह जान लेगा और कोई इंसाफ पसंद उन से इंकार नहीं कर सकता है। इनाद की बात जुदा है। हम निहायत इख़तिसार के साथ उन की चंद मज़ेद ख़िदमात व कमालात और औसाफ़ व अख़लाक़ सुपुर्द कलम करते हैं जो उन की हयात तैबा के ताबनाक नुक़ूश हैं।
1। दीन के तीन जुज़ हैं जिसे हदीस जिबरील में बयान फ़रमाया है; अल्फ़, ईमान। ब, इस्लाम यानी आमाल सालहा। ज, एहसान यानी इख़लास।
अक़ाइद:
सूफ़िया कराम की ज़िन्दगी पूरे तौर पर उन में ढली हुई मिले गी। अक़ाइद में वह हमेशा स्वाद आज़म अहले सुन्नत व जमात के पाबंद रहे और कभी सर मो तजावुज़ नहीं फ़रमाया। इस ताल्लुक से उन की कुतुब का मुताला यकीन तक पहुँचा देता है। अगर उन का कश्फ़ कभी इस के खिलाफ़ भी वाक़्य हुआ तो उन्हों ने इस का ऐतबार नहीं किया। चनां चह मुक़रबीन बारगाह इलाही ख़्वाह अंबिया अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात हूँ या ओलिया अलैहिम इलरिज़्वान, कुरआन व सुन्नत के दलायल की रोशनी में उलमा-ए अहले सुन्नत ने जिन के जो मुरातिब व मनाज़िल मुक़रर कियासी के पाबंद रहे। हज़रत अबू बुकर व उम्ररज़ि अल्लाह अन्हा की अफ़ज़लीयत पर उलमा का इजमा है। अगर किसी का कश्फ़ अस्नए सुलूक इस के खिलाफ़ वाक़्य हुआ तो इस का ऐतबार नहीं किया और शरीअत को ही मयार किया।
इसी तरह जमहूर अहले सुन्नत हज़रत उसमान को हज़रत अलीरज़ि अल्लाह अन्हा से अफ़ज़ल मानते रहे अगरचे यह तफ़ज़ील मदार संयत न रही। मुहक़्क़ीन सूफ़िया कराम रहिमहुम अल्लाह तआला भी इसी के कायल रहे, बाज़ अर्बाब कश्फ़ सूफ़िया व ओलिया पर हज़रत अली के कमालात का इन्किशाफ़ ज़्यादा हुआ, बाज़ पर इशतिबाह हुआ और वह तवक़्क़्फ़ के कायल हो गए, मगर मुहक़्क़ीन ने सय्यदना अलीरज़ि अल्लाह अन्हु की कसरत कमालात के इन्किशाफ़ और तशाबा की वजूहात को तफ़सील से बयान कर
दिया। इस ताल्लुक से हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तोबात क़ुदसी का मुताला इतमीनान की मंज़िल अता करता है। यहाँ यह भी ध्यान रहे कि बाज़ नाक़िदीन ने बाज़ अर्बाब विलायत के बाज़ उन मक्शफ़ात की बना पर जिन का ताल्लुक हज़रत सय्यदनाली मुर्तज़ा रज़ि अल्लाह अन्हु की ज़ात मुबारका से है माइल ब शीयेत या शीया होने का इल्जाम लगा दिया, यह सरासर गलत है। शीया अपने अक़ाइद व आमाल के ऐतबार से हक़ से कोसों दौर हैं और अक्सर मिसाइल एतिक़ादी व अमली में अहले सुन्नत के मुख़ालिफ़ हैं मज़कूरा अर्बाब विलायत जुमला उमूर में अहले सुन्नत की आरए साइबा के माफ़िक़ हैं ज़्यादा से ज़्यादा उन के इस तरह के मक्शफ़ात को ख़ताए कशफ़ी कहा जा सकता है, शीया या माइल ब शीयेत कहना सरासर बोहतान है।
अक़ाइद के ताल्लुक से जो चीज़ सूफ़िया कराम रहिमहुम अल्लाह तआला को आम अहले इल्म से मुमताज़ करती है वह है एमानी इस्तिहकाम ईमान के मामले में सूफ़िया कभी तज़बज़ब व तर्दद के शिकार नहीं हुए और आमाल सालहा की बरकात और कशफ़ी ताईदात की वजह से वह हमेशा अज़आन व ईक़ान और जमईयत व इतमीनान की शाहराह पर गामज़न रहे और वह कभी दूसरों की सोहबत से या तआरुज़ दलायल की आरा मुख़तलिफ़ा की वजह से तज़बज़ब का शिकार न हुए और न कभी उन्हों ने किसी भी लालच में ईमान वामाल का सौदा किया यह वह जौहर और कमाल है जो जिस क़द्र कसरत के साथ अहले इल्म के इस तबका को नसीब हुआ वह दूसरों को नसीब नहीं हुआ। चनां चह तारीख शाहिद है कि सूफ़िया बदमज़हबीयत से कोसों दौर है और उन में इर्तिदाद और ज़लालत कभी राह न पा सकी जब कि उलूम ज़ाहिरा के हामिलियन में इस तरह की बहुत मिसालें हैं जब से उम्मत में नज़रियाती इख़तिलाफ़ शुरू हुआ इस वक़्त से आज तक उम्मत में उन गणित फ़िरकेवजूद में आये और अहले सुन्नत के मुख़ालिफ़ रहे किसी की बदकीदगी ज़लालत और किसी की हद कुफ्र तक पहुँच गई और अक़ाइद व आमाल में इस क़द्र इख़तिलाफ़ हुआ कि जिस की फिहरिस्त निहायत तवील है इस के बरख़िलाफ़ सूफ़िया में इख़तिलाफ़ निहायत कम है और जो कुछ है वह कशफ़ी इशतिबाहात की बुनियाद पर है और इस के बावजूद अक़ाइद में हमेशा स्वाद आज़म के ताबे रहे और ताजब है
कि हर फ़िरक़े के बानी बड़े बड़े अहले इल्म रहे।
आमाल:
खैर उलक़ुरून के बाद आमाल सालहा में भी आम तौर पर सूफ़िया दीगर अहले इल्म से कुछ वजूह से मुमताज़ रहे।
1।इस ताल्लुक से सूफ़िया कराम की एक बड़ी खूबी यह रही जिसे नाक़िदीन ने भी तसलीम किया है, वह यह कि उन के कौल व अमल में तज़ाद नहीं रहा जो कहा पहले ख़ुद इस पर अमल किया और इस के बावजूद वह मुनाफ़क़त से डरते थे। यह उन की ज़िन्दगी का नुमायाँ और वाज़िह वस्फ़ है। अगर हुब्ब दुनिया, हुब्ब जाह, हुब्ब मदह, हुब्ब मन्सब की मुज़म्मतें बयान फरमाएं तो सब से पहले उन तमाम मुहब्बतों से ख़ुद को पाक किया और गैर की मुहब्बत से कली तौर पर ख़ुद को पाक कर लिया, माल व औलाद और बीवियां वगैरह कोई भी कशिश उन को अपनी तरफ़ खींच न सकी और इसी वजह से वह उन तमाम गंदगियों से पाक रहे जो दुनिया व मा फ़ीहा की मुहब्बत से पैदा होती हैं जैसे हसद, बुग़ज़, कीना, हिर्स, तमा वगैरह औसाफ़ ज़मीमा व अख़लाक़ रज़ीला इसी तरह नफ़्स इमारा की तमाम शरारतों से बचने के लिए उन्हों ने निहायत कठिन और दुश्वार मुजाहिदात व रियाज़ात इख्तियार फ़रमाए और ख़ुद को मसाइब व आलाम की पर ख़तर वादियों में झोंक दिया, सारे एश व तनाम को तज दिया, नरम गरम बिस्तर और सामान एश व इशरत हजार रानाइयों के बावजूद उन्हें अपना असीर न बना सके और उन्हों ने अपने मूलए क्रीम रऊफ़ व रहीम इज़ व जल की मुहब्बत और रज़ा के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया और दुनिया की कोई ज़ेब व जीनत उन के दलों को दाम फरेब में फंसा न सकी। अहले ज़ाहिर और नाक़िदीन उन की सिर्फ़ इसी खूबी को गहराई से देखते और क़द्र करते तो उन पर नुक्ता चीनी के बजाए उन्हें आंखों में जगह देते।
सूफ़िया कराम ने अपने महबूब हक़ीक़ी की कमाल मुहब्बत में सब कुछ कुर्बान कर दिया इस
लिए न उन्हों ने कभी उमरा व सलातीन का तक़र्ब चाहा न कभी मनासिब की ख्वाहिश की, न सरकारी मुलाज़मतों को कबूल किया, न दुनिया की तहसील के लिए कोई हीला किया, न वह किसी के ताज महल से मरऊब हुए। तो अहले स्रोत की पर शिकवा इमारतें , मन्सब, इज़्ज़तें और आम ख़ल्क़ का रुजू उन्हें मुतास्सिर न कर सिक्का, न कभी किसी के खिलाफ़ बगावत और ख़ुरूज किया, न क़ज़ा व इफ़्ता के मनासिब के लिए कोई तग व दो की, न लोगों को अपनी तरफ़ माइल करने के लिए कोई हुनर सीखा, न लच्छे दार बे मानी तकरीरें कीं, न नारे लगवाए, न वाह वाही सूची, न मुरीदों की तलब की, न किसी पीर व आलम से दुखी हुए,न मुरीदों से कभी नज़रानों की ख्वाहिश की वगैरह वगैरह। इस के बरख़िलाफ़ अक्सर अहले इल्म ज़ाहिर और रूहानियत से खाली मशाइख़ की ज़िंदगियां जिन्हों ने पढ़ें या देखें हैं वह सब जानते हैं कि किया हो रहा है और आज तो पानी सर से ऊँचा हो गया है, अब तो हर ऐब व नुक़्स और हर फरेब ही शआर है बल्कि ज़िन्दगी इसी का नाम है।
इसी तरह तौबा व अनाबत, सब्र व शकर, ख़ौफ़ व रजा, क़नाअत व तोकल, तसलीम व रज़ा वगैरहा अहवाल व मुक़ामात और अख़लाक़ व आदात की उन्हों ने दूसरों को दावत दी तो पहले ख़ुद को अला वजह अलकमाल उन से मुत्तसिफ़ किया। चनां चह इस ताल्लुक से उन की हयात तैबा जो आला और उनमोल मिसालें मिलती हैं वह किसी में नहीं मिलती हैं।
2।आमाल के ताल्लुक से दूसरी चीज़ जो सूफ़िया को मुमताज़ करती है वह यह कि हर ज़िक्र व फ़िक्र और ताअत व इबादत वगैरह को कसरत से इख्तियार किया नवाफ़िल इबादात की जो कसरत, संन व मुस्तहबात की जो फ़रावानी उन के यहाँ है वह किसी के यहाँ नहीं। नमाज़, रोजा, ज़कात व हज, सदक़ात व खैरात किसी भी अमल सालिह को आप देखें गे उन्हें नुमायाँ पाएं गे। फर्ज़ नमाज़ तो बड़ी चीज़ है, नवाफ़िल इस कसरत से पढ़ें कि आम अहले इल्म ही जानते हैं कि इस मामले में कोई उन का सानी नहीं। अशराक़, चाश्त, तहजद, अवाबेन
फ़े ज़वाल संन गैर मउकदा, अस्र व इशा से क़ब्ल की संन, इसी तरह तकबीर औला और जमात की पाबंदी वगैरह जो उन के यहाँ है वह किसी के यहाँ नहीं।
3।उन की तीसरी इमतियाज़ी चीज़ यह है कि आमाल सालहा की बजाआवरी और ममनूआत व महज़ूरात से इजतिनाब में जो इस्तिक़ामत और दवाम उन में है उन की मिसालें आम अहले इल्म में नहीं हैं।
4।चौथी चीज़ जो गोया उन के ख़साइस से है वह यह है कि शब् बेदारी, आह व फ़ुग़ां, गर्ये व ज़ारी, तज़रा व तज़लल वगैरह कलबी कैफियात जिन को कुरआन व सुन्नत तलब करते हैं और जो इंद अल्लाह बड़ी अहमियत रखते हैं और जिन पर वह अज्र व सवाब मुरत्तिब होता है जिन का वहम व गुमान अंदाजा नहीं कर सकते हैं इस बुजुर्ग तबका का मशहूर वस्फ़ है। इश्क व मुहब्बत की जो इन्तहा कुरआन व सुन्नत तलब करते हैं इस को देखना है तो वह इसी तबके में कसरत से मिलेगा, इश्क व उलफ़त के आला नमूने उन्ही का हिस्सा हैं, फ़ैज़ान मुहब्बत से यह हज़रात जिस क़द्र मुस्तफ़ीज़ हुए इतना कोई मुस्तफ़ीज़ नहीं हुआ और इस के तक़ाज़े जितने उन्हों ने पूरे किए वह कोई दूसरा पूरा नहीं कर सिक्का।
5।पाँचवीं चीज़ जो निहायत आला भी हैऔर दुश्वार भी वह बुरे अख़लाक़ और गंदी आदात को अच्छे अख़लाक़ और पाक आदात में तब्दील करना और ख़ुद को अख़लाक़ हसना व सिफ़ात हमीदा का पीकर बनाना जितना उन का वस्फ़ मशहूर है वह किसी का नहीं तसव्वुफ़ का दूसरा नाम ही इल्म अलख़लाक़ है, मीठी और नरम बोली, दिल जोई, इमदाद व इआनत, खबर गिरी, ईसार व कुर्बानी, इयादत व मिजाज परसी, ज़ख्मों पर मरहम रखना, भटके होऊं को राह रास्त पर लाना, दुखी दलों को राहत देना, ग़मज़दों की ग़म गुसारी, अमानत व दयानत, यतीमों की परवरिश, बेवाओं की देख भाल वगैरह, छोटे बड़े गुनाहों से बचना और ज़बान व आंख की हिफाज़त करना सूफ़िया अजाम ने जिस तरीके पर किया आम बशर के लिए मुश्किल है, उन के औकात ज़्यादा तर ज़िक्र व फ़िक्र में,
मसाजिद में और ख़लवतों में बसर हुए आम इंसानों से इख़तिलात कम रखते लिहाज़ा न किसी की ग़ीबत होती न चुगली न गाली गलोच न तहक़ीर व तज़लील, न इस्तिहज़ा व मजाक वह दूसरों की तरफ़ ज़्यादा इलतिफ़ात ही न करते, बाज़ सूफ़िया का मुज़ाहिर जमेला से लगाव और दिलचस्पी भी उन की फ़हम के ऐतबार से इस लिए थी कि वह उसे इश्क हक़ीक़ी का ज़ीना समझते थे इस के बावजूद मुहक़्क़ीन ने भी इस को पसंद न किया।
6।सूफ़िया कराम ने इज़ाअत वक़्त से भी जिस क़द्र गुरेज किया इस क़द्र दूसरों से आम तौर पर नहीं हो सिक्का उन के यहाँ एक लम्हा की गफलत भी बड़े ख़सारे का मूजिब (सबब) थी।
7।सूफ़िया कराम का एक बड़ा काम यह है कि उन्हों ने इल्म बातिन और नूर वफ़ीज़ इलाही को ख़ुसूसीयत के साथ अख़ज़ किया और दूसरों को इस से नवाजा। यह नूर एक तो मशाइख़ कामलियन के तवस्सुत से हासिल होता है और वह अपने तसर्फ़ व तवज्जो से इस नूर को मुरीदों के सीनों में मुंतक़िल करते हैं, दूसरे हुज़ूर पुरनूर ﷺ की इत्तिबा व पैरवी और आप की मुहब्बत व उलफ़त और आप ﷺ और नूर मुतअल्लिक़ यानी अल्लाह इज़ व जल की तरफ़ तवज्जो से हासिल होता है, इस के हुसूल के और भी ज़िमनी ज़राए हैं नीज़ मुजाहिदात व रियाज़ात को भी इस में काफ़ी दखल है। सूफ़िया कराम ने हर वह तरीका इख्तियार किया जिस से इस नूर का इकतिसाब किया जा सकता था और यही नूर और यही तरीका दर असल तसफ़ीया क़ल्ब व तज़किया नफ़्स का सबब था इस के ज़रिया बे शुमार फ़वाइद हासिल हुए और मज़कूरा बाला अक़ाइद व आमाल के ताल्लुक से उन के सारे इमतियाज़ात और कमालात इसी नूर का नतीजा और अमली मश्क़ का समरा थे। गुनाहों से इजतिनाब में भी इसी नूर को बहुत दखल था और हसन अख़लाक़ और किरदार साज़ी में यह अहम अंसर की हैसियत रखता था और ख़ास बात यह कि इख़लास जो सारे आमाल सालहा की जान और रूह है और क़बूलीयत का सबब है वह इसी के वसीले से कामिल तौर पर हासिल होता है, सूफ़िया
कराम अलैहिम इलरिज़्वान की ज़िन्दगी का लम्हा लम्हा इस का गवाह है।
8।जुमला अक़्वाल व आमाल का इख़लास पर मबनी होना बड़ा मुश्किल काम है और नफ़्स का जब तक तज़किया नहीं होता है इस वक़्त तक यह दौलत मुकम्मल तौर पर हाथ नहीं आपाती है नीज़ कामिल इख़लास के लिए क़ल्ब का हर गंदगी से पाक होना ख़ास कर हुब्ब दुनिया से आजाद होना भी ज़रूरी है और यह तसफ़ीया व तज़किया बग़ैर तरीका सूफ़िया अपनाए हासिल नहीं होता है।
मालूम रहे कि इल्म अलग चीज़ है और इस पर अमल जुदा चीज़, अमल इल्म पर मौक़ूफ़ है लेकिन इल्म अमल को मुस्तलिज़्म नहीं है। आज बड़े बड़े अहले इल्म हैं लेकिन उन की अमली हालतें अवाम तक को मालूम हैं । फिर आमाल में जिन आमाल का ताल्लुक क़ल्ब से है उन को कमा हुक्का बजा लाना बड़ा मुश्किल काम है जैसे हुब्ब इलाही, हुब्ब रसूल , मुहब्बत औलीए कराम, तो ब अली अल्लाह और ख़ौफ़ व ख़शीयत इलाही वगैरह अख़लाक़ व आमाल।
सूफ़िया कराम के बड़े कारनामों से यह है कि उन्हों ने वह उसूल व क़वाइद वज़ा किए जिन की वजह से शरीअत पर अमल आसान हो जाए, आमाल सालहा की बजाआवरी और मुआसी और ख़ताओं से इजतिनाब, अख़लाक़ हसना से आरास्तगी और अख़लाक़ सीइआ से परहेज़ की दौलत हाथ आजाए और बंदे में वह सिफ़ात पैदा हो जाएँ जिन को कुरआन व सुन्नत तलब करते हैं और जिन्हें रसूल कायनात ﷺ ने सहाबा में पैदा कीं।
9।इसी तरह अक़्वाल व अफ़आल में मियाना रवी शरीअत को निहायत महमूद है। आम तौर पर लोग इफ़रात व तफ़रीत का शिकार हो जाते हैं, सूफ़िया कराम ने तरबीयत का वह नहज इख्तियार फ़रमाया जिस से बंदे में मियाना रवी और तवस्सुत व एतिदाल पैदा होता है।
10।सूफ़िया कराम के ख़साइस से बहुत बड़ी चीज़ यह है कि उन्हों ने अपने मुजाहिदात व रियाज़ात की वजह से बहुत सी मख़फ़ी कुव्वतों को बेदार किया और नये नये क़ुवा और हवास से लोगों को आशना किया मसलन कश्फ़ व शहूद उन्ही बुजुर्गों की दीन है और अगर दूसरों को
मिला है तो उन्ही की सहबुतों से मिला है इसी तरह इलहाम भी है, यह नये कवी व हवास बहुत से उलूम नाफ़ा का ज़रिया बने और उम्मत उन उलूम से आशना हुई जिन को जुबानी तालीम व ताल्लुम से नहीं हासिल किया जा सकता था। उन उलूम की क़दरे तफ़सील हम किताब ‘‘कश्फ़ व इलहाम’’ में कर चुके हैं नीज़ उन उलूम की क़द्र व कीमत उन हक़ायक़ व मआरिफ़ से भी समझी जा सकती है जो मुहक़्क़ीन सूफ़िया की किताबों में महफूज़ हैं और आइंदा सफ़हात में इक़साम मआरिफ़ के ज़िमन में मुलाहिजा करें गे।
11।सूफ़िया के ख़साइस से करामात व तसर्फ़ात का हुसूल है। यह इतनी बड़ी दौलत है जिस का अंदाजा करना मुश्किल है कर्मात व तसर्फ़ात ज़्यादा तर मुजाहिदात व रियाज़ात का समरा होते हैं और उन के हुसूल के लिए मसाइब व आलाम की दुश्वार घाटियों से गुज़रना होता है, भूक पर भूक की मशक्कत झेलनी पड़ती है, राहतों को तजना (चौड़ना) पड़ता है, ख़ाहिशात का दम तोड़ना पड़ता है। इस के लिए सूफ़िया कराम अलैहिम इलरिज़्वान को मसाइब से जरूर दो चार होना पड़ा मगर इस्लाम व संयत और तसव्वुफ़ व रूहानियत की जो ख़िदमत उन्हों ने करडाली वह उन्ही का हिस्सा थी।
उमूमन लोग खिलाफ़ आदत कामों को बड़ी क़द्र की निगाहों से देखते हैं। हिंदोस्तान के जोगियों,गिरजा घरों और किलीसाओं के राहिबों या और उलमा-ए अशराक़ियेन ने जो कश्फ़ के ज़रिया ग़ैबी खबरें और मुस्तक़बिल की बातें बता बता कर अऔर खिलाफ़ आदत उमूर दिखा दिखा कर अपने मज़ाहिब बातिला की धूस और हक़्क़ानियत अवाम के दलों में बिठा रखी थी और अपनी अज़्मतों का जो सिक्का चला रखा था और अपने मुख़ालिफ़ीन को जिस क़द्र ख़ौफ़ ज़दा कर रखा था इस का मुकाबला सिर्फ़ सूफ़िया कराम के तसर्फ़ात व कर्मात ने किया और सब की हक़ीक़त लोगों पर वाज़िह कर दी और इस्लाम की हक़्क़ानियत को अजहर मिन अश्शम्स कर दिया।
आखिर कौन नहीं जानता है कि जादू गुरों के मुक़ाबिल हज़रत मूसा अला नबीना व अलैहि
अस्सलात व अस्सलाम को असा और यद बैजा अता किया गया, फ़िरऔन के जादू गुरों के जादू को कुरआन सह्र अज़ीम से ताबीर करता है इस मौका पर हक़ व बातिल की कैसी अजीब जिंग थी इस मैदान में हज़रत मूसा अलैहि अस्सलाम और दीन हक़ की फतेह और जादूगरों की शिकस्त और बातिल के बतलान की वज़ाहत अवाम व ख़वास के सामने सिर्फ़ मोजज़ात का समरा थी। अगर जुबानी तालीम व ताल्लुम और अख़लाक़ व आमाल ही हर एक पर इज़ाहत (इज़हार) हक़ के लिए काफ़ी होते तो अंबिया अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात को मोजज़ात की कोई हाजित न होती उन से बड़ा मुअल्लिम और उन से अज़ीम अख़लाक़ व आमाल का मालिक कौन हो सकता है।
सूफ़िया कराम की करामात व तसर्फ़ात उन्ही मोजज़ात का फ़ैज़ान और अक्स हैं अगर यह न होते तो मुख़तलिफ़ मुमालिक में जो मुख़तलिफ़ क़ौमों और जादूगरों से साबिक़ा पड़ा और दुश्मनान इस्लाम से जो सामना हुआ इस का मुकाबला सिर्फ़ जुबानी दावत व तबलीग़ से मुमकिन न था हिंदोस्तानी जादूगरों और दुश्मनों की तारीख जिन के सामने हैवो यकीन से जानते हैं कि एसों की तसख़ीर सिर्फ़ औलीए कराम व सूफ़िया अजाम अलैहिम इलरिज़्वान के तसर्फ़ात का नतीजा थी और लाखहा लाख लोगों को कुफ्र व शिर्क की ज़ुल्मतों से निकाल कर इस्लाम की नूरानी फ़िज़ा में खड़ा कर देना उन के तसर्फ़ात व करामात का नतीजा थी, आखिर अब क्यों नहीं यह काम हो पा रहा है जब कि तकरीरें और तहरीरें इस वक़्त बहुत ज़्यादा हैं। तबलीग़ व दावत का काम भी मुख़तलिफ़ फ़िरक़े मुख़तलिफ़ तरीकों से कर रहे हैं, जलसे जुलूस भी बहुत हो रहे हैं फिर भी काफ़िरों को कलिमा पढ़ाना और मुशरिकों को शिर्क की आलूदगियों से निकालना तो बड़ी चीज़ है मुसलमानों को सही और कामिल मुसलमान रखना मुश्किल हो गया है।
अक़ाइद व नज़रियात का ताल्लुक दिल के मानने से होता है। क़ल्ब व दिल से किसी चीज़ पा यकीन कर लेना और उसे मान लेना कोई दुश्वार काम नहीं मेहनत व मशक्कत अमल में होती है, नफ़्स पर सब से ज़्यादा ग्रां अमल है। आज हम अक़ाइद के तोहफ़्ज़ में भी नाकाम हैं,
हजारों जलसे, ख़ुतबात, तकरीरें, आरास की मुहाफ़िल व मजालिस, पेरी मुरीदी वगैरह के ज़रिया ना मालूम कितने अफराद कोशिशें कर रहे हैं मगर फिर भी लोग गुमराह होते चले जा रहे हैं और आमाल का तो हाल ज़ाहिर है, फिर आमाल को रिया वगैरह से बचाना उन में इस्तिक़ामत और उन को सही तरीके पर अदा करना कितना दुश्वार हो गया है, यह सब कुछ हस्सास और दर्द मंद अहले इल्म अच्छी तरह जानते हैं। सूफ़िया कराम ने तो कितने लाखों लाख काफ़िरों को कलिमा पढ़ाया, फ़ासिकों फ़ाजिरों को ताइब किया, बीअत वगैरह के ज़रिया गुनाहों से रोका और आमाल सालहा का पाबंद बनाया, शब् बेदार किया, मुख़लिस बनाया, ईसार व कुर्बानी का मालिक बनाया वगैरह वगैरह।
12। यह मज़मून अहादीस से साबित है कि जो दुनयवी हज़ूज़ व मनाफ़े जितने हासिल करते हैं इतने ही उन के उखरवी मनाफ़े कम हो जाते हैं। बहुत से सहाबा कराम अलैहिम इलरिज़्वान दुनियाही मिलने पर डरते थे कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारे आमाल की जज़ा हमें दुनिया में मिल जा रही है, कहीं आख़िरत में महरूम न हो जाऊं। सूफ़िया कराम अलैहिम इलरिज़्वान ने दुनिया को बक़दर ज़रूरत इस्तेमाल किया, खाने पीने लिबास घर वगैरह में हाजित पर इकतिफ़ा फ़रमाया।
हुज़ूर इकराम ﷺ दुआ फ़रमाते ‘‘ए अल्लाह आल मुहम्मद का रिज़्क़ कफ़्फ़ाफ़ बना यानी बक़दर हाजित बना।’’
सूफ़िया कराम ने इसी सुन्नत पर अमल किया नीज़ ख़ुद सर्वर कायनात ﷺ का अपना अमल भी सब पर अयाँ है।
13। औलीए कराम, सूफ़िया अजाम अलैहिम इलरिज़्वान के बड़े कामों से यह भी है कि उन के उलूम इस्तिदलाली कशफ़ी हो गए और इजमाली तफ़सीली हो गए थे जिन के ज़रिया नज़र व इस्तिदलाल के तंग कोचे से निकल कर कश्फ़ व शहूद की शाहराह पर गामज़न होकर कामिल
इतमीनान व यकीन की मंज़िल पर पहुँच गए। इस की क़दरे वज़ाहत यह है कि बालिग नज़र अहले इल्म अच्छी तरह जानते हैं कि नज़र व इस्तिदलाल से जो उलूम हासिल होते हैं उन में इंसान यकीन और हक़ व सवाब पर बड़ी मुश्किल से पहुँच पाता है। किसी का इस्तिदलाल किसी की मंज़िल पर पहुँचाता है, किसी का इस के खिलाफ़ दूसरी मंज़िल पर, कभी कभी तो बहुत आरा में बहुत इख़तिलाफ़ वाक़्य हो गया, इसी तरह बहुत से मुक़ामात पर कुरआन व सुन्नत के बाज़ मुतालिब व मुरादात के समझने में कसीर अक़्वाल वजूद में आगये और ख़ास कर अक्ल के ग़लबा ने निरे निरे एहतिमालात पैदा कर दिए, इस से तश्कीकात के दरवाजे खुले और बहुत से फ़र्क़ बातिला को अपने अपने मुख़तरआत व मुहद्दिसात के लिए ताईदात हासिल हुईं, आम तो आम बहुत से ख़ास भी वादी शकूक व शुबहात में गर पड़े। इसी लिए अल्लामा इकबाल ने कहा था।؏
है दानिश बुरहानी हैरत की फ़रावानी
सूफ़िया कराम सफ़े क़ल्ब व नफ़्स की बदौलत और कश्फ़ व इलहाम की बरकत से शकूक व शुबहात की वादियों में भटके नहीं और न भटकाया वह अक़ाइद व आमाल में लोगों को वह रास्ता दिखाते रहे जो कश्फ़ व इलहाम से मउईद व मजबूत था हम इस की बहुत सी मिसालें दे सकते हैं, क़दरे हम दूसरी किताबों में बयान कर चुके हैं, इस मुख़्तसर में गुंजाइश नहीं है।